Thursday, June 30, 2016

पुतुल : जीवन का प्रतिरूप

कठपुतली! एक व्यंजनामूलक शब्द है— सामान्य-जीवन में भी, कला-साहित्य में भी। तुलसी-रचित रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से कहते हैं, उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।। फ़िल्म 'आनंद' के लिए गुलज़ार इसी भाव को अपने अंदाज़ में संवादबद्ध करते हैं। आनंद अपने मित्र डॉ. भास्कर से कहता है— हम सब रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है। हालांकि गुलज़ार के इस संवाद से अधिक परिपक्व कथन जॉर्ज बकनर का है, उनके मुताबिक हमलोग महज कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर अज्ञात शक्तियों के हाथों में है। सहज शब्दों में कहें तो हम उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित और संचालित हैं, जो हमेशा नेपथ्य में रहती हैं। यही बात सातवें अखिल भारतीय पुतुल महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर बिना किसी अगर-मगर के कपिला वात्सायन ने कही— ऐसे या वैसे, चाहे जैसे, हम सब पपेट्स हैं। फिर भी यह प्रश्न तो मन को व्यथित करता ही है कि क्या सचमुच हाड़-मांस का हमारा यह शरीर भी काठ सरीखा निर्जीव है? और यह भी कि क्या हम जो कुछ भी करते-सोचते हैं, वह सब महज हमारा भ्रम है? कि हमारी प्रज्ञा, हमारा विवेक, हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण, हमारी भावनाएँ—इनका कोई महत्व नहीं है? कि यह सब कल्पना-मात्र हैं? मानव-अस्तित्व से जुड़े इन भारी-भरकम प्रश्नों को यदि हल्के में ही लें और इनकी सांकेतिकता को भी सामान्यीकृत कर लें, फिर भी यह बात कम परेशान करने वाली तो ख़ैर नहीं ही है कि हाड़-मांस से निर्मित, प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी भी अन्ततः कठपुतली सरीखा है, जिसकी एक-एक गतिविधि पर किसी अज्ञात कुल-शील शक्ति का नियंत्रण है! इस लिहाज़ से देखें तो कठपुतलियाँ, मनुष्य से अधिक स्वभाविक जान पड़ती हैं; विशेष रूप से तब, जब यह साहित्य और सामान्य जीवन में प्रयुक्त होने वाले मुहावरे से इतर, रंगमंच पर अवतरित होती हैं।
यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि अपने अभिधात्मक स्वरूप में यह शब्द और अधिक व्यंग्यात्मक हो उठता है। रंगमंच पर इनके अवतरण से एक ऐसा बोध-संसार निर्मित होता है, जहाँ तमाम सामाजिक-बौद्धिक अवधारणाएँ एकबारगी संदिग्ध हो उठती हैं और हम विस्मित-विमूढ़ यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि कौन किसको नचा रहा है? कठपुतली को नचाया जा रहा है या कठपुतली ही नचा रही है? या कि दोनों एक-दूसरे को नचा रहे हैं?’ तुलसीदास से शब्द उधार लें तो नट मरकट इव सबहि नचावत।(किष्किन्धाकाण्ड, रामचरितमानस) नट ही नहीं मरकट (बंदर) भी नचाता है। यहाँ द्वंद्व जितना घना और गहरा है, व्यंजना उतनी ही व्यापक।
       यह कैसा मायालोक है, जहाँ नट-मरकट दोनों नचाते हैं? अजब द्वंद्व है! चेतना के पटल पर कठपुतली नृत्यरत् है, पंडित कुमार गन्धर्व के स्वर में 'माया महाठगिनी हम जानी'(कबीर) सुन रहा हूँ और स्मृति के थाल में शैलेन्द्र का गीत ठनक रहा है—'बोल री कठपुतली डोरी कौन संग बाँधी/सच बतला तू नाचे किसके लिए?/जहाँ जिधर साजन ले जाए, संग चलूँ मैं छाया सी/वो हैं मेरे जादूगर, मैं जादूगर की माया सी'।(कठपुतली, 1957) दोनों एक-दूसरे को व्याख्यायित करते से प्रतीत होते हैं— 'केसव के कमला ह्वै बैठी, सिव के भवन भवानी/पंडा के मूरत ह्वै बैठी, तीरथ में भई पानी/जोगि के जोगिन ह्वै बैठी, राजा के घर रानी'। कठपुतली अगर माया है तो जादूगर निश्चित रूप से पुतुल कलाकार को होना चाहिए! किन्तु पुतुल कलाकार तो बिल्कुल कठपुतली के रंग में रंगा नज़र आता है, जैसे माया केशव के घर कमला और शिव के भवन भवानी बन जाती है। कौन किसकी छाया है? कौन जादूगर और कौन माया है? शुक्र है कि 'माया' दर्शन नहीं, अनुभूति है! ...धागे के दो छोरों के बीच का अंतराल वस्तुतः सत्य और माया (मिथ्या) के मध्य का अंतराल है। छद्म और यथार्थ के मध्य का अंतराल है। जो प्रत्यक्ष है वह माया है, जो अप्रत्यक्ष है वह यथार्थ है। 'पपेटीअर' यदि दर्शकों को 'प्रत्यक्ष' पर केन्द्रित कर पाया तो वह सफल है, अन्यथा नहीं। 'पुतुल' ज़िन्दगी का ऐसा सच्चा-खेल है जो वास्तविक होकर भी अवास्तविक है। असली हुनर भी यही है कि अवास्तविक बिल्कुल वास्तविक और वास्तविक बिल्कुल अवास्तविक लगे। और जीवन की व्यंजना इसलिए कि वास्तविक को अवास्तविक मानकर देखने को हम अनुकूलित हैं। साहित्य और तमाम दूसरी कला-विधाओं से यह भिन्न इस सन्दर्भ में कि जहाँ अन्य कलाएँ अपनी युक्तियों से छद्म को सदैव यथार्थ करने की चेष्टा में रत् रहती हैं वहीं 'पुतुल-कला' में छद्म और यथार्थ के बीच की आँख-मिचौली सदैव आपकी आँखों के सामने चुनौती-स्वरूप मौजूद रहती है। आप बंधते हैं या मुक्त होते हैं, इन्द्रियाँ मोहासिक्त होती हैं या नहीं, यह आपकी प्रज्ञा पर निर्भर करता है क्योंकि डोरों के एक-एक छोर से कठपुतली के जिस्म का जोड़-जोड़ बिंधा हुआ है तो दूसरा छोर पुतुल-कलाकार की उँगलियों से बद्ध है। मंच पर कठपुतली है, नेपथ्य में उसका कर्त्ता।
पुतुल नाट्य के छोटे से मंच के पीछे बड़ा-सा नेपथ्य और निर्जीव पुतुलों का व्यवस्थित ढेर। प्रसंगानुकूल पात्र जीवंत होते हैं, मंच पर आते हैं, युद्ध-प्रेम-चुनौती-घात-प्रतिघात-नृत्य-संवाद आदि होते हैं और फिर ये पुतुल मंच के दाएँ-बाएँ बने संकरे गलियारों से नेपथ्य में लौट जाते हैं। मंच से ओझल होते ही प्राणवान कठपुतलियाँ पुनश्च निष्प्राण हो जाती हैं। शेक्सपियर का कथन याद आता है, सम्पूर्ण विश्व एक मंच है/और सभी स्त्री-पुरुष मात्र अभिनेता:/सभी की अपनी प्रविष्टियाँ एवं निकास हैं;/और एक आदमी अपने समय में कई-कई भूमिकाएँ निभाता है।(ऐज़ यू लाइक इट) पुतुल-कलाकार एक ही समय में सचमुच कई-कई भूमिकाएँ अदा करता है। पुतुल का हाथ-पैर-मुँह-भाव-विभाव आदि पुतुल-कलाकार ही है। पुतुल के पैर नहीं होते, किन्तु 'पपेटीअर' के होते हैं और उनमें घूँघरू बंधे हैं। पुतुल मूक होते हैं, स्वर कर्त्ता भरता है। मंच पर जब पुतुल का सिर दाएँ-बाएँ या ऊपर-नीचे गति करता है तो ठीक उसी वक़्त पर्दे के पीछे 'पपेटीअर' का सिर भी उसी लय से और उसी दिशा में गतिशील होता है। मंच पर झमाके के साथ आक्रोश का इज़हार यदि पुतुल करता है तो मंच के पीछे पुतुल-संचालक ही अपने पैर पटकता है। सजे-संवरे, चटख-आकर्षक पुतुलों-पुतलियों का अभिनय-नर्तन मंच की शोभा हैं, जबकि नेपथ्य किंचित कम प्रकाशमान, थोड़ा कम व्यवस्थित किन्तु मंच और कठपुतलियों से अधिक गतिशील और कम्पायमान। जहाँ तक महत्ता का प्रश्न है तो 'पुतुल' के सन्दर्भ में 'ऑन स्टेज' और 'ऑफ़ स्टेज' दोनों महत्वपूर्ण हैं, किन्तु नेपथ्य कहीं अधिक प्रभावी है। होना भी चाहिए, क्योंकि नियंता शक्ति तो 'ऑफ स्टेज' ही है। लेकिन यह केवल नियंता की भूमिका में नहीं होती, बल्कि स्वयं भी नियंत्रित होती है- पात्र और कथानक द्वारा; टाइम और स्पेस द्वारा। अभिनय केवल 'पुतुल' नहीं करते, पुतुलों को नचाने वाला भी करता है। बल्कि इसको थोड़ा और सही करें तो अभिनय पुतुल नहीं, पुतुल-कलाकार करता है। क्या आपने पर्दे के पीछे का दृश्य देखा है? असली नाटक वहीं होता है। मंच पर तो संवेदनारहित पुतुलों की उछल-कूद और पैंतरे ही नज़र आते हैं, मंच के पीछे प्रसंगानुकूल हँसते, गुर्राते, गाते, रोते पुतुल-कलाकारों की भाव-भंगियों से तो आप नावाक़िफ़ ही रह जाते हैं। हाँ, 'दस्ताना-पुतुल' में चूँकि मंच और यवनिका सांकेतिक होते हैं, अतः वहाँ आप पुतुल-संचालक के क्रिया-व्यापार भी देख सकते हैं। इस कला-रूप की यही विशेषता है— पुतुल और पुतुल-संचालक दोनों को मिलाकर एक पात्र की निर्मिति होती है। जीवंतता दोनों के संलयन से आती है। और यह भी कि मंच पर प्रत्यक्ष पुतुल-नर्तन में तो अंतराल होता है, जबकि नेपथ्य में उसके कर्ता का नृत्य अप्रतिहत होता है।
प्रयाग शुक्ल लिखते हैं कि पुतुल बोलती या बोलता नहीं है। उसकी ओर से बोलता है 'सूत्रधार'। उसकी यह बात ही उसकी 'पहचान' है। अगर पुतुल को स्वयं किसी कृत्रिम मशीनी ढंग से बुलवा दिया जाए तो उसकी मूल-प्रकृति ही नष्ट हो जाएगी।(संगना, अ.जू.2011, पृ.76) यह सत्य तो है किन्तु अपूर्ण है। मनुष्य तो स्वयं बोलता है! लेकिन वह जो बोलता या सोचता है, वह कितना उसका अपना होता है? मनुष्य भी तो बाह्य-परिस्थितियों द्वारा संचालित है! अभ्यासजन्य और प्रभावजन्य मनुष्य-जीवन का सम्पूर्ण क्रिया-व्यापार (बहुत हद तक) भी तो यांत्रिक ही है, फिर भी मनुष्यत्व संकटग्रस्त नहीं होता। जब पुतुलवत् जीवन के बावजूद मनुष्य की पहचान संकटापन्न नहीं होती तो पुतुल की क्योंकर होगी? हाँ, पुतुल की 'पहचान' नष्ट तब होगी जब वह बोलने के साथ-साथ ख़ुद अपने पैरों से चलने लगेगा। किन्तु ऐसा होगा क्यों? पुतुल बोलने लगे, पुतुल चलने लगे तो पुतुल फिर पुतुल कहाँ रह जाएगा? वह तो कुछ और हो जाएगा। बहरहाल, पुतुल-निर्माण की जो आधुनिक तकनीकें विकसित हुई हैं और कलाकारों ने जो नये-नये प्रयोग किए हैं, उसके नतीज़े में अब पुतुल के होंठ तो हिलने ही लगे हैं, उसकी भृकुटियाँ भी बनने-बिगड़ने लगी हैं। लेकिन वह अब भी मूक और पद-विहीन है और उसको रहना भी होगा, क्योंकि यही उसकी 'पहचान' है।
यद्यपि पुतुलकला के उद्भव और विकास को लेकर कई-कई विचार-सरणियाँ हैं, किन्तु आधुनिक विश्व के तमाम क्रिया-व्यापारों के आलोक में न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि पुतुलकला की उत्पत्ति भी मानव सभ्यता के साथ-साथ ही हुई होगी! (यही विचार दुलाल राय के भी हैं।) यदि ऐसा नहीं होता तो संसार में सबकुछ इतना पुतुलवत् क्यों होता? ख़ैर, आज भी हमारे मुल्क के 12 सूबों में तकरीबन 18-20 पुतुल-परम्पराएँ जीवित हैं और सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर इनके संरक्षण-सम्वर्द्धन का प्रयास भी हो रहा है। होना भी चाहिए क्योंकि यह मानव-जीवन के सर्वाधिक निकटस्थ है। किन्तु परम्परा के नाम पर पुरानी लकीर पीटना बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती। समयानुकूल कथ्य और औचित्य पर ध्यान तो देना ही होगा। रंगकर्मी दुलाल राय की भी यही राय है। दुखद यह है कि परम्परा के नाम पर इस तरह पकड़-जकड़ कर रखा हुआ है कि बढ़ नहीं रहा पुतला नाच। राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में देखता हूँ तो कष्ट होता है। यह अन्यों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पाया है। ऐसा नहीं है कि मैं परम्परा को नहीं समझता या परम्परा को प्रगति के पूर्ण हवाले कर देना चाहता हूँ। परम्परा अंधविश्वास नहीं है। हमारा प्रगतिशील मन-मस्तिष्क, सोच-विचार होना चाहिए। परम्परा में विस्तार होना चाहिए। जो गुण है, सो लेना चाहिए। रूढ़ि को तोड़ते और नए को जोड़ते चलना चाहिए।(संगना, अ.जू.2011, पृ.83) पुतुल परम्परा को पुतुलवत् ढोना निश्चित रूप से परम्परा के हित में नहीं है। कई कला-रूपों के क्रमशः अलोकप्रिय और विलुप्त होने या इसकी कगार पर जा पहुँचने का मुख्य कारण यही है। पुतुल को अलंकृत करने से मंच आकर्षक तो बन सकता है, लेकिन घिसेपिटे कथानक की मदद से दर्शकों को नहीं बांधा जा सकता। जबकि पुतुल-नाट्य बिल्कुल 'जादू' जैसी विधा है, जिसमें दर्शक यदि कथानक से न बंधा हो तो 'हाथ की सफाई' का पूरा उपक्रम ही ध्वस्त हो जाता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी परम्परा का संचरण तो हो रहा है किन्तु सम्वर्द्धन नगण्य है।
देश के भिन्न-भिन्न राज्यों की भिन्न-भिन्न भाषाओं और भिन्न-भिन्न धार्मिक-पौराणिक-लोक कथाओं का आंचलिक भाव-विन्यास के साथ धागा/छड़/छाया/दस्ताना पुतुलों के माध्यम से मंचन देखना अच्छा तो लगता है, धर्मानुकूल संसार के सृष्टिकर्त्ता ईश्वर/देवता/राक्षस आदि के वामन रूपों का एक सामान्य मनुष्य की उंगलियों के इशारे पर अभिनय-नर्तन रोमांचित भी करता है, किन्तु निरंतर दोहराव वाली पुतुलवत् परम्परा मन को निराश भी करती है। किसी कला-रूप की उत्पत्ति का मूल कारण क्या था? इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी कला-रूप का उद्देश्य क्या है/हो? पुतुल ही नहीं बल्कि किसी भी कला-रूप के लिए यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है और बिना इससे मुठभेड़ किए, कोई भी कला एवं कलाकार अपने कौशल का उच्चतम शिखर नहीं छू सकता। समकालीन पुतुल नाट्य में भी रचनात्मक दूरदर्शिता का लगभग अभाव ही है। हाँ, कुछ गिने-चुने निर्देशक हैं जो भविष्य को लेकर आशान्वित करते हैं, बशर्ते कि नई पीढ़ी इनका अनुसरण करे! फिलहाल तो एकमात्र कुलदीपक 'दादी पदमजी' नज़र आते हैं। इस व्यक्ति में 'प्रयोग' का साहस ही नहीं, वरन् और बेहतर करने की भूख भी ख़ूब है। यही वजह है कि आप अगर उनके एक ही नाटक के दो प्रदर्शन देखें तो दोनों में कई स्तरों पर फ़र्क़ और बदलाव नज़र आएगा। 'हीर के वारिस' को ही लीजिए— पिछले साल (2014) दिसंबर में यह चंडीगढ़ में मंचित किया गया था और अभी सितंबर (2015) में यह संगीत नाटक अकादेमी के मेघदूत थिएटर (दिल्ली) में मंचित हुआ। इत्तेफ़ाक़ से मैं दोनों ही मौक़ों पर मौजूद था। कई 'संवाद' बिल्कुल यांत्रिक ढंग से अदा किए जाने के बावजूद 'ट्रीट्मंट' के स्तर पर यह पुतुल नाटक अद्भुत प्रभाव पैदा करने वाला साबित हुआ। चंडीगढ़ में फ़क़ीर जहाँ पुतुल के रूप में था, वहीं दिल्ली में यह 'पार्ट' मुखौटा पहने अभिनेता के सुपुर्द कर दिया गया था। मैं ईमानदारी से कहूँ तो 'पुतुल' के माध्यम से फ़क़ीर उस तरह जीवंत नहीं हो पाया था, जिस क़दर वह मुखौटे के माध्यम से हो सका। निर्देशक का कौशल तो इसी में है कि वह दर्शक और औचित्य के नुक़्ते-नज़र से चीज़ों को देखने/दिखाने की कोशिश करे। ख़ुद से सवाल करे। हक़ की बात तो यही कि 'और बेहतर' करने की भूख और अन्वेषण का माद्दा हो तो कला ख़ुद-ब-ख़ुद समृद्ध होती चली जाती है। हीर-रांझा की प्रेमकथा तो सदियों पुरानी है। दोनों का प्रेम लोक-हृदय के लिए बिल्कुल भी नया नहीं है। बल्कि शायद ही कोई मिले जो इस कहानी से वाक़िफ़ न हो! फिर ऐसे पुराने कथानक में ऐसा क्या है कि मैं 'हीर के वारिस' का मुरीद हुआ जाता हूँ?
'हीर के वारिस' में दो समांतर कथाएँ हैं। एक तो हीर-रांझा की कहानी है और दूसरी आज के, आधुनिक पीढ़ी के प्रेमी-युगल की कथा है। अर्थात अतीत और वर्तमान शाना-ब-शाना चल रहे हैं। दर्शक मानो दो युगों की विभाजक-रेखा पर बैठा, समय की समीक्षा को बाध्य हो! तमाम वैज्ञानिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्रांतियों के बावजूद मनुष्य कितना बदला? उसकी धारणा, उसका दृष्टिकोण कितना बदला? हीर अर्थात स्त्री और उसके प्रेम के प्रति समाज के रवैये में क्या बदलाव आया? यह स्त्री-विमर्श का मसला है जबकि मेरा उद्देश्य निर्देशक के नवाचारी-रूझान को इंगित करना है। उन्होंने बाबा वारिस शाह की कहानी को एक नया परिप्रेक्ष्य दिया और कथा, परम्परागत होते हुए भी आधुनिक जीवन-समाज का आईना बन गई। हम केवल प्रत्यक्षदर्शी नहीं रह सके, पात्र में परिणत हो गए। कथानक ही क्यों, स्टेज-डिज़ाईन और विविध रंग-प्रयोगों के माध्यम से निर्देशक ने मंच को भी 'नरेटर' बना दिया। लगभग अर्द्धवृत्ताकार ढंग से कफन जैसे सफ़ेद कपड़े का पर्दा, जो पुराने झोंपड़ीनुमा (या पहाड़ी टीले जैसा या कि पुराने कबीले का बोध कराता) रूपाकार में मंच के पिछले हिस्से को घेरता है और फिर पर्दे के आर-पार अभिनय का क्रिया-व्यापार जिस रागात्मक गति से चलता है, वह हमारा अपना जीवन ही तो है। विविध रंग-विधियों का संलयन ऐसा कि आप द्विधा के शिकार हो सकते हैं कि यह पुतुल नाटक है या कि सामान्य नाटक! अभिनेता, पुतुल, मुखौटा, छाया-दृश्य, प्रकाश-प्रभाव के साथ-साथ नृत्य-गीत का अद्भुत संलयन एक नई अवधारणा और तकनीक को जन्म देते हैं। विविध कला-युक्तियों का समन्वय, अतीत और वर्तमान का समन्वय, पुतुलवत् मनुष्य और मनुष्यवत् पुतुल का समन्वय अर्थात जीवन का समन्वय। पुतुल-कला यहीं अपने समन्वित रूप एवं दर्शन को परिभाषित करती हुई जीवन से अधिक गूढ़ और जीवन से अधिक सरल दिखाई देने लगती है, 'नट'-'मरकट' का भेद दृष्टि-भ्रम सिद्ध होने लगता है। सृष्टि और सृष्टिकर्त्ता के मध्य की दीवार ध्वस्त होती जाती है—'जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहिर भीतर पानी।'
क्षेपकः 
'कठपुतली' शब्द लोक-प्रसूत है। समाज में स्त्री की परम्परागत स्थिति-अवस्थिति के आलोक में यह हैरानी में नहीं डालता। लेकिन 'दारु जोषित' अर्थात 'लकड़ी की स्त्री' हमारे विवेक को टहोका मारता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरुष-सत्तात्मक सामाजिक-संरचना में स्त्री की हैसियत को मद्देनज़र रखते हुए ही 'कठपुतली' शब्द गढ़ा गया! क्योंकि हमारे यहाँ सिर्फ़ गुड़िया नहीं होती, गुड्डा भी तो होता है। नाटकों के सभी पात्र स्त्रीलिंगी तो नहीं होते! यदि 'मारू' होती है तो 'ढोला' भी होता है। जिज्ञासा जड़ की खोज को बाध्य करती है। पता चलता है कि पाणिनी अपने ग्रंथ अष्टाध्यायी के नटसूत्र में इसके लिए जिस शब्द का इस्तेमाल करते हैं, वह हैपुतला नाटक। पौराणिक आख्यान कहते हैं कि पार्वती के मनोरंजन के निमित्त स्वयं शिव ने काठ की खोखली मूर्ति में प्रवेश कर उसको संचालित किया था। इसी आधार पर वे इस कला के प्रारम्भकर्ता भी माने जाते हैं। ज़्यादातर विद्वान 'कठपुतली' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'पुत्तलिका' और लैटिन भाषा के 'प्यूप' शब्द से बताते हैं। 'प्यूप' के दो अर्थ हैं—1. गुड़िया 2. कीट के जैविक विकास की वह निष्क्रिय अवस्था, जिसमें वह न तो लार्वा होता है और न ही प्रौढ़ कीट। दोनों ही अर्थ-सन्दर्भ एक-दूसरे के पूरक प्रतीत होते हैं क्योंकि सामाजिक संरचना में स्त्री का पुरुषों द्वारा जो निर्धारित स्वरूप है, वह यही है। हम स्त्री को जैविक रूप से आयु-विशेष के बाद प्रौढ़ तो मान लेते हैं लेकिन उसको बौद्धिक स्तर पर प्रौढ़ स्वीकार करने के मामले में सामान्यतः शंकित ही रहते हैं। इस प्रकार लार्वा भले कीट की विकसित अवस्था में पहुँच जाए, स्त्री का अस्तित्व हमारे लिए हमेशा 'विकास की निष्क्रिय अवस्था' में ही रहता है। प्रसंगानुकूल एक और बात, परम्परागत रूप से पुरुष स्वयं को स्त्री का नियंत्रक ही मानता आया है। शब्द भले ही मनु के हों किन्तु यह पुरुष-मानस का प्रतिनिधि कथन है— 'बाल्या वा युवत्या वा वृदध्या वापि योषिता/न स्वतंत्रयेन कर्तव्यं किंचित्कार्य गृहेश्वपी'। जहाँ 'विवेकाधिकारी' और नियंत्रक पुरुष हो, वहाँ नियंत्रित को स्त्री ही होना है, चाहे वह काठ की हो या हाड़मांस की। अतः पुतली नाट्य का जन्म भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' से माना जाए या तमिल महाकाव्य 'शिल्पादीकरम' से, क्या फ़र्क़ पड़ता है! वैसे भी भारत जैसे विविधता से परिपूर्ण भाषा-भाषी और सांस्कृतिक समाजों वाले देश में एक शब्द के प्रति आग्रह-दुराग्रह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। यदि हिन्दी समाज इस कला को 'कठपुतली' पुकारता है तो मराठी मानुष के लिए यह 'कलासूत्री बाहुलिया' है। आसाम में 'पुतला नाच' है तो उड़िया में 'कुंढई'। कर्नाटक में यही 'गोम्बेयट्टा' तो आन्ध्र प्रदेश तथा केरल में 'बोम्मालट्टा' और बांग्ला में 'पुतुल' हो जाता है। 'पुतुल' शब्द से 'विधा' ध्वनित होती है, लिंग नहीं। अतः इस शब्द को 'पपेट' का सहोदर स्वीकार करना मेरी निगाह में अधिक विधा-सम्मत है। 'पुतुल' सिर्फ लकड़ी के नहीं होते, बल्कि चमड़ा, काग़ज़ की लुग्दी, प्लास्टिक और प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि से भी बनाए जाते हैं। इसलिए कठपुतली शब्द 'शैली' के स्तर पर तो ठीक है लेकिन 'विधा' के स्तर पर नहीं। 'कठपुतली' पर विचार करते हुए उसके विस्तार, या उसकी बहुविविधता पर भी नज़र रहे तो अच्छा!

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