Sunday, November 29, 2015

अमरकांतः साधारण भाषा में असाधारण का संधान

20वीं सदी का छठा दशक हिन्दी साहित्य की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया था। नई कहानी ने न सिर्फ ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया बदला, बल्कि कहानी की बनी-बनाई पुरानी लीक भी तोड़ दी। हालांकि तोड़ना की जगह नई दिशा शब्द का इस्तेमाल अधिक सटीक होता। ख़ैर, साठ का दशक बदलावों का दशक था। तेज़ी से उभरता निम्न-मध्यवर्ग, ग्रामीण परिवेश से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। युवाओं के सपने अँगड़ाइयाँ ले रहे थे। शहर का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। बड़ी तादाद में वे शहरों का रुख़ कर रहे थे। राजनीतिक वातावरण लगातार दूषित होता जा रहा था। सामाजिकता अपना महत्व खोती जा रही थी और नैतिकता की पकड़, व्यक्ति पर कमज़ोर पड़ती जा रही थी। कुंठा और संत्रास के ब्रह्मफांस में उलझी युवा-पीढ़ी मोहभंग की सहज शिकार बन रही थी। कुपथगामी हो रही थी। सामंतवाद का बूढ़ा-प्रेत अब भी लोकतांत्रिक देश की छाती पर तना बैठा था। उसके पैने नाख़ून और नुकीले दाँतों से मानवीयता का हृदय छलनी हो रहा था। गाँधी की टोपीपहन-पहन कर जन-प्रतिनिधि बनने वाले राजनेता चुनाव के बाद जनता को या तो टोपियाँ पहना रहे थे, या उनकी टोपियाँ उछाल रहे थे। अर्थात राजनीति, समाज और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जब बदलाव(नैतिक अथवा अनैतिक) स्पष्ट नज़र आ रहा था तो कहानी भला कैसे अछूती रहती? शहरी मध्यवर्गीय परिवार महत्वाकांक्षाओं के अतिशय बोझ के कारण चरमरा रहा था। इस टूटन, घुटन और बिखराव की कथा मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर लिख रहे थे। प्रगतिशील चेतना के बढ़ते दबावों के बावजूद पुरुष-सत्तात्मक समाज का सामंतवादी प्रेत हार मानने को तैयार नहीं था और निम्न-मध्यवर्ग झूला-नट की तरह दोनों को साधने में अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ख़र्च करने को अभिशप्त था। भारत का साधारण मनुष्य जवाहरलाल नेहरू नहीं था। लिहाजा पंचशील के सिद्धांत जैसे महान उद्देश्य अथवा दर्शन में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसकी तो बेहद छोटी-छोटी समस्याएँ और आकांक्षाएँ थीं। रहने के लिए घर। खाने के लिए अन्न। पहनने के लिए कपड़े। इलाज के लिए अस्पताल। बेरोजगार बेटे के लिए नौकरी और जवान बेटी के लिए योग्य-वर। उसे धर्म अथवा जाति के नाम पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों से मुक्ति और शांति की ज़रूरत थी। व्यवस्था का छलावा और आदर्शों का भुलावा, समस्यापूर्ति के लिए काफ़ी नहीं थे। शिक्षित मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों का ढोंग और भावनात्मक स्तर पर शोषण और स्त्री की परम्परागत छवि को बनाए रखने की साजिश। गाँव और शहर के बीच सेतुबंध के रूप में तेज़ी से आकार ग्रहण करता यह क़स्बाई समाज और क्षेत्र, जटिल जीवन-अनुभूतियों और संबंधों के त्रिविमीय प्रदर्शन का असाधारण रंगमंच बना हुआ था। सभ्यता के इसी अंधेरे प्रेक्षागृह से अमरकांत जीवन का आँखों देखा हाल सुना रहे थे। शिक्षित मध्यवर्ग की मनोदशा, उसके सपने, उसके काइयाँपन और यथार्थ-जीवन की सहज सांकेतिक अभिव्यक्ति का दायित्व अमरकांत ने अपने मज़बूत कंधों पर ले रखा था।

अभिधा, लक्षणा, व्यंजना और तात्पर्य वृत्ति- ये चार शब्द शक्तियाँ हैं। अमरकांत का कथा-साहित्य इस बात का साक्षी है कि वे यूँ तो चारों में सिद्धहस्त हैं, लेकिन विशेष रूप से लक्षणा, व्यंजना और तात्पर्य-वृत्ति, उनकी मज़बूती है। जबकि उनकी कथा-भाषा के बारे में अधिकांश विद्वानों की राय वही है, जो कमलेश्वर की है। अमरकांत जैसी सीधी और सपाट भाषा लिखने वाला दूसरा कोई कथाकार नहीं था, साथ ही अमरकांत की कहानियों की मानवीय विदग्धता को (पाठक) अपने अनुभवों के इतना पास पाते थे कि उन्हें यह सोचते देर नहीं लगती थी कि यही तो उनका अनुभव है और ऐसी भाषा तो कोई भी लिख सकता है। अमरकांत की कला और यथार्थ का यही जादूई जाल था...1 अमरकांत के बारे में कमलेश्वर का यह कथन अर्द्ध-सत्य की श्रेणी में आता है। अमरकांत की कहानियों में मानवीय विदग्धता तो है और निश्चित रूप से यह उन्हें पाठकों के बेहद क़रीब लाता है। लेकिन अमरकांत की भाषा न तो उतनी सीधी है, जितनी की नज़र आती है और न ही उतनी सपाट, जितनी की कही जाती है। बल्कि दावे के साथ यह बात भी कही जा सकती है कि अमरकांत जैसी भाषा हर कोई नहीं लिख सकता। कथाकार की मनोभूमि तक पहुँचना और कथाकार के लिखे को अपने अनुभवों के आधार पर समझना, दोनों दो भिन्न स्थितियाँ हैं। अमरकांत की भाषा और उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द-समुच्चय को समझना तभी संभव है, जब शब्द-शक्ति के दो रूपों- व्यंजना और तात्पर्य-वृत्ति की विशेषताओं से सुधि-पाठक अनभिज्ञ न हो! वस्तुतः तात्पर्य वृत्ति वह वृत्ति है जो प्रत्येक शब्द के संकेतित अर्थों के समन्वय द्वारा पूरे वाक्य का संगत अर्थ प्रस्तुत करती है।2 जबकि व्यंजना शक्ति ऐसे अर्थ को बतलाती है जो अभिधा, लक्षणा या तात्पर्य-वृत्ति द्वारा उपलब्ध नहीं होता।3 अमरकांत की कथा-भाषा मुख्य-रूप से, शब्दों के इन्हीं दो शक्ति-स्तम्भों पर टिकी है। एक उदाहरण- उसको लगा कि बाईं ओर के सटे हुए मोहल्ले से एक शोर उठ रहा है और बहुत-से लोग मारो-मारो की आवाज़ करते हुए इधर ही दौड़े आ रहे हैं। उसकी आँखों के सामने एक छुरा चमक उठा। क्या वह घर के अंदर भाग जाए? वह दो कदम पीछे हट गया। पर कुछ मकानों के सामने खड़े गिरोहों के लोग उसी तरह बातों में मशगूल थे। वह कुछ आश्वस्त होकर शोर को ध्यानपूर्वक सुनने लगा, तो उसकी समझ में आया। बग़लवाले मोहल्ले में बहुत-से कुत्ते लड़ रहे थे। आजकल कुत्ते भी ख़ूब लड़ रहे हैं। उसने सोचा और मुस्कराने की चेष्टा की, पर उसकी मुस्कराहट पानी के बुलबुले की तरह समाप्त हो गई।4 क्या सीधी-सपाट भाषा इसी को कहते हैं? साम्प्रदायिक दंगे के तुरंत बाद के हालात का दृश्यांकन है। कहानी का नाम है- मौत का नगर। शहर में कर्फ्यू के बाद ढील दी गई है और राम घर से निकला है। उसने कौए की भांति सिर घुमाकर शंका से दोनों ओर देखा। दंगे का भय, कितना घनीभूत है! कुत्तों के झगड़ने की आवाज़, निश्चित रूप से भौं-भौं ही होती है, लेकिन राम को मारो-मारो सुनाई देती है और उसकी आँखों के सामने छुरा का चित्र उभरता है। यही तो आधुनिक भारतीय समाज की त्रासदी है। अपने भय का प्रक्षेपण! मनुष्य-मनुष्य के बीच अविश्वास और शक का अलक्ष्य साम्राज्य। और इन सबके प्रभाव-स्वरूप ध्वनियों की पहचान का संकट। जीवन के प्रति आश्वस्त होते ही, राम के मुँह से निकलने वाला पहला वाक्य है- आजकल कुत्ते भी ख़ूब लड़ रहे हैं। ये क्या महज व्यंजना है? आजकल कुत्ते भी, इसमें भी केवल भी मनुष्य-जाति की त्रासद जीवन-स्थिति को रेखांकित करने के लिए काफी है। इस सपाट से वाक्य द्वारा व्यंजित भाव तेज़ाबी है। तिलमिलाने वाला है। मनुष्य-जाति के अधोगति की पराकाष्ठा का द्योतक है। मनुष्य की हिंस्र-पशुता के प्रति घृणा-भाव का वाहक है। साथ ही प्रचलित मुहावरे (कुत्ते की तरह झगड़ना अथवा झाँव-झाँव करना) का विखंडन भी। अब भी क्या ये बताना शेष रह जाता है कि आजकल लड़ना कुत्ते की नहीं, मनुष्य की प्रवृत्ति है? कि मारो-मारोऔर भौं-भौं में अब फ़र्क़ करना सामान्य मानव-बोध के लिए दुष्कर कार्य हो गया है? संत्रस्त मन, हत्या का भय, जीवन की आश्वस्ति, आश्वस्ति से मुदित चेतना में रूढ़ होता व्यंग्य भाव और इसके बाद चेहरे पर रेंगने वाली क्षणिक भ्रमित मुस्कान। इस जटिल भाव-मिश्रण की सहज और तटस्थ रवादार-भावाभिव्यक्ति, शब्दों के संकेतित अर्थों के समन्वय से ही संभव है। ध्वन्यार्थ, वाच्यार्थ और भावार्थ का त्रिविमीय परावर्तन और प्रत्येक किरण का सूक्ष्म पर्यवेक्षण तभी संभव है, जब हम लेखक के मनोभूमि तक अपनी सहज पहुँच संभव कर सकें। अन्यथा सतही तौर पर अमरकांत की भाषा सीधी और सपाट ही नज़र आएगी। अमरकांत की अधिकांश कहानियों का भाषिक-विन्यास ऐसा ही है। एक और उद्धरण देखिए- सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर शायद पैर की उँगलियों या ज़मीन पर चलते चींटे-चींटियों को देखने लगी। अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास लगी है। वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा-भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कहकर वहीं ज़मीन पर लेट गई।5 दोनों घुटनों के बीच सिरऔर पैर की उँगलियों को देखना या ज़मीन पर चलते चींटे-चीटियों पर दृष्टि का स्थिर होना, और इस दृश्य को शब्दबद्ध करते वक़्त अनिश्चय-बोधक शब्द शायद का इस्तेमाल। अंतर्द्वंद्व और बेचैनी को अभिव्यक्ति देने के लिए हमेशा अँधेरी कोठरी या बियाबाँ में बेसब्रों की तरह निरुद्देश्य लंबे-लंबे डग भरना या चक्कर लगाना, उफ्फ-हाय करना या सिर के बाल नोंचना ज़रूरी नहीं होता। भूख की त्वरा दर्शाने के लिए अन्न का ज़िक्र भी आवश्यक नहीं है। सिद्धेश्वरी का चूल्हे को बुझाने के तुरंत बाद वहीं पर यूँ मूर्तिवत् हो जाना, उसके चिंता में ग़र्क होने को ही प्रदर्शित करता है। ख़ाली पानी का कलेजे में लगना इस बात की स्पष्ट गवाही देता है कि पेट में अन्न नहीं है। यह विपन्न मध्यवर्गीय जीवन के मनोविज्ञान का सूक्ष्मांकन है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि अमरकांत की भाषा-युक्ति का साम्य, कबीर की उलटबाँसी अथवा सत्य को उल्था करके देखने वाली प्रवृत्ति से है। सत्य वही नहीं है, जो प्रत्यक्ष है। बल्कि कई बार सत्य दूध में शक्कर जैसा घुला हुआ होता है, जो प्रत्यक्ष दृष्टिगत नहीं होता, लेकिन आस्वाद में शामिल रहता है। अमरकांत की अधिकांश कहानियों की भाषिक-संरचना ऐसी ही है। हाँ, परिवेश के अनुकूल बदलाव सामान्य बात है, इसका अलग से उल्लेख आवश्यक नहीं है।

अगर आपने ग़ौर किया हो तो... अमरकांत की कहानियों में लेखकीय तटस्थता के साथ ही शब्द-शब्द में संवेदनाओं का संगुम्फन स्पष्ट परिलक्षित होता है। दो विपरीत प्रवृत्तियों का ऐसा सघन सामंजस्य उनके समकालीनों में विरल है। सहज भाषा के सहारे असहज जीवन-अनुभूतियों, परिस्थितियों और घटनाक्रमों का व्यंजनामूलक-शिल्प (जो प्रत्यक्ष रूप में अभिधात्मक ही प्रतीत होता है) की मदद से उद्घाटन, अभ्यास से अधिक संवेदनशील तीक्ष्ण दृष्टि और सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता द्वारा ही संभव है। एक बानगी- शिवनाथ बाबू के घर के सामने, सड़क की दूसरी ओर स्थित खंडहर में, नीम के पेड़ के नीचे, एक दुबला-पतला काला आदमी, गंदी लुंगी में लिपटा चित्त पड़ा था, जैसे रात में आसमान से टपककर बेहोश हो गया हो अथवा दक्षिण भारत का भूला-भटका साधु निश्चिंत स्थान पाकर चुपचाप नाक से हवा खींच-खींचकर प्राणायाम कर रहा हो।6 गाँव से खाली हाथ, केवल उम्मीदों की ऊर्जा के बल पर छोटे शहर की सीमा में प्रवेश के बाद खंडहर में नीम के पेड़ के नीचे लेटे युवक का दृश्य-चित्र। गाँव के गोपाल का क़स्बे के रजुआ में रूपांतरण की जो त्रासद-कथा है, उसका संकेत तो कहानी के इसी प्रारंभ में निबद्ध है। शेष तो जीवन का सतत् चलने वाला संघर्ष ही है। ज़िन्दगी और जोंक का गठन, शुरू से अंत तक रूपकात्मक और सांकेतिक है। बकौल बटरोही संभवतः सबसे अधिक कलापूर्ण और सफल कहानियाँ इन्हीं कस्बों की मनोवृत्ति को लेकर लिखी गईं। अमरकांत पहले कहानी लेखक हैं, जिन्होंने इस प्रकार की सफल कहानियाँ दीं। गाँवों से शहर की ओर स्थानांतरित होती हुई इस मनोवृत्ति का बहुत सफल मानवीय रूपक अमरकांत की कहानी ज़िन्दगी और जोंक में देखा जा सकता है। कहानी का विकास इतनी सूक्ष्मता और कलात्मकता से होता है कि लगता है जैसे लेखक रजुआ के माध्यम से इसी परिवर्तित होती हुई मनःस्थिति को अंकित करना चाहता है।7 गोपाल के सहज जीवन का कॉमिक-पात्र में क्रमशः तब्दील होना और फिर विडंबनापूर्ण जीवन-परिस्थितियों में ख़ुद को महज जिंदा रखने की जद्दोजहद और टोने-टोटके तक की अधोगति को प्राप्त करना। ज़िन्दगी और जोंक पढ़ते वक़्त बरबस ही प्रेमचंद की कहानी कफ़न का ख़्याल हो आता है। रजुआ की तुलना में घीसू-माधव अधिक सहज स्थिति में नज़र आते हैं। वे किसानों की खेत से फसल की चोरी कर अपना पेट पालते हैं और एक रजुआ है कि बिना चोरी किए ही चोरी के इल्ज़ाम में मार खाता है। श्रम-शोषण के ख़िलाफ़ घीसू-माधव अकर्मण्यता को हथियार बनाते हैं, लेकिन रजुआ को मुफ़्त की रोटी तोड़ना बिल्कुल भी पसंद नहीं। माधव, पेट की खातिर अपनी पत्नी को मृत्युशैया पर तड़पता हुआ छोड़ देता है। रजुआ रेलवे स्टेशन पर भटकती पगली को आश्रय देने का प्रयास करता है। गाँव का बुद्धू रजुआ क़स्बे के साभ्रांत लोगों के लिए मुफ़्त का नौकर है, जिसके श्रम का मूल्य बासी रोटी और नमक है। सामंती-समाज में भी बुधिया की मौत के बाद घीसू-माधव को कफ़न-दफ़न के लिए गाँव के लोगों से चंदा मिलता है। लेकिन दिन-रात लोगों के कामों में हाथ बँटाने वाला रजुआ, बीमार होने की स्थिति में फिर से वहीं, उसी खंडहर में बेसुध पड़ा मौत का इंतज़ार करने को विवश होता है। अर्थात गोपाल जिन सपनों के साथ शहर आया था, वो खंडहर में दफ़्न हो गए हैं और सिर्फ ख़ुद को जिलाए रखने की जद्दोजहद ही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि बन गई है। यानी विकास और प्रगति के शहरी-छद्म और मृगमरीचिका का शिकार ग्रामीण जीवन, आधुनिक सभ्यता के खंडहर में ही आश्रय पा सकता है। यही है आधुनिकता की तल्ख़ सच्चाई और संवेदनहीन सभ्य-समाज के वास्तविक चरित्र का वस्तुगत प्रक्षेपण। रजुआ जैसे लोगों का जीवन-वृत्त, ऐसे ही अपने विस्थापन और विपन्न-परिस्थितियों में महज क्षण-भंगुर स्वप्नों को पल-पल छीजते जाने से बचाने की कोशिशों में अंततः जड़ होकर, पुनः उसी प्रस्थान बिन्दु पर पहुँच जाता है, जहाँ से उसकी शुरुआत हुई थी।

कहानी जिन्दगी और जोंक अप्रत्यक्ष व्यंग्य-तंतुओं से बुनी गई है। छोटा सा उद्धरण- आपको ठीक से पता है कि साड़ी इसी ने चुराई है?”….“आप भी ख़ूब बात करते हैं! यही पता लग गया तो चोर कैसा?” व्यंजना-शक्ति शब्दों से अधिक भावों में स्थान पाती है। अमरकांत इस कला में सिद्धहस्त हैं। वैसे ज़िन्दगी और जोंक कहानी को यथार्थ की कसौटी पर कसने के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं, बल्कि सिर्फ अपने आसपास या फिर महानगरों की मलिन बस्तियों का तसव्वुर ही काफ़ी है। ऐसी स्थिति में कहानी का यह अंत कि उसके मुख पर मौत की भीषण छाया नाच रही थी और वह ज़िन्दगी से जोंक की तरह चिमटा हुआ था- लेकिन जोंक वह था या ज़िन्दगी? वह ज़िन्दगी का ख़ून चूस रहा था या ज़िन्दगी उसका?”8, एक नये प्रारंभ का द्योतक है। ये कहानी जीवन और सभ्यता के क्रमिक विकास अथवा उत्थान और मानव-मूल्यों के सौष्ठव का मज़ाक उड़ाती, अँगूठा दिखाती प्रतीत होती है और पाठक को जीवन के प्रति वितृष्णा का शिकार भी बनाती है। अमरकांत की अधिकतर कहानियाँ मसलन, दोपहर का भोजन, डिप्टी कलक्टरी, गगन बिहारी, मूस, मकान आदि भी इन्हीं मनोवृत्तियों का मार्मिक किंतु तटस्थ और निरपेक्ष प्रस्तुतिकरण है।

किसी भी भाषा की कहानी का मूल्यांकन करते समय हमारी दृष्टि दो बातों पर रहनी चाहिए। एक तो यह कि कहानी की आंतरिक उपलब्धियों का विकास उसमें किन स्तरों पर हुआ है; और दूसरे यह कि क्या उस भाषा की कहानी के विकास को एक निश्चित परम्परा के अन्तर्गत रखकर देखा जा सकता है।9 और विश्वासपूर्वक यह कहा जा सकता है कि इन दोनों ही कसौटियों पर अमरकांत की कहानियाँ बिल्कुल खरी उतरती हैं। नामवर सिंह के इस कथन से भी मेरी सहमति है कि अमरकांत की भाषा प्रेमचंद की परंपरा का अद्यतन विकास हैः वही सादगी और वही सफाई है। पढ़ने पर गद्य की शक्ति में विश्वास जमता है।10 लेकिन इसके साथ यहाँ ये जोड़ना उचित होगा कि सिर्फ कथा-भाषा ही नहीं, बल्कि प्रेमचंद की कथा-परम्परा का भी अमरकांत के यहाँ अद्यतन विकास हुआ है। अमरकांत की विश्वसनीयता इसलिए भी अक्षुण्ण रहती है, क्योंकि उनका रचना-संसार, अनुभव-क्षेत्र की सीमा से परे नहीं जाता। उनकी कहानियाँ, अपने आसपास के जीवंत परिवेश से प्राण-तत्व प्राप्त करती हैं। जीवन की विविधता, उसकी जड़ता और ताज़गी, सबकुछ वे अपने परिवेश से ही ग्रहण करते हैं। इसी को नामवर सिंह अन्वेषण की संज्ञा देते हैं और ये स्वीकार करते हैं कि यह कोई दूर की कौड़ी लाने जैसा काम नहीं है, बल्कि यह तो अतिपरिचित और नितांत समीपी जीवन के क्षेत्र में भी सम्पन्न किया जा सकता है। आज की कहानियों के पाठकों का जो बहुत बड़ा समूह तथाकथित निम्न मध्यवर्ग के परिवारों में रहता है, जिनकी जिन्दगी की तहों में भी खोजने को बहुत कुछ पड़ा हुआ है। कितने ही प्राइवेट मज़ाक होते हैं, हाथ और मुँह के बीच में भी बहुत सी बातें पैदा होती रहती हैं। अमरकांत ने अपनी कहानियाँ यहीं से उठाई हैं और इस तरह हमारी आँखों में, हमारी ही जिन्दगी के जाने कितने पर्दे उठ गए हैं। इस क्षेत्र में अमरकांत की कहानियाँ किसी भी नये लेखक के लिए चुनौती हैं। हरिशंकर परसाई के कथात्मक व्यंग्यों की धार यहीं पैनी हुई है।11 यक़ीन न हो तो अमरकांत की कहानी लड़का-लड़की और हरिशंकर परसाई की क्रांतिकारी की कथा को आमने-सामने रख-परख सकते हैं। परसाई के नायक ने तो अपना उपनाम ही क्रांतिकारी रख लिया है। क्रांतिकारी कहता, "प्यार? हाँ, हर बुर्जुआ क्रांतिकारिता को मारने के लिए प्यार करता है। यह प्यार षड्यंत्र है। तुम लोग नहीं समझते। इस समय मेरा बाप किसी ब्राह्मण की तलाश में है जिससे बीस-पच्चीस हजार रुपए लेकर उसकी लड़की से मेरी शादी कर देगा। पर मैं नहीं होने दूँगा। मैं जाति में शादी करूँगा ही नहीं। मैं दूसरी जाति की, किसी नीच जाति की लड़की से शादी करूँगा। मेरा बाप सिर धुनता बैठा रहेगा।"12 और जब माता-पिता ने उसके प्रेम-विवाह को स्वीकार कर लिया तो क्रांतिकारी ने सर ठोंक लिया। पसीना बहने लगा। पीला हो गया। बोला, "हाय, सब खत्म हो गया। जिंदगी भर की संघर्ष-साधना खत्म हो गई। नो स्ट्रगल। नो रेवोल्यूशन। मैं हार गया। वे मुझे लेने आ रहे हैं। मैं लड़ना चाहता था। मेरी क्रांतिकारिता! मेरी क्रांतिकारिता! देवी, तू मेरे बाप से मेरा तिरस्कार करवा। चे ग्वेवारा! डियर चे!"13 अब ज़रा अमरकांत के लड़का-लड़की कहानी के क्रांतिकारी नायक चंदर को देखिए- मैं दुनिया को दिखा दूँगा... चंदर गर्व से कहता था। इसके बाद चंदर बहुत ही ऊँचाई से अपना जीवन दर्शन पेश करने आ जाता। उसकी बात 'मेरे विचार में' या 'मैं यह सोचता हूँ' से शुरू होती थी। उसको पूरा विश्वास था कि वह एक महान क्रांतिकारी परोपकार का कार्य कर रहा है, जिसमें अपनी पूर्ण विजय और सर्वोच्चता की बात सोच कर वह सारे समाज को अपने शत्रु के रूप में कल्पना करने लगता। अपने प्यार को लेकर वह निरंतर संघर्ष और लड़ाई की बात सोचता था और इसीलिए तारा को तैयार करना चाहता था।14 और तारा उसकी इन्हीं बातों से प्रभावित होकर एक दिन अपने माँ-बाप के खिलाफ विद्रोह कर देती है। बेटी की दृढ़ता के आगे माता-पिता को झुकना पड़ता है। लेकिन शादी की स्वीकृति मिलते ही चंदर का चेहरा सहसा फक पड़ गया। उसने अपने को आलिंगन से मुक्त कर लिया और खिड़की के बाहर अँधेरे में देखने लगा। शादी! वह अपने को महान समझाता था और उसकी कल्पना थी कि उसका प्यार महान संघर्ष, महान तूफान और महान कुर्बानी के दौर से गुजरेगा। उसके प्यार की ऐसी साधारण परिणति होगी, ऐसा उसने सोचा भी न था। उसका मुँह देखते ही देखते कठोर हो गया।15 दोनों ही कहानियों में क्रांतिकारी का मैं कॉमन है। और दोनों ही मामलों में नायिका का पर्यवेक्षण भी बिल्कुल सटीक है। परसाई अपनी क्रांति-कथा का समाहार हास्य-मिश्रित व्यंग्य-बोध से करते हैं। उसने (पत्नी ने) कहा, "डियर एक बात कहूँ। तुम क्रांतिकारी नहीं हो।" / उसने (पति ने) पूछा, "नहीं हूँ। फिर क्या हूँ?" / पत्नी ने कहा, "तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो। पर मैं तुम्हें प्यार करती हूँ।16 जबकि अमरकांत की कहानी का अंत बिल्कुल भिन्न मनोभूमि पर होता है। यहाँ नायिका अपने प्रेमी को आदर्शों और वायवीय क्रांतिबोध के आसमान से धक्के देकर, खुरदरी ज़मीन पर पटक देती है और बेबाकी के साथ यथार्थ का आईना भी दिखा देती है। आपको दो ही बातों से मतलब है, एक मेरी देह से और दूसरे मुझे उपदेश देने से। मैं मेहनत करूँ, मैं कुरबानी देने को तैयार हो जाऊँ। आप क्या करोगे? आप क्या मेहनत करते हैं? बात तो यह है कि आप सदा हवा में उड़ते रहना चाहते हैं और आज जब जमीं पर उतरने का मौका आया है त्याग करने का समय आया है, तो आप जान बचाना चाहते हैं, इसलिए आप नाराज हैं, अपने लिए मौजपूर्ण गैरजिम्मेदार और दूसरों के लिए परिश्रम, कर्तव्य और जिम्मेदारी, यही आपका जीवन दर्शन है। पर मैं आपसे यह पूछती हूँ कि आपने मेरा जीवन क्यों बरबाद किया? खैर आप यह बात गाँठ बाँध कर रख लीजिए कि मैं किसी की दया पर निर्भर नहीं रहना चाहती।17 दोनों ही कहानियों का प्रस्थान बिन्दु एक ही है, लेकिन जीवन-दृष्टि बिल्कुल भिन्न, बल्कि इस बिन्दु पर अमरकांत, परसाई को पीछे छोड़ देते हैं। परसाई की नज़र में क्रांतिवादिता बचकाना जोश से अधिक कुछ नहीं है, जबकि अमरकांत की दृष्टि में क्रांतिवादिता भी शोषण का ही एक ढब है। परजीवीपन और आत्म-मुग्धता यदि क्रांतिवादिता के लक्षण हैं तो क्रांति का स्वप्न वायवीय ही बना रहने वाला है। अमरकांत एक ही साथ युगानुरूप स्त्री-जीवन-दृष्टि में आ रहे बदलाव और उसकी संघर्ष-क्षमता का न सिर्फ विश्वसनीय चित्रांकन करते हैं, बल्कि इस तथ्य को भी उद्घाटित कर देते हैं कि आखिर क्यों भारतीय समाज में बदलाव और क्रांति का स्वप्न आज भी रुमानी अवधारणा से आगे नहीं बढ़ पा रहा है? साथ ही अमरकांत और परसाई की व्यंजना शक्ति का फ़र्क़ भी स्पष्ट हो जाता है। व्यंग्य का हास्य के साथ गठजोड़, व्यंग्य की प्रभावोत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जबकि यदि व्यंग्य में गंभीरता का आसव मिला हो, तो वह पाठक पर न सिर्फ सकारात्मक असर छोड़ता है, बल्कि पाठक को अंदर तक झकझोरता भी है। इस सूची में एक और कहानी लड़की और आदर्श जोड़ी जा सकती है।

अमरकांत का कथा-शिल्प ही ऐसा है, कि कहानियों में जीवन के विभिन्न भाव-चित्रों का कोलाज तो देखा जा सकता है, लेकिन उपदेशात्मक अथवा आदर्श-वृत्ति कहीं भी नज़र नहीं आती। यहाँ प्रेमचंद के बड़े घर की बेटी या फिर जयशंकर प्रसाद के मधुआ जैसे आदर्श-संवेदित पात्रों के दर्शन दुर्लभ ही हैं। शायद यही कारण है कि पाठक को अमरकांत की कहानियाँ अपनी ही जीवन-कथा का प्रत्यक्षीकरण जान पड़ती हैं। निस्संदेह समय-संदर्भों की पहचान और पड़ताल के मामले में अमरकांत का कोई शानी नहीं। अब हत्यारे को ही लीजिए। दो लफ्फ़ाज़ों के आपसी संवाद और उनके कृत्यों की मदद से तत्कालीन राजनीति, समाज और व्यवस्था को बड़ी चतुराई के साथ बेपर्दा कर दिया गया है। सभ्य-समाज की कथनी-करनी के फ़र्क़ का ये प्रोजेक्शन वाक़ई क़ाबिले-दाद है। जुगुप्सा और भोंड़े हास्य के माध्यम से कथाक्रम आगे बढ़ता है। अहिंसक तरीके से आर्थिक और सामाजिक क्रांति का दम भरने वाले इस प्रहसन का पटाक्षेप छुरे के माध्यम से होता है। दरअसलअमरकांत की कहानी हत्यारेसामाजिक विश्रृंखलता से उत्पन्न होने वाले त्रास और आतंक का कलात्मक दस्तावेज है। किसी भी समाज से यह प्रारंभिक प्रत्याशा होती है कि वह अपने सदस्यों को सुरक्षा दे सके। पर हत्यारे का जो संसार है, उसमें न तो समाज रक्षा देता है और न अपने इन सदस्यों से सम्मान पाता है। आजादी के बाद के संदर्भ में उपजी नई पीढ़ी के लिए वे तमाम शब्द और अवधारणाएँ अब केवल मज़ाक के लिए रह गई हैं, जिनको लेकर तमाम चिंतक, व्यवस्थापक, राष्ट्रनिर्माता आदि अब तक स्वप्न देखते आए थे। समाजवाद, देश की तरक्की, देश का बोझ, विश्वशांति, ग्रामर ऑफ पॉलिटिक्स, रूस-अमरीका विवाद आदि उनके लिए हँस-कर उड़ा देने की चीज़ें हैं। वस्तुतः इन शब्दों का उनके लिए अर्थ ही खो गया है। पर इस खोए हुए अर्थों वाली भाषा से ही बीच-बीच में वे कण चमक जाते हैं जो उनकी आकांक्षा को भी सूचित करते हैं। वे प्रशासन के उच्चतम पदों के आकांक्षी हैं- यह उनकी व्यक्त अनाकांक्षा से प्रकट होता है; आजन्म ब्रह्मचारी रहने की घोषणा के पीछे जो वासना झांक रही है, वह बगल से लड़कियों के गुजरने पर हवा में उछाले गए चुम्बनों या चन्द्रा-सिन्हा प्रसंग से ही प्रकट नहीं होती, बहुत जल्दी अपने निम्नतम रूप में आगे आती है।18 बस्ती कहानी भारतीय लोकतंत्रका रूपक है। बस्ती का उद्घाटन करते वक्त रामलाल के भाषण का साम्य आप चाहें तो 14 अगस्त 1947 की आधी रात को पंडित जवाहरलाल नेहरू के राष्ट्र के नाम संबोधन में पा सकते हैं। लेकिन जिस तरह इस बस्ती के बाशिंदे अपनी एकता और अखंडता को नहीं बनाए रख पाए, आदर्शों की दीवार तोड़ी और लूटी जाती रही... ठीक ऐसा ही हाल क्या हमारे देश का नहीं है?

भले ही अमरकांत की कहानियों का प्लॉट या कैनवॉस छोटा हो, लेकिन जीवन की समग्रता का जिस रूपकात्मक ढंग से वो उद्घाटन करते हैं, और अपनी सशक्त भाषा के माध्यम से इसको सांकेतिक अभिव्यंजना में तब्दील करते हैं, वह कहानी को काव्यात्मक आख्यान में रूपांतरित कर देती है। ऐसी विलक्षण वाग्विदग्धता, पर्यवेक्षण शक्ति और ऊर्जा का स्रोत क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में अरमकांत लिखते हैं कि हम अपनी उत्तम परम्पराओं से सीखते हैं, प्रभावित होते हैं और उससे शक्ति ग्रहण करके हम नये सन्दर्भों में नई परम्पराओं को गढ़ते भी हैं।19 अमरकांत के इस कथन की तस्दीक उनकी कहानियाँ करती हैं। अमरकांत की कहानियों में भाषा-वैविध्य है। पात्रों और परिस्थितियों के अनुकूल शब्द-चयन की उनकी अपूर्व क्षमता, उन्हें प्रेमचंद और रेणु के बीच खड़ा करती है। देशज शब्दों, मुहावरों की मदद से पात्र अथवा परिस्थिति के मूडको उद्घाटित करने का उनका ढब बिल्कुल निराला है। बल्कि पात्रों के नाम भी कथा-सूत्र को पकड़ने में मददगार साबित होते हैं। अब पलाश के फूल को ही लीजिए, कहानी के शीर्षक और कहानी के मुख्यपात्र राय साहब के चरित्र के बीच क्या कोई साम्य नहीं है? धोती, कुर्ता, गाँधी टोपी, हाथ में छड़ी... सामाजिक प्रतिष्ठा का जो बाह्य-आवरण है, वो बहुत चटख और आकर्षक है। लेकिन उसके कृत्य बेहद घिनौने। उसमें सदाचार अथवा सच्चरित्रता की सुगंध का सर्वथा अभाव है। अँजोरिया के रूप-लावण्य से आकर्षित होकर, उसके शरीर को प्राप्त करने के लिए पहले तो उसके पिता के साथ अमानुषिक कृत्य, फिर उपकारी बनकर मदद का ढोंग। और फिर अँजोरिया को प्रेम का झांसा दे-देकर उसका यौन शोषण। मन भरने के बाद दूध में पड़ी मक्खी की तरह उसे अपने जीवन से निकाल बाहर करना। निर्लज्जता की पराकाष्ठा ये कि वह शोषक है लेकिन स्वयं को पीड़ित के रूप में पेश करता है। उसने पहले अपने रूप के जादू से मुझे वश में किया, फिर प्यार जताकर मुझे उल्लू बनाती रही, मेरा रूपया-पैसा बर्बाद करती रही... माया का असली रूप यहीं देख सकते हो! ...तो मैं ज्यों-ज्यों सोचता गया, मुझमें उस औरत के लिए नफ़रत-सी भरती गई।20 सामंती समाज का वास्तविक चरित्र यही है। अँजोरिया का अर्थ होता है- प्रकाश। सामंती-शोषण के अँधेरे-ढंके कोने अँजोरिया के प्रभावस्वरूप ही तो प्रत्यक्ष हो रहे हैं। वैसे मुक्ति औरमहुआ जैसी कहानियाँ भी इसी श्रेणी में रखी जा सकती हैं। जबकि लड़की की शादीपढ़े-लिखे और प्रगतिशील-चेतना से लैस माने जाने वाले मध्यवर्ग के दोहरे चरित्र को उद्घाटित करने वाली कहानी है।

अमरकांत नई कहानी आंदोलन की अनुपम उपलब्धि हैं। हालांकि ये भी सच है कि मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव का प्रभामंडल इतना सघन था कि अमरकांत उस शुरुआती माइलेज से महरूम रहे, जिस पर इनका हक़ था। लेकिन वास्तविकता यह है कि अमरकान्त का इस समय से पीछे छूट जाना ही उनका समय से आगे बढ़ जाना था। अमरकान्त जिस सादगी और व्यंग्य की प्रच्छन्न अन्तर्धारा के साथ अपने आसपास की निम्न मध्यवर्गीय जिन्दगी पर लिख रहे थे, वस्तुतः वे उसी कारण नई कहानी के बीच होकर भी उससे बड़े हैं।21 अगर हम यह स्वीकार करते हैं कि हिन्दी की नयी कहानी जिस रूप में विकसित हुई है, उस रूप में उसका भारतीय जीवन के धरातल से गहरा संबंध है और इसीलिए यह केवल साफिस्टिकेटिडपाठक की कहानी न होकर साधारण पाठक की कहानी बनी रही है।22 तो निश्चित रूप से हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि इसका श्रेय अमरकांत को ही जाता है। मार्कण्डेय महत्वपूर्ण कथाकार तो हैं, लेकिन उनकी कथा-भाषा में कृत्रिमता का बाहुल्य है। उनकी भाषा पात्र-परिवेश के अनुकूल नहीं है। वहाँ अमरकांत की सी सहजता और देशज-ठाठ का अभाव भी बहुत खलता है। अंत में बस इतना ही कि साधारण भाषा में अमरकांत जिन असाधारण जीवन-अनुभूतियों, सामाजिक सम्बंधों, परिस्थितियों और तरल मनोवेगों को स्वर देते हैं, वह अनुपम है। अमरकांत की कथा-भाषा वास्तव में फल्गू नदी जैसी है, जहाँ व्यंजना और तात्पर्य-वृत्ति अंतःसलीला के रूप में विद्यमान है। यहाँ साधारण भाषा में असाधारण भाव-बोध छुपा है।

संदर्भ सूचीः
1.कमलेश्वर, जो मैंने जिया(आधारशिलाएँ-1), राजपाल प्रकाशन, संस्करण 1992, पृ.सं.150
2.http://www.hindisamay.com/Alochana/shukl%20granthavali2/rasmimansa7.htm
3.http://www.hindisamay.com/Alochana/shukl%20granthavali2/rasmimansa7.htm
4.अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक्स, प्र.सं. 1984, आवृत्ति 2007, पृ.सं.30-31
5.अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक्स, प्र.सं. 1984, आवृत्ति 2007, पृ.सं.98
6.अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक्स, प्र.सं. 1984, आवृत्ति 2007, पृ.सं.47
7.हिन्दी कहानी के अठारह कदम, सं. बटरोही, वाणी प्रकाशन, प्र.सं.2002, पृ.सं.37-38
8.अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक्स, प्र.सं. 1984, आवृत्ति 2007, पृ.सं.47
9.मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.92
10.नामवर सिंह, कहानीः नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, सं. 2009, पृ.सं.37
11.वही, पृ.सं.38-39
12.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=428&pageno=1
13.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=428&pageno=1
14.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=3979&pageno=1
15.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=3979&pageno=1
16.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=428&pageno=1
17.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=3979&pageno=1
18.देवीशंकर अवस्थी, रचना और आलोचना, वाणी प्रकाशन, पृ.सं.144-145
19.अमरकान्त, कुछ यादें कुछ बातें, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.2005, पृ.सं.140
20.अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक्स, प्र.सं. 1984, आवृत्ति 2007, पृ.सं.139
21.श्रीलाल शुक्ल, कुछ साहित्य चर्चा भी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.2008, पृ.सं.184

22.मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.94

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