Sunday, March 8, 2015

‘डार्क रीऐलिटी’ के चितेरे हैं मधुर

20वीं सदी के अंतिम दशक में हिन्दुस्तान में जो कुछ घटित हुआ, उसने कम-अज़-कम बौद्धिक जगत में कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रचलित किए, जो अब तक हमारे लिए बिल्कुल अनजान थे। भूमंडलीकरण और उदारीकरण को बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। जिन ग्रामीण बालाओं को बर्फ़ का गोला भी कभी-कभार ही नसीब हो पाता था, उन्हें रूप बदलकर गाँव पहुँचा बॉलीवुड का नायक, कुएँ से कोका कोला निकाल-कर पीने-पिलाने लगा। याराँ दा टशन का वो दौर अब भी जारी है। डीटीएच ने शहरी मध्य-वर्गीय स्त्रियों की ठसक और ऐंठ के साथ ही रुतबे पर भी बुरा असर डाला है। गर्मी की छुट्टियाँ बिताने या तीज-त्यौहार पर गाँव जाने वाली इन विदुषियों का प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो चुका है। अब न तो इनकी पहले-सी आवभगत होती है और न ही कोई सास भी कभी बहू थी की अकथ-कथा सुनने के लिए ख़ुशामदी अंदाज़ में इनके आगे-पीछे ही करती हैं। और तो और दूरदर्शन पर शुक्रवार के दिन आनेवाली फिल्मों का क्रेज़ भी खत्म हो चुका है। मार्शल मैक्लूहान के ग्लोबल विलेज़ का ग्लोबल बेचारा कब-का ग्लोकलद्वारा अपदस्थ किया जा चुका है। फिल्मों का नायक तो पहले ही बदल चुका था, अब तो कथानक भी बदल गया है। कुछ रामगोपाल वर्मा टाईप हो गए हैं तो कुछ ने ख़ुद को कपिल और राजू श्रीवास्तव की श्रेणी में फिट कर लिया है। फिल्मों में भूतिया दौर भले ही ढंग से कभी आ नहीं पाया हो, लेकिन टीवी सोप्स ने बॉलीवुड की इस कमज़ोरी को अपने अथक-परिश्रम से ढंक लिया है। भगवान कृष्ण ने बड़ा होने से मना कर दिया है और अब तो गणेश की भी उम्र नहीं बढ़ती क्योंकि दोनों का बाल-रूप ही बच्चों को अट्रैक्ट करता है। हाँ, एक महादेव हैं, जिन्हें अब तक बच्चा बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। हनुमान और मूसकराज जैसे इनके सहयोगियों को भी अच्छा-ख़ासा फुटेज मिलने लगा है। नगरीय सभ्यता के कामकाजी-जीवन और परिवार के विघटन से जो धार्मिक और पौराणिक गैप पैदा हुआ था, उसे टीवी ने बख़ूबी भर दिया है। दिन-रात खट-खटकर बेहाल लोगों की सेहत का ख़्याल रखते हुए धर्म-दर्शन का पुण्य-लाभ भी वाया टीवी अथवा सिनेमा, घर बैठे ही प्राप्त किया जा सकता है।

युवा-पीढ़ी को अब फूलों की रानी, बहारों की मलका का मुस्कराना ग़ज़ब-का नहीं लगता। अब उन्हें या तो गंदी बात पसंद आती है या फिर एडवेंचर और एक्साइटमेंट में मज़ा आता है। लिहाजा हीरो को अपनी हीरोपंती छोड़कर, लंबे-लंबे किसिंग सीन करने पड़ते हैं। बेचारा प्रेमिका से मिलते ही कपड़े उतारने पर मजबूर कर दिया जाता है। अभी हाल ही में एक प्रतिष्ठित न्यूज़-चैनल पर चैरिटी-शो के बहाने सलमान खान को शर्टलेस देखने के लिए बोली लगी थी। यानी सिर्फ स्क्रिप्ट की माँग पर ही नहीं, बल्कि फैन्स की डिमांड पर भी कपड़े उतारने का चलन शुरू हो चुका है। जब दृश्य-श्रव्य माध्यम का कायाकल्प हो चुका हो तो नायक अपने पुराने औरा में क़ैद कैसे रह सकता है! लिहाज़ा वो भी बदल रहा है। पहले जहाँ फिल्मी नायक विज्ञापन करने से भरसक परहेज़ बरतते थे (क्योंकि उन्हें इस बात का अंदेशा रहता था कि यूँ उठाईगिरों की तरह वे साबुन-क्रीम बेचते दिखे तो लोगों में उनकी छवि धूमिल हो जाएगी), वहीं अब वे फिल्मों से ज़्यादा विज्ञापनों और रिबन काटने में मज़ा पाते हैं। भला हो सदी के महानायक का, जिनके कर-कमलों से ये पवित्र-बंधन टूटा। नौबत तो यहाँ तक आ पहुँची है कि नायक अपने आचरण को लेकर बिल्कुल कैजुअल हो गया है और वह नायिका के सामने हेकड़ी दिखाते हुए यहाँ तक कह देता है कि वह दिल्ली वाली गर्लफ्रेंड छोड़-छाड़-के आया है। यानी प्रेम में भी दबाव की राजनीति का असर दृष्टिगोचर है। किस्सा-कोताह ये कि बड़ा-छोटा पर्दा मिलकर ग्लोकलाइज़्ड बाज़ार और समाज का पूरा ख्याल रख रहे हैं। कुल मिलाकर उत्तर-आधुनिक युग में ऑल इज़ वेल है। आप सोच रहे होंगे कि मैं ये क्या बक रहा हूँ! बात का कोई ओर-छोर नज़र ही नहीं आता! जब सारी दुनिया बदली-बदली सी है और सभी ने परंपरागत लीक छोड़ रखी है तो मैं ही क्यों सीधे-सीधे विषय पर उतर आऊँ? आप ही बताइए, जिस युग-परिवेश में हम जी रहे हैं, उसका क्या कोई ओर-छोर या कि कोई विन्यास अथवा क्रम समझ में आता है? तो फिर हमसे ही तारतम्यता की उम्मीद क्यों? ख़ैर, बाज़ार का ज़माना है, पाठक भी उपभोक्ता होता है (हालांकि हमारी ये दिली गुजारिश है कि आप ऐसा न मानें) लिहाजा जिरह करना, अपना ही मार्केट ख़राब करने जैसा है! इसलिए आइए विषय से ही मुखामुखम करें।

20वीं सदी का भारतीय गणतंत्र अपने समाजवादी प्रस्थान बिन्दु से क्रमशः प्रगति करता हुआ अब 21वीं सदी का पूँजीवादी हब बन गया है। को-ऑपरेशन (को-ऑपरेटिव भी कह सकते हैं।) का कॉर्पोरेशन में कायांतरण हो चुका है। उद्यम की जगह निगम की सत्ता स्थापित हो गई है। उदारीकरण ने कॉर्पोरेट शब्द को आम-फ़हम बनाने के साथ ही कल्चर के साथ इसकी युगलबंदी से एक नया पदबंध कॉर्पोरेट कल्चर गढ़ा है, जिसका कल्चर के प्रचलित अर्थ से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। बल्कि सपाट-बयानी से काम लें तो कह सकते हैं कि एक ऐसा कल्चर जो केवल कल्चर्ड होने का भ्रम पैदा करता है। सन 2006 में आई मधुर भंडारकर की फिल्म कॉर्पोरेट इसी छल-छद्म को बेपर्दा करती है। पैसा, पॉवर और पॉलिटिक्स के अनैतिक गठजोड़ से निर्मित कॉर्पोरेट का यथार्थ-चित्र हमारे सामने पेश करती है। फिल्म का प्रारंभ नेपथ्य से उभरते इस वॉयस ओवरसे होता है- कॉर्पोरेट यानी बिजनेस करने का प्रोफेशनल तरीक़ा। ...बिजनेस का एक ही मक़सद होता है - मुनाफ़ा। ...मुनाफ़े को कॉर्पोरेट वर्ल्ड में बॉटम लाईन कहते हैं। बॉटम लाईन सुधारने के लिए इन प्रोफेशनल लोगों को कई बार अनप्रोफेशनल काम भी करने पड़ते हैं। लेकिन रुकिए, फ़िल्म की शुरुआत इस वॉयस ओवर से पहले ही हो चुकी है, बल्कि सच कहें तो ख़त्म भी हो चुकी है। यानी जहाँ से फिल्म शुरू हुई मानी जा रही है, वह तो महज संकेत-सूत्रों की व्याख्या का प्रारंभ है। सिल्वर स्क्रीन पर फिल्म का नाम उभरने से ठीक पहले, बार-चार्ट फ्लैश होता है और वह तेज़ी से कॉर्पोरेट शब्द में तब्दील हो जाता है। फिर क्रमशः संगीत की संगत पर संकेतों का कोलाज अथवा मोंटाज जिसमें कम्प्यूटर, की-बोर्ड, मोबाइल, मीडिया, शराब, शबाब, कबाब, सेलेब्रेशन, रिलीजन, पॉलिटिक्स, ब्रोकर, दलाल-पथ, शासन-सत्ता और सेंसेक्स, फिर शतरंज के मोहरे और अंततः रेत-घड़ी का क्षणिक अवतरण। एक भी तस्वीर ठहराव का संकेत नहीं देती। ऐसा प्रतीत होता है, गोया उफनती नदी की उद्वेलित धारा पर तिनकों का भय-नृत्य। गहन चिंतन और शोध के बाद भी कॉर्पोरेट की परिभाषा को इतने गहरे और सहज ढंग से शब्दबद्ध नहीं किया जा सकता, जैसा कि मधुर ने दृश्यबद्ध किया है। हंस के सिनेमा विशेषांकके लिए उदय शंकर से बातचीत में कमल स्वरूप ने कहा भी था कि हमारा अधिकांश सिनेमा या तो वास्तविक जीवनकाल का एक संक्षिप्त संस्करण होने का प्रयत्न है या फिर किसी साहित्यिक कृति की जस की तस अनुकृति होने की कोशिश। मैं चाहता हूँ कि ऐसे फिल्मकार हों जो अपनी कृति को सदा सफल और लोकप्रिय मुहावरों में तिरोहित कर देने की जगह सिनेमा को साहित्य के नाट्यकृत पुनरुत्पादन की भूमिका से खुद को अलग कर पाठ, गति, ध्वनि और बिम्ब के सम्बन्ध को पुनर्व्यख्यायित करने का प्रयत्न करें। सिनेमा अभिव्यक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम है।”(हंस, फरवरी, 2013) और इस आधार पर मधुर बिल्कुल खरे उतरने वाले निर्देशक साबित होते हैं।

उदारीकरण ने बिजनेस ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीयता, राजनीति, विचारधारा, भाषा, साहित्य, समाज, धर्म और संस्कृति से लेकर फिल्म तक, सभी का रूप-विन्यास बिगाड़ दिया है। उपन्यास पढ़ते वक़्त अब कभी आत्मकथा’, कभी संस्मरण, कभी यात्रा-वृत्तांत तो कभी ललित निबंध का भ्रम होता है। गद्य की भाषा पद्यात्मक हो रही है तो पद्य निरे गद्य का-सा प्रतीत होता है। कहानियाँ अप्रस्तुत विधान में रची जाने लगी हैं। फिल्मों का दृश्यांकन, संवाद-अदायगी का परंपरागत ढंग, नाटकीयता और कथा-विन्यास भी बदल गया है। बल्कि फिल्मों में जो परंपरागत बचा है, वो है प्रारंभ में आने वाला डिस्क्लेमर, यानी इस फ़िल्म की कहानी और पात्र काल्पनिक हैं। और वास्तव में ये भी अपनी अर्थवत्ता खो चुके हैं। अगर उत्तर-आधुनिक शब्दावली में कहें तो इस डिस्क्लेमर का मानक अर्थ विस्थापित हो चुका है। क्योंकि अब हकीक़त ये है कि फ़िल्में महीनों और कभी-कभी वर्षों के रिसर्च का परिणाम होती हैं। घटनाओं के यथार्थ-अंकन के लिए लोकेशन के चुनाव तक में पहले की बनिस्बत अधिक सजगता और ईमानदारी बरती जाती है। यही वजह है कि अब फीचर फिल्म की नज़दीकियाँ क्रमशः डॉक्यूमेंट्री से बढ़ रही हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि साहित्य ही नहीं, बल्कि फिल्में भी अपना फॉर्म बदल रही हैं। चाँदनी बार को छोड़कर अपनी अधिकांश फिल्मों में मधुर भंडारकर फॉर्म के स्तर पर अन्वेषी नज़र आते हैं। दिसंबर 2002 में मधुर भंडारकर की ही किसी फिल्म के मुहूर्त से लौटे महेश भट्ट ने निराशा का इज़हार किया था और कहा था कि रसास्वादन, आय, तकनीक, सनक, विज्ञापन, प्रतियोगिता और सभी कल्पनीय चीज़ों से मिलकर ग्राहक की ज़रूरतें बदलती हैं। ग्राहक का बोध बदलता है। नये उत्पाद पुराने उत्पादों को पुराना कर देते हैं। बाज़ार से आगे रहने के लिए ज़रूरी है कि या तो बदलें या फिर मरें। हिन्दी सिनेमा इसलिए मर रहा है कि वह बदल नहीं रहा है। XXX सीधी बात समझ लें कि ज़िन्दगी की अगुवाई मुर्दे नहीं कर सकते। पुराने विचारों से दर्शकों को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। नये जन्म के लिए फिल्म इंडस्ट्री की सृजनात्मक मौत आवश्यक है।(महेश भट्ट, ज़िद जीतने की, पृ.62) लेकिन अब इच्छा होती है कि महेश भट्ट से मिलूँ और पूछूँ कि क्या वे अब भी निराश हैं? मेरी जिज्ञासा वाजिब है क्योंकि हिन्दी सिनेमा (भारतीयशब्द का इस्तेमाल जान-बूझकर नहीं कर रहा) काफ़ी तेज़ गति से बदला और बदल रहा है। ज़िन्दगी की अगुवाई अब मुर्दे नहीं कर रहे। बल्कि अनुराग कश्यप (ब्लैक फ्राइडे, देव-डी, गुलाल, द गर्ल इन येलो बूट्स, गैंग्स ऑफ वासेपुर), विशाल भारद्वाज (मकड़ी, मकबूल, द ब्लू अम्ब्रेला, मटरू की बिजली का मंडोला), तिग्मांशु धूलिया (चरस, शागिर्द, पान सिंह तोमर, बुलेट राजा), राजकुमार हिरानी (मुन्नाभाई एमबीबीएस, लगे रहो मुन्नाभाई, थ्री-इडियट), इम्तियाज़ अली (जब वी मेट, लव आज कल, रॉक-स्टार, हाईवे), अनुराग बसु (गैंग्सटर, काइट्स, बर्फी), मधुर भंडारकर (चाँदनी बार, पेज-थ्री, कॉर्पोरेट, ट्रैफिक सिग्नल, फैशन, हिरोइन) जैसे सेकंड रंग निर्देशकों के इन्नोवेटिव हाथों में है। अब मार्क्सवाद-माओवाद जैसी गूढ़ और कथित तौर पर बोझिल विचारधारा की थीम पर मटरू की बिजली का मंडोला जैसी इंटरटेनिंग मसाला-मूवी बन सकती है। भारतीय जीवन-जगत पर हावी होते कॉर्पोरेट कल्चर के प्रतिक्रिया-स्वरूप बुलेट राजा जैसी फिल्म आकार ग्रहण कर सकती है। लगे रहो मुन्नाभाई की मदद से लगभग अप्रासंगिक हो चुके गाँधीवाद का अपडेटेड वर्ज़न अर्थात गाँधीगीरी को न सिर्फ स्थापित किया जा सकता है बल्कि लोकप्रिय भी बनाया जा सकता है। स्त्री-विमर्श को सेल्यूलाइड के हाईवे पर बिना धचका के दौड़ाया जा सकता है। महानगरों की मध्य-वर्गीय सभ्यता का पेज थ्री छद्म उजागर किया जा सकता है। विकास और सेंसेक्स के वायवीय अंतर्संबंधों के साथ ही उदारीकरण की अवधारणा और मसीही कॉर्पोरेट-जगत की हकीक़त को पूरी सहजता और गंभीरता के साथ पर्दे पर उतारा जा सकता है। लिहाजा महेश भट्ट की बनिस्बत शेखर कपूर का ये ऑब्ज़र्वेशन ज़्यादा तार्किक और बॉलीवुडीय यथार्थ का द्योतक है कि हॉलीवुड की फिल्मों की तरह सभी को प्रभावित करने के कारण यह (हिन्दी फिल्म) कुछ मात्रा में जड़विहीन है। फंतासी की सभी हदें पार कर चुकी हिन्दी फिल्में अब जड़ों की ओर लौट रही हैं।(वही, पृ.64) कहने की ज़रूरत नहीं कि 21वीं सदी का हिन्दी सिनेमा एनआरआई सिंड्रोम से मुक्त हो रहा है। हाँ, फिल्मों में मनोरंजन की मिक़्दार बढ़ी है, साथ ही हास्य-व्यंग्य का दायरा भी बढ़ा है लेकिन ये सर्वथा अर्थहीन नहीं होते, यहाँ डार्क ह्यूमर को तरजीह मिल रही है। कॉर्पोरेट का ही एक संवाद द्रष्टव्य है- ये सब वी.पी., सीईओ, एक्जक्यूटिव। ये सबलोग हैं ना! ...कम्पनी के पैसे से जलवे करते रहते हैं। ये श्याना हर छह महीने में सेक्रेटरी बदलता है। बोलो क्यों... बीवी नहीं बदल सकते हैं ना। हा हा हा या फिर चपरासी लोबो का ही ये डायलॉग कि चार बजे जो काम बंद करता है, वो प्यून होता है... और जो चार बजे के बाद काम शुरू करता है, वो बॉस होता है।

कार्पोरेट अपने उत्थान अथवा प्रारंभ से पतन अर्थात अंत तक संशयवाद और निराशावाद के गुंजलक में उलझी रहती है। लोबो नाम का यह अदना सा किरदार पूरी फिल्म में कॉर्पोरेट शब्द की अर्थ-व्यंजना करता चलता है। वह इस शब्द के अर्थ को डीकंस्ट्रक्ट करता चलता है। पूरी फिल्म में उसकी उपस्थिति अंतःसलीला जैसी है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि वह मास्टर स्ट्रोक के लिए ही गढ़ा गया है। एक आदमी का काम पचास आदमी मिल-के टेबुल पर बैठ-के खराब करते हैं ना, उसको कॉरपोरेट बोलते हैं।या फिर लगता है तेरे को कॉर्पोरेट लेवेल पे समझाना पड़ेगा! क्या है, ये (तनाज) जो है न, पहले पब्लिक लिमिटेड थी, इसलिए किसी के भी साथ जाती थी। अब ये प्राइवेट लिमिटेड हो गई है, इसलिए अब बस त्यागी के साथ जाती है। एक और उदाहरण- लेट्स स्लिप ओवर दिस इश्यूलेट्स स्लिप ओवर दिस इश्यू... किधर स्लिप करते हैं, कौन सा इश्यू निकालते हैं- मालूम नहीं। चल तू पिन मार वरना एक और इश्यू हो जाएगा।ये तीनों संवाद ह्यूमरस हैं, लेकिन इनकी मदद से कॉर्पोरेट की कार्यप्रणाली और संरचना को समझने में सहूलत होती है। ख़ैर, आपको पेप्सी-कोला विवाद तो याद होगा! कार्पोरेट उसी पर आधारित है, जिसे मुम्बई के दो औद्योगिक घरानों मारवाह और सहगल ग्रुप के बीच की प्रतिस्पर्धा के रूप में चित्रित किया गया है। विनय सहगल और धर्मेश मारवाह के अपने-अपने पॉलिटिकल कनेक्शन्स हैं। विनय सहगल जहाँ केन्द्र सरकार में अपनी पैठ का फायदा उठाते हुए एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के साथ अरबों की डील में कामयाब हो जाता है तो महाराष्ट्र सरकार में अपनी पहुँच की बदौलत धर्मेश मारवाह बॉटलिंग प्लांट की बिड जीतने में कामयाब हो जाता है। असली टंटा तब शुरू होता है जब फिल्म में रितेश की नाटकीय इंट्री होती है। सहगल उसे नये प्रोजेक्ट का वाइस प्रेसिडेंट बनाने की घोषणा करता है और यहीं पर सहगल ग्रुप की टॉप ब्रास निशी से रितेश के संबंध उजागर होते हैं। बिजनेस में असफलता और आलोचना के कारण अवसाद के शिकार रितेश को उबारने और आलोचकों का मुँह बंद करने के लिए निशी सो-कॉल्ड बिजनेस एथिक्सको ताक़ पर रख, मारवाह ग्रुप के परवेज़ को इमोशनली चिट करती है और मिंट-बेस्ड सॉफ्ट ड्रिंक का आइडिया चुरा लेती है। मीडिया-मित्र यानी देवयानी की मदद से सेटिंग के बावजूद बिजनेस अवॉर्ड जीतने में असफल सहगल जल्दबाज़ी में सॉफ्ट ड्रिंक जस्ट चिल्लके लांच की घोषणा कर देता है और शह-मात का कॉर्पोरेट गेम सत्ता की आँच पर और अधिक लहक उठता है। वॉटर-प्लांट में पेस्टिसाइड वाला राज़ लीक होता है और धर्मेश मारवाह इसको इश्यू बनाने में कामयाब हो जाता है। सहगल ग्रुप की मार्केट वैल्यू में न सिर्फ भारी गिरावट आती है, बल्कि उसे अपनी छवि बचाने के लिए निशी को मोहरा बनाना पड़ता है और अंत में सहगल और मारवाह के बीच समझौता हो जाता है। रितेश की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाती है। फिल्म की मुख्य-कथा यही है, लेकिन मेरी नज़र में ये महज आउट-लाइन है। फिल्म की अंतर्कथा इसके बिल्कुल विपरीत है। जिस कथात्मक बिखराव को विश्वनाथ त्रिपाठी कहानी या उपन्यास का अनिवार्य तत्व गर्दानते हैं, वही बिखराव मधुर भंडारकर के फ़िल्मों की विशेषता है। और यह मधुर की किसी एक फिल्म की नहीं, बल्कि अधिकांश फिल्मों की खूबी है। उनकी फिल्में वास्तव में कथा-कोलाज हुआ करती हैं।

फ़िल्म भले ही संकेत-सरगम पर फास्ट-फॉरवार्ड मोड में चलती हो, लेकिन राजनीति और कॉर्पोरेट के अंतर्संबंधों की एक-एक परत को बड़ी सावधानी और धैर्य के साथ अलग-अलग करने की कोशिश में कहीं कोई चूक नज़र नहीं आती। बीच में वॉयस ओवर है- कॉर्पोरेट वर्ल्ड में बिजनेस को पॉलिटिक्स की ज्यादा ज़रूरत है, या पॉलिटिक्स को बिजनेस की.., सोचने वाली बात है।राष्ट्रहित में और बिना फेवरटिज़्मके बॉटलिंग प्लांटके टेंडर में किस तरह घपलेबाज़ी होती है? अचानक से पेस्टिसाइड-जाँच कैसे बदल जाती है? दो विरोधी दल के नेता-मंत्री कैसे एकजुट हो जाते हैं? और दोनों औद्योगिक घरानों की लड़ाई का पटाक्षेप तो और भी नाटकीय है, गोया कॉर्पोरेट-युद्ध मुहल्ले के दो बच्चों की मामूली झड़प हो, जिन्हें उनकी माँओं के हस्तक्षेप से शांत करा दिया जाए! और क्लीन चिट! ये दो शब्दों का चिरकुट आपको बहुश्रुत महसूस नहीं हो रहा? भ्रष्टाचार की जड़ें व्यवस्था में बहुत गहराई तक अपनी पैठ रखती हैं। तभी बिडके टर्म्स एंड कंडीशन को पढ़ता हुआ विनय सहगल काइयाँ मुस्कान के साथ उत्साहित स्वर में कहता है कि ये करप्शन का क्राइटेरिया हैऔर इस पर भी हम खरे उतरते हैं। Corruption is the most infallible symptom of a constitutional liberty. We are truly liberated.” क्या सहगल की बात में सच्चाई नहीं है? उदारीकरण की आड़ में सरकार ने कॉर्पोरेट्स को लूट की पूरी छूट नहीं दे रखी है? उन्हें तमाम नियमों-प्रतिबंधों से मुक्त नहीं कर दिया गया है? सत्ता और सरकार, राष्ट्र की सम्पत्ति के रक्षक की बजाय बिचौलिये की भूमिका में नज़र नहीं आ रहे? मंत्री गुलाबराव सीआईआई की मीटिंग में पीएसयू अर्थात पब्लिक सेक्टर यूनिट्स में विनिवेश के लिए जो तर्क देता है, वो क़ाबिले-ग़ौर है। सरकार का काम रास्ता बनाना है। स्कूटर-मोटरसाइकिल बनाना नहीं। वैसे भी सरकारी लोग फोर-ह्वीलर में ट्रैवेल करते हैं, टू व्हीलर में नहीं।यह संवाद सरकार की आर्थिक-नीतियों की गंभीरता का परिचायक है। दो कॉर्पोरेट्स के बीच जंग में स्वदेशी दल और एनजीओ का रणनीतिक इस्तेमाल महज फ़िल्मी आइडिया नहीं है, अप्रैल 2011 से लेकर अप्रैल 2014 तक, भारत का यही वास्तविक परिदृश्य रहा है। पॉवर स्ट्रगल और किसको कहते हैं? कॉर्पोरेट की फिल्मी रस्साकशी और भारतीय सियासत की ज़मीनी हकीक़त दोनों सेम-टू-सेम।

सबसे बड़ा कंट्रास्ट तो ये है कि सूफी गीत में सिकंदर बनने का उकसावा है। गोया सिकंदर कोई महत्वाकांक्षी योद्धा नहीं, दुनिया का कोई पहुँचा संत-फकीर गुजरा हो! “क्यूं तड़पता है तू बंदे। जल्द ही बदलेगा मंज़र। तू भी बन सकता है सिकंदर। झांक ले झांक ले दिल के अंदर। कोशिश करने से मुश्किल आसां होती है।आप ही सोचिए, कोशिश करने से मुश्किल आसाँ होती तो रितेश की लाश सड़क पर औंधे मुँह क्यों पड़ी होती? कॉर्पोरेट्स को दिल के अंदर झाँकने की फुरसत नहीं है। सबसे आगे निकलने की होड़ है। यह संबंधों की आत्मीयता में नहीं, संबंधों की मार्केट-वैल्यू और संबोधनों में यक़ीन रखता है। यहाँ भावना नहीं मोल-भाव की संस्कृति है। विकास के ग्लोबल विलेज में मीडिया की भूमिका ब्लडी पिम्प की है। राजनेता राष्ट्रहित में कॉर्पोरेट घरानों के बीच लैज़ान का दायित्व निभाते हैं और अभिनेत्रियों और मॉडल्स की फेस-वैल्यू से उनके बॉडी के निचले हिस्से की मार्केट वैल्यू तय होती है। अर्थात मल्टी-फंक्शनल कॉर्पोरेट-वर्ल्ड में स्त्री सौंदर्य और शरीर का मल्टी-पर्पज़ यूज़ है, जिसको अंततः सेक्सुअलिटी में डायलूट कर दिया जाता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि उत्तर-आधुनिक युग में भी स्त्री की स्थिति पुरुष के अन्य की ही बनी हुई है। अपनी अधीनस्थ मेघा से आत्मीय क्षणों में निशी अपने अनुभव का सार कुछ यूँ बयान करती है-सोसाइटी और कॉर्पोरेट वर्ल्ड में करियर ओरिएंटेड लड़की के लिए कोई जगह नहीं है। हिप्पोक्रेसी!” सहगल हो, परवेज़ हो, त्यागी हो या कि गुलाबराव या कोई और, सभी के लिए स्त्री एक कमोडिटी या फिर सेक्स टॉय से ज़्यादा अहमियत नहीं रखती। व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद निशी के प्रति परवेज़ की उदारता, मानवीय संवेदनशीलता की नहीं, बल्कि स्त्री-शरीर के प्रति उसके भोगवादी नज़रिए का ही उदाहरण है। कभी अविश्वसनीय पैकेज (जिसे कॉर्पोरेट-लैंग्वेज़ में माउथ वॉटरिंग कहते हैं) तो कभी ये नसीहत कि बिजनेस के साथ थोड़ा प्लेजर मिक्स किया करो। इट्स ए हाइली पोटेंट मिक्सचर। तनाज़ के साथ तो उसका बॉस इतनी भी कट्सी मेंटेन नहीं करता, सीधे-सीधे प्रोमोशन की शर्त पर नाईट फिक्स कर लेता है। गुलाबराव को सोशल-वर्क का बेहद शौक है। गुलाबराव के साथ होटल में पायल का संवाद बड़ा ही आक्रामक है। उसे गुलाबराव जैसे गिद्धों से अपने नृत्य-कौशल और अभिनय-क्षमता की प्रशंसा बिल्कुल भी पसंद नहीं। इसलिए वह कट-टू-कट मुद्देपर आ जाती है- चलें क्या? मुझे दूसरी जगह बूटीक में रिबन काटने के लिए जाना है। आप चाहें तो इसे यथार्थ का विरूप चित्रण कह सकते हैं, लेकिन यथार्थ के विरूप चित्रण या जीवन की विरूपताओं का चित्रण करने वाले साहित्य को अश्लील या अनैतिक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह प्रायः उस साहित्य से अधिक सच और समर्थ होता है जो स्थूल नैतिकता का ढोंग प्रस्तुत करता है। यथार्थ का विरूप चित्रण प्रायः विरूपताओं के प्रति विद्रोह भी हो सकता है, होता है।(विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, रचना के सरोकार, पृ.97) फिल्म भी साहित्य ही है। बहरहाल, तनाज़, देवयानी, पायल जैसी लड़कियाँ परवेज़ के हाइली पोटेंट मिक्सचर वाले फॉर्मूले से बद्ध होने को अभिशप्त हैं। जबकि निशी समर्पण नहीं करती, संघर्ष करती है और पुरुष की इसी कमज़ोरी को हथियार बनाकर मिंट बेस्ड सॉफ्ट ड्रिंक के ब्लू-प्रिंट की चोरी करती है। परवेज़ से जब वह कहती है कि और हाँ परवेज़, एक बात याद रखना। दिमाग हमेशा ऊपर होता है, नीचे नहीं। तो यह महज दो लोगों के बीच अहं के टकराव से उपजा संवाद महसूस नहीं होता, बल्कि यह स्त्री-अस्मिता के जारी संघर्ष का सूत्र-वाक्य बन जाता है। यह अलग बात है कि मधुर भंडारकर प्रत्यक्ष रूप से यह कभी स्वीकार नहीं करते कि उनकी फिल्में स्त्री-विमर्श में इन्डल्ज होती हैं। जबकि चाँदनी बार हो, पेज थ्री हो या कॉर्पोरेट, फैशन या हिरोइन, सभी स्त्री-प्रधान फिल्में हैं और स्त्री-अस्मिता के यथार्थ-प्रश्नों से उलझने वाली भी।


बकौल मधुर भंडारकर वे रीऐलिटी-सिनेमा बनाते हैं। वे ख़ुद कहते हैं कि मैं मानता हूँ कि मेरी फिल्में समाज का आइना होती हैं। कई बार हो सकता है कि मेरी फिल्मों से कोई ख़ास-वर्ग असहज महसूस करता हो। लेकिन मैं तो वही बनाता हूँ, जो महसूस करता हूँ। जो सच है।” (स्रोतः बीबीसी) रीऐलिटी यानी यथार्थ, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मधुर भंडारकर सिर्फ वही दिखाते हैं जो वो समाज में होता हुआ देखते हैं। उनकी फिल्में समाज का आईना तो हैं, लेकिन ये आईना एक ख़ास कोण पर फिक्स्ड है, और वहीं से वह लगातार यथार्थ को रिफ्लेक्ट करता रहता है। इसे डार्क-ह्यूमर की तर्ज़ पर डार्क रीऐलिटी कहा जा सकता है। निशी अपनी बेटी को गोद में लिए कोर्ट की सीढ़ियाँ चढ़ रही है। आँखों में आशा की पुरानी चमक ग़ायब है। निराशा जैसे भाव भी नहीं हैं, वहाँ एक रिक्तता है। कोर्ट की सीढ़ियाँ चढ़ती निशी और दोबारा पेज थ्री पार्टी कवर करने को मजबूर माधवी शर्मा का चेहरा यहाँ गड्डमड्ड होता प्रतीत होता है। बल्कि कई बार तो ऐसा लगता है कि वे बार-बार एक ही थीम के अलग-अलग शेड्स को फिल्माते हैं। पेज थ्री, कॉर्पोरेट और फैशन की नायिका में ख़ास क़िस्म का साम्य महज संयोग नहीं हो सकता। और अगर रिफ्लेक्शन ऑव रीऐलिटी इतनी ही ज़रूरी है तो फिर कम्पलीट रीऐलिटीका परावर्तन हो और इसके लिए आईने को किसी विशेष कोण पर फिक्स करने की बजाय उसको मूविंग ग्लोब की शक्ल दी जाए। अगर कमल स्वरूप से शब्द उधार लूँ तो हमें भंगीफिल्मकारों की ज़रुरत है जो झाड़ू फेरे और इस रियल नारियल के खिलाफ जंग छेड़े। (हंस, फरवरी, 2013) निरा यथार्थ कभी भी कला-साहित्य का प्रिय शगल नहीं हो सकता। मधुर की फिल्मों की विशेषता मात्र यथार्थ का अंकन नहीं है, बल्कि उनकी मूल शक्ति सांकेतिक दृश्यांकन में निहित है। वैसे भी सिनेमा अनुभूति और संवेदना, व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध का विज्ञान है। विभिन्न नाट्य एवं ललित कलाओ का सम्मिश्रण है। किसी घटना के काल और दिक् के आयामों का रूपांकन है। (कमल स्वरूप, हंस, फरवरी, 2013) लिहाजा मधुर भंडारकर की ख़ामियों को नज़र-अंदाज़ किया जा सकता है, क्योंकि उनमें किसी फाइव स्टार होटल को छद्म लोकतंत्र के रूपक में तब्दील करने की अद्वितीय क्षमता है, जिसमें राजनीति और कॉर्पोरेट के अलग-अलग कमरे हैं, लेकिन दोनों के बीच चोर दरवाज़ा है। जनता जानती है, लेकिन उसके लिए इस रहस्य को बेपर्दा करने से ज्यादा ज़रूरी ताश के पत्ते हैं, ताकि टाईम-पास करने में सुविधा हो। कुमार को पता है, लिहाजा नाम्या का सवाल उसे बचकाना लगता है- अरे नाम्या, तू अभी-अभी आया है, धूलिया से। ये फाइव स्टार होटल है। ये फाइव स्टार होटल का स्पेश्यलिटी है- दो रूम के बीच में एक दरवाजा होता है। और दरवाजा खुलते ही टारैंग! जब तक कुमार और नाम्या जैसे चौकीदार हैं, तब तक जिन्दगी के मजे ले-ले लूट। पी-ले, पी-ले, दो-दो घूँट। मौज-मस्ती की तुझे है हर तरह की छूट।

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