Sunday, December 27, 2015

अधूरे जीवन का पूरा कोलाज

उपन्यास का नाम है- चिरकुट और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि शीर्षक को छोड़, उपन्यास में कहीं और ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया। लिहाजा मन में उठा यह सवाल वाजिब था कि आख़िर क्यों हितेन्द्र पटेल ने अपने उपन्यास का नाम चिरकुट रखा? क्या इसलिए कि वो जिस सांस्कृतिक समाज का अंग रहे हैं, उसमें यह शब्द आमफ़हम है? या कि कथा-नायक अथवा कथा में विन्यस्त घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और जीवन-दशाएँ ऐसी हैं, जो अपनी समग्रता में चिरकुट शब्द के अर्थ एवं अभिप्राय को भाव-गम्य बनाती हैं? जब ये सवाल मेरे मन को मथने लगा तो हमने शब्दकोश की मदद ली। पता चला कि चिरकुट शब्द दरअसल दो शब्दों के बड़े टुकड़ों का योग है। अर्थात चिरना+कुटना=चिरकुट(यहाँ नानियत है)। शाब्दिक अर्थों में फटा-पुराना कपड़ा, चिथड़ा, कपड़े का छोटा सा टुकड़ा। लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि साहित्य महज शब्द और उसके रूढ़ अर्थों से निर्देशित नहीं होता, बल्कि इसका नियंता, भाव होता है। चिरकुट शब्द से जो भाव ध्वनित होता है, वह उसके शब्दकोशीय अर्थ से साम्य नहीं रखता। ऐसे में चिरकुट शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए लोक में जाना होगा और वहाँ से चिरकुटशब्द का वाजिब अर्थ ग्रहण करना होगा। गाँव-मोहल्ले में वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो छोटी-छोटी बेवकूफ़ियाँ, चालाकियाँ, होशियारियाँ या साजिशें करता है और ऐसे कृत्यों से उसका कोई ख़ास भला तो होता नहीं, उल्टे वह लोगों की नज़र में आ जाता है। या फिर वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो समाज में गरिष्ठ और निम्न अथवा हेय समझे जाने वाले क्रिया-व्यापारों में लिप्त रहता है। कभी-कभार हम व्यक्ति से इतर किसी काम को भी चिरकुट शब्द से अभिहित करते हैं। मसलन- अरे यार! एक चिरकुट से काम के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो? ये तो बस यूँ चुटकी बजाते ही हो जाएगा। ख़ैर, इस माथापच्ची के बाद चिरकुट को लेकर मेरी सामान्य जिज्ञासा तो संतुष्ट हो गई है, लेकिन अब भी मेरी कथित बौद्धिक-दृष्टि इस बात को लेकर पशोपेश में है और ज़िद ठाने बैठी है कि उपन्यासकार ने यहाँ चिरकुट शब्द का इस्तेमाल महज इसलिए नहीं किया है कि इसका अर्थ लोग सहज ही लगा लेंगे, बल्कि वह इसके माध्यम से कुछ और ही कहना चाहता है। तो क्या चिरकुट शब्द का निहितार्थ जीवन-जगत से जुड़ी वैसी छोटी-छोटी घटनाएँ और व्यवहार-विचार सरणियाँ हैं, जिनके बग़ैर जीवन संभव नहीं है, फिर भी उनका लेखा रखने की ज़रूरत इतिहास महसूस नहीं करता? मेरे संशय को तब और बल मिलता है, जब रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि संसार में मनुष्य-जीवन संबंधी बहुत सी ऐसी-ऐसी बातें नित्य होती रहती हैं, जिनका इतिहास लेखा नहीं रख सकता, पर जो बड़े महत्व की होती हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन, इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं का जोड़ है। पर बड़े से बड़े इतिहास और बड़े से बड़े जीवन-चरित्र में भी इन घटनाओं का समावेश नहीं हो सकता।(रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि-3, प्र.सं. 1983, पृ.सं.102) अपने इसी निबंध(उपन्यास) में वो फिर लिखते हैं कि मानव जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाओं को प्रत्यक्ष करने का यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास आदि की पहुँच के बाहर हैं।(वही, पृ.सं.102) यहीं पर यह राज़ भी फ़ाश होता है कि आख़िर हितेन्द्र पटेल जैसा इतिहासकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा उपन्यासको क्यों चुनता है? और यही मेरे उस सवाल का भी जवाब है कि आख़िर उपन्यास का शीर्षक चिरकुट क्यों रखा गया?

Sunday, November 29, 2015

अमरकांतः साधारण भाषा में असाधारण का संधान

20वीं सदी का छठा दशक हिन्दी साहित्य की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया था। नई कहानी ने न सिर्फ ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया बदला, बल्कि कहानी की बनी-बनाई पुरानी लीक भी तोड़ दी। हालांकि तोड़ना की जगह नई दिशा शब्द का इस्तेमाल अधिक सटीक होता। ख़ैर, साठ का दशक बदलावों का दशक था। तेज़ी से उभरता निम्न-मध्यवर्ग, ग्रामीण परिवेश से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। युवाओं के सपने अँगड़ाइयाँ ले रहे थे। शहर का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। बड़ी तादाद में वे शहरों का रुख़ कर रहे थे। राजनीतिक वातावरण लगातार दूषित होता जा रहा था। सामाजिकता अपना महत्व खोती जा रही थी और नैतिकता की पकड़, व्यक्ति पर कमज़ोर पड़ती जा रही थी। कुंठा और संत्रास के ब्रह्मफांस में उलझी युवा-पीढ़ी मोहभंग की सहज शिकार बन रही थी। कुपथगामी हो रही थी। सामंतवाद का बूढ़ा-प्रेत अब भी लोकतांत्रिक देश की छाती पर तना बैठा था। उसके पैने नाख़ून और नुकीले दाँतों से मानवीयता का हृदय छलनी हो रहा था। गाँधी की टोपीपहन-पहन कर जन-प्रतिनिधि बनने वाले राजनेता चुनाव के बाद जनता को या तो टोपियाँ पहना रहे थे, या उनकी टोपियाँ उछाल रहे थे। अर्थात राजनीति, समाज और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जब बदलाव(नैतिक अथवा अनैतिक) स्पष्ट नज़र आ रहा था तो कहानी भला कैसे अछूती रहती? शहरी मध्यवर्गीय परिवार महत्वाकांक्षाओं के अतिशय बोझ के कारण चरमरा रहा था। इस टूटन, घुटन और बिखराव की कथा मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर लिख रहे थे। प्रगतिशील चेतना के बढ़ते दबावों के बावजूद पुरुष-सत्तात्मक समाज का सामंतवादी प्रेत हार मानने को तैयार नहीं था और निम्न-मध्यवर्ग झूला-नट की तरह दोनों को साधने में अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ख़र्च करने को अभिशप्त था। भारत का साधारण मनुष्य जवाहरलाल नेहरू नहीं था। लिहाजा पंचशील के सिद्धांत जैसे महान उद्देश्य अथवा दर्शन में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसकी तो बेहद छोटी-छोटी समस्याएँ और आकांक्षाएँ थीं। रहने के लिए घर। खाने के लिए अन्न। पहनने के लिए कपड़े। इलाज के लिए अस्पताल। बेरोजगार बेटे के लिए नौकरी और जवान बेटी के लिए योग्य-वर। उसे धर्म अथवा जाति के नाम पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों से मुक्ति और शांति की ज़रूरत थी। व्यवस्था का छलावा और आदर्शों का भुलावा, समस्यापूर्ति के लिए काफ़ी नहीं थे। शिक्षित मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों का ढोंग और भावनात्मक स्तर पर शोषण और स्त्री की परम्परागत छवि को बनाए रखने की साजिश। गाँव और शहर के बीच सेतुबंध के रूप में तेज़ी से आकार ग्रहण करता यह क़स्बाई समाज और क्षेत्र, जटिल जीवन-अनुभूतियों और संबंधों के त्रिविमीय प्रदर्शन का असाधारण रंगमंच बना हुआ था। सभ्यता के इसी अंधेरे प्रेक्षागृह से अमरकांत जीवन का आँखों देखा हाल सुना रहे थे। शिक्षित मध्यवर्ग की मनोदशा, उसके सपने, उसके काइयाँपन और यथार्थ-जीवन की सहज सांकेतिक अभिव्यक्ति का दायित्व अमरकांत ने अपने मज़बूत कंधों पर ले रखा था।

Sunday, August 16, 2015

मीडिया मंडप में चिकित्सक से मुलाकात

हमारे एक मित्र हैं। पेशे से चिकित्सक हैं। एक दिन बातचीत हो रही थी। बातचीत के दौरान उन्होंने शिकायत की। उनकी शिकायत थी कि पत्रकार बेलगाम हो रहे हैं। मैंने उनका वाक्य सुधारा, 'पत्रकार नहीं मीडिया बेलगाम हो रहा है।' मित्र ने दलील दी, 'दोनों एक ही बात है। मीडिया अपने-आप में कोई ऐक्टिंग अथॉरिटी नहीं है।' मैंने विरोध किया, 'यह कोई तर्क नहीं है।' उसने उदाहरण पेश करते हुए कहा, 'मान लो कार से कोई दुर्घटना होती है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि कार को दोषी ठहराया जाए! बल्कि किसी से भी पूछो तो वह यही कहेगा कि ड्राइवर की बदमाशी या लापरवाही के कारण हादसा हुआ। यानी दुर्घटना की स्थिति में कार नहीं ड्राइवर दोषी होता है। इस लिहाज़ से अगर मीडिया बेलगाम है तो साफ है कि मीडियाकर्मी बेलगाम हैं।' मैंने कहा, इसका मतलब आप की निगाह में मीडियाकर्मी ही मीडिया का निर्देशक है?’ मित्र ने मुस्कराते हुए कहा, 'बिल्कुल।' मैंने थोड़ा तुनकने वाले अंदाज़ में कहा, 'जी नहीं। मीडिया कोई कार नहीं है, और न ही कोई मीडियाकर्मी ही ड्राइवर है। यह आपकी निजी सोच है।' मित्र मानने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने आरोप लगाया, 'तुम मीडिया में काम कर चुके हो इसलिए अपनी बिरादरी की असलियत छुपाने की कोशिश कर रहे हो।' मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध जताया, 'ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं मीडियाकर्मी रहा हूँ इसलिए जानता हूँ कि मीडिया और मीडियाकर्मी दोनों पर्यायवाची नहीं हैं। दोनों में बहुत फ़र्क़ है।' मित्र ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, 'क्या तुम इस बात से भी इनकार करोगे कि मीडियाकर्मी ही मीडिया रूपी भवन के निर्माण के लिए ईंटें तैयार करते हैं?' मैंने दृढ़ता का प्रदर्शन किया, 'हाँ, बिल्कुल करूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मीडियाकर्मी मीडिया रूपी भवन के लिए ईंटों का निर्माण नहीं करते बल्कि वे स्वयं ईंट के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।' मित्र ने ज़ोरदार ठहाका लगाया, 'अच्छा मज़ाक है।

Tuesday, July 21, 2015

न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात

या रब, न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़ुबाँ और।।अब या तो इस शेर को उसकी तात्पर्य-वृत्ति के अनुकूल समझा जाए और तीखे व्यंग्य की दाद दी जाए। या फिर यूँ हो कि ग़ालिब को इस हेकड़ी के लिए ख़ूब खरीखोटी सुनाई जाए- अमाँ मियाँ ये ग़ालिब भी न, बड़े ख़ब्ती क़िस्म के शायर थे। चले न जाने आँगन टेढ़ा। ख़ुद तो सीधी-सादी बात को बेवजह घुमा-फिरा कर कहते हैं और इल्ज़ाम पाठक पर मँढ़ते हैं। मतलब यह कि जो भी बात समझ में न आए, वो बकवास है। अच्छा है कि ग़ालिब हमारे ज़माने में न हुए, वरना अपना सिर पीट लेते। वैसे ग़ालिब के ज़माने में आज जैसे क़द्रदान भी न हुए, वरना वो दीवान क्या खाकर लिखते! ख़ैर, ग़ालिब का ये शेर हमेशा मेरी ज़ुबान पर कुछ इस अंदाज़ में होता है, जैसे बाँध तोड़ने पर उतारू कोई उफनती हुई नदी। मुश्किल ये कि बार-बार दुहराऊँ तो ख़ब्ती कहे जाने का डर है। और ज़ुबाँ पर काबू रखूँ तो बेचारा दिल रुआँसा हुआ जाता है। दिमाग़ है कि ढाढ़स बँधाने की बजाय दिल को कोंचने में ज़्यादा मज़ा पाता है। कभी-कभी खीझ इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि सिर के बाल नोंचने लगता हूँ। कई बार तो तन्हाई में ख़ुद को तमाचा भी जड़ चुका हूँ। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं! दिल-दिमाग भारतीय लोकतंत्र के दो दलों की तरह बर्ताव करने से परहेज़ बरतने को तैयार ही नहीं होते! दिल और दिमाग की नूरा-कुश्ती थमती ही नहीं! समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? कई बार सोचा कि दिल-दिमाग के झमेले में जिस्म को ही तकलीफ़ क्यों हो? लेकिन जिस्म ऑथोरिटी  नहीं है। ये पॉवर तो दिमाग के ही पास है। दिल उसी पॉवर में हिस्सेदारी चाहता है। इसलिए बात-बेबात हस्तक्षेप करता रहता है। वैसे दिल की बात भी वाजिब है। जिस भाषा को लोग समझते ही नहीं, उस भाषा में कुछ कहने की ज़रूरत क्या है? लेकिन दिमाग़ है कि ज़िद ठाने बैठा है! कहता है- अभिव्यक्ति के अनुकूल भाषा तो होनी ही चाहिए। जो लोग अभिधा-व्यंजना में फ़र्क़ नहीं कर सकते, उनके लिए हलकान होने की ज़रूरत नहीं है।

Saturday, July 11, 2015

मालिकों का बोझ ढोता मीडिया

दो विवाद और चार मीडिया समूह। पहला विवाद इंडियाज़ डॉटर डॉक्यूमेंट्री से जुड़ा है तो दूसरे का रिश्ता वक़्त ने किया क्या हसीं सितम धारावाहिक से है। प्रत्यक्ष रूप से जो प्रदर्शित किया गया, वह यह था कि विवाद का सम्बंध इंडियाज़ डॉटर और वक़्त ने किया क्या हसीं सितम के कंटेंट से है। दोनों ही मामलों में राष्ट्र की छवि और राष्ट्रवाद की आड़ लेकर प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों ने अपने-अपने क्षुद्र हितों का पोषण करने की नापाक़ कोशिश की। नतीज़ा क्या निकला? हम-आप से छुपा नहीं है। टाइम्स और एनडीटीवी समूह के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की चरम परिणति केन्द्र सरकार के उस बचकाना फैसले में हुई, जिसकी वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई। जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में दिलचस्पी नहीं भी हो सकती थी, वैसे लोगों ने भी प्रतिबंध के कारण उत्सुकता के अतिरेक में देख लिया और एनडीटीवी ने तो डॉक्यूमेंट्री के लिए निश्चित प्रसारण समय पर अपना स्क्रीन भी ब्लैक रखा। टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने दावा किया कि इंडियाज़ डॉटर वास्तव में भारत की छवि धूमिल करने वाला वृत्तचित्र है, जबकि देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबके की सोच इसके विपरीत थी। जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की प्रतिक्रिया थी कि जिस किसी ने बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज़ डॉटर' देख ली है, उसने बड़ी सहजता से इस बलात्कार-विरोधी फिल्म को भारत में प्रतिबंधित करवाने वाली मानसिकता और अभिव्यक्ति का गला घोंटकर दुनिया भर में भारत की नाक कटवाने वाली बुद्धि पर तरस ही खाया होगा। बहरहाल यह एपिसोड अब लगभग ख़त्म हो चुका है और अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो हममें से ज़्यादातर लोग इसको भूल भी चुके हैं!

Thursday, May 14, 2015

मीडिया का माइंड गेम

मेरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है/और अब/मेरी चाल के इंतेज़ार में है/मगर मैं कब से/सफेद ख़ानों/सियाह ख़ानों में रक्खे/काले-सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ/मैं सोचता हूँ/ये मोहरे क्या हैं…” (जावेद अख़्तर, ये खेल क्या है) उलझन वाजिब है। शतरंज की बिसात को जंग का मैदान समझें या खेल! सफ़ेद-काले मोहरों को लकड़ी का टुकड़ा मानें या हक़ीक़त! अगर यह महज खेल है तो फिर हार-जीत का ज़्यादा महत्व नहीं। और जो हार-जीत अहम है तो फिर खेल को जंग की तरह क्यों न लें? और यह भी कि क्या मोहरे सांकेतिक हैं जो किसी बड़े यथार्थ को रेप्रज़ेन्ट करते हैं? आज के इस उत्तर-आधुनिक युग में जब जंग को खेल की तरह और खेल को जंग की तरह लेने की संस्कृति विकसित हो चुकी है, तो उलझन वाजिब है। 1990 में कुवैत-मुक्ति के लिए प्रारम्भ हुआ खाड़ी युद्ध। सितंबर 2001 में अपहृत विमानों के माध्यम से वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर कथित अटैक और फिर उसके बाद तालिबानी अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमला। 2003 में जैविक हथियारों की आड़ में इराक के विरुद्ध युद्ध और सद्दाम हुसैन को युद्धापराध का दोषी क़रार देकर फांसी की सज़ा। इज़्राइल-फिलिस्तीन के बीच सतत् झड़पें। ये तमाम जंग खेल ही तो थे/हैं। बल्कि खेल से कहीं ज़्यादा रोमांचक, ज़्यादा यथार्थ, बिल्कुल हाइपर-रियल। मुमकिन है, आपको उपरोक्त बातें हँसी-खेल जैसी लगें! लगनी भी चाहिए।

Friday, March 20, 2015

उपभोक्तावाद की असंसदीय मुहिम

समझ का उम्र से रिश्ता है भी और नहीं भी है। वैसे ही जैसे उम्र और ज़िन्दगी के गुज़रने में फ़र्क़ होता है। हम जिस मुल्क में रहते हैं, वहाँ बड़ी आबादी की सिर्फ़ उम्र गुज़रती है, ज़िन्दगी नहीं। इसके विपरीत एक तबका ऐसा भी है, जिसकी ज़िन्दगी तो गुज़रती है, लेकिन उम्र है कि साठ में भी छब्बीसवें बसंत का मुखौटा चस्पाँ किए इतराती फिरती है। जलने वाले जलते हैं तो जलें, उनकी बला से! अतः उम्र का सम्बंध ज़िन्दगी से है भी और नहीं भी। आदर्श स्थिति तो यही है कि दोनों अन्योन्याश्रित हों! किन्तु ऐसा विरले ही हो पाता है क्योंकि उम्र का सम्बंध प्रकृति से है और ज़िन्दगी का भौतिक संसाधनों, लालसा और आत्मिक उल्लास से। भौतिक कारक अधिक अहमियत रखते हैं। अतः त्याग से आत्मिक उल्लास की प्राप्ति का मार्ग विकट भी है और संदिग्ध भी, क्योंकि लालसा मनुष्य की अनिवार्य दुर्गुण है। कबीर ने सही पहचाना था- माया महा ठगनी हम जानी/तिरगुन फांस लिए कर डोले/बोले मधुरे बानी।

Sunday, March 8, 2015

‘डार्क रीऐलिटी’ के चितेरे हैं मधुर

20वीं सदी के अंतिम दशक में हिन्दुस्तान में जो कुछ घटित हुआ, उसने कम-अज़-कम बौद्धिक जगत में कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रचलित किए, जो अब तक हमारे लिए बिल्कुल अनजान थे। भूमंडलीकरण और उदारीकरण को बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। जिन ग्रामीण बालाओं को बर्फ़ का गोला भी कभी-कभार ही नसीब हो पाता था, उन्हें रूप बदलकर गाँव पहुँचा बॉलीवुड का नायक, कुएँ से कोका कोला निकाल-कर पीने-पिलाने लगा। याराँ दा टशन का वो दौर अब भी जारी है। डीटीएच ने शहरी मध्य-वर्गीय स्त्रियों की ठसक और ऐंठ के साथ ही रुतबे पर भी बुरा असर डाला है। गर्मी की छुट्टियाँ बिताने या तीज-त्यौहार पर गाँव जाने वाली इन विदुषियों का प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो चुका है। अब न तो इनकी पहले-सी आवभगत होती है और न ही कोई सास भी कभी बहू थी की अकथ-कथा सुनने के लिए ख़ुशामदी अंदाज़ में इनके आगे-पीछे ही करती हैं। और तो और दूरदर्शन पर शुक्रवार के दिन आनेवाली फिल्मों का क्रेज़ भी खत्म हो चुका है। मार्शल मैक्लूहान के ग्लोबल विलेज़ का ग्लोबल बेचारा कब-का ग्लोकलद्वारा अपदस्थ किया जा चुका है। फिल्मों का नायक तो पहले ही बदल चुका था, अब तो कथानक भी बदल गया है। कुछ रामगोपाल वर्मा टाईप हो गए हैं तो कुछ ने ख़ुद को कपिल और राजू श्रीवास्तव की श्रेणी में फिट कर लिया है। फिल्मों में भूतिया दौर भले ही ढंग से कभी आ नहीं पाया हो, लेकिन टीवी सोप्स ने बॉलीवुड की इस कमज़ोरी को अपने अथक-परिश्रम से ढंक लिया है। भगवान कृष्ण ने बड़ा होने से मना कर दिया है और अब तो गणेश की भी उम्र नहीं बढ़ती क्योंकि दोनों का बाल-रूप ही बच्चों को अट्रैक्ट करता है। हाँ, एक महादेव हैं, जिन्हें अब तक बच्चा बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। हनुमान और मूसकराज जैसे इनके सहयोगियों को भी अच्छा-ख़ासा फुटेज मिलने लगा है। नगरीय सभ्यता के कामकाजी-जीवन और परिवार के विघटन से जो धार्मिक और पौराणिक गैप पैदा हुआ था, उसे टीवी ने बख़ूबी भर दिया है। दिन-रात खट-खटकर बेहाल लोगों की सेहत का ख़्याल रखते हुए धर्म-दर्शन का पुण्य-लाभ भी वाया टीवी अथवा सिनेमा, घर बैठे ही प्राप्त किया जा सकता है।

Sunday, February 22, 2015

भरि-भरि मारै बान

हम जब भोजन बनाते हैं तो ध्यान उसके स्वाद पर ही होता है। चिकित्सक भले पौष्टिकता का आग्रह पालें। सामान्य व्यक्ति के लिए तो स्वाद भोजन की सबसे बड़ी विशेषता है। जिन लोगों को स्वाद में दिलचस्पी नहीं होती, वे वैसे लोग होते हैं जिन्हें किसी रोग अथवा व्याधी ने जकड़ रखा हो! उनके लिए सेहत अधिक अहम होती है। हालांकि स्वाद के प्रति आकर्षण तो वहाँ भी बना ही रहता है। भय भले हाथ पर अंकुश लगा दें, नेत्र और जीभ ललचते ही रहते हैं। मान लीजिए आप किसी के मेहमान हुए! मेज़बान के घर शाही पनीर बना। उसके रंग-सुगंध से ही आपकी क्षुधा का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा। लेकिन आपने पहला कौर मुँह में डाला और निगलने की बजाय उगल दिया। कारण यह कि रसोइया भोजन बनाते समय नमक डालना भूल गया था। नमक की अनुपस्थिति से शाही पनीर के रंग अथवा गंध पर तो फ़र्क़ नहीं पड़ा, लेकिन स्वाद बिगड़ गया। आपके सामने पड़ी प्लेट में वह अब भी उतना ही मनोहारी दिख रहा है। उसकी गंध जो आपके नथूनों तक पहुँच रही है, उसके जादू से अब भी आपके मुँह में पानी भरा है। लेकिन दूसरा कौर मुँह तक लाने की इच्छा नहीं हो रही। क्या ऐसी ही स्थिति तब भी नहीं आती, जब सब्ज़ी में नमक की मात्रा सामान्य से अधिक हो? व्यंग्य के नाम पर लिखे जा रहे अकूत साहित्य पर दृष्टिपात करें तो बहुत हद तक यही स्थिति नज़र आती है। वाक्य-वक्रता के बल पर व्यंग्य तो दूर हास्य भी उत्पन्न नहीं किया जा सकता। फिर भी किया जा रहा है। मंचाश्रयी कवियों का काम तो फिर भी शारीरिक-सांकेतिक पराक्रमों से चल सकता है, किन्तु लेखन के मामले में भाव के बिना साहित्य के भवसागर को पार करना, असम्भव है। यदि साहित्य आस्वाद का विषय है तो पढ़ते समय पाठक को स्वाद तो मिलना ही चाहिए। लेकिन कुछ-एक को छोड़ दें तो व्यंग्य की नैया के ज़्यादातर खेवनहार वाक्य-वक्रता की पतवार ही थामे नज़र आते हैं और व्यंग्य की नैया है कि न इस किनारे आती है, न उस किनारे जाती है, बस शब्दों के बीच भंवर में फंसी चकरघिन्नी की तरह बस गोल-गोल घूमती जाती है। पाठक को कुछ वाक्यों के बाद ही चक्कर आने शुरू होते हैं और फिर मितली से उल्टी तक की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार पाठक को आस्वाद के रूप में न तो हास्य की अनुभूति हो पाती है और न ही व्यंग्य का बोध। ऐसी परिस्थिति में शब्दों की मर्यादा खंडित होती है और शिल्पी की छवि भी।

Tuesday, February 17, 2015

रेत की परतें

बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल तक उन्मादिनी सी हिलोरें मार रही थी, आज सुस्त-सी नज़र आ रही थी। डूबता सूरज भी आज अनासक्त-सा पानी को बस छू-कर चला गया था। उसने डूबने में दिलचस्पी ही नहीं ली। सीमा की यह साध तो पुरानी ही थी, लेकिन आज ही दिल से ज़ुबाँ तक का सफ़र तय कर पाई थी। उसने सरजू की बाँह पर अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत करते हुए कहा- 'क्या हम सुबह फिर यहाँ आ सकते हैं? मैं देखना चाहती हूँ कि डूबी धरती, पानी से उबरने के तुरंत बाद कैसी लगती है?' सरजू ने हाँ में सिर हिलाया और फिर निगाहें पानी के बीच उभरे धरती के कूबड़ों पर टिका दीं। सीमा जैसा उल्लास-मिश्रित विस्मय, सरजू के चेहरे पर नहीं आ पाया था। वहाँ विषाद की एक और गहरी परत जम गई थी। ठीक वैसे ही, जैसे पानी उतरते समय उर्वर धरती पर बालू की एक मोटी अनुपजाऊ परत छोड़ जाता है। सरजू सोच रहा था- 'क्या बेग़म-बादशाहों की तरह ही फ़सलों की क़ब्रें भी आकर्षक हुआ करती हैं, कि लोग देखने को दौड़ पड़ते हैं!?'

Friday, February 13, 2015

केवल दो नर ना अघाते थे

10-12 साल पहले की एक घटना है। घटना का मीडिया से कोई सम्बंध नहीं है। तब हमारे गांव में कुल पाँच ही दुकानें हुआ करती थीं। उनमें से भी केवल तीन ही लोकतांत्रिक थीं अर्थात ऐसी दुकानें जहाँ प्रत्येक वर्ग-समुदाय और स्वभाव के लोग बिना किसी दुराव-छिपाव के आ-जा सकते थे। शेष दो दुकानों पर वही लोग आते-जाते थे, जिन्हें ताड़ी-दारू की तलब हुआ करती थी। मैं जिस घटना का ज़िक्र करने वाला हूँ, उसका सम्बंध शेष दो दुकानों में से किसी एक से है! घटना का मुख्य पात्र इनरदेव मंडल है। हमारे गाँव के ही एक मुहल्ले का निवासी। जो बस-खलासी का काम करता था। स्वभाव का दबंग तो था ही उसको अपनी ताक़त का घमंड भी था। इसलिए गाँव के बड़े-बुज़ुर्ग कभी भी उसको यह समझाने का जोख़िम नहीं उठा पाए कि भई ताड़ी-दारू नहीं पीते। सेहत ख़राब होती है। हमउम्रों में कभी इतनी हिम्मत हुई नहीं कि कोई उसके साथ तू-तड़ाक कर सके। नशेड़ी भले हो लेकिन वह शील का बिल्कुल पक्का-सच्चा था। शोहदों से उसकी पुरानी दुश्मनी थी। अगर किसी बंदे से ऊँच-नीच हो गई और इनरदेव को पता चल गया तो फिर उस बंदे की हड्डी टूटे-न-टूटे, दो-तीन दिन के लिए खाट पकड़ना तो तय ही था। लेकिन उस शाम इनरदेव जमकर पीने के बावजूद नशे में नहीं था। उसके अंदर का दबंग भी पस्त पड़ा हुआ था और उसकी अकड़ न जाने कहाँ ग़ायब हो गई थी। वह सिर झुकाए शर्मिंदा सा पान की गुमटी से पीठ टिकाए खड़ा था। हाँ, उसकी बहन ज़रूर ग़ुस्से में थी और अपने भाई के कथित दोस्त को लानत-मलामत भेज रही थी। सामने वाला बंदा भी शर्मिंदा था और बार-बार यही सफ़ाई पेश कर रहा था कि यार मुझे नहीं पता था कि ये तेरी ही बहन है। बात दरअसल ये थी कि इनरदेव को उसके दोस्त ने पार्टी दी थी। उसका दोस्त भी बस स्टैंड में ही काम करता था। होगी ख़ुशी की कोई बात! ...तो दोनों ने पहले पासीखाने में चखने के साथ ताड़ी का लुत्फ़ उठाया और फिर झूमते हुए पान खाने आ पहुँचे। पनवाड़ी जिस वक़्त पान लगा रहा था और ये दोनों सुरूर में झूम रहे थे, ठीक उसी वक़्त इनरदेव की बहन दुकान से सौदा ले घर लौट रही थी। जब वह पान की गुमटी के पास से गुजर रही थी तभी इनरदेव के मित्र की निगाह उस पर पड़ी और उसने एक भद्दा सा फ़िकरा कस दिया। लड़की ने पहले तो उस व्यक्ति के कुल-ख़ानदान की शान में क़सीदे पढ़े। फिर भाई को भी लताड़ दिया। कोई और मौक़ा होता तो इनरदेव अब तक उस व्यक्ति की हड्डियाँ चटखा चुका होता। किन्तु आज ख़ुद उसकी बहन पर फ़िकरा कसा गया था और वह था कि सिर झुकाए मौन खड़ा था। वह अपने दोस्त की सफ़ाई के जवाब में बार-बार दाँत पीसते हुए धीमी आवाज़ में एक ही बात दुहरा रहा था- चुपचाप चल जाओ। ताड़ी पिला के नाक काट लिया। भाग जाओ!’ इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे की ताड़ी पी थी, इसलिए उसके हाथ शिथिल पड़ गए। इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे का चखना चखा था, इसलिए उसकी ज़ुबान क्रोध के अतिरेक के बावजूद अपशब्द निकाल पाने में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी। दूसरों की माँ-बहनों की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर पाने वाला इनरदेव आज स्वयं अपनी बहन के क्रोध में भागीदार नहीं बन पा रहा था। आप चाहें तो इन तीन पात्रों को प्रतीकात्मक मान सकते हैं। इनरदेव को मीडिया, इनरदेव की बहन को जनता और इनरदेव के मित्र को पूँजी के रूप में यदि देखें तो वर्तमान मीडिया का वास्तविक चित्र और चरित्र उद्घाटित हो सकता है। लेकिन यह इनरदेव के साथ अन्याय होगा! इनरदेव को तो अपनी भूल पर पछतावा था। लेकिन मीडिया इसको भूल नहीं बल्कि अपना कौशल मानता है। वह चखना और ताड़ी को इंज्वॉय कर रहा है। पूँजी द्वारा जनता के साथ भद्दा मज़ाक उसके लिए शर्म या आक्रोश का विषय नहीं है।

Sunday, January 4, 2015

सामासिक संस्कृति की संभाव्यता का आख्यान

गौरीनाथ के उपन्यास दागको पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा और मज़बूत हुई है कि अंतःप्रज्ञा साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। इसके बिना साहित्य-सृजन संभव नहीं है। अंतःप्रज्ञा का अभाव, साहित्य को एक ऐसे तालाब में तब्दील कर देता है, जिसमें पानी तो है लेकिन मछली अर्थात जीवन नहीं है। और अगर हम जीवन को मछली मान लेते हैं तो पानी को उस समाज के रूप में चिन्हित करना होगा, जिसमें मनुष्य जन्म से मृत्यु तक रहता है। अर्थात साहित्य न सिर्फ समाज और मानव-जीवन के जटिल अंतर्संबंधों से प्रभावित होता है, बल्कि वह सार्थक हस्तक्षेप भी करता है। हस्तक्षेप की त्वरा कितनी है? या कि वह समाज पर कितना प्रभाव छोड़ती है? यह साहित्यकार की अंतःप्रज्ञा पर निर्भर करता है। जबकि अंतःप्रज्ञा की आधार-भूमि संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन है। बकौल मुक्तिबोध जिस प्रकार हम संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन द्वारा बचपन से ही बाह्य जीवन जगत को आत्मसात कर उसे मनोवैज्ञानिक रूप देते आते हैं, उसी तरह हम इस आत्मसात्कृत अर्थात मन द्वारा संशोधित, सम्पादित, संस्कारित, गठित-पुनर्गठित, जीवन-जगत को बाह्य रूप भी देते हैं।स्पष्ट है कि हम अपने संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन की मदद से जीवन, समाज, संस्कार, धर्म और अन्यायन्य चीजों को देखते-समझते और आत्मसात करते चलते हैं और उसे संशोधन-सम्पादन के बाद अभिव्यक्ति भी देते हैं। बाहरी जीवन-जगत का आभ्यन्तरीकरण और आभ्यन्तरीकृत का बाह्यीकरण एक सनातन मानव प्रक्रिया है। कला आत्मजगत के बाह्यीकरण का ही एक मार्ग है, जिसको अंतःप्रज्ञा से आलोक मिलता है। दागका सर्जक इस कसौटी पर बिल्कुल खरा उतरता है। वरना कोई कारण नहीं कि सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर असंभव सी लगने वाली यह कथा पाठक को सहज ही पूर्णतः विश्वसनीय प्रतीत होने लगती है। यह विश्वसनीयता यदि संभव हुई है तो निश्चय ही इसका सीधा संबंध लेखक के ज्ञानात्मक संवेदन, संवेदनात्मक ज्ञान और उसकी अंतःप्रज्ञा का ही कमाल है। 

Friday, January 2, 2015

क्रांति ऐसे नहीं आती

(भगत सिंह को याद करते हुए)

क्रांति कोई चूँ-चूँ का मुरब्बा नहीं
क्रांति डालडा का खाली डब्बा नहीं
क्रांति अद्धा, पौव्वा या सिक्का भी नहीं
क्रांति उद्घोष या नारों का नाम नहीं
झंडे को मीनार पर टाँगने का नाम नहीं
क्रांति कोई मादक गंध भी नहीं है कि
फूल से झड़ते शब्दों पर कोई हो जाए क़ुर्बान!

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