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Sunday, November 20, 2016

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.     साक्षी है इतिहास
(मार्टिन नीमोलर को समर्पित)

जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे
अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ
बेग़ैरत और बेतकल्लुफ़ होकर उठाएँगे
गर उठाइगिरों की भाषा में कहूँ तो
आपके लिए आँखें बंद कर
तत्वज्ञाता बनने का मज़ा ही कुछ और है!

जगत के धृतराष्ट्रों, मैं संजय नहीं हूँ
मैं कोई रेडियो का जौकी भी नहीं हूँ
आपके दो कौड़ी के क्रिकेट का कमेंटेटर भी नहीं
इसलिए कुछ भी नहीं सुनाऊँगा


गर देखना चाहो तो देखो
आँखें खोलना चाहो तो खोलो
धूप का चश्मा नहीं, दूरबीन लाया हूँ

रक्त सने रेत को निचोड़ा जा रहा है
विकास का ईंधन आसानी से नहीं मिलता
वनदेवी के कपड़े उतारे जा रहे हैं
क्योंकि शर्म पूँजी की सबसे बड़ी दुश्मन है

स्वेच्छा से सर्वस्व दान नहीं करना
लोक की चिंता में परलोक को बिसराना
मालिक की हाँ में हाँ नहीं मिलाना
अपनी झोंपड़ी फूँकने से इनकार करना
शक्ति के समक्ष दंडवत प्रणाम नहीं करना
ये सब जघन्यतम अपराध हैं

ईश्वर और नरेश दोनों का अपमान!
और तो और आत्मरक्षा का एलान!
भूल गए वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान?
सीरिया की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ कृपा-निधान
यहाँ आएगा! यहाँ भी आएगा!!

यहाँ भी पहुँच चुके हैं उसके सिपहसालार
यहाँ भी पहुँच चुके हैं उसके सारे हथियार
शांति-शांति का शोर है युद्धघोष का चिन्ह
अभी भी वक़्त है खोलो आँखें और देखो
लगाकर समय का यह दूरबीन।

बात छत्तीसगढ़ या झारखंड की नहीं है
दुनिया अब अबूझमार का जंगल बन रही है
शिकारियों ने डालियों पर डाल दिए हैं डेरे
न्याय, विकास और सभ्यता का पाठ
साक्षी है इतिहास
इसी वेश में अब तक आते रहे हैं हत्यारे-लुटेरे
****

2.     समय को लकवा मार गया है

सर्द रात के चेहरे पर मुर्दनी छाई है
जुगनुओं के जिस्म अकड़ने लगे हैं
और उम्मीदों की टिमटिमाहट गुम हो गई है
नाउम्मीदी की स्याही गाढ़ी हो रही है
कोहरा और घना हो रहा है
पुरनूर आँखें बंद हो गई हैं
आसेबज़दा मजनूं का अकड़ा जिस्म
अकड़े जिस्म के भीतर क़ैद बेचैन रूह
तड़प तो रही है लेकिन बाहर कोई जुंबिश नहीं
स्याह शहर की स्याह गलियों में स्यापा जारी है
एक ज़िन्दगी हार गई है
लोग उम्मीदों का जनाज़ा सजा रहे हैं
दुनिया ऊब की गिरफ्त में है
बार-बार करवट बदल रही है
पथराई बस्ती में अब कहीं कोई हलचल नहीं है
समय को लकवा मार गया है
अंधे लोग अपनी नाक पोंछ रहे हैं
और एक बच्चा अपने होंठ चबा रहा है
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3.     पत्थर का बताशा

ख़्वाब बुनता है!
हर बार तुम्हें चुनता है
उसे मालूम है कि सपना है
मगर फिर भी दिल
दिमाग की कहाँ सुनता है!
कबीरी ठाठ है
इरादा शहंशाही है
वही काजल है वही स्याही है
तेरी आमद पर आँखों में सजाता है
जो तू जाए तो चेहरे पे मलता है
उसका प्यार सूफी का अमल है
भीड़ में मुस्कराता है
जंगल में सिर धुनता है
ख़्वाब बुनता है!
इश्क क़ुदरत का तमाशा है
चख कर देखो तो पत्थर का बताशा है
न शीरीनी खोती है न पिघलता है
है हमल ऐसा कि ताउम्र कोख में पलता है
ख़्वाब बुनता है!
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4.     ओ मेरे कौम-ओ-मुल्क के रहबरों!

ओ मेरे कौम-ओ-मुल्क के रहबरों!
गर बुरा न मानो तो एक बात कहूँ!
जिन्हें तम्बीह करते हो, वो कौन हैं?
जिसकी तसरीह करते हो, वो क्या है?
जिधर हाँकते हो हमको, उधर क्या है?

कि मैं देखता हूँ तुम हमेशा मंच पर हो
कि मैं देखता हूँ तुम्हारे आमाल निराले
कि मैं देखता हूँ तुम कभी आगे नहीं आते

रहबरी का ये अनोखा ढंग अख़ज़ किया कैसे?
कथनी-करनी के बीच फ़ासले को ढंका कैसे?
इंसानों को सदियों तलक छला कैसे?

फ़रेबी भ्रम का जाला मशक्कतों से टूटता ही नहीं
नेक इस्लाहों के बावजूद फासला घटता ही नहीं
इंसानियत रोज़-ब-रोज़ होती रही है ग़रीब

मेहनत और हलालख़ोरी क्यों है अज़ाब?
चुभता नहीं क्यों मठ और ख़ानकाहों का शबाब?
बुर्दाफरोशी और अस्मतदरी का क्यों उतरता नहीं नक़ाब?

मैं सचमुच उलझन में हूँ
मैं सचमुच हैरत में हूँ

कि बेग़ैरती क्यों बन गई है जादूई पोशाक?
कि लुटी-पिटी क़ौम के अब भी तुम ही हो बंदानवाज़!
कि तुम्हारे सेहर का असर चूकता ही नहीं!
लुटता-पिटता तो है इंसान पर उठता ही नहीं!

नहीं पूछूँगा क्यों और कैसे करते हो?
मज़लूम के कंधों पर बंदूकें कैसे रखते हो?
मासूम चिड़िया के पर कैसे कुतरते हो?
सफ़ा की आड़ में मरीज़ों को कैसे डसते हो?

मसीहा हो, मुझे इस गुंजलक से निकालो
भ्रम के अँधेरे में भटका हूँ, राह दिखा दो
ज़्यादा नहीं, बस इतना बता दो

शिकमपरस्त हो, सुरसा हो, समंदर हो, सहाबा हो, सिकंदर हो!
इंसानी लहू और गोश्त का ज़ायका क्या इतना अच्छा है?
कि तुम पीते जाते हो, कि तुम खाते जाते हो
और तुम्हारी भूख है कि घटती ही नहीं!
कि तुम्हारी भूख है कि बढ़ती ही जाती है!
****

5.     अंततः मारे जाओगे

ये कौन हैं, ये किसके हितैषी हैं?
माज़रा क्या है, ये किसके शिकारी हैं?

इंसानों की तो ये बात ही नहीं करते हैं!
सिर्फ गणितीय समीकरण में उलझे रहते हैं!

अत्याचारों का आधार
बलात्कारों का आधार
भ्रष्ट किरदारों का आधार
लुटेरे सिपहसालारों का आधार
मात्र संख्या ही है सबकी सरदार

खाकी, खद्दर, लद्धड़ सबके सब
खिलते, खुलते, खेलते हैं बस
संख्या और सांख्यिकी के साथ
जोड़-घटाव, गुणा-भाग... बाप रे बाप!

मालिक हैं कम, बिचौलिये ज़्यादा हैं।
हकीम-वैद्य हैं कम, बहेलिये ज़्यादा हैं।

हित सामूहिक अवधारणा नहीं है
न्याय सामूहिक अवधारणा नहीं है
प्रेम की ही तरह नफ़रत की भी
छल की ही तरह त्याग की भी
प्राकृत मौत की ही तरह हत्या की भी
कोई सामूहिक अवधारणा नहीं है

दर्शन, गीता, कुरान, बाइबिल या इंजील
ज्ञान-विज्ञान, ध्यान हो या चिंतन चातुर्य
अनुयायी तो संख्या पर ही अटक जाते हैं।

तुम बहुसंख्यक हो! तुम मानो
लेकिन बहुसंख्यक तो कोई नहीं है
दुनिया किसी देश का नाम नहीं है
तुम्हीं कहो, क्या कोई ऐसी क़ौम है?
जो तुम्हारी इस गणना का लिहाज रखे?

जातियाँ, उपजातियाँ, गोरे-काले, नीले-पीले
हिन्दू-मुस्लिम, यहूदी, सिख-इसाई ही नहीं
बल्कि सभ्य-असभ्य, नागरिक-आदिवासी
तुम जो भी हो, सबके-सब अल्पसंख्यक हो।

बहुसंख्यक शब्द संवेदनहीन है
जिसे चंद लुटेरों-चटोरों ने रचा है
इन मांस-भक्षियों ने अभी तुम्हें चुना है
वे सिर्फ खाएँगे, पेट उनका बहुत बड़ा है
शिकार तुम करोगे, ऐसा उन्होंने तय किया है
सो, सीमाओं का भ्रम मत पालो
लुटेरी चीलों की आँखें मत बनो
कि तुम बहुसंख्यक नहीं हो!

टीका-टोपी-क्रॉस, धोती-पाजामा-गाउन
तुम जब तक इनसे पहचाने जाओगे
अल्पसंख्यक ही रहोगे, अल्पसंख्यक ही कहलाओगे
हाँ, इंसानों का क़त्ल करते जाओगे
हत्यारों के पक्ष में नारे लगाते जाओगे
इस तरह धीरे-धीरे ख़ुद ही घटते जाओगे।
और अंततः मारे जाओगे।

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