Friday, February 13, 2015

केवल दो नर ना अघाते थे

10-12 साल पहले की एक घटना है। घटना का मीडिया से कोई सम्बंध नहीं है। तब हमारे गांव में कुल पाँच ही दुकानें हुआ करती थीं। उनमें से भी केवल तीन ही लोकतांत्रिक थीं अर्थात ऐसी दुकानें जहाँ प्रत्येक वर्ग-समुदाय और स्वभाव के लोग बिना किसी दुराव-छिपाव के आ-जा सकते थे। शेष दो दुकानों पर वही लोग आते-जाते थे, जिन्हें ताड़ी-दारू की तलब हुआ करती थी। मैं जिस घटना का ज़िक्र करने वाला हूँ, उसका सम्बंध शेष दो दुकानों में से किसी एक से है! घटना का मुख्य पात्र इनरदेव मंडल है। हमारे गाँव के ही एक मुहल्ले का निवासी। जो बस-खलासी का काम करता था। स्वभाव का दबंग तो था ही उसको अपनी ताक़त का घमंड भी था। इसलिए गाँव के बड़े-बुज़ुर्ग कभी भी उसको यह समझाने का जोख़िम नहीं उठा पाए कि भई ताड़ी-दारू नहीं पीते। सेहत ख़राब होती है। हमउम्रों में कभी इतनी हिम्मत हुई नहीं कि कोई उसके साथ तू-तड़ाक कर सके। नशेड़ी भले हो लेकिन वह शील का बिल्कुल पक्का-सच्चा था। शोहदों से उसकी पुरानी दुश्मनी थी। अगर किसी बंदे से ऊँच-नीच हो गई और इनरदेव को पता चल गया तो फिर उस बंदे की हड्डी टूटे-न-टूटे, दो-तीन दिन के लिए खाट पकड़ना तो तय ही था। लेकिन उस शाम इनरदेव जमकर पीने के बावजूद नशे में नहीं था। उसके अंदर का दबंग भी पस्त पड़ा हुआ था और उसकी अकड़ न जाने कहाँ ग़ायब हो गई थी। वह सिर झुकाए शर्मिंदा सा पान की गुमटी से पीठ टिकाए खड़ा था। हाँ, उसकी बहन ज़रूर ग़ुस्से में थी और अपने भाई के कथित दोस्त को लानत-मलामत भेज रही थी। सामने वाला बंदा भी शर्मिंदा था और बार-बार यही सफ़ाई पेश कर रहा था कि यार मुझे नहीं पता था कि ये तेरी ही बहन है। बात दरअसल ये थी कि इनरदेव को उसके दोस्त ने पार्टी दी थी। उसका दोस्त भी बस स्टैंड में ही काम करता था। होगी ख़ुशी की कोई बात! ...तो दोनों ने पहले पासीखाने में चखने के साथ ताड़ी का लुत्फ़ उठाया और फिर झूमते हुए पान खाने आ पहुँचे। पनवाड़ी जिस वक़्त पान लगा रहा था और ये दोनों सुरूर में झूम रहे थे, ठीक उसी वक़्त इनरदेव की बहन दुकान से सौदा ले घर लौट रही थी। जब वह पान की गुमटी के पास से गुजर रही थी तभी इनरदेव के मित्र की निगाह उस पर पड़ी और उसने एक भद्दा सा फ़िकरा कस दिया। लड़की ने पहले तो उस व्यक्ति के कुल-ख़ानदान की शान में क़सीदे पढ़े। फिर भाई को भी लताड़ दिया। कोई और मौक़ा होता तो इनरदेव अब तक उस व्यक्ति की हड्डियाँ चटखा चुका होता। किन्तु आज ख़ुद उसकी बहन पर फ़िकरा कसा गया था और वह था कि सिर झुकाए मौन खड़ा था। वह अपने दोस्त की सफ़ाई के जवाब में बार-बार दाँत पीसते हुए धीमी आवाज़ में एक ही बात दुहरा रहा था- चुपचाप चल जाओ। ताड़ी पिला के नाक काट लिया। भाग जाओ!’ इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे की ताड़ी पी थी, इसलिए उसके हाथ शिथिल पड़ गए। इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे का चखना चखा था, इसलिए उसकी ज़ुबान क्रोध के अतिरेक के बावजूद अपशब्द निकाल पाने में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी। दूसरों की माँ-बहनों की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर पाने वाला इनरदेव आज स्वयं अपनी बहन के क्रोध में भागीदार नहीं बन पा रहा था। आप चाहें तो इन तीन पात्रों को प्रतीकात्मक मान सकते हैं। इनरदेव को मीडिया, इनरदेव की बहन को जनता और इनरदेव के मित्र को पूँजी के रूप में यदि देखें तो वर्तमान मीडिया का वास्तविक चित्र और चरित्र उद्घाटित हो सकता है। लेकिन यह इनरदेव के साथ अन्याय होगा! इनरदेव को तो अपनी भूल पर पछतावा था। लेकिन मीडिया इसको भूल नहीं बल्कि अपना कौशल मानता है। वह चखना और ताड़ी को इंज्वॉय कर रहा है। पूँजी द्वारा जनता के साथ भद्दा मज़ाक उसके लिए शर्म या आक्रोश का विषय नहीं है।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू दूरदर्शी थे। उन्हें इसका अंदेशा पहले से ही था कि अगर मीडिया को आर्थिक रूप से सक्षम और स्वावलंबी नहीं बनाया गया तो देर-सवेर प्रभावशाली पूँजी इसको अपने पाश में ज़रूर जकड़ लेगी। और फिर सूचनाओं का संकुचन, मिक्सिंग, प्रौपगंडा, तथ्यहीनता, पक्षपात और अन्यान्य दुर्गुण मीडिया की आत्मा को कलुषित करने लगेंगे। उसकी निष्पक्षता और लोकमंगल की अवधारणा खंडित होगी और यह लोकतंत्र के लिए, विशेष रूप से भारत जैसे सांस्कृतिक-सामाजिक विविधता वाले देश के लिए बेहद ख़तरनाक साबित होगा। मीडिया की हालत इनरदेव जैसी न हो! मीडिया जनहित के मुद्दों से, निष्पक्षता से, अन्याय के प्रतिकार से, राष्ट्र और अपनी निर्भीकता, अपनी तटस्थता से समझौते को बाध्य न हो! इसके लिए ज़रूरी था कि मीडिया पूँजी के दबाव से मुक्त रहे। नेहरू चाहते थे कि अख़बार (उस समय इंटरनेट और टेलीविज़न नहीं थे) स्वावलंबी हों ताकि वे सत्ता-प्रतिष्ठान तथा पूँजी के दबाव से मुक्त रह सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु सरकार द्वारा कई समाचार-पत्रों को बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर बहुत कम क़ीमत पर बड़े-बड़े भूखंड आवंटित किए गए, जिससे कि मीडिया मालिकान उन पर भवनों का निर्माण करा सकें और उन भवनों के किराए से समाचारपत्रों की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति अबाधित रूप से होती रहे। अख़बारों को उद्योगपतियों एवं विज्ञापनदाताओं का मुँह जोहने की ज़रूरत ही न पड़े, क्योंकि नेहरू को पूँजी की प्रकृति मालूम थी। वे जानते थे कि पूँजी को समाजसेवा या राष्ट्रसेवा से नहीं, मुनाफ़े से मतलब होता है। यही कारण था कि सन 1952 में गठित प्रथम प्रेस आयोग ने जब दो साल की मशक्कत के बाद 1954 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी और मीडिया में विदेशी निवेश के प्रति सरकार को आगाह किया तो नेहरू ने इसको गम्भीरता से लिया और अगले ही साल अर्थात 1955 में क़ानून के माध्यम से न केवल अख़बारों में विदेशी निवेश पर पाबंदी लगा दी गई बल्कि किसी भी विदेशी अख़बार द्वारा भारतीय संस्करण निकालना भी प्रतिबंधित कर दिया गया। अर्थात न तो भारतीय समाचार-पत्रों में विदेशी पूँजी का निवेश किया जा सकता था और न ही कोई विदेशी अख़बार अपना भारतीय संस्करण ही प्रकाशित कर/करा सकता था।

20वीं सदी के अंतिम दशक में जब उदारीकरण और भूमंडलीकरण का भूत भारतीय अर्थ-व्यवस्था के सिर चढ़कर बोल रहा था। विदेशी कम्पनियों के लिए जब भारतीय बाज़ार और सरकार पलक-पांवड़े बिछाए खड़ी थी। उस समय भी विदेशी पूँजी की काली छाया से मीडिया को मुक्त ही रखा गया। एक वाक्य में कहें तो नेहरू से गुजराल तक; किसी भी प्रधानमंत्री ने मीडिया का दरवाज़ा विदेशी पूँजी के लिए नहीं खोला। सम्भवतः अटल बिहार वाजपेयी के तमाम पूर्ववर्तियों को यह बात मालूम थी कि पूँजी मीडिया को अपने हाथों की कठपुतली बनाने में सक्षम है और राष्ट्र एवं समाज हित में मीडिया को पूँजी के शिकंजे में जाने से रोकना अत्यावश्यक है। किन्तु 1955 में सरकार द्वारा लिया गया यह संकल्प 25 जून 2002 को टूट गया और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने प्रिंट मीडिया में 26 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने आशंकित राष्ट्र को सांत्वना देने की कोशिश की कि केवल विदेशी पूँजी के लिए द्वार खोले गए हैं, मीडिया पर नियंत्रण भारतीयों का ही रहेगा। यह कोरी लफ़्फ़ाज़ी थी। छल था। नियंत्रक शक्ति पूँजी होती है, व्यक्ति नहीं। विदेशी निवेश को उचित ठहराने के लिए दलील दी गई कि पूँजी के अभाव में अख़बार बंद हो जाएँगे। जबकि वास्तविकता यह थी कि विदेशी पूँजी के भूखे मीडिया समूहों और वैश्वीकरण का बढ़ता दबाव अटल सरकार सह न सकी और उसने घुटने टेक दिए। वैसे अटल सरकार को ही दोष क्यों दिया जाए? क्या उससे पहले ही क़ानून की मूल भावना को ठेंगा दिखाते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की लगाम ढीली नहीं छोड़ दी गई थी? क़ानून में संशोधन के बाद सुषमा स्वराज और अन्य स्वनामधन्य बुद्धिजीवियों ने क्या यह तर्क नहीं दिया था कि जब इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया में निवेश की इजाज़त है तो प्रिंट मीडिया को इससे महरूम क्यों रखा जाए? तत्समय भरत झुनझुनवाला ने कहा था कि आने वाले समय में यह हमारे गले का फंदा बन जाएगा। कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत ने भी इस फैसले को राष्ट्रहित के प्रतिकूल माना था और चेतावनी दी थी कि विदेशी शक्तियाँ योजनाबद्ध तरीक़े से भारतीय मीडिया का इस्तेमाल भारत के ही ख़िलाफ़ करेंगी और सरकार मूकदर्शक बनी रहने को बाध्य होगी। वर्तमान मीडिया-परिदृश्य को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि झुनझुनवाला और कॉमरेड सुरजीत की आशंका ग़ैरवाजिब नहीं थी।

पाँच दशक पुरानी नीति को जिस आसानी और अदूरदर्शिता का प्रदर्शन करते हुए सरकार ने पलट दिया, वह वाक़ई चौंकाने वाला था। सोमनाथ चटर्जी की अध्यक्षता वाली संसदीय स्टैंडिंग कमेटी ने मीडिया में विदेशी पूँजी निवेश की ज़ोरदार मुख़ालफ़त की थी। लेकिन अटल सरकार ने स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट को अहमियत नहीं देना गोया पहले से ही तय कर रखा था। इंडियन न्यूज़ पेपर सोसायटी अर्थात आईएनएस के अध्यक्ष प्रताप पवार ने भी सरकार के रुख़ की आलोचना की थी और विदेशी निवेश की मंजूरी को ख़तरनाक क़रार दिया था। एडिटर्स गिल्ड ने केन्द्र सरकार के फ़ैसले पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि ऐसे गम्भीर मसले पर सरकार का अप्रोच इतना कैजुअल कैसे हो सकता है! लेकिन सारे विरोधी स्वर अंततः नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ से ज़्यादा असर पैदा नहीं कर सके। जब 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी तो ऑल इंडिया न्यूज़ पेपर इम्प्लॉइज़ फेडरेशन की तरफ से ज्ञापन दिया गया और पुनश्च मीडिया में विदेशी निवेश को राष्ट्रहित एवं फ्रीडम ऑव प्रेस के प्रतिकूल क़रार दिया गया। किन्तु अटल के फैसले पर मनमोहन भी मौन रहे। उल्टे मीडिया में विदेशी पूँजी की सीमा को 26 से बढ़ाकर 49 फीसदी करने का दबाव बनाया जाने लगा। भारतीय मीडिया में विदेशी शक्तियों की कितनी दिलचस्पी थी/है? इसका अंदाज़ा नवंबर 2005 में यूरोपीय संघ की सूचना आयुक्त विवियन रेडिंग के उस बयान से लगाया जा सकता है, जो उन्होंने भारतीय उद्योग परिसंघ के साथ बैठक के दौरान दिया था। रेडिंग ने भारत सरकार से मांग की थी कि वह मीडिया में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाए। विदेशी निवेशकों के लिए 26 फीसदी की भागीदारी महज ऊँट के मुँह में ज़ीरा जैसी ही थी, जबकि इतने में ही भारतीय मीडिया की काया और चाल-ढाल में अजीबो-ग़रीब बदलाव आने शुरू हो गए थे। ख़ैर, साल 2002 को बीते 12 साल हो चुके हैं। बीते 12 वर्षों में सरकार ही नहीं, बल्कि मीडिया और बुद्धिजीवियों की दृष्टि में भी बदलाव आया है। 2005 तक मीडिया में विदेशी पूँजी निवेश के प्रति लोगों का जो दृष्टिकोण था, वह अब नहीं है। इसकी तस्दीक़ साल 2013 में मायाराम समिति द्वारा दिए गए सुझावों से भी होती है। पूँजी की माया सिर चढ़कर बोल रही है। जून 2002 में अटल सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ खड़ी आईएनएस का सुर अगस्त 2013 में बिल्कुल बदला हुआ था। टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी भी आईएनएस की सुर में सुर मिला रही थी। दोनों मायाराम के साथ इस मसले पर एकमत हैं कि मीडिया में विदेशी निवेश की सीमा को 26 से बढ़ाकर 49 फीसदी कर दिया जाए। कठदलीली की इंतहा देखिए! तर्क ये दिया जा रहा है कि मीडिया में विदेशी निवेश की सीमा को 26 से बढ़ाकर यदि 49 फीसदी किया जाता है तो इससे मीडिया की स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता के साथ-साथ तटस्थता और निष्पक्षता में भी इजाफ़ा होगा। यह दावा सरासर झूठ है। यह दावा पूँजी का फ़रेब है। जब सिर्फ चखना और ताड़ी के कारण मीडिया की आँखों पर जाला और दिमाग-ज़ुबान पर ताला पड़ गया है तो अँगूर की बेटी क्या गुल खिलाएगी, अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है।


पूँजी-रूपी अफ़ीम का स्वाद चखने के बाद मीडिया के होश ठिकाने पर नहीं हैं। उसने अपनी आज़ादी को पूँजी के पास गिरवी रख दिया है और बदले में मिली रक़म से गुलछर्रे उड़ा रही है। नेहरू की आशंका सच साबित हो रही है। 20वीं सदी के 9वें दशक से लेकर अब तक, यदि मीडिया घरानों के व्यवहार और प्रकृति में आए बदलाव पर ग़ौर करें तो सारे भ्रम दूर हो जाते हैं। राम मंदिर आंदोलन से 2014 के आमचुनाव तक; मीडिया की निष्पक्षता और नैतिकता का लबादा तार-तार हो चुका है। मीडिया ने रिटेल में एफडीआई के पक्ष में लॉबिंग करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। पेट्रोलियम पदार्थों पर सरकारी नियंत्रण के ख़िलाफ़ भी प्रौपगंडा किया। मीडिया अब कॉर्पोरेट और सत्ता की कठपुतली बन चुका है। रक्षा क्षेत्र में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश, रसोई गैस की क़ीमत में वृद्धि, भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश, निजी कम्पनियों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए पीएफ कटौती को ऐच्छिक करने जैसे फैसले दरअसल जन-विरोधी फैसले हैं, किन्तु इनको मीडिया ने जिस प्रकार प्रस्तुत किया, वह न्यूज़ ट्रेडिंग का प्रत्यक्ष दस्तावेज़ है। अख़बारों से लेकर न्यूज़ चैनल तक, सभी ने पीएफ कटौती को ऐच्छिक बनाने को कर्मचारियों के हित में उठाया गया सरकारी क़दम साबित करने की कोशिश की, जबकि हक़ीक़त बिल्कुल विपरीत है। यह क़दम कॉर्पोरेट-हित में उठाया गया है। पीएफ कटौती में कम्पनियों को भी अंशदान देना होता है। अब इस क़दम से उन्हें इससे मुक्ति मिल जाएगी और वे ऐसा इरादा रखने वाले कर्मचारियों को हतोत्साहित करने में भी सक्षम होंगे। जनता के साथ सरकार और मीडिया संयुक्त रूप से छल में व्यस्त हैं। नक्सलवाद और किसानों की आत्महत्या जैसे संकटों से गुज़र रहे देश में (सिंगूर की घटना याद करें) भूमि-अधिग्रहण जैसे संवेदनशील मसले पर अध्यादेश लाना निश्चित रूप से किसान विरोधी क़दम है। ज़मीन पर अब किसान का हक़ नहीं है। सरकार जब चाहे बिना किसी सुलह-सफाई के अपनी शर्तों पर भूमि हस्तांतरित कर सकती है। यह अध्यादेश जन-विरोधी है लेकिन मीडिया के लिए यह ख़बर नहीं है। वह पीके के बहाने मुल्लों-पंडितों और दलालों के साथ गोलमेज सम्मेलन के माध्यम से धर्म-चिंता में जुटी है ताकि मायाराम के मायावी सुझावों पर मोदी मनमोहन की तरह मौन धारण करने की बजाय ठोस क़दम उठाएँ और मीडिया मुग़लों की झोली विदेशी पूँजी से भर जाए। पूँजी के बढ़ते दबाव की अनदेखी का ख़ामियाजा मनमोहन सिंह को प्रोपगंडा के रूप में भुगतना पड़ा और अब वे सत्ता से बाहर हैं। जबकि मीडिया और पूँजी फ्रेंडली नरेन्द्र मोदी के हाथ में देश की कमान है। ऐसे में वो दिन दूर नहीं, जब अटल-26 का स्थान मोदी-49 ले ले। यह आशंका इसलिए भी बलवति होती जा रही है, क्योंकि सत्ता और कॉर्पोरेट्स के इशारे पर मीडिया की भांडलीला चरम पर है। तमाम पुरानी दलीलें बेमानी साबित हो रही हैं। समाचार से जनता और जनहित दोनों ग़ायब हैं। ग्रामीण भारत का तो पता भी नहीं है। टीवी स्क्रीन और समाचार पत्र के पन्नों को धनकुबेरों और उनके चारनों यथा नेता, अभिनेता, खिलाड़ी और लफ़्फ़ाज़ी ने ढंक लिया है। भविष्य को आश्वस्त करे, ऐसा कुछ भी नहीं है। वर्तमान की यही उपलब्धि है। और मुझे रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर) की यह पंक्ति बार-बार याद आती है- थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े/केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।

1 comment:

  1. पूँजी-रूपी अफ़ीम का स्वाद चखने के बाद मीडिया के होश ठिकाने पर नहीं हैं। उसने अपनी आज़ादी को पूँजी के पास गिरवी रख दिया है और बदले में मिली रक़म से गुलछर्रे उड़ा रही है।

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