Monday, October 10, 2016

लोकहृदय में बसते हैं राम

रामकथा बाँचने वाली शैली में कहूँ तो भारत भूमि के कण-कण में राम हैं, भारतीय मानस के क्षण-क्षण में राम हैं। भारत-भूमि पर वास करने वाले जन-जन में राम हैं। राम हैं तो भारत है। राम हैं तो हिन्दुस्तान है। राम मनुष्य-मात्र के कल्याण का निमित्त हैं। राम हैं तो मंगल है। राम करुणा-पुरुष हैं। राम मर्यादा-पुरुष हैं। दुष्ट-दलन करने वाले राम हैं। दुख-हरण करने वाले राम हैं। राम हैं तो वाल्मीकि हैं। राम हैं तो कबीर हैं। राम हैं तो तुलसीदास हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं जो यह मानते हैं कि वाल्मीकि हैं तो राम हैं। कबीर हैं तो राम हैं। तुलसीदास हैं तो राम हैं। धर्म और साहित्य इसी बिन्दु पर अलग होते हैं। पहला पक्ष दूसरे के विरुद्ध साक्ष्य लेकर उपस्थित होगा और यह दावा पेश करेगा कि राम तो आदि और अनंत हैं। राम का ज़िक्र तो वेदों में है, पुराणों में है, उपनिषदों और अरण्यक में है। वाल्मीकि नहीं होते तो भी राम होते। कबीर नहीं होते तो भी राम होते। तुलसीदास नहीं होते तो भी राम होते। राम तो भगवान हैं। घट-घट व्यापी हैं, अविरल और अविनाशी हैं। आस्था तो यही कहती है, किन्तु विवेक विरोध करता है।



प्रश्न यह उठता है कि यदि राम से वाल्मीकि, कबीर और तुलसी हैं तो फिर इनके पहले राम कहाँ थे? क्यों भक्तिकाल में ही राम जन-जन में बस सके? राम और उनकी अयोध्या का अस्तित्त्व तो वाल्मीकि से भी पीछे की घटना है। बल्कि कबीर और तुलसीदास से पहले जन-जन में राम वाली उक्ति क्या लोक-मुहावरा बन सकी थी? आज भी ऐसे कितने लोग होंगे जिन्होंने वाल्मीकि रामायण का पारायण किया होगा? और रामचरितमानस! देश की अधिसंख्य जनता ने इसे पढ़ा भले न हो, सुना ज़रूर होगा! राम को घर-घर तक पहुँचाने वाले कौन हुए फिर? निश्चिय ही कबीर और तुलसीदास। बल्कि तुलसीदास से भी पहले कबीर। यह अलग बात है कि कबीर के राम दशरथ सुत नहीं हैं। और जो हों भी तो सगुन-साकार तो बिल्कुल नहीं। कबीर के राम निर्गुण और निराकार हैं। उनके लिए तो राम नाम ही साँचा है। कोई पीवै रे रस राम नाम का, जो पीवै सो जोगी रे। कबीर के लिए तो योगी वही है जो राम नाम का रस पीता हो। राम के प्रति कबीर का जो इश्क है वह भी मस्ताना है। हरि मेरा पीव मैं हरि की बहुरिया, राम बड़े मैं छुटक लहुरिया। कबीर के राम कबीर में ही समाहित और समादृत हैं। उनको ढूंढने के लिए बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं है। जाके राम सरीखा साहिब भाई, सों क्यूँ अनत पुकारन जाई।
अलबत्ता तुलसीदास के राम बिल्कुल हमारी-आपकी तरह के राम हैं। तुलसी के राम का जीवन बिल्कुल सर्वसामान्य मनुष्य जितना ही सामान्य है। यहाँ हर्ष-विषाद, सुख-दुख, प्रेम-क्रोध, त्याग-तपस्या, विरह-मिलन, जीवन-मरण, शोक-हर्ष सबकुछ है। यह अलग बात है कि तुलसीदास भी अतिश्योक्ति से बच नहीं पाते जब वे लिखते हैं कि रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा॥ ख़्वाब में देखने का प्रश्न ही कहाँ उठता है, जब हम यह स्वीकार करते हैं कि राम भारतीय मानस के अभिन्न अंग हैं। इसीलिए कबीर को अन्यत्र भटकने अथवा टेर लगाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। किन्तु यह भी सत्य है कि सबके अपने-अपने राम हैं। कबीर के राम, तुलसी के राम से भिन्न हैं और तुलसी के राम वाल्मीकि के राम से किंचित अलग। बल्कि जन-सामान्य के राम, पुरोहितों के राम और साहित्यिकों के राम भी भिन्न-भिन्न हैं। असंख्य राम-कथाएँ हैं। राम को लेकर असंख्य दृष्टिकोण भी हैं। यह ऐसा अथाह समुद्र है, जिसमें डूबने के बाद उबरने की सम्भावना लेश-मात्र भी शेष नहीं बचती। जैनियों के राम थे, बौद्धों के राम थे, हिन्दुओं के राम थे। और तो और एकेश्वरवादी मुसलमानों के भी राम थे! थे क्या हैं। तुलसीकृत रामचरितमानस का पहला पाठक भी मुसलमान था। स्वयं तुलसीदास के अनन्य मित्र रहे अब्दुर्रहीम खानखाना ने रामचरित मानस को मुसलमानों के लिए भी आदर्श पुस्तक के रूप में चिन्हित करते हुए कहा था, रामचरित मानस विमल, संतन जीवन प्राण/हिन्दुअन को वेदसम जमनहिं प्रगट कुरान। वह रहीम ही थे, जिनके आग्रह पर तुलसीदास ने बरवै रामायण की रचना की थी। और तो और जिस वक़्त जहाँगीर हिन्दुस्तान के बादशाह हुआ करते थे, उस वक़्त मुल्ला मसीह ने मसीही रामायन की रचना की थी। अतः राम और मुसलमान के बीच अन्तर्सम्बंधों की पड़ताल का बौद्धिक नाटक भी बेजा ही है।
मेरी जिज्ञासा का मूल यह है कि आख़िर राम में ऐसा क्या था जो उन्हें सबके लिए स्तुत्य बनाए रखता है? कुछ तो ऐसा ज़रूर ही था जो एक नायक को भगवान के पद पर प्रतिष्ठित कर देता है। भगवान! भगवान भी तो असंख्य हैं, फिर राम ही क्यों सर्वाधिक लोकप्रिय हैं? मेरा विवेक कहता है कि राम की विलक्षणता उनकी विपरीत जीवन-स्थितियों में निहित है। हालांकि इस नुक़्ते-नज़र से कृष्ण और शिव की दावेदारी भी मज़बूत ठहरती है। फिर भी यदि राम ने तमाम कवियों को मोहासिक्त बनाया तो मुमकिन है कि राम के व्यक्तित्व में आमजन का कुछ अधिक ही साझा होगा! अतः जब उद्भ्रांत यह प्रश्न करते हैं कि प्रत्येक भारतवासी की/आत्मा के मंदिर में/सुशोभित हैं सदियों से।/कभी हमने कोशिश की/देखने की वह मंदिर?’(अयोध्या-1, बिंब) तो इस प्रश्न का उत्तर प्रतिप्रश्न के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होता है; यदि भारतवासी ने अपनी आत्मा के मंदिर में सुशोभित राम को नहीं देखा होता तो फिर राम कालजयी कैसे हुए होते? कितने मंदिर होंगे राम के? मंदिरों में सुशोभित होने को यदि लोकप्रियता और लोक-स्वीकार्यता का आधार बनाया जाए तो शिव और कृष्ण की तुलना में राम काफ़ी पीछे छूट जाएँगे। लेकिन ऐसा है नहीं। सच तो यह है कि राम कभी मंदिर और पुरोहित की पकड़ में आए ही नहीं। राम हमेशा जनसामान्य के हृदय में ही प्रतिष्ठापित रहे हैं। इसी बिन्दु पर यह हिसाब भी गड़बड़ाता-सा प्रतीत होता है कि साहित्य ने राम को और राम ने साहित्य को कितना दिया है? वैसे साहित्य भी तो लोकमानस से ही उत्प्रेरण ग्रहण करता है। ऐसी स्थिति में क्या यह मुमकिन नहीं कि कवियों ने राम को लोक ही से ग्रहण किया हो?
राम की लोकप्रियता का क्षरण ही वहाँ से शुरू होता है जहाँ से राम पर पुरोहितवाद हावी होने की चेष्टा प्रारंभ करता है। विकल्प मंच के दिगंबर ने ठीक ही लिखा है कि जबतक राम की जन्मभूमि का दावा अदालत में नहीं पहुँचा था/अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद राम लोकमन में बसते थे/सिया होती थी संग-साथ, सियावर रामचन्द्र की जय/विधुर नहीं थे कि कोई कहे जय श्री राम/अब राम शब्द सुनते ही जो चित्र आँखों में उभरता है, वह तकलीफ़देह है/उनके जयकारे की धुन पर जलते हैं इन्सान और मकान, होते हैं बलात्कार/पड़ते हैं गड्डी-गड्डी वोट, बनती है सरकार। कुंवर नारायण की चिंता भी यही है, अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं/योद्धाओं की लंका है/'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं/चुनाव का डंका है! कहने की ज़रूरत नहीं कि राम का संकट वही है जो हिन्दुस्तान के आमजन का संकट है। राष्ट्र के संस्थानीकरण की प्रक्रिया ने जिस प्रकार लोकतंत्र का गला घोंटा है, ठीक उसी तरह राम भी धर्म के संस्थानीकरण की भ्रष्ट प्रक्रिया का शिकार हुए हैं। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे जन-मानस से उनका लोप हो रहा है। लेकिन यह काम राम का नहीं, राम नाम के सौदागरों का है। कभी सियावर रामचन्द्र की जय के उद्बोधन से आत्मीयता और प्रेमरस का संचार होता था और हृदय अनायास ही भाव-विभोर हो जय-जय गा उठता था। लेकिन आज इसके ठीक विपरीत जय श्री राम का उद्घोष भय और घृणा उत्पन्न करता है। बदन में झुरझुरी सी उठती है। दिल झूमने को नहीं, झुरझुराने को विवश होता है। यहाँ भक्ति नहीं शक्ति हावी नज़र आती है। तामसी प्रवृत्ति अपने विभत्सतम रूप में प्रत्यक्ष होती है।
ये कौन लोग हैं जो राम को कुख्यात बना रहे हैं? राम नाम को असहज बना रहे हैं? मधुर गीत को कर्कश शोर में तब्दील कर रहे हैं? हमारा राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम था। वह तो अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥ हमारा राम तो आदर्शों को जीने वाला राम था। गृहस्थ राम था। माता-पिता की आज्ञा का पालन करने वाला राम था। अपने भाइयों और मित्रों के साथ भोजन करने वाला राम था। ऐसा गृहस्थ और परिवारी राम अचानक एकाकी कैसे हो गया? आप कहेंगे कि सियाराम या सियावर राम और श्री राम में कुछ भेद नहीं! भेद है तो बस इतना कि एक तद्भव है और दूसरा तत्सम। किन्तु मैं नहीं मानता। इन दोनों में भेद है, गहरा भेद, वही भेद जो महाभारत और राम-रावण युद्ध में है। सियाराम या सियावर राम में परिवार है, इसलिए प्रेम भी है। जबकि श्री राम कहते ही परिवार ग़ायब हो जाता है। अब जो शेष है, वह केवल शक्तिजन्य प्रमाद है। भाव से रहित। ऐसे राम से लोकमन नहीं जुड़ता।
वैसे लोकमन से जुड़ाव का एकमात्र यही कारण नहीं है क्योंकि 14 वर्षों के वनवास के बाद लौटते ही मर्यादा का पहला कोड़ा सीता की पीठ पर ही पड़ा। शिकायतों का पुलिंदा है, अरे कइसे याद करी दुनिया जब राम ही लोक कली के मिटवलें... मिथिला तो आज तक अपनी बेटी के साथ हुए अन्याय को भूल नहीं पाया है। फिर भी लोकमन यदि राम को बिसरा नहीं पाया तो उसका बड़ा कारण यह है कि राम ने पत्नी की रक्षा का प्राथमिक धर्म निभाया। उन्होंने अपनी पत्नी को दाँव पर नहीं लगाया था और न ही चीर-हरण के मूकदर्शक बने थे। उन्होंने राज्य-सत्ता में हिस्सेदारी के निमित्त युद्ध की आतुरता प्रदर्शित नहीं की थी। राम ने यदि युद्ध किया था तो अपनी पत्नी के शील और मान की रक्षा के लिए। छलपूर्वक सीता का अपहरण करने वाले रावण को सबक़ सिखाने के लिए। राम-रावण युद्ध राज्य विस्तार या शक्ति-प्रदर्शन हेतु नहीं लड़ा गया था। इस युद्ध का कारण नितांत व्यक्तिक और पारिवारिक था। यह अस्मिता की लड़ाई थी, इसीलिए आज भी लोकग्राह्य है।
राम का वन-गमन पांडवों के वन-गमन से बिल्कुल भिन्न है। वहाँ प्राण-रक्षा ध्येय था, यहाँ पिता के वचन की रक्षा। वहाँ अपने ही परिवारी जनों की घृणा और द्वेष का दबाव था, यहाँ माता-पिता के बीच रागात्मक सम्बंध को बनाए रखने की सदिच्छा थी। वहाँ सत्ता के लिए भाई-भाई का दुश्मन बना था। यहाँ भ्रातृ-मातृ-पितृ-प्रेम और एक-दूसरे के लिए त्याग की भावना प्रबल थी। वर्ना आप ही बताइए, भरत को राम के खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखने की क्या आवश्यकता थी? वनवास तो राम के लिए था, लक्ष्मण को जाने की क्या आवश्यकता थी? और तो और सुकुमारी सीता को पति के साथ वन में भटकने की क्या ज़रूरत थी? जब हम इन तमाम जीवन-दृश्यों से गुज़रते हैं तब जाकर यह सत्य उद्घाटित होता है कि लोकहृदय में राम का ही मंदिर क्यों बन सका? कवियों ने तो राम से कहीं अधिक मनोहारी छवि कृष्ण की गढ़ी है, फिर भी मन राम-राम ही क्यों करता है? क्योंकि राम में सामान्य लोक को अपनी छवि दिखती है। राम हमेशा सीता के साथ स्मरण आते हैं। यानी पूर्णतः गृहस्थ राम। कृष्ण की पत्नी का कितनों को ढंग से नाम याद है?
राम का जीवन एक ऐसे व्यक्ति का जीवन है जो परिवार को एकजुट रखने की तीव्र इच्छा से संचालित है। राम का जीवन एक ऐसे व्यक्ति का जीवन है जो एक साथ पारिवारिक और सामाजिक दायित्व और दबावों के निर्वाह की सदिच्छा द्वारा संचालित है। राम का जीवन एक ऐसे व्यक्ति का जीवन है जो सामाजिक-पारिवारिक मर्यादा को अक्षुण्ण रखने की आत्महंता आस्था से संचालित है। राम का जीवन एक मुहाजिर का जीवन है। एक ऐसे मुहाजिर का, जो तमाम दुखों को भोगता हुआ भी सुंदर भविष्य के स्वप्न देखता है, समर्पण नहीं करता। बाधाओं से बार-बार टकराता है। राम का जीवन एक ऐसे प्रेमी का जीवन है जो मरजाद की ख़ातिर अपनी प्रेमिका का त्याग करने को विवश है। ज़रा सोचिए, जिस समय गर्भवती सीता अकेली जंगल के लिए निकली होंगी, उस समय राम के हृदय में कैसी उथल-पुथल मची होगी! रामकथा में कहीं भी निरा बौद्धिकपना नहीं है। यहाँ जीवन का कटु यथार्थ है। विवशता है, वेदना है, त्याग है। यदि वनवास के बाद भी सीता जंगल में पति-वियोग सहन कर रही हैं तो राजभवन में बैठे राम का जीवन भी एकाकी ही है।
फ़िल्म मुग़लेआज़म में पिता और बादशाह के कर्त्तव्यों के बीच का जो द्वंद्व है, वह भी तो राम के जीवन का ही द्वंद्व है। बादशाह के कर्त्तव्य और पिता के दायित्व के बीच झूलते अकबर में भी तो राम ही की छवि है। क्या गोदान के होरी और रामचरितमानस के राम में साम्य नहीं है? यदि आप राम के जीवन-चरित और होरी के जीवन-संघर्ष पर ग़ौर करें तो मुमकिन है कि आप भी मुझसे सहमत होंगे! पृष्ठभूमि और पैटर्न का ही तो फ़र्क़ है, शेष सबकुछ एक जैसा। इसलिए साहित्य में राम की तलाश करते समय शब्द राम नहीं बल्कि भाव राम को ध्यान में रखना आवश्यक है। जब हम भाव राम पर स्वयं को केन्द्रित करते हैं तो रहस्य-तिमिर के तन्तु छिन्न-भिन्न होने लगते हैं। रामचरितमानस की लोकप्रियता का असली कारण समझ में आने लगता है और राम लोकमंगल के प्रतीक पुरुष के रूप में उभरने लगते हैं।
राम आमजन के प्रतिनिधि पुरुष हैं और धर्म श्रेष्ठियों का सत्ता-प्रपंच। दोनों बिल्कुल दो ध्रुवों की तरह हैं। राम मंदिर के लिए बने ही नहीं। उन्हें तो जबरन मंदिर में बैठाने के कुत्सित प्रयास होते रहे हैं। अपने वास्तविक रूप में राम का चरित्र लोक-सापेक्ष है, लोकोन्मुख है किन्तु वर्तमान परिदृश्य त्रासद है क्योंकि राम के राजनीतिकरण की प्रक्रिया में राम को धर्मोन्मुख बना दिया गया है। भारत के मानस में बसने वाले राम को साम्प्रदायिक बना दिया गया है। राही मासूम रज़ा की नज़्म इसी वेदना को शब्द देती है, ऐ श्रीराम, रघुपति राघव, ऐ मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम/ये आपकी दौलत आप सम्हालें/मैं बेबस हूँ/आग और ख़ून के इस दलदल में/मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं। जिस राम ने मर्यादा और लोकमंगल के लिए अपने जीवन में सभी सम्भव सुखों की तिलांजलि दे दी, कष्ट उठाए, उसी राम के नाम पर मर्यादा का दामन तार-तार किया गया। जिस राम ने प्रेम को अक्षुण्ण रखने के लिए स्वेच्छा से वनवास स्वीकारा था, उसी राम को बलपूर्वक लोकहृदय से खींचकर निकाला जा रहा है, उन्हें सत्ता और शक्ति के लोभ में दोबारा वनवास को विवश किया जा रहा है, पाँव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे/कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे/पाँव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे/राजधानी की फ़िज़ा आई नहीं रास मुझे/छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे!(कैफ़ी आज़मी) राम पुनः वनवास को मजबूर हैं। लेकिन अब राम लौटें भी तो किस जंगल को लौटेंगे? सत्ता-धर्म के गठजोड़ ने कहीं भी कुछ भी कहाँ निरापद रहने दिया है। अतः सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ/किसी पुरान-किसी धर्मग्रन्थ में/सकुशल सपत्नीक..../अबके जंगल वो जंगल नहीं/जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!(कुँवर नारायण) लेकिन धर्मग्रन्थ में राम सुरक्षित नहीं रह सकते। वहाँ ख़तरा है। उनके लिए तो साहित्य या फिर लोकहृदय ही उपयुक्त जगह हो सकती है।


समस्या सचमुच विकट है। धर्म और सत्ता जब किसी लोकनायक का अपहरण कर लेती हैं, तब ऐसी ही स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। जंगल-जंगल नंगे पाँव भटकने वाला श्रमशील राम स्वर्णाभूषणों से मंडित किए जाने के बाद मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दिया जाता है। लोकमन के स्वामी राम को पुरोहितों का चाकर बना दिया जाता है। साहित्य लोकमन में राम के स्थान को अक्षुण्ण रख सकता था, यदि धर्म की कुत्सित नज़र नहीं पड़ी होती। राम आज विडंबनापूर्ण स्थितियों में नहीं घिरे होते यदि राजनीति से राम को बचाया जा सकता। लेकिन शोक! जन पर तंत्र हावी होता गया और राम का साम्राज्य सिमटता चला गया। मेरे राम इससे बड़ा क्या हो सकता है/हमारा दुर्भाग्य/एक विवादित स्थल में सिमट कर/रह गया तुम्हारा साम्राज्य। लेकिन मैं निराशावादी नहीं हूँ। केवल विवादित ढाँचे और धार्मिक उन्माद के वशीभूत हुए साम्प्रदायिक दंगों की कलिमा से राम का प्रांजल व्यक्तित्व और संघर्ष धूमिल नहीं हो सकता। कुछ मंथरा-प्रवृत्ति के लोगों से भारतीय मानस में फूट नहीं पड़ सकती। धर्म बहुत दिनों तक राम को मंदिर में क़ैद नहीं रख सकता और न ही राजनीति राम को बाँधे रख सकती है। राम मुहाज़िर थे, हैं और रहेंगे। उनके क़दम किसी गर्भगृह में जड़ नहीं हो सकते। साहित्य अभी राम के साथ है और लोकहृदय में अब भी राम का वास है। मुझे पुख़्ता यक़ीन है, मेरा राम मेरे परिवार को टूटने नहीं देगा। वह फिर-फिर वनवास को सहर्ष तैयार होगा। वह फिर-फिर अयोध्या लौटेगा। मंदिर-मस्ज़िद तो टूटते-बनते रहते हैं। राम का अस्तित्व हमेशा अक्षुण्ण रहता आया है और रहेगा भी। (फोटोः गूगल से साभार)

3 comments:

  1. Shandar, ummid ke anurup! Sadhuvad Akbar Bhai...

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  2. माशाल्लाह ये बेहतरीन है :)

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