Sunday, December 28, 2014

यही है हमारा लोकतंत्र (राष्ट्रपिता को समर्पित, क्योंकि उम्मीदें कभी मरती नहीं।)

कुछ लोग हिन्दुओं को जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश हिन्दुओं का था
कुछ लोग मुसलमानों को जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश मुसलमानों का था
कुछ लोग राजे-रजवाड़ों का जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश राजाओं का था
कुछ लोग दलितों-वंचितों को जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश दलितों-वंचितों का था

सभी टुकड़ों में जनता को जगा रहे थे
और जनता थी कि सोई पड़ी थी
कोई कुनमुनाता तो कोई बड़बड़ाता

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...