Sunday, April 24, 2016

अक्कड़-बक्कड़ः कथ्य और स्वरूप में विरल उपन्यास

अक्कड़-बक्कड़ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और गंभीरता इसलिए भी कि यह व्यंग्य उपन्यास है और बकौल श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य लेखन का सम्बंध सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है। तो उपन्यास पढ़ते वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं, कथ्य और वातावरण के भेदाभेद को समझने से चूक सकते हैं।
  उपन्यास की कथा-भूमि कंगलों का नंगला है। बकौल कथावाचक यहाँ पहुँचने के दो रास्ते हैं। पहला रास्ता थोड़ा लम्बा है। आधा किलोमीटर की दूरी तय करने में सिर्फ आधा घंटा लगता है। जबकि दूसरा रास्ता शॉर्टकट है। इस मार्ग का अनुसरण करने वाले पलक झपकते ही नंगला में प्रवेश पा जाते हैं। नंगला अर्थात स्वार्थ की दुनिया। हाँ, इसके लिए कुछ शर्तें निश्चित की गई हैं और पार उतरने के लिए इसका पालन आवश्यक है। धारीदार नेकर छोड़कर बाकी सारे कपड़े उतारने पड़ते हैं। शील और संकोच का संहार महज एक नारा यानी गंगा मैया की जय से हो जाता है। गंगा मइया का नारा पवित्रता और शुद्धता की गारंटी है। साफ है कि मसला प्रवृत्ति का है। नंगला-वासियों को सीधा रास्ता पसंद नहीं है। उन्हें शॉर्टकट से प्यार है और इसके लिए उन्हें अपना कपड़ा उतारने में कोई संकोच नहीं है। बल्कि वे तो दूसरे गाँव या क़स्बे से आने वाले व्यक्ति का कपड़ा भी उतरवाने में सिद्धहस्त हैं। वैसे भी यदि कोई सीधे रास्ते मंज़िल तक पहुँचने की मूर्खतापूर्ण सोच रखे भी तो नंगलावासी उसे घुमा-फिराकर शॉर्टकर्ट वाले रास्ते पर डाल ही देंगे। अब अगर वह पाण्डु जैसा प्रवीण है तो पुलिस का सिपाही बन जाएगा, यदि नहीं है तो फिर जलालपुरिए की तरह अंततः पराजित-पस्त अपने शरीर पर कीचड़ की परत चढ़ा, रात के अंधेरे में लिपटा घर को लौट जाएगा।
      उपन्यास में वर्णित यथार्थ, यथार्थ होकर भी इलूसिव नज़र आता है। इसीलिए हमने प्रारम्भ में ही लिखा है कि पाठ के दौरान सावधानी ज़रूरी है क्योंकि कथा में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे महान अथवा अप्रतिम की श्रेणी में रखा जा सके। कोई विशेष नाटकीय घटनाक्रम अथवा मोड़ भी नहीं है। कोई नायक नहीं, कोई आदर्श पुरुष अथवा स्थिति नहीं, है तो केवल कीचड़, यौनिकता, राजनीति, छल और दंभ। प्रेम के नाम पर भी जो है वो केवल स्वार्थपरता और वासना है। प्रेम में भी सफल पाण्डु को ही होना है। गुन्नू को अंततः पागलखाने ही जाना होगा क्योंकि वह प्रेम को वासना से परे और जन्म-जन्मांतर का सम्बंध मानने की ज़िद ठाने बैठा है। पाठ के समय भ्रम की स्थिति भी बन सकती है। पाठक यह सोच सकता है कि कथा-वाचक के लिए स्त्री केवल देह है। स्त्री के प्रति गुन्नू (जो अपने स्वभाव में न सिर्फ मूर्ख बल्कि अबोध भी है) को छोड़ शेष कोई भी पात्र ऐसा नहीं जो भावात्मक दृष्टिकोण रखता हो। पाण्डु के लिए तो प्रेम भी अवसर की तरह है। वह कभी अपनी प्रेमिका के पिता को ठगता है तो कभी प्रेमिका की सोने की अँगूठी हड़पता है। वह तो नंगला के गौरव मेघनाथ सिंह से भी दो क़दम आगे है। मेघनाथ के हृदय में कम-से-कम गाँव की बेटी के लिए तो सम्मान और शुचिता का भाव था। सम्भवतः यही कारण है कि उपन्यास का अंत आते-आते नंगला के प्रवेश-द्वार पर स्थापित अमर शहीद मेघनाथ सिंह की मूर्ति को तोड़कर (किसी ने) उस जगह को सफाचट कर दिया था। जबकि गणतंत्र दिवस पर ईमानदार देशभक्त और कर्त्तव्य परायण पाण्डुराम और उनके साथियों को मुख्यमंत्री के हाथ से नकदी और प्रमाण पत्र मिला था।
      प्रत्यक्ष रूप से उपन्यास किसी वैचारिक बहस को जन्म नहीं देता, यहाँ किसी विचारधारा या आदर्शवाद की झलक भी नहीं दिखाई देती। लेकिन ऐसा कहना सतही पर्यवेक्षण ही होगा क्योंकि उपन्यास में उक्ति-वैचित्र्य और व्यंजना-शक्ति का जिस सावधानी से इस्तेमाल हुआ है वह कथा की संचरण-प्रक्रिया को परतदार बनाता है। चाहें तो कह सकते हैं कि यह फल्गू नदी की तरह अन्तःसलिला है। अक्कड़-बक्कड़ वस्तुतः जीवन में आदर्श और नैतिकता की निरर्थकता को सम्बोधित है। यह हमारे जैसे सफ़ेदपोशों को गिरेबाँ से पकड़ आईना दिखाने के दुर्दम्य साहस का परिणाम है। देश की सेवा एक ऐसा मुहावरा है जो हमेशा देश को लूटने वाले दुहराते रहते हैं। सम्माननीय और योग्य वही है जो अवसरों को भुनाने में सिद्धहस्त हो।

उपन्यास की भाषा वास्तविक जन-जीवन को प्रतिबिम्बित करने में बिल्कुल सक्षम है। जीवन को  महान विचारों की रोशनी में नहीं समझा जा सकता। जीवन को उसके अंधेरे में अभ्यस्त बिल्लौरी निगाहों से ही समझा जा सकता है। यह उपन्यास ऐसी ही कोशिश है। वैसे भी व्यंग्य उपन्यास की रचना वैचारिक शून्य में सम्भव नहीं है। हाँ, मानदण्ड अलग-अलग हो सकते हैं। इस उपन्यास की सफलता का राज़ ही यही है कि यहाँ कोई आदर्श प्रतिमा या मानदण्ड निर्दिष्ट नहीं है। यहाँ जीवन की, रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं, क्रिया-व्यापारों, व्यवहारों के माध्यम से वास्तविक जीवन-समाज के उन कोनों में झांकने की कोशिश की गई है जो सायास उपेक्षित छोड़े गए हैं—तथाकथित सभ्यता और संस्कृति के दबाव में। सत्ता सिर्फ राष्ट्र और राज्यों की राजधानियों में सीमित नहीं रहती क्योंकि यह प्रवृत्ति है और व्यक्ति तक जाती है। श्रेष्ठता और महानता के जो उच्चादर्श ग्रंथों में उत्कीर्ण हैं वह मात्र छलावा हैं। यथार्थ छल-बल द्वारा पोषित और प्रतिष्ठापित हैं। यह ऐसी वस्तुगत सच्चाई है जिसे जानते तो सभी हैं किन्तु स्वर या शब्द विरले ही दे पाते हैं। इस दृष्टि से यह उपन्यास अपने कथ्य और स्वरूप में विरल ही है।

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