Tuesday, November 25, 2014

दिन की गवाही दर्ज़ नहीं होती

दिन तो दिन ही होते हैं
वही सात जो लौट-लौट आते हैं
कभी कोई दिन मनहूस नहीं होता
कैलेंडर पर दर्ज़ तारीख़ें बदलती हैं
उन्हें तीन सौ पैंसठ दिन पूरे करने होते हैं
दिन तो वही सात जो लौट-लौट आते हैं
तारीखों से इसीलिए होड़ नहीं लेते दिन
इसलिए तारीख़ों से अक्सर मेल नहीं खाते दिन

तवारीख़ में तारीखें दर्ज़ होती हैं
इसलिए लोगों को रहती हैं याद
सभी को याद है अम्बेडकर का निर्वाण
सभी को याद है बाबरी मस्जिद का ध्वंस
सभी को याद रहेगा मंडेला का देहावसान
लेकिन क्या सभी को याद हैं या रहेंगे वो दिन
किस वार को हुआ था अंबेडकर का परिनिर्वाण?

Friday, November 21, 2014

दुखी मत होना मेरे भाई

दुखी मत हो! मेरे वर्दी वाले भाई!
क्या हुआ जो तेरी बंदूक से निकली गोली
मेरी निर्जीव सी पसलियों में उतर गई तो?

दुखी मत हो! मेरे बंदूक वाले भाई!
क्या हुआ जो तेरे नेज़े की धार ने फाड़ दिए
हफ्तों से अन्नहीन-रसहीन मेरे खाली पेट!

दुखी मत हो! मेरे टोपी वाले भाई!
तुमने व्यवस्था बनाए रखने की शपथ ली
और मेरा नंगा सिर खंडित हो गया तो क्या!

दुखी मत हो! मेरे प्यारे भाई!
तुमने सचमुच कुछ नहीं किया है मेरे साथ
बंदूक तुम्हारी नहीं थी, वर्दी तुम्हारी नहीं थी
नेज़े की धार या लाल फुदने वाली टोपी भी तो
तुम्हारी नहीं थी... जब हाथ ही तुम्हारे नहीं थे

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