Monday, September 29, 2014

नयी कहानीः लघुता में विराट का प्रक्षेपण और अमरकांत

हिन्दी कहानी उपदेश की हवेली से आदर्शवाद की डोली पर सवार होकर यथार्थ के धरातल पर उतरी। रूसी क्रांति के प्रभावस्वरूप प्रगतिशील चेतना ने उपदेश और आदर्श की महत्ता को थोड़ा कम किया। लेकिन यथार्थ का दबाव कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया। उपदेश-भाव की साँसें तो बहुत पहले ही उखड़ गई थीं, लेकिन आदर्श और यथार्थ के बीच रस्साकशी आज तक चली आती है। सच तो ये है कि दोनों ही अपने एकल-वास्तविक रूप में जन-मानस का प्रतिबिम्ब नहीं बन सके। प्रगतिवाद निरे-यथार्थवाद का पोषक था। आदर्शवाद के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। न तो यथार्थ की उपेक्षा की जा सकती थी और न ही आदर्शों की वायवीयता से समाज और साहित्य का भला हो सकता था। 20वीं सदी का चौथा-पाँचवां दशक न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक और वैचारिकता के स्तर पर भी उथल-पुथल से भरा था। स्वतंत्रता के लिए जब तक संघर्ष चलता रहा, तब तक आज़ादी का स्वप्न और सबकुछ के सुंदरतम हो जाने की उम्मीद बची रही। लेकिन आज़ादी के बाद अचानक मोहभंग ने सुंदर-स्वप्नों के हवा-महल को धराशायी कर दिया। फणिश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय, जैनेन्द्र, यशपाल, धूमिल, मुक्तिबोध आदि, सभी मोहभंग के शिकार हुए। वैसे मोहभंग की कथा तो बाद में शुरू होती है, उससे पहले ही मार्क्सवाद और गाँधीवाद के ज़ेरे-असर, प्रेमचंद एक नयी लीक बना चुके थे, जिसका नाम था- आदर्शोन्मुख यथार्थवाद। लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से भी अपना दामन छुड़ा लिया था। उनकी कहानी सांकेतिकता का अवलम्ब ग्रहण कर रही थी। कफ़न इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप की साहित्यिक-धारा में उत्पन्न विक्षोभ की परानुभूति ने भी हिन्दी की साहित्य-धारा को कम परेशान नहीं किया। भाषा हिन्दी ही थी। पात्रों के नाम भी हिन्दुस्तानी थे। लेकिन अनुभूतियाँ, कथा-विन्यास और घटनाक्रम पाठकों के स्वानुभूत सामाजिक-सत्य से कोसों दूर। साहित्य की यह अजनबीयत बेचैन करने वाली थी। इसी बेचैनी से नयी कहानीऔर नयी कविता की धारा फूटी। नयी कहानी ने जहाँ अपनी सहजता के कारण लोकप्रियता का नया मापदंड गढ़ा, वहीं नयी कविता’ ‘ब्रह्मराक्षस बन गई।

अमरकांत जिस युग-परिवेश को शब्द दे रहे थे और जिस नयी कहानी से उनका जुड़ाव था, उसको समझना दुःसाध्य भले न हो, श्रमसाध्य तो है ही। कथाकार का प्राथमिक कर्तव्य कहानी लिखना है। युग-प्रवृत्तियों को चिन्हित करने की क्षमता निस्संदेह उसमें होती है। उसका हाथ भी हमेशा समय की नब्ज़ पर होता है। बल्कि इन्हीं कथा-तंतुओं के सहयोग से तो वह अपनी कल्पना-दृष्टि के आलोक में कहानी बुनता है। लेकिन साहित्य के किसी विशेष कालखंड का, प्रवृत्तियों के आधार पर नामकरण अथवा साहित्येतिहास की पूर्ववर्ती-धारा से इसके पृथक्करण का काम वह नहीं करता। इस दायित्व का निर्वहन परम्परागत रूप से साहित्येतिहास के अध्येता और आलोचक ही करते रहे हैं। जिस कालखंड में अमरकांत का कथा-सिंधु में अवतरण हुआ, वह सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक एवं आर्थिक विक्षोभों से ही भरा नहीं था, बल्कि साहित्य भी तब बड़े फलक के व्यामोह का शिकार था। व्यक्ति, व्यक्तिकता और उसकी संवेदना, समाज और सामूहिकता द्वारा अपहृत थी। इसके समांतर फ्रायड के सिद्धांतों की पैरोडी पर कुंठा और वासना का कथा-नृत्य चल रहा था। ऐसे में नयी कहानी का आगमन, जेठ की दोपहरी में झुलसते मनुष्य के लिए वटवृक्ष की छांव जैसा था। अब कहानी के केन्द्र में व्यक्ति था, लेकिन यह समाज के प्रतिनिधि-पात्र के रूप में था। अमरकांत की कहानी मकान के आईने में इसको अच्छी तरह अनुभूत किया जा सकता है। ख़ैर, प्रवृत्तियों और उपलब्धियों पर बात से पहले यह आवश्यक है कि कहानी के साथ नयी पदबंध के इस्तेमाल के औचित्य की पड़ताल की जाए। नयी कहानी के साथ जुड़ा नयीशब्द पहले की कहानी से मात्र पार्थक्य स्पष्ट करने के लिए नहीं प्रयुक्त हुआ, बल्कि उसके पीछे कहानी की नयी संवेदना, नयी दृष्टि और नये रूपबंध को रेखांकित करने की भावना थी। सन 1950 के बाद देश विकास की ओर अग्रसर होता प्रतीत हुआ।1 लेकिन यह मात्र प्रतीति ही रही। अपेक्षाओं के स्वर्णिम पृष्ठ बुद्धिजीवियों द्वारा बार-बार पलटे गए, मुलम्मा छूटता गया और यथार्थ अपने नग्न रूप में आता गया। लोकतांत्रिक मूल्य, गाँधीवादी आदर्श... यहाँ तक कि संसदीय प्रतिष्ठान अपना वज़न खोते गए और हास्य में तब्दील होते गए। अमरकांत की कहानी हत्यारेकी मदद से इस वस्तुगत सच्चाई को समझा जा सकता है।

कहानी के साथ नयीशब्द के जुड़ाव पर ख़ूब बहस-मुबाहिसे हुए। सवाल उठा कि जिन विषयों, क्षेत्रों, संकेतों, प्रतिमानों, मूल्यों आदि के नयेपनअथवा टटकेपनका दावा किया जा रहा है, क्या उससे प्रेमचंद, अज्ञेय और जैनेन्द्र जैसे कथाकार बिल्कुल अनभिज्ञ थे? या कि उनके साहित्य में इनका अभाव है? ख़ुद नयी कहानी आंदोलनके ही एक स्तम्भ रहे, मोहन राकेश इसका प्रतिकार करते हैं- ऐसा कोई भी विषय या क्षेत्र नहीं है, जिसे लेकर पहले कहानियाँ नहीं लिखी जा चुकीं। इसलिए इस या उस क्षेत्र के जीवन को लेकर कहानियाँ लिखने वाले लोग जब अपनी नयी दृष्टि, नयी चेतना और नयी भावभूमि की बात कहते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे वे अपने को किसी ऐसी चीज़ का विश्वास दिलाना चाहते हों, जिस पर उनका भी मन विश्वास नहीं करता। निःसंदेह कहानी की सार्थकता इस बात में नहीं है कि वह किस नये अजायबघर से कौन-सा अजूबा लाकर हमारे सामने पेश करती है। नयी तरह के व्यक्ति या नयी तरह के वातावरण का चित्रण कर देने से एक नयी कहानी की सृष्टि नहीं हो जाती।2 निस्संदेह सृजन में नयापन तभी आता है, जब कथाकार अनुभव-जन्य, यथार्थ-सम्मत प्रयोगशील-दृष्टि से सम्पन्न हो! अपने समय की नब्ज़ पकड़ने में सक्षम कथाकार को ऐसी दलीलें अथवा पक्ष रखने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। रचनाकार की कल्पना-शक्ति का घोड़ा यथार्थ से ज्यादा दूर जा भी नहीं सकता। साहित्य-सृजन, पुराने ज़माने के कनफटा योगी अथवा मस्तान द्वारा किए जाने वाले चमत्कार-प्रदर्शन जैसा कार्य नहीं है। सामाजिक-यथार्थ से अलगाव और चमत्कारिक-छवि गढ़ने जैसा ख़ब्त साहित्येतर ही कहलाएगा। लेकिन मात्र शिल्प, भाषा अथवा यथार्थ की अभिव्यक्ति में आए नयेपन के कारण युग-विशेष में रचित कहानियों को नयी कहानी का दर्जा नहीं दिया जा सकता तो फिर नयी कहानी की सृष्टि कैसे होती है? प्रचलित कथा-परम्परा से नयी कहानीकैसे अलग है? वास्तव में, इस प्रश्न का उत्तर कहानी की आंतरिक उपलब्धिमें छुपा है। कहानी का शिल्प एक कोण है, भाषा दूसरा, यथार्थ की अभिव्यक्ति तीसरा और सांकेतिकता चौथा। कोण और भी हैं और हर कोण से विचार कई भूमियों पर किया जा सकता है। परन्तु किसी भी एक उपलब्धि से कहानी, कहानी नहीं बनती- कहानी की आन्तरिक अन्विति का निर्माण इन सभी उपलब्धियों के सामंजस्य से होता है।3 निस्संदेह कहानी की आंतरिक अन्विति का निर्माण उपरोक्त तमाम उपलब्धियों के सामंजस्य से होता है। लेकिन नयी कहानी के पक्ष में यह दलील ठोस प्रतीत नहीं होती, क्योंकि पूर्ववर्ती कहानियों में भी इन आंतरिक उपलब्धियों का सामंजस्य स्पष्ट लक्षित होता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रेमचंद का परवर्ती लेखन इसका अनन्यतम उदाहरण है। फिर नयी कहानी का नयापन? स्वयं मोहन राकेश नयेपन को कुछ यूँ उद्घाटित करते हैं- जहाँ तक कहानी की आंतरिक उपलब्धियों का सम्बन्ध है, उनमें सांकेतिकता को कहानी की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। यह सांकेतिकता आज की कहानी की या किसी एक भाषा की कहानी की ही उपलब्धि नहीं, कहानी-मात्र की एक अनिवार्य उपलब्धि है। पुरानी कहानी इस अर्थ में अलग होती है कि उसमें सांकेतिकता का विस्तार पहले से भिन्न स्तरों पर होता है। बात वही होती है और जीवन के उसी कैनवस से उठाई जाती है। मगर उसके संबंध में लेखक के अनुभव की निजता, जीवन के यथार्थ की उसकी व्यापक पकड़ और भाषा तथा शिल्प के क्षेत्र में उसकी अपनी प्रयोगात्मकता उसकी रचना को भिन्नता और एक और ही सार्थकता प्रदान कर देती है।4 पहले से भिन्न स्तर पर सांकेतिकताका विस्तार तो नैसर्गिक है। शिशु हमेशा शिशु नहीं रहता। घड़ी की सूइयाँ हमेशा एक ही जगह ठिठकी नहीं रहतीं। समाजिक चेतना जड़ नहीं होती। भूत और वर्तमान में अगर साम्य हो तो इतिहास की आवश्यकता नहीं रहेगी। आशय बस इतना ही कि मात्र सांकेतिकता के भिन्न स्तर पर विस्तार से कहानी नयी नहीं बनती। इसका एक अनिवार्य तत्व सोद्देश्यता भी है। नामवर सिंह सोद्देश्यताको अर्थ विस्तार देते हुए लिखते हैं कि मूलतः इसका (सोद्देश्यता) अर्थ है एक इशारा- इशारा एक दिशा की ओर या एक अनदेखी स्थिति की ओर। कहते हैं कि जब डॉक्टर को मर्ज का पता नहीं चला तो एक प्रसिद्ध चित्रकार ने उसके पास अपना नग्न चित्र बनाकर एक जगह छोटा सा काला धब्बा लगाते हुए इस नोट के साथ भेज दिया था कि यहाँ दुखता है। कहानी में इतना सा इशारा ही सोद्देश्यता है। दर्द से छटपटाते हुए जिस व्यक्ति अथवा समाज को यह पता न हो कि दर्द कहाँ है और क्या है, उसके लिए उसकी दुखती रग पर हाथ रख देना भी बहुत बड़ी बात है।5दोपहर का भोजनकहानी में जो इशारा अथवा संकेत है, वो क्या है? समाज के नग्न चित्र पर काला धब्बा ही तो है! कहानीकार की भूमिका भी उसी चित्रकार जैसी होती है या होनी चाहिए।

एक महत्वपूर्ण आंतरिक उपलब्धि के रूप में सांकेतिकता अथवा सोद्देश्यता को चिन्हित किया जा सकता है, लेकिन ये प्रवृत्ति तो पूर्ववर्ती कथा-धारा में भी सहज-सुलभ है! या यूँ कहिए कि साहित्य तो सोद्देश्य ही होता है! फिर नयी कहानी में सांकेतिकता अथवा सोद्देश्यता ने कौन से उच्चतम स्तर को छू लिया कि उसे अपनी पूर्ववर्ती कथा-धारा से अलगा-कर देखा जाए? इसका समाहार भी नामवर सिंह करते हैं- सांकेतिकता का सहारा पिछली पीढ़ी(प्रेमचंद, जैनेन्द्र आदि) के लेखक कभी-कभी ही लेते थे, जबकि आज(नयी कहानी दौर) का लेखक अक्सर इसका सहारा लेता है। लेकिन इससे भी आगे बढ़कर कहा जा सकता है कि पहले कि तरह आज की कहानी आधारभूत विचारका केवल अंत में संकेत नहीं करती; बल्कि नयी कहानी का समूचा रूप-गठन (स्ट्रक्चर) और शब्द-गठन (टेक्सचर) ही सांकेतिक है। कहानी के दौरान लेखक जगह-जगह संकेत देता चलता है और ये सभी संकेत एक-दूसरे से इस तरह जुड़े रहते हैं कि एक संकेत प्रायः किसी पूर्ववर्ती तथा परवर्ती संकेत की ओर संकेत करता जाता है, इस प्रकार आधारभूत विचार द्रवीभूत होकर सम्पूर्ण कहानी के शरीर में भर उठता है, कहीं एक जगह स्थिर नहीं रहता! देह में जैसे रक्त अथवा प्राण!6 सांकेतिकता के भिन्न स्तरों को अमरकांत की कहानी असमर्थ हिलता हाथऔर कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ए लड़कीके पाठ द्वारा आसानी से समझा जा सकता है।

कहानी कोई उपन्यासनहीं है। इसलिए उसका फैलाव औपन्यासिक नहीं हो सकता। कहानी लेखन, इतिहास लेखन भी नहीं है। इसलिए किसी घटना का विश्लेषण अथवा उसके ऑथेंटकैशन का दबाव भी कहानी पर नहीं होता। इस लिहाज़ से अपने शिल्प और कथ्य में कहानी का शंश्लिष्ट और संक्षिप्त होना आवश्यक है। “(कहानी) चाहे जितनी संश्लिष्ट और समग्र हो- उसे अपनी बात बहुत संक्षेप में और संकेत से कहनी है। खंड में अखंड को देखने की मजबूरी ही है कि वह समाज से एक व्यक्ति को और जीवन से एक केन्द्रीय क्षण को काटकर, उससे दूरी और गहराई एक साथ पाने की कोशिश करता है।7 अर्थात कहानी का कार्य लघुता में विराट का संधान है। ज़िन्दगी और जोंक, दोपहर का भोजन, डिप्टी कलक्टरी, लड़की की शादी जैसी कहानियाँ आख्यान जैसा प्रभाव रखती हैं। मकान का मनोहर अपराधबोध की प्रेतबाधा का शिकार है। कपारचिरवा प्रेत कोई और नहीं, आर्थिक विवशता के कारण मानवीय दायित्व से मुँह मोड़ने के परिणामस्वरूप जन्मी कुंठा और आक्रोश ही है। निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति की संवेदना और स्वार्थ के बीच का संघर्ष, उसको असहज जीवन-अनुभूतियों का शिकार बनाता है। कहानी काव्यात्मक बिम्ब ग्रहण करती प्रतीत होती है और मुक्तिबोध की कविता ब्रह्मराक्षस का मानसपटल पर दृश्यांकन होने लगता है- तन की मलिनता/दूर करने के लिए प्रतिपल/पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात/स्वच्छ करने-/ब्रह्मराक्षस/घिस रहा है देह/हाथ के पंजे बराबर/बाँह-छाती-मुँह छपाछप/खूब करते साफ/फिर भी मैल/फिर भी मैल!! XXXXX खूब ऊँचा एक जीना साँवला/उसकी अंधेरी सीढ़ियाँ…/वे एक आभ्यंतर निराले लोक की।/एक चढ़ना औउतरना/पुनः चढ़ना औलुढ़कना/मोच पैरों में/व छाती पर अनेकों घाव।/बुरे-अच्छे-बीच के संघर्ष/ अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर/गहन किंचित सफलता/अति भव्य असफलता/...अतिरेकवादी पूर्णता XXXXXX  पिस गया वह भीतरी/' बाहरी दो कठिन पाटों बीच/ऐसी ट्रेजिडी है नीच!!8 मनोहर अपनी आर्थिक-स्थिति से मजबूर होकर, न चाहते हुए भी अपनी पत्नी शकीला के मामा के साथ छल करता है। उस मामा के साथ, जिसने कठिन परिस्थितियों में मनोहर की ख़ूब मदद की है। वही मामा जब बीमार पड़ा और मदद माँगी तो मनोहर नट गया। उसने इस सत्य को अपनी पत्नी के सामने कभी जाहिर नहीं होने दिया। लिहाजा एक ही समय वह दो स्तरों पर ख़ुद को मुजरिम पाता है। मकान में रहकर हमें गर्व होता है कि हमारा भी कोई अस्तित्व है। मकान आदमी को हँसाता है, संतोष देता है, उसमें जोश भरता है, उसको ऊँचा उठाता है, उसको आगे बढ़ाता है। ऐसे ही हँसते हुए मकान में आदमी रहना पसंद करता है। लेकिन कुछ मकान ऐसे होते हैं जिनमें तकलीफ-ही-तकलीफ होती है। उसमें हर काम उलटा होता है। उसमें रहकर हर जगह मात खानी पड़ती है। आशा और विश्वास खत्म हो जाता है। मेरा मकान ऐसा ही है।9 मकान यहाँ मानव-अस्तित्व और उसकी संवेदना का रूपक है। मकान होते हुए भी मनोहर मामा की आशाओं का हत्यारा है। पत्नी के विश्वास का क़ातिल है। मकान उसकी गरिमा को ऊँचा नहीं उठाता, बल्कि नीचे गिराता है। यहाँ मकान मनुष्य के अस्तित्व को प्रश्नांकित करता है। मनोहर को परेशान करने वाला कपरचिरवा प्रेत कोई और नहीं, उसकी संवेदनशीलता और अपराधबोध ही है।

लघुता में निरर्थकता का खतरा सबसे अधिक है। कहानी की सृष्टि इसी लघुता को सार्थकता प्रदान करने के लिए हुई थी।10 और अपवादों को छोड़, कहानी अपने इस दायित्व का जिम्मेदारी के साथ अब-तक निर्वहन करती आई है। प्रश्न लघुता का नहीं, बल्कि समाज अथवा जीवन के उस खंड अथवा क्षण की सार्थकता का है, जिसे कोई कहानीकार चुनता है। एक थी गौरा में सुहाग सेज पर बैठी नई-नवेली दुल्हन का अपने पति के साथ वार्तालाप (हालांकि इसे एकालाप की श्रेणी में रखना ज्यादा उचित जान पड़ता है।) आपको जिस मनोवैज्ञानिक भाव-भूमि पर ला पटकता है, वह बड़ा ही दारुण दृश्य उपस्थित करती है। यहाँ असुरक्षा और आत्मबल का विलोप एक त्रासद जीवन का संकेत ही तो है। एक समर्थ कहानीकार किस प्रकार जीवन की छोटी-से-छोटी घटना में अर्थ के स्तर-स्तर उद्घाटित करता हुआ उसकी व्याप्ति को मानवीय सत्य की सीमा तक पहुँचा देता है। ऐसे अर्थगर्भत्व को मैं सार्थकता कहता हूँ।11 वास्तविक सत्य तो जीवन का मामूलीपन ही है। जीवन की विशिष्टता या विलक्षणता, मनुष्य के रागात्मक-जीवन के बाधक तत्व हैं। यहाँ नैसर्गिक अथवा प्राकृतिक अवस्था से मनुष्य का पलायन स्वभाविक है। लिहाजा अमरकांत कभी भी असाधारण जीवनानुभूतियों का आग्रह नहीं रखते। वे इस तथ्य से भलिभांति परिचित हैं कि साहित्य का मूल लक्ष्य मानवीय सत्य का उद्घाटन है, कैनवास या थीम का महत्व एक आवश्यक टूल से अधिक नहीं है। सिर्फ बहुत बड़ी थीम (विषय) उठा लेने से काम नहीं चलता। यह जरूरी है कि सिर्फ उतना ही अंश उठाया जाये जिसका मन पर अत्यधिक आघात हुआ हो। बड़ी भारी बिल्डिंग खड़ी करने को बजाय छोटी-सी कुटिया खड़ी की जाये तो अधिक अच्छा होगा।12 दोपहर का भोजन, मकान या डिप्टी कलक्टरीकहानी की थीम बड़ी नहीं है, लेकिन निम्न-मध्यवर्गीय जीवन की दुखती रग यही है। ये कहानियाँ निम्न-मध्यवर्गीय जीवन की त्रासदी को बिल्कुल नग्न रूप में हमारे सामने ला पटकती हैं। इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि कहानी की सहज सांकेतिकता रूपकात्मक सांकेतिकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। कहानी का वास्तविक संकेत कहानी की सहज गठन से स्वतः उभर आता है। आज की हिन्दी कहानियों में चीफ की दावतऔर दोपहर का भोजनजैसी कहानियाँ उदाहरण-रूप में रखी जा सकती हैं। चीफ की दावतका संकेत माँ के चरित्र के माध्यम से उभरता है और दोपहर का भोजनमें अभावग्रस्त घर की एक साधारण सी दोपहर के वर्णन मात्र से। इन दोनों की लिखी हुई कितनी ही और ऐसी कहानियाँ मिल जाएँगी, जिनमें कई-कई तरह के संकेत हैं- वे संकेत जो चरित्रों की भाव-भंगिमाओं और उनकी साधारण बातचीत से उभरते हैं, या केवल वातावरण के चित्रण से, या केवल कहानी के शिल्प या कहने के ढंग से ही। कहानी के अंतर्निहित संकेत तक न जाकर, जब केवल ऊपरी सतह पर ही उसका अध्ययन किया जाता है तो कई बार एक बहुत अच्छी कहानी भी साधारण और सपाट-सी प्रतीत होती है।13 एक सच्चे आलोचक का कार्य कहानी में अंतर्निहित संकेतों को पकड़ना और प्रत्यक्ष करना ही है। ध्यान रहे कि नयी कहानी में स्थूल कथानकों के स्थान पर सूक्ष्म कथा-तंतुओं को प्रधानता मिली। सांकेतिकता, प्रतीकात्मकता और बिंबात्मकता का प्राधान्य हुआ।14 मूस, बस्ती,मकान, मौत का नगर, घुड़सवार औरहत्यारे जैसी कहानियों में संकेतों और रूपकों के माध्यम से अमरकांत ने सत्य का संधान सहज-सधे अंदाज़ में किया है। बल्कि यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि इन कहानियों में नयी कहानी की तमाम विशेषताएँ संगुम्फित हैं।

हिन्दी की नयी कहानी के अधिकांश प्रयोगों में जिस जीवन का चित्रण हुआ है, वह इस उफनती और शोर करती हुई धारा से हटा हुआ जीवन है, उन अकेले किनारों का जीवन जहाँ अभी तक सामंती संस्कारों की छायाएँ मँडराती हैं।15 हौसला’, ‘बादल बिजली की कहानी, शक्तिशाली, पलाश के फूल जैसी कहानियों में इसका साक्षात्कार किया जा सकता है। पलाश के फूल में राय साहब जैसा व्यक्ति-चरित्र क्या आज भी हमारे समाज में दृढ़ता से जमा हुआ नहीं है? निश्चित रूप से आज की कहानी ने समूहगत सामाजिकता को व्यक्तिगत सामाजिकता के रूप में देखने-पाने की कोशिश की। विराट युग-बोध को व्यक्ति या व्यक्तियों के आपसी सम्बन्धों की चेतना, यानी मन के अनेक स्तरों पर आकलन और प्रतिफलन के नाटक को, आज की कहानी ने ही सबसे पहले देखा।16 डिप्टी कलक्टरी एक निम्न-मध्यवर्गीय संतप्त जीवन में अचानक आशा के संचार और इसके परिणामस्वरूप आए बदलाव का सूक्ष्म-अंकन करती कहानी है। शकलदीप बाबू मुख्तारी से किसी तरह परिवार का पेट पाल रहे हैं। जीवन में शुष्कता है। एक क़िस्म की जड़ता है। यहाँ स्वप्न नहीं है। निराशा-जन्य कुंठा है। लेकिन बेटे नारायण का डिप्टी कलक्टरीके लिए फॉर्म भरना, मानो जीवन-समर में पराजित और विकास की अवरुद्ध धारा का सहसा तिरोहित-प्रवाहित हो उठना है। डिप्टी कलक्टरी नारायण का सपना है, लेकिन ये सपना सकलदीप बाबू में शिफ्ट हो जाता है। सकलदीप बाबू आर्थिक विपन्नता को भूल जाते हैं और बेहतर भविष्य की उम्मीद उनसे बेटे के लिए घी और मेवे का बंदोबस्त करवा लेती है। स्वप्न को यथार्थ की भुरभुरी ज़मीन पर जमाने के लिए ईश्वर का अवलंब लेने से भी सकलदीप बाबू नहीं चूकते। बल्कि पति-पत्नी के बीच भक्ति की भिन्न धाराओं के कारण उपजा गतिरोध भी स्वाहा हो जाता है। मनोरथ की पूर्ति के निमित्त अचानक ही राधास्वामी सकलदीप बाबू के लिए प्रभावशाली देवता बन जाते हैं। अर्थात महज डिप्टी कलक्टरी का फॉर्म भरना ही, विषण्ण जीवन में प्राण फूंक देता है और सकलदीप बाबू फिर से जीवंत हो उठते हैं। यह स्वीकार करने में संकोच नहीं कि प्रगतिशील होते हुए भी, अमरकांत अपनी प्रगतिशीलता का न तो ढिंढोरा पीटते हैं और न ही स्थूल रूप में उसके चित्रण को तरजीह देते हैं। बल्कि उनका लक्ष्य जीवन को उसके छोटे-छोटे किन्तु महत्वपूर्ण संकेतों के माध्यम से उद्घाटित करना ही है। सामान्यतः हर देश और भाषा की कहानी अपनी परिस्थितियों और अपने लेखकों की सामर्थ्य के अनुसार विकसित होती है।17 लेखकीय सामर्थ्य के कारण ही अमरकांत अपने समकालीनों में सबसे सहज और सधे कथाकार हैं। अमरकांत के कथा-संसार का पर्यवेक्षण मात्र से यह बात सिद्ध हो जाती है कि कहानी-शिल्प का विकास लेखक के प्रयोग-बुद्धि पर उतना निर्भर नहीं करता, जितना उसके मैटर की आन्तरिक अपेक्षा पर।18 यथार्थ-चेतना और शिल्प के साथ-साथ विषय-चयन की चेतन-समझदारी किसी भी कथाकार के लिए महत्वपूर्ण तो है, लेकिन उतनी नहीं जितनी कि कहानी के मैटर की आन्तरिक अपेक्षा पर उसका खरा उतरना। यही कथाकार की सबसे बड़ी परीक्षा है और इसमें अमरकांत को शतप्रतिशत अंक तो नहीं, लेकिन डिस्टिंक्शन ज़रूर दिया जाना चाहिए।

साहित्य जगत में यथार्थ को लेकर बहसों का सिलसिला कहानी के उद्भव-काल से ही चला आ रहा है। यथार्थ के विभिन्न रूपों पर विचार की आवश्यकता नहीं है। लेकिन हाँ, वैयक्तिक अनुभव या भोगे हुए यथार्थ के नाम पर साहित्य में बहुत-सी विसंगतियाँ आई हैं। इसके आधार पर नितान्त निजी यथार्थ का भी चित्रण लोगों ने किया है। वैयक्तिक यथार्थ में कभी-कभी निजी कुंठा, निजी संत्रास, घोर व्यक्तिवादिता के दर्शन होते हैं। वैयक्तिक यथार्थ के नाम पर, जो एक नारे की तरह है, बहुत-सी रचनाओं का खण्डन किया जाता है। रचना यथार्थ की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है, वह रचना हमारे अनुभव क्षेत्र के अन्तर्गत भी आ सकती है और उससे बाहर भी जा सकती है। वस्तुपरकता ही श्रेष्ठ रचना की जान है। यदि सच्चाई एकदम निजी भी हो तो भी उसे रचनात्मक विशिष्टता उसी समय मिलती है जब वह पूरे समाज की सच्चाई या युग की सच्चाई के रूप में उभरकर सामने आती है। रचना कल्पना के आधार पर नहीं लिखी जा सकती, आधार तो उसका जीवन ही होगा और उस जीवन के निकट जाकर ही सृजनात्मक ऊँचाइयाँ प्राप्त की जा सकती हैं।19 अमरकांत के इस दावे को राजेन्द्र यादव और पुख़्तगी देते हुए लिखते हैं कि कोई भी आइडिया, विचार या सत्य- व्यक्ति या पात्र के जीवन की धारा में रहते हुए ही उसकी उपलब्धि बने, उसका यह प्रयत्न है। उसकी यथार्थ दृष्टि बताती है कि बिना देश-काल अर्थात परिवेश के व्यक्ति की कल्पना अधूरी और आनुषंगिक है। व्यक्ति के अन्तर्बाह्य निर्माण में उसके संस्कार, शिक्षा-दीक्षा, सामाजिक स्थिति, सम्पर्क और पेशा- सभी का हाथ होता है। इस सबकी पृष्ठभूमि के साथ ही, अपनी सीमाओं के भीतर ही कोई व्यक्ति सत्य को उपलब्ध या उद्घाटित कर सकता है। बिना इस परिवेश की संगति को आत्मसात् किए, हर किसी सत्य या आइडिया को घटित और उद्घाटित करना- उनका आरोप करना है, प्राप्त करना नहीं।20 सत्य का उद्घाटन परिवेश की संगति के साथ ही संभव है। अपरिचित बिम्बों एवं परिवेश की युगलबंदी में यथार्थ अथवा सत्य के उद्घाटन का दावा हमारी समझ से बौद्धिक छल से अधिक कुछ भी नहीं है। कहानीकार बिम्बों के माध्यम से एक भाव या विचार को सफलतापूर्वक तभी व्यक्त कर सकता है जब वे बिम्ब यथार्थ की रूपाकृतियों से भिन्न न हों- उनके संघटन में जीवन के यथार्थ को पहचाना जा सके। ज़रा भी अनकन्विंसिंग होते ही एक सुंदर संकेत के रहते हुए भी कहानी असमर्थ हो जाती है। कहानी की वास्तविक सामर्थ्य इसी में है कि बड़ी-से-बड़ी बात कहने के लिए भी लेखक को असाधारण या असामान्य का आश्रय न लेना पड़े- साधारण जीवन के साधारण संघटन से ही विचार की अनुगूँज पैदा कर सके।21 अमरकांत की एक थी गौरा, लड़का-लड़की और हरिशंकर परसाई की क्रांतिकारी की कथा के आलोक में उपरोक्त बातें और अधिक स्पष्ट हो उठती हैं। वैसे भी काल के प्रवाह में, व्यक्ति की सामाजिकता का बोध और स्थिति ही आज की कहानी की विषय वस्तु है। कथाकार व्यक्ति को उसकी समग्रता में देखने का आग्रह करता है। व्यक्ति को उसके सामाजिक परिवेश, मानसिक अंतर्द्वंद्वों तथा व्यावहारिक जीवन के तकाज़ों तथा अन्य आवश्यकताओं की एक संश्लिष्ट प्रक्रिया के रूप में पाना चाहता है। इसलिए कहानी का कोई भी तत्व निमित्त या आलम्बन बनकर नहीं, स्वयं आश्रय या विषय-वस्तु बनकर आता है।22 यही नयी कहानी की सबसे बड़ी और अनन्यतम उपलब्धि है, जो उसे पूर्ववर्ती कहानियों से अलग एक नये धरातल पर खड़ा करती है। असमर्थ हिलता हाथ स्त्री-जीवन की विडंबनाओं का कोलाज है। एक युवती, जो सामाजिक और पारिवारिक मर्यादा की बलिवेदी पर अपने प्यार की क़ुर्बानी देने पर मजबूर की जाती है, विवाह के बाद पत्नी और माँ के रूप में वह अपनी नैसर्गिक संवेदनशीलता गवाँ बैठती है। प्रतिशोध अनुशासन का डंडा बन जाता है। मीना को प्रेम-विवाह की अनुमति नहीं देने का कारण, सामाजिक मर्यादा नहीं, बल्कि प्रतिशोध ही है। लेकिन विडंबना देखिए कि जब लक्ष्मी अपने मानसिक अंतर्द्वंद्वों से मुक्त होकर, बेटी के प्रति पहली बार नैसर्गिक प्रेम से आप्लावित होती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वह जो कहना चाहती है, नहीं कह पाती और मीना जो कहती है, उसका अर्थ वही नहीं है, जो लक्ष्मी ग्रहण करती है। मीना का चेहरा स्याह हो गया था। उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं। वह एक क्षण अनिश्चित ढंग से खड़ी रही। फिर तेज़ी से माँ की चारपाई के पास जाकर बोली- अम्मा माफ़ करो, मैं वचन देती हूँ कि मैं वही करूँगी जो तुम्हारी इच्छा थी...।23 लेकिन लक्ष्मी की इच्छा तो बदल चुकी थी! ख़ैर, प्रभावान्विति कहानी में उतनी पुरानी है, जितनी स्वयं आधुनिक कहानी। किन्तु प्रभाव की सम्पूर्ण अन्विति को सांकेतिक बनाने का श्रेय एकदम नयी कहानी को है। नयी कहानी संकेत करती नहीं, बल्कि स्वयं संकेत है!24 यानी नयी कहानी का कंस्ट्रक्ट, उसके विषय-वस्तु और प्रभावों से सामंजस्य की क्षमता में कम, स्ट्रक्चर और टेक्स्चर की सांकेतिकता में अधिक है। इन तमाम कसौटियों पर अमरकांत की कहानियाँ कुछ-एक अपवादों को छोड़, बिल्कुल खरी उतरती हैं। यहाँ जीवन अपनी तमाम विडंबनाओं के साथ सरल संकेतों के माध्यम से अभिव्यक्ति पाता है। कहानी का लक्ष्य हल ढूंढना नहीं, बल्कि जीवन-जगत की दुखती रग पर हाथ रखना है। मानवीय संवेदना को चाक्षुस-बिम्बों में परिवर्तित करना है, जिससे कि आत्मगत त्रासदी, वस्तुनिष्ठ रूपाकार ग्रहण कर सके। यही वह मार्ग है, जिससे साधारण मनुष्य की जीवन-परिस्थितियों का सहज मूल्यांकन और विडंबनाओं से उपजे त्रास और कुंठा का विरेचन संभव है। इस दृष्टि से अमरकांत अपने युग-परिवेश और जीवन की सहज सांकेतिक अभिव्यक्ति में पूर्णतः सफल कहे जा सकते हैं।


संदर्भः
1.       डॉ. अमरनाथ, हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्र., प्र.सं.2009, पृ.सं.278
2.       मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.90
3.       मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.91
4.       वही, पृ.सं.92
5.       नामवर सिंह, कहानीः नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, सं.2009, पृ.सं.24
6.       वही, पृ.सं.32-33
7.       राजेन्द्र यादव (आज की कहानीः परिभाषा के नये सूत्र) नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.104
8.       http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=3852&pageno=1
9.       अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक्स, प्र.सं. 1984, आवृत्ति 2007, पृ.सं.68-69
10.    नामवर सिंह, कहानीः नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, सं.2009, पृ.सं.24
11.    वही, पृ.सं.26
12.    गजानन माधव मुक्तिबोध, एक साहित्यिक की डायरी, भारतीय ज्ञानपीठ, प्र.सं.1964, सं.2000, पृ.सं.50
13.    मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.93
14.    डॉ.अमरनाथ, हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.2009, पृ.सं.279
15.    मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.95
16.    राजेन्द्र यादव (आज की कहानीः परिभाषा के नये सूत्र) नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.99
17.    मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.92
18.    वही, पृ.सं.97
19.    अमरकान्त, कुछ यादें कुछ बातें, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.2005, पृ.सं.136-137
20.    राजेन्द्र यादव (आज की कहानीः परिभाषा के नये सूत्र) नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.101
21.    मोहन राकेश, (कहानी नये संदर्भों की खोज), नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.93
22.    राजेन्द्र यादव (आज की कहानीः परिभाषा के नये सूत्र) नयी कहानीः संदर्भ एवं प्रकृति, सं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं.1973, पु.मु.2008, पृ.सं.102
23.    अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक्स, प्र.सं. 1984, आवृत्ति 2007, पृ.सं.46-47

24.    नामवर सिंह, कहानीः नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, सं. 2009, पृ.सं.33

2 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    अष्टमी-नवमी और गाऩ्धी-लालबहादुर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    --
    दिनांक 18-19 अक्टूबर को खटीमा (उत्तराखण्ड) में बाल साहित्य संस्थान द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।
    जिसमें एक सत्र बाल साहित्य लिखने वाले ब्लॉगर्स का रखा गया है।
    हिन्दी में बाल साहित्य का सृजन करने वाले इसमें प्रतिभाग करने के लिए 10 ब्लॉगर्स को आमन्त्रित करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी है।
    कृपया मेरे ई-मेल
    roopchandrashastri@gmail.com
    पर अपने आने की स्वीकृति से अनुग्रहीत करने की कृपा करें।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
    सम्पर्क- 07417619828, 9997996437
    कृपया सहायता करें।
    बाल साहित्य के ब्लॉगरों के नाम-पते मुझे बताने में।

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