Tuesday, February 17, 2015

रेत की परतें

बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल तक उन्मादिनी सी हिलोरें मार रही थी, आज सुस्त-सी नज़र आ रही थी। डूबता सूरज भी आज अनासक्त-सा पानी को बस छू-कर चला गया था। उसने डूबने में दिलचस्पी ही नहीं ली। सीमा की यह साध तो पुरानी ही थी, लेकिन आज ही दिल से ज़ुबाँ तक का सफ़र तय कर पाई थी। उसने सरजू की बाँह पर अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत करते हुए कहा- 'क्या हम सुबह फिर यहाँ आ सकते हैं? मैं देखना चाहती हूँ कि डूबी धरती, पानी से उबरने के तुरंत बाद कैसी लगती है?' सरजू ने हाँ में सिर हिलाया और फिर निगाहें पानी के बीच उभरे धरती के कूबड़ों पर टिका दीं। सीमा जैसा उल्लास-मिश्रित विस्मय, सरजू के चेहरे पर नहीं आ पाया था। वहाँ विषाद की एक और गहरी परत जम गई थी। ठीक वैसे ही, जैसे पानी उतरते समय उर्वर धरती पर बालू की एक मोटी अनुपजाऊ परत छोड़ जाता है। सरजू सोच रहा था- 'क्या बेग़म-बादशाहों की तरह ही फ़सलों की क़ब्रें भी आकर्षक हुआ करती हैं, कि लोग देखने को दौड़ पड़ते हैं!?'

त्रासदी सामूहिक अवधारणा नहीं है। सीमा के लिए बाढ़ की अनुभूति रोमांचक है। उसके लिए तो नदी का बौराना और किनारों का अतिक्रमण कर, फैलते चले जाना 'डेयरिंग एक्ट' है। तमाम ऊबड़-खाबड़ धरती को जल समतल बना देता है। गड्ढे और टीले अपना वजूद खो देते हैं। किसान की लहलहाती उम्मीदों पर मटमैले रंग का पानी ठाठें मारने लगता है। काठ की कश्तियों का बेड़ा अवतरित होता है। पानी की उफनती-बलखाती धारा में कश्ती का इतराना, सिंदबादी यात्रा का रोमांच भरने लगता है। पानी उतरते वक़्त भले ही ज़ख़्म और मवाद छोड़ गया हो, लेकिन गाद का क्रीम पोते गीली ज़मीन तब सिल्की नज़र आने लगती है ...और सम्पन्न हाथों की कोमलता उसका स्पर्श पा-कर, अद्भुत अनुभूति को संजोने की उतावली में पैरों को जबरन कीचड़ में धकेल देती है।

आउच्च!’ ...सीमा के मुँह से निकले इस कराह-मिश्रित शब्द ने सरजू का ध्यान भंग किया। सीमा की हाई-हील के साथ ही उसका टखना भी कीचड़ में धँसा देख, सरजू के चेहरे पर भी झुंझलाहट की कीच के कुछ छींटे आ पड़े। 'यार तुम अर्बन मिडिल क्लास लड़कियों की यही समस्या है। हर वक़्त बेमतलब का रोमांटिसिज़्म ओढ़े फिरती हो। शुक्र करो कि हाई हील ने बचा लिया, वर्ना अभी मड-थिरैपी हो गई होती- तुम्हारी।' सरजू के इस रिएक्शन ने सीमा का दर्द और बढ़ा दिया। आँखें डबडबा आईं। चेहरा सूख गया। उसने कुछ कहा नहीं। बस शॉक्ड-सी, नम-आँखों से सरजू को देखती रही। सरजू को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने आहिस्ता से 'सॉरी' कहा और उसे बाजू में उठा, सूखी ज़मीन पर ले आया। 'अब इतना भी दुखी मत हो-ओ, कीचड़ ही लगा है। अभी घर चलकर धो लेना।' ...सीमा चुप ही रही, लेकिन उसके चेहरे पर निराशा के कुछ आवारा बादल अब भी भटक रहे थे। उसने गाँव आने के बाद ही यह नोट किया था कि सरजू में अचानक कुछ ऐसे बदलाव आ गए हैं, जो कम से कम उसके लिए अन-एक्सपेक्टेड थे।

सरजू नहीं चाहता कि सीमा का दिल दुखाए। जब से वह उसको लेकर गाँव आया है, बेहद सचेत रहता है- इसको लेकर। लेकिन लाख सावधानी के बावजूद, उसकी सोच और ज़ुबान अक्सर बेक़ाबू हो रही है। सीमा को त्रासदी का सही अर्थ नहीं पता। सीमा बाढ़ का भय नहीं जानती। सीमा खोने का मतलब नहीं समझती। ठीक है, लेकिन इसमें सीमा का क्या क़सूर? उसने जब इन्हें वास्तविक अर्थों में अनुभूत ही नहीं किया, फिर वह कैसे सरजू जैसी गंभीरता ओढ़ सकती है? क्या ऐसी अपेक्षा सीमा के प्रति अन्याय नहीं है? सरजू ग्लानि से भरता जा रहा है। उसकी आँखों के कोरों पर मोती जैसी बूँदें चमकने लगी हैं। वह बुदबुदा रहा है, गोया ख़ुद ही से जिरह कर रहा हो- 'यार 7 साल तो हो गए। उबरने को अब और कितना वक़्त चाहिए? कोसी तो कब की लौट गई, अपनी पेटी में! हम क्यों नहीं लौट सकते? भूत का ज़हर-बुझा तीर, क्यों मेरे वर्तमान को बार-बार घायल करता है?'

बाढ़ के पानी की ही तरह सीमा का जोश भी अब अपने उतार पर था। बाढ़, नाव, मछली, तैराकी सब अपना आकर्षण समेट रहे थे। 'एडवंचर' की जगह अब एक नामुराद क़िस्म की उदासीनता और खीझ भरी ख़ामोशी ने सीमा के दिल में अपना घोंसला बनाना शुरु कर दिया था। वह अब उस दिन को कोस रही थी, जब अख़बार में बाढ़ की ख़बर देख, मचल उठी थी और सरजू को सुपौल, उसके गाँव चलने पर मजबूर कर दिया था- 'प्लीज सरजू चलो ना! तुम्हारा तो घर है वहाँ। तुम्हीं तो कहते हो कि तुम्हारा घर कोसी के बिल्कुल क़रीब है। मैं देखना चाहती हूँ कि आखिर बौराई नदी कैसी दिखती है! अपनी बहन गंगा से मिलने की उतावली में कोसी क्या कुछ करती है? देखना चाहती हूँ। प्लीज़ चलो ना!' सीमा कोस रही है ख़ुद को... सरजू के चेहरे पर अचानक उभर आई असहजता को उसने तब इग्नोर क्यों कर दिया था? उसकी आँखों में अचानक उमड़ आए सैलाब को वह क्यों नहीं देख पाई थी? न-न अब और नहीं... अगर मैं यहाँ रुकी तो सरजू की तरह मैं भी बीमार पड़ जाऊँगी। मुझे जल्द से जल्द लौटना ही होगा।

'सुनो, मुझे दिल्ली लौटना है।' सीमा की आवाज़ में नमी के बावजूद दृढ़ता थी।
'क्यों? क्या हुआ? शेड्यूल्ड रिटर्न में तो अभी पाँच दिन बाक़ी है!' सरजू की आँखों में ही नहीं, आवाज़ में भी अचंभे का भंवर था।
'जो देखना था, वो देख लिया। वैसे भी अब कोसी शांत हो रही है। पानी उतर रहा है। कुछ बचा ही कहाँ देखने के लिए...' सीमा ने आकाश के उस छोर पर नज़र टिका रखी थी, जहाँ वह धरती से मिलता प्रतीत हो रहा था और सूरज अपनी रोशनी और गर्मी समेट-कर वहीं-कहीं गुम होने की फिराक़ में था।
'अरे अभी तो तुमने ठीक से कुछ देखा भी नहीं। पानी उतरने के बाद भी तो बहुत कुछ देखना है- तुमको।' विस्मय भरी छोटी सी चुप्पी के बाद सरजू ने फिर कहा- 'तुम्हें कुसहा भी तो जाना है, बैराज देखने! अभी गाँव के लोगों से भी तुम्हारी मुलाक़ात नहीं करवाई, मैंने। ...'
'अरे नहीं! कुछ चीज़ें बिना देखे भी तो देख ली जाती हैं। मुझे तो ऐसा लग रहा है कि मैंने उबलती कोसी देखने के बाद ही सबकुछ देख लिया हो जैसे...' सीमा ने सरजू को बीच में ही टोक दिया। उसके हाव-भाव से स्पष्ट था कि अब वह किसी भी क़ीमत पर, यहाँ और रुकने को तैयार नहीं है।

सरजू को लगा कि अब सीमा से रूकने की रिक्वेस्ट बेमानी है। वैसे भी, सीमा से मेरा रिश्ता ही क्या है? नॉर्मल फ्रेंडशिप ही तो...!’ ऐसा सोचते ही, उसने मुँह बिचकाया और हथियार डालने वाले अंदाज़ में कहा-
'ठीक है फिर... लेकिन दो-तीन दिन वेट करना पड़ेगा। मजबूरी है। कल किसी से नाव उधार करूँगा और जाऊँगा सुपौल। देखें रिज़र्वेशन...' सीमा ने बीच में ही टोक दिया-
'रिज़र्वेशन नहीं मिले तो भी चलेगा। ज़िन्दगी हमेशा आरक्षित डिब्बे में पसरने का नाम नहीं है। मैं देखना चाहती हूँ एक बार कि लोग जेनरल डिब्बे में सफ़र कैसे करते हैं?'
सीमा की बात कोई चुटकुला नहीं थी, फिर भी सरजू ने ज़ोरदार ठहाका मारा। ठहाके में घुली तुर्शी और व्यंग्य की बेहद बारीक सुइयाँ, सीमा के दिल में झटके से पेवस्त हो गईं। ऐसा लगा जैसे यह ठहाका नहीं था, बल्कि उसके बिल्कुल नज़दीक कोई बम ब्लास्ट हुआ था और वह उसकी ज़द में आ गई थी। उसने सरजू की तरफ नहीं, उतरते पानी और धरती के बेडौल कूबड़ों को देखा और बिना कुछ कहे घर की तरफ मुड़ गई।

मनुष्य की सौंदर्य-दृष्टि भी गिरगिट से कम नहीं है। मूड के हिसाब से बदलती रहती है। कल तक यही कूबड़ उसको बेहद ख़ूबसूरत लग रहे थे। कदली ज़मीन को छूने का दिल कर रहा था। और आज, अभी अचानक उसके नथूनों ने बदबू का भयानक हमला झेला है। जी मितला रहा है। पानी उतरने के बाद के दृश्य वातावरण को भयावह बना रहे हैं। कीचड़-सनी सड़कनुमा पगडंडियों के सहारे गाँव घूमने की कल्पना मात्र से पैर के तलवों में खुजली सी होने लगी है। जिस जलकुंभी के फूलों को बेवजह तोड़, गुलाब की तरह बालों के जूड़े में खोंसने की नाकाम कोशिश में सीमा ने डगमग कश्ती पर घंटों गुजारा था, आज गीली ज़मीन पर लकवाग्रस्त मरीज़ की तरह पड़ी उसी जलकुंभी को देख उसे घिन्न आ रही है। उसके बदन में झुरझुरी सी हो रही है। चारपाई की बजाय सीलन भरे कच्चे फ़र्श पर सोने की ज़िद ठानने वाली सीमा को आज चारपाई पर भी नींद नहीं आएगी। बाढ़ के रोमांच की अनुभूति धीरे-धीरे लोमहर्षक दृश्यों में तब्दील हो रही है। वह सोच रही है- 'क्या यह शापित संवेदनाओं का गाँव है? सरजू भी तो यहाँ आने के बाद ही से बेतरतीबी का शिकार है। क्या इसीलिए वह गाँव आने से कतराता है? ओ माय गॉड! कहीं ऐसा न हो कि यही वितृष्णा मुझे सरजू... नो-नो...' आगे की बदहवास सोच को सीमा ने जबरन परे धकेल दिया।

सीमा तुम्हें अचानक ये क्या हो गया है?’
नहीं! मुझे क्या होगा? कुछ नहीं...
झूठ मत बोलो..! तुम्हारा चेहरा... तुम्हारी आँखें और तुम्हारी आवाज़ तक चुगली खा रही हैं।
अरे नहीं यार, तुम ग़लत समझ रहे हो। ऐसा कुछ भी नहीं है। तुम बेवजह परेशान हो रहे हो।
हा-हा-हा... तुमको क्या लगता है, तुम कहोगी और मैं मान लूँगा? जानता हूँ तुमको...
तो ठीक है। फिर बंदोबस्त करो, जितनी जल्दी संभव हो सके।
बाबा वो तो कर ही रहा हूँ। लेकिन आज क्या मेरे साथ कहीं घूमने नहीं चलोगी?’
कहाँ?’
एक मुर्दों का टीला...
ओ गॉड! मैं नहीं जा सकती। सीमा ने बीच में ही टोक दिया।
अरे-अरे... वहाँ पर भूत-प्रेत नहीं रहते। नाम है जगह का... वहाँ एक पागल सा इंसान रहता है। उसी ने रेत को बटोर-कर एक टीला बनाया है और उसी को चीख़-चीख़ कर मुर्दों का टीला बताता रहता है। हालांकि टीला रोज़ आवारा हवाओं की ज़द में आकर ढह जाता है। इसलिए, वह हमेशा वहीं रहता है और लगातार रेत जुटाता रहता है। मुझे विश्वास है कि उससे मिलने के बाद तुम्हारी नाराज़गी थोड़ी कम हो सकेगी।
सीमा कुछ बोल नहीं रही। वह सिर्फ सरजू को देख रही है। अपलक... पता नहीं क्या सोच रही है! क्या ढूँढ रही है? वह जाना तो नहीं चाहती। लेकिन जाएगी- सरजू के लिए।

चारों तरफ रेत का विस्तार। हरियाली की बेवफाई के शिकार पेड़-पौधे। सिर्फ कुछ सूखी-झुकी डालियाँ, टेढ़े-ऐंचे तने। बेपर्दा-बेदम और उखड़ी हुई जड़ें। लूले-लंगड़े अभिशप्त पेड़ों की लाशें। बरसात की बेशर्म धूप ने सीमा को परेशान कर दिया है। आँखें चौंधिया रही हैं। रेत में चप्पल पहन-कर चलना मुश्किल हो रहा है। आवारा रेत-कण, चप्पल और तलवों के बीच घुस-कर गुदगुदी कर रहे हैं। लिहाजा सीमा ने चप्पल उतार लिए हैं। अब उसके पैर बालू के गद्दे को रौंदते और ख़ुद भी उसमें धंसते हुए, आगे बढ़ रहे हैं। मुर्दों का टीला अभी काफ़ी दूर है। हाँ, एक टेर अब कान के पर्दों पर दस्तक देने लगी है। दर्द में डूबी आवाज़, इस वीराने को और वीराना बना रही है।
तुम क्या जानो नीतीश-बिजेन्दर, कैसे सबो-रोज़ जीते हैं?
वीराने में बैठे बेबस-बेघर हम ज़हर ज़िन्दगी का पीते हैं।

'ये आवाज़ उसी पागल की है। जानती हो सीमा, इस पागल का नाम डॉक्टर समी है। यहाँ रेत के नीचे एक बस्ती दफ़्न है। अभी हम जिस रेत पर चल रहे हैं, वह कभी आबादी से भरपूर बस्ती थी। अब रेत का मैदान। समी कभी सुपौल के मशहूर सर्जन हुआ करते थे। अब पागल हैं। पागल शायर।' सरजू बोले जा रहा है। आवाज़ में नमी उतर आई है। सीमा को अभी-अभी रेत के एक छोटे ढूह से ठेस लगी है और वह गिरते-गिरते बची है। वो हैरत से अपना आकार खो चुके उस छोटे से ढूह को देख रही है। 'रेत-कणों का मामूली ढूह भी इतना शक्तिशाली हो सकता है कि क़दम लड़खड़ा उठें! ...यहाँ कुछ भी मुमकिन है।' वह सिर को हल्का झटका देती है और सामने थोड़ी दूरी पर दोनों हाथों से रेत इकट्ठा करते एक शख़्स पर नज़रें टिका देती है।

दाढ़ी और सिर के लंबे बेतरतीब बालों ने चेहरे को ढंक रखा है। मूँछ के बाल अगर आप हटाकर देखेंगे तो पपड़ाए ज़ख़्मी होंठ नज़र आ जाएँगे। आँखों में कीच भरी है। आवाज़ फटी हुई है। चीख़ते-चीख़ते उसके गले की नसें उभर आई हैं। पता नहीं कौन और कब कुछ खाने-पीने को यहाँ रख जाता है? पूरे जिस्म पर रेत की कई परतें चढ़ी हैं। पता नहीं किस मिट्टी का बना है- यह इंसान! कोसी का पानी उतरने के बाद से यहीं बैठा है। पिछले सात सालों में कोसी फिर उस तरह कभी नहीं बौराई ...और अब तो यह जगह फिर से वही पुराना दावा दुहरा सकती है कि यहाँ कभी बाढ़ आ ही नहीं सकती! ...जाड़ा, गर्मी, बरसात... मौसम कोई भी हो! ये पागल यहीं रहता है। शुरू-शुरू में कुछ लोगों ने झोंपड़ी बना दी थी। लेकिन पागल ने कभी उसमें झांका नहीं। सीमा की चेतना जड़ हो गई है- बिल्कुल प्रस्तर मूर्ति की तरह। चेहरे पर न कोई भाव है और न ही होंठों में कोई जुंबिश। आँखों में भी सिर्फ पथरीलापन है।

ठहरो! ...बेहद सर्द आवाज़ ने सरजू और सीमा के बढ़ते क़दमों पर ब्रेक लगा दिया है। पागल और इनके बीच महज चंद क़दमों का फासला ही बचा था, जब रेत इकट्ठा करते उस पागल का ध्यान भंग हुआ। दो अजनबियों को देख, उसकी आवाज़ अचानक तेज़ हो गई है। ग़ुस्से से उसकी आँखें लाल हो उठी हैं। उसका कमज़ोर जिस्म काँप रहा है। थरथराहट भय की नहीं, नफ़रत और ग़ुस्से की है। 'क्या लेने आए हो? मुआवज़ा दोगे? शोग जताओगे? बर्बादी का मज़ाक उड़ाओगे? दफ़ा हो जाओ, यहाँ से...।' पागल की भिंची मुट्ठियाँ, कसे जबड़े और नफ़रत में लिथड़ी आवाज़ ने सीमा को भय से जड़ कर दिया है। सरजू के चेहरे पर दर्द एक बार फिर से हरा हो उठा है। चाचा हम सरकारी कर्मचारी नहीं हैं। हम हैं- सरजू। आपका सरजू, जिसको आप ही ने दिल्ली भेजा था, पढ़ने के लिए। पागल ने आँखें भींच-कर दोबारा सरजू को ग़ौर से देखा है। पहचानने की कोशिश की है। कौन सरजू? हम तो नहीं जानते। कहाँ से आए हो?’ सरजू की आँखों में अब नमी उतरने लगी है। आवाज़ में भारीपन आ गया है। किसी तरह उसके गले से आवाज़ निकली है- हम लटौना से आए हैं चाचा, आपने ही तो ज़िन्दगी दी थी। अब आप ही पूछ रहे हैं!’
अरे झूठ क्यों बोलता है? मैं कौन होता हूँ ज़िन्दगी देने वाला? ज़िन्दगी दे पाता तो मुर्दों के टीले पर रेत क्यों चढ़ाता? देखता नहीं! रूहों के जिस्म बार-बार बेपर्दा हो रहे हैं। हवा बहुत कमीनी है।
वो हादसा था- चाचा। भूल जाइए- सब।
हाँय! तू तो नेताओं की भाषा बोल रहा है। अभी तो कह रहा था कि नेता नहीं है! कौन है तू?’
अब सरजू का धैर्य टूट रहा है। वह बिलखने लगा है। पागलों की तरह रेत हँसोत रहा है। टीले पर पागल के साथ रेत चढ़ा रहा है। घुटी-घुटी आवाज़ में कह रहा है- हम भी बदनसीब हैं चाचा। हम दोनों बदनसीब हैं चाचा। हमने भी परिवार खोया है। कुनबे की लाश पर रोने वाला, मैं भी इकलौता ही हूँ।
अब पागल संयत हो रहा है। आवाज़ की तल्ख़ी धीरे-धीरे रेत में घुल रही है। वह सरगोशी वाले लहज़े में फुसफुसाता है- हाँ, सुन! किसी साले नेता को आने मत देना इधर... छोटे-छोटे बच्चे अभी सोए ही हैं। बहू-बेटियाँ भी बेपर्दा हैं। बुज़ुर्गों की आहें-कराहें घुली हैं, इस रेत में। उनके नापाक क़दमों की आहट से ये दुनिया भी ख़तरे में पड़ जाएगी।
सरजू से अब रहा नहीं जाता। वह फफक पड़ा है। सीमा की आँखों के कोर भींगने लगे हैं। पागल ने डपट दिया है। चुप रहो। शोर क्यों करते हो? तुम भी सरकारी हरकारे हो क्या? कहा न, सभी नींद में हैं। जगे तो कोसी को लील जाएँगे।

अभी-अभी पागल की निगाहें सीमा पर पड़ी हैं। उसने सरजू से पूछा है- ये लड़की कौन है?’
हमारी दोस्त है चाचा। आपसे मिलना चाहती थी, सो साथ लेता आया।
पागल अब अपनी फटी लुँगी की फेंट में कुछ टटोल रहा है। थोड़ी देर बाद, उसके हाथ में एक बेहद पुरानी काई जमी अंगूठी नमूदार हुई है। उसने सीमा को इशारे से पास बुलाया है। उसकी हथेली पर अंगूठी डाल, तुरंत मुट्ठी भींच दी है और अब सरजू से मुख़ातिब हुआ है- सुनो! इसे जितनी जल्दी हो सके, गाँव से लेकर निकल जाओ। दोबारा मत आना। मैं यहाँ हूँ। रेत में बसी ज़िन्दगियों की हिफ़ाज़त मेरी जिम्मेदारी है। जाओ।

अब सरजू और सीमा लौट रहे हैं। सरजू के क़दम और भारी हो उठे हैं। सीमा का मन अब हल्का होता जा रहा है। पागल की आवाज़ एक बार फिर वीराने में गूंजती है- कभी मत लौटना। वह एक बार फिर अपनी धुन में मस्त हो गया है।

भावनाओं के ज्वार और नदी का उबाल, दोनों में एक ख़ूबी कॉमन है। जितनी तेज़ी से चढ़ती हैं, उतनी तेज़ी और सफ़ाई से कभी उतरती नहीं। पानी उतरने के बाद खेतों के सूखने और आबाद होने में वक़्त लगता है। ताल-तलैया और गड्ढे, पानी को उसी रफ़्तार से लौटने नहीं देते। रोक लेते हैं। सारा पानी नदी में कहाँ लौटता है! सरजू अभी उबर नहीं पाया है। होंठ और उसके इर्द-गिर्द नसों का अनियंत्रित कम्पन और आँखों के किनारों पर अटकी बूँदें, अभी कुछ दूर और उसके साथ ही चलेंगी। सीमा के लिए यह सबकुछ तिलिस्मी है। वह आसेबज़दा राजकुमारी सी रेत को घूरती, छोटे-छोटे क़दमों से दूरी नाप रही है। उसकी भी आँखें लाल हैं। नाक के दोनों हिस्से बेलगाम हो गए हैं और बार-बार अपना परिधि-विस्तार कर रहे हैं। मुर्दों का टीला बहुत पीछे छूट गया है, लेकिन अब तक सीमा ने सरजू की तरफ एक बार भी नहीं देखा है। हाँ, इस बीच वह एक बार रुकी है और अँगूठी को दुपट्टे के एक सिरे में कस-कर बाँध लिया है।

उफ्फ! बहुत गर्मी है। मैं थक गई हूँ। थोड़ी देर रुकोगे नहीं?’ सीमा की आवाज़ में थकन से ज़्यादा दर्द घुला हुआ है। सरजू के बढ़ते कदम थम गए हैं। उसने मुड़कर देखा है और बिना कुछ कहे, किसी पके फल सा, लद से रेत पर बैठ गया है। सीमा ने रेत पर घुटने टेक दिए हैं और पहली बार वह अपने दुपट्टे से सरजू की आँखों के कोर पोंछने, आगे झुकी है।

मानो बादल फटा हो! मानो किसी डैम में बरसों से जबरन रोके गए पानी ने बैराज को तोड़ दिया हो और अब हाहाकार करता हुआ, रवाँ हो उठा हो! सीमा का दुपट्टा ही नहीं, कमीज़ भी तर-ब-तर हो गई है। पानी का ग़ुस्सा धीरे-धीरे कम हो रहा है। धार की रफ़्तार घट रही है। दोनों सुबक रहे हैं। चेहरे की मलिनता घुल रही है। मन हल्का हो रहा है। दोनों अब संयत हो उठे हैं। रूदन के बाद मनहूस मौन को सरजू ने छेड़ा है। 'सॉरी यार, बहुत कोशिश करता हूँ। ख़ुद को बहुत समझाता हूँ। लेकिन बेबसी का बोझ है कि उतरता ही नहीं। अक्सर ख़ुद को मुजरिम महसूस करता हूँ। काश उस मनहूस रात मैं दिल्ली में नहीं, यहीं अपने घर में पड़ा सो रहा होता! कम से कम मातम की इस बेरहम जिम्मेदारी से तो मुक्त हो गया होता। जान ही तो जाती।...' सीमा ने कुछ कहा नहीं, सरजू के होठों पर सिर्फ हथेली चिपका दी है। अब सरजू ने सीमा को देखा है। वह अचरज में है- यह कौन सा रूप है, इस लड़की का!?

सूरज अब भी सिर पर है। लेकिन सीमा के दिल में ठंडक उतर आई है। उसने एक लंबी साँस खींची है और सरजू का हाथ थाम चल पड़ी है। अभी सरजू की हालत ठीक वैसी ही है, जैसी किसी दो-तीन साल के बच्चे की उस वक़्त हुआ करती है, जब उसे किसी वजह से उसकी माँ जबरन बाँह पकड़, घर की तरफ़ खींच रही होती है। पाँच साल के साथ में यह पहला मौक़ा है, जब सरजू सीमा को लेकर इतना सहज और आत्मीय महसूस कर रहा है। ये चुलबुली लड़की आज अचानक बूढ़ी अम्मा में तब्दील हो गई है। वह चाहता तो बाजू छुड़ा सकता था, लेकिन उसने ऐसा किया नहीं। हाँ, जिस्म को ज़रूर ढीला छोड़ दिया है, ताकि सीमा को दिक़्क़त न हो। जब मन हल्का हो तो पैरों को पंख लग जाते हैं। दूरी का अहसास नहीं होता। दोनों कब घर पहुँचे, पता ही नहीं चला।

सरजू ख़ुद ही बरामदे से खाट उठा लाया है। दोनों आँगन में चारपाई पर बैठ गए हैं। काकी ने मकई का भूंजा, कच्ची मिर्ची और नमक सजी थाली सामने टूल पर रख दी है। कुटुर-कुटुर के एकरस संगीत को सीमा ने भंग किया है- सुनो! ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। हमलोग आराम से चलेंगे। लेकिन हाँ, मैं कुसहा देखने नहीं जाऊँगी। सरजू के चेहरे पर कई दिनों बाद आज नैसर्गिक मुस्कान लौटी है। उसने कहा है- ऐज़ यू लाईक।
घर को ठीक क्यों नहीं करवाते? कितना उजाड़ सा लगता है!’
किसके लिए ठीक करवाऊँ? मुझे नहीं रहना यहाँ। रहूँगा तो दुःस्वप्नों से मुक्त नहीं हो पाउँगा।
कैसी बातें करते हो! तुम न सही, काकी को तो यहीं रहना है। उनकी प्रॉब्लम के बारे में तो सोचो।
काकी को तो कई बार कहा है कि दिल्ली शिफ्ट कर जाए- मेरे साथ। लेकिन मानती ही नहीं।
ठीक ही तो नहीं जातीं। पूरी ज़िन्दगी तो यहाँ गुजारी, अब मरने के लिए दिल्ली चली जाएँ!’
यार हद्द है! यह रहने की जगह है?’
क्यों रहने की जगह कैसी होती है?’
अब तुमसे डिबेट कौन करे। काकी जब तक हैं, तब तक हैं। उनके बाद तो मैं इधर झांकूँगा भी नहीं।
लेकिन मैं तो अब एट लिस्ट साल में एक बार ज़रूर आउँगी।
सीमा के इस नये इरादे ने सरजू को चौंका दिया है। वह बिल्कुल अवाक्... उज़बक सा सीमा को घूर रहा है।
ऐसे क्या देख रहे हो? पहले कभी ख़ूबसूरत लड़की नहीं देखी क्या?’

सचमुच, सरजू ने अब से पहले ऐसी पागल लड़की नहीं देखी- कभी। यह लड़की कोई और ही है। यह सीमा नहीं हो सकती। जिस सीमा को सरजू जानता है, वह तो यह बिल्कुल भी नहीं है। चंचल-अल्हड़-मनमौजी... तभी तो हमेशा वह इससे बचने की कोशिश करता रहा है। कभी इस फ्रेंडशिप को उसने गंभीरता से नहीं लिया। बल्कि सच तो यह है कि वह मन-ही-मन हमेशा इसी गुनधुन में रहा है कि लिबरलाईजेशन की पैदाईश इस मॉड कैरिकेचर से चाहे जिस तरह भी हो, पीछा छूटे। लेकिन सीमा है कि माया की तरह लगातार इसके साथ लिपटी रही है। सरजू सिर्फ़ इसलिए उसको बर्दाश्त करता रहा है, क्योंकि वह किसी भी संबंध को तल्ख़ी की तलवार से खत्म करने में विश्वास नहीं रखता। बाढ़ देखने के लिए सुपौल आने की ज़िद भी...। सरजू के सोच की लगाम सीमा ने खींच दी है।
हलोs। कहाँ खो गए मिस्टर?’
नहीं... कहीं नहीं। सरजू लौट तो आया है। लेकिन वह बोलने की बजाय एक बार फिर सीमा को अपलक देख रहा है। उसके चेहरे पर सिर्फ एक अलसाई मुस्कान बार-बार अंगड़ाई ले रही है।

सरजू! ए सरजू!’ इस अजनबी आवाज़ ने सरजू-सीमा का ध्यान भंग कर दिया है। सीमा थोड़ा संभल कर बैठ गई है और सरजू ने पूछा है- कौन?’
हम छी, धनेसर।
अरे कक्का आबह-आबह!’
त कहिया जाए के पलान बनलै हs?’
काल्हि जयबाक पलान छै। कतेक टाइम लगतै?’
कम सँ कम तीन घंटा तS लागिए जायत।
तहन ठीक छै, एतय सँ सात बजे निकलब ठीक रहतै। अहाँक संगे के रहत?’
बिसनाथ के ल लेबै।
बिसनाथ-का ठीक भ गेला!’ सरजू की आवाज़ में हर्ष-मिश्रित विस्मय है।
अरे कहाँ... मुदा पहिने जकाँ स्थिति नइँ छनि।
धनेसर कक्का और सरजू के बीच संवाद के दौरान सीमा मौजूद रही है। मैथिली नहीं जानती, लेकिन आशय समझ गई है। सरजू कल सुबह रिज़र्वेशन के लिए सुपौल जाएगा- धनेसर काका की नाव से। बिसनाथ के नाम पर सरजू के चेहरे पर आए-गए भावों को लेकर वह उत्सुक है। धनेसर कक्का के जाते ही उसने पूछ लिया है- ये बिसनाथ-का कौन हैं?’
हमारे गाँव के किसान हैं... हैं क्या... थे।
थे!... मतलब?’
कोसी ने किसानी छीन ली और सरकारी सिस्टम ने उम्मीद। पानी उतरने के कुछ दिनों बाद तक तो उम्मीदों के सहारे जीते रहे। फिर निराशा ने पागल बना दिया। दिन-भर खेत में पागलों की तरह रेतखखोरते रहते थे। अब तुम ही बताओ, हाथ से तीन-चार फीट मोटी रेत की परत हटाई जा सकती है क्या?’
लेकिन वे ऐसा कर क्यों रहे थे?’
कोसी त्रासदी के बाद प्रधानमंत्री तक हवाई दौरे पर आए। मुख्यमंत्री ने दिलासा दिया कि अब ये इलाका बिहार का पिछड़ा नहीं, बल्कि विकसित और सुव्यवस्थित इलाका बन जाएगा। उपजाऊ ज़मीन पर चढ़ बैठी रेत की परतों को हटाने और नई मिट्टी के अनुकूल नये क़िस्म की फसलें तजवीज़ करने के लिए कमेटी बनी। जाँच का ड्रामा हुआ। जिनकी जेबें गर्म होनी थीं- हुईं। जिनकी दुनिया संवरनी थी- संवरी। लेकिन किसानों की उम्मीदों पर रेत की परत ज्यों की त्यों चढ़ी रही। बिसनाथ-का ये झटका बर्दाश्त नहीं कर सके और पागल हो गए। शायद अब भी... अगर खेत में बाढ़ का पानी नहीं होता तो वे अपने हाथ से रेत ही उलीच रहे होते!’

सरजू और सीमा की बातचीत को काकी ने विराम दिया। दोनों हाथ-मुँह धोने के बाद चटाई पर आ बैठे। मकई और गेहूँ के आटे को मिक्स कर बनाई गई रोटी, बिल्कुल अलग ही स्वाद दे रही थी। ख़ासतौर से सीमा के लिए यह टेस्ट बिल्कुल नया था। तृप्त होने के बाद दोनों ने अपनी-अपनी चारपाई संभाल ली।

अँधेरे का तिलिस्म है। पानी का रंग अचानक गाढ़ा लाल हो उठा है। एक भंवर बन रहा है। सीमा उसमें तेज़ी से समाती जा रही है। चकरघिन्नी की तरह गोल-गोल घूमती-धंसती। चीख, फरियाद और फुत्कार का मिला-जुला शोर, उसके कान के पर्दे को फाड़ देने पर उतारू हैं। वह भय से गुड़मुड़ी होती जा रही है। ख़ुद में सिमटती जा रही है। उसका आकार लगातार संकुचित हो रहा है। जबकि बे-चेहरा पिशाचों की भीड़ लगातार नज़दीक आ रही है। शोर बढ़ता ही जा रहा है। कुछ साये थर-थर काँप रहे हैं। हाथ जोड़े घिघिया रहे हैं। क़ातिल और मक़तूल की आवाज़ें मिक्स-अप हो गई हैं। मारो-मारो! ...काटो सालों को! ...कोई बचने न पाए! ...नहीं-नहीं! ...मुझे छोड़ दो! नहींsss ...आह! ...वाहे गुरू दी सौंह! ...पापाजी माफ़ कर दो!’ और इसी बीच एक साये का हाथ ऊपर उठा है, तलवार हवा में लहराने के बाद तेज़ी से गर्दन की तरफ़ लपकी है। ठीक उसी वक़्त सीमा के हलक़ से थर्रा देने वाली चीख़ हवा में बुलंद हुई। सरजू लगभग गिरते-गिरते खाट से उठा और भागता हुआ सीमा के पास पहुँचा है। सीमा की साँस धौंकनी की तरह तेज़ है। सरजू उसको झकझोर रहा है। सीमा दुःस्वप्न से धीरे-धीरे मुक्त हो रही है। काकी गिलास में पानी ले आई है। सरजू ने गिलास सीमा के होठों से लगा दिया है।

सीमा अब संयत नज़र आ रही है। उसके चेहरे पर झेंप भरी मुस्कान है। उसने धीरे से सॉरी कहा है। सरजू ने काकी को इशारे से सो जाने को कहा है। काकी अपनी खाट पर लौट आई हैं। सरजू ने थोड़ा रुक-कर पूछा है- क्या कोई डरावना सपना देख रही थी?’ सीमा ने एक लंबी साँस ली- हाँ, बहुत भयानक। बचपन से ही देख रही हूँ। सरजू थोड़ा और नज़दीक सरक आया है और सीमा के बालों में अपनी उँगली फंसा दी है। पीठ पर हाथ फेरा है और तसल्ली दी है- कभी-कभी गहरी नींद में अवचेतन हावी हो जाता है। सभी के साथ होता है- ऐसा। घबराने की ज़रूरत नहीं है। सीमा के चेहरे पर फीकी मुस्कान उभर आई है। उसकी आवाज़ में बर्फ़ की-सी तासीर आ गई है। अरे अब क्या! अब तो आदत पड़ गई है। शुरू-शुरू में तो मम्मी-पापा बेचैन हो जाते थे। मैं दहाड़ें मार-मारकर देर तक रोती रहती थी।
क्यों बचपन में कोई हादसा हुआ था क्या- तुम्हारे साथ?’
अरे नहीं यार! हादसा तो मेरे जन्म से चार साल पहले ही हो गया था। हादसा नहीं, ...क़यामत आई थी। हमारे पूरे ख़ानदान के लिए क़यामत। चेहरे पर दाढ़ी और सिर पर पगड़ी, मौत का निशान बन गई थी। हम गाजर-मूली की तरह काटे गए थे। ...सीमा बोलते-बोलते ठिठक गई। उसके चेहरे पर जिज्ञासा उभर आई और उसने सरजू से पूछा- अच्छा एक बात बताओ! महाभारत में अभिमन्यु और चक्रव्यूह वाली कहानी क्या सच्ची है?’ सरजू इस सवाल पर चौंक पड़ा है। थोड़ी देर सोचने के बाद उसके मुँह से बोल फूटे- मुझे तो वह कोरी कल्पना ही लगती रही है। तुम्हीं बताओ, भला कोई माँ की पेट में रहते, बाहरी दुनिया में हो रहे संवाद सुन सकता है? और हद तो ये कि पैदा होने के बाद उसे वो बातें याद भी रह जाएँ!... सरजू को बीच में ही सीमा ने टोक दिया- लेकिन मुझे तो लगता है कि ये कोरी कल्पना नहीं हो सकती। इसमें सच्चाई ज़रूर होगी। बल्कि मुझे तो लगता है कि माँ-बाप अपने बच्चों में सिर्फ अपने गुण-अवगुण ही नहीं, अपना चिर-संचित भय और डरावना अतीत भी ट्रांसफर कर देते हैं।... सीमा की लय को अबकी सरजू ने भंग किया। अरे नहीं! ऐसा नहीं होता। ये तुम्हारा वहम है।
तो तुम्हीं बताओ? सिख दंगा सन 1984 में हुआ। मैं 88 में पैदा हुई। मैंने तो वो दंगा न देखा, न भोगा। घटना में मेरे दादा-दादी, चाचा-चाची, मेरे भाई-बहन, रक्त-पिपासु भीड़ के शिकार बन गए। पापा-मम्मी को भी तो उनलोगों ने मार ही डाला था। वो तो उनकी क़िस्मत थी कि सांसों ने जिस्म का साथ नहीं छोड़ा।... (सीमा ने छोटा सा विराम लिया। सरजू को भरपूर निगाहों से देखा। सरजू ने कुछ कहा नहीं, सिर्फ अपने हाथों का कसाव सीमा की हथेली पर बढ़ा दिया। सीमा ने फिर कहना शुरू किया है।) ...तुम्हें मालूम है! पापा बताते थे कि हमारा पूरा कुनबा पहले बिहार के वैशाली ज़िले में ही रहता था। पार्टीशन के बाद हमलोग माइग्रेट कर यहीं महुआ में सेट्ल हो गए थे और हमारा कपड़ों का अच्छा-खासा कारोबार था। सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक 31 अक्टूबर को एक ज़हरीली ख़बर रेडियो से हवा में फैली और सिख तरबूज बन गए। ...पापा तो दोबारा यहीं रोज़गार जमाना चाहते थे, लेकिन मम्मी तैयार नहीं हुई और इस तरह हमलोग दिल्ली शिफ्ट कर गए। मैं तो दिल्ली में ही पैदा हुई। फिर भी यह दुःस्वप्न मेरे पीछे पड़ा हुआ है। आख़िर क्यों?’

अब सरजू क्या जवाब दे? उसे तो कुछ सूझ ही नहीं रहा। वह बस एकटक सीमा को देख रहा है। इतनी टीस, इतना भय और इतनी छटपटाहट लिए घूम रही है- ये लड़की! फिर भी खिलखिलाती है! हे भगवान, ये कैसी पहेली है?’ सरजू की ज़ुबान से अचानक फिसल-कर गिरे इन शब्दों ने सीमा को चौंका दिया है और अब वह सवालिया निगाहों से सरजू को देख रही है। लेकिन जवाब होता तो सरजू चुप क्यों रहता! उसने धीरे से सीमा को कंधे से पकड़ खाट पर लिटा दिया और चादर ओढ़ा दी। सिर पर हल्की थपकी देने के बाद वह उठ खड़ा हुआ।

7 comments:

  1. बेहतरीन,,,, एक बार फिर से बधाई

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  2. Rupa Singh; apne apne saleeb.keelen thonkti hai wywastha...ta -umr chubhan sahte hain ham.bare hi kalatmaktak dhang se buna gaya tana bana,jisme mati lok ki khushbu hai to mahanagriy marmikta bhi.sab wanchit hi kyun hain?kaisa loktantr hai jahan duhswapnon ke pagalpan ke siwa kuch nahi?bhawishy ka koi sapna nahi ..?mrityu bhay se bachne aur bacha lene ki jaddojahad?kahani chupke se in bhayawah sthiytiyon ke khilaf uthti hai..do alag mansikta ko peera .samwedna ke star par jorti hui" naye ka nirman fir" ki ashwasti de jati hai.sarthak kahanijisme chitratmakta bhi hai khushbu bhi.

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  3. आपकी लिखी कहानी एक ही साँस में पढ़ गया। बहुत ही मार्मिक और ह्रदय स्पर्शी कहानी है। कथानक बहुत ही उत्तम है। गज़ब का वातावरण आपने रचा र्है ।कोशी की रेत मैं अपने पैरों में महसूस कर रहा हूँ। अपनों को खोने का दर्द...वाक़ई में बेमिसाल बयानी हैं। सवांद अदायगी बेहतरीन है।भाषा शैली एकरूपता लिए हुए है। नायक-नायिका का चित्रण बख़ूबी किया गया है।बाढ़ के गुज़र जाने के बाद का चित्रण तथ्यपरक और वास्तविक है।सौंधी सौंधी गन्ध मेरे नथुनों में बस गई है।चुलबुली नायिका का अंतर्द्वद्व और उसके अतीत से जुड़ी घटना को ऐतिहासिकता का पुट देकर अमर कर दिया।मैने पहले ऐसा रूपक पहले नहीं देखा। उत्तम रचना। आपको बहुत बहुत बधाई । उज्ज्वल भविष्य की कामना।

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