Wednesday, May 10, 2017

कहाँ है किसानों का देश?

किसान अच्छा विषय है
लिखी जा सकती है कविता
जीता जा सकता है चुनाव
सदन में की जा सकती है बहस
बनाई जा सकती हैं नीतियाँ
बाँटे जा सकते हैं अनुदान
छीनी जा सकती है ज़मीन
उजाड़े जा सकते हैं गाँव
दी जा सकती है श्रम की मिसाल
बनाया जा सकता है मजदूर
बरसाई जा सकती हैं लाठियाँ
जताई जा सकती है संवेदना
कभी-कभी भर्रा भी सकता है
मसीहा का गला
सम्प्रेषण में आ सकता है व्यवधान
अर्द्ध-पूरित जल-पात्र से भरा जा सकता है घूँट
और अंत में पूछा जा सकता है- 'भई कैसा रहा बयान?'
प्रत्युत्तर में कहा जा सकता है-
'मार्वेलस सर! लग जाएगी स्क्रीन में आग!'
जैसे खड़ी फसल जलती है धू-धू
वैसे ही सुलग उट्ठेंगी किसानों में उम्मीद
जैसे झोंपड़ियों पर चलते हैं बुलडोज़र
वैसे ही प्रतिपक्ष हो जाएगा धराशायी
हँसी के साथ मसीहा दिखा सकता है पीठ
और सफ़ेद पीठ छूने का कुफ़्र कर सकता है
सरसराता हुआ सवाल- और किसान?

निस्पृह नागरी फ़िज़ा में तैरते हैं आरोप
विकास विरोधी होते हैं किसान
मुफ़्तख़ोर होते हैं किसान
कामचोर होते हैं किसान
क़र्ज़खोर होते हैं किसान
करचोर होते हैं किसान
करजोड़ होते हैं किसान
सिस्टम से सिर्फ़ और सिर्फ़ लेते हैं किसान
देश को, सरकार को क्या देते हैं किसान?
और इसी ऊब-डूब के बीच
सत्ता के अंतःपुर से उभरती है विषैली हँसी
दबी-दबी आवाज़ में ऐंठते हैं शब्द-
जो राजधानी की नहीं सुनता
उसकी राजधानी भी नहीं सुनती
जो राजधानी को देता है
उसी को देती है राजधानी भी
राजधानी को अन्नदाता की नहीं
राजधानी को आपूर्तिकर्त्ता की ज़रूरत है
फिर भी राजधानी के हृदय में लबालब संवेदना है
सत्ता के लकवाग्रस्त ऐंठे निचले होंठ से टपकते हैं दर्द
टपकती है अपार करुणा और यह अफवाह भी
कि भारत किसानों का देश है !

देश!
कहाँ है देश?
देश तो गल्प है!
किसान भी गल्प ही होंगे!
गल्प का भूगोल नहीं होता
गल्प के शब्द होते हैं
जो झड़ते रहते हैं अनवरत...

No comments:

Post a Comment

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...