Tuesday, May 6, 2014

विभ्रम के धुंधलके में सच की तलाश

हां, जीतता कौन है? शुद्ध लाभ किसे होता है? शुद्ध लाभ मतलब अर्थ लाभ, पद्लाभ, प्रतिष्ठा लाभ, सम्मान लाभ या कोई और लाभ? परिभाषाएँ भोथरी हैं। किस रास्ते पर चलोगे तो मंजिल मिलेगी? सोच लो कहीं वही मंजिल न हो, जहां से यात्रा शुरू की हो? और कहीं चलनेवाला ही मंजिल हुआ तो? ...सोचने के कई तरीके, पहलू, अन्दाज़, ढंग और आज़ादी न होती तो कुछ न होता।

कैसी आगी लगाई उपन्यास का कथा नायक साज़िद अपने सपनों और क्रांतिवादिता की रोमांचक दुनिया से बेदखली एवं यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर धराशायी होने के बाद पराजय-बोध से मुक्ति के लिए जो तर्क ढूंढता है, वह यही है। यहां कोई ठोस हल, पहल या उत्तर नहीं है। सिर्फ अनुत्तरित प्रश्न हैं और आश्चर्यजनक रूप से द्वंद्वपूर्ण साधु-भाव है। सपनों की राजधानी दिल्ली से विरक्ति और इससे नफ़रत की पराकाष्ठा है- मैं तुमसे पक्का और सच्चा वादा करता हूँ। क़सम खाता हूँ... कि दिल्ली कभी नहीं लौटूँगा... मतलब रहने या काम करने...
...
इस शहर पर थूक दो।

...
इस शहर पर आक थू... उसने प्लेटफार्म पर थूका।

बाबा और साज़िद ने क्या वाकई सिर्फ दिल्ली शहर पर थूका था? या कि सिर्फ लोकतांत्रिक राष्ट्र की राजधानी पर थी- यह थूक? या कि यह व्यवस्था और उस विभत्स मानसिकता के क्रूर-कलूटे चेहरे पर थी.., जो स्वभाव और व्यवहार में पूरी तरह से रोबोटिक हो चुकी है और जिसे सोर्स की कुंजी से ही चलाया जा सकता है।

राजधानी व्यवस्था का केन्द्र होने के कारण उम्मीदों का अंतिम शरण-स्थल भी है। लेकिन बकौल बाबा- यहां रहते रहोगे तो एक दिन तुम भी खूंख़्वार जानवर बन जाओगे। ...कभी यह शहर दिल्ली रहा होगा। अब तो यह भ्रष्ट दलालों... मैं राजनीतिज्ञों को दलाल ही मानता हूँ... का शहर है। भड़ुवों, रंडियों और षड्यंत्रकारियों का शहर है। रहस्यों और बेजोड़ तिकड़मों का शहर है। क्रूरता और अपमान, स्वार्थ और घृणा, तिरस्कार और भ्रष्टाचार और अनैतिक तरीके से वह सब प्राप्त करना, जो चाहिए- इस शहर का बुनियादी चरित्र है

पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूँ। इसलिए साज़िद या बाबा के साथ-साथ उनके वैसे तमाम साथियों की स्थिति को समझ सकता हूँ, जो सिर्फ और सिर्फ समाजसेवा के उद्देश्य या फिर मीडिया के ग्लैमर से आकर्षित होकर आए और तमाम राग-द्वेषों को झेलते हुए इसी में या तो मर-खप गए या फिर पलायन को बाध्य हुए। यह पूरा नहीं, लेकिन बड़ी हद तक भ्रम है कि पत्रकारों को स्वतंत्रता होती है।

बाबा के पास दूसरा ऑप्शन नहीं है। उसने इसीलिए अपना लक्ष्य बदल लिया है। अब उसने अपने अधूरे और कुचले सपनों को अपने बच्चों में शिफ्ट कर दिया है। राजधानी की भूल-भुलैय्या में उसने अपनी अधिकतम ऊर्जा नष्ट करने के बाद द्वंद्व और निराशा की पीड़ा से मुक्ति के लिए अफीम का सेवन शुरू कर दिया है। लेकिन साज़िद के सामने वापसी का रास्ता अभी खुला पड़ा है, लिहाजा बाबा चाहता है कि वह सपनों की इस झूठी और फरेबी दुनिया से जल्द से जल्द मुक्ति पा ले।

युवा उत्साह को हार स्वीकार करने में, प्राकृतिक संकोच के कारण करीब साल भर लग जाता है और अंततः उसकी अंतरात्मा उसको उसके अंतर्द्वंद्व से कुछ यूं मुक्ति दिलाती है- बुरा मत मानो, कह दो चीख़ कर कि मैं हार गया... बस चौबीस साल की उम्र में हार गया। चिल्ला कर कह दो कि राजधानी ने मुझे हरा दिया। साज़िद यह भी स्वीकार कर लेता है कि मेरी कोई सिफारिश नहीं है। मुझे किस अच्छे अख़बार में नौकरी मिलेगी? कहीं जैन भरे हैं। कहीं मारवाड़ी हैं। कहीं पुराने कम्यूनिस्टों का बोलबाला तो कहीं कांग्रेसी हैं।

उपन्यास की कथा-भूमि भले ही 60-70 के दशक की हो लेकिन इसने अपने जादूई जाल में वर्तमान और भविष्य के धुंधलके तक को समेट रखा है। कहानी सिर्फ साज़िद की नहीं है। नीतियां और आदर्श, कथनी और करनी का फ़र्क सिर्फ सुविधाभोगी बुद्धिजीवी तबके में ही नहीं है। यहां छोटे-छोटे घटनाक्रमों के जरिए कॉलेज लाईफ से लेकर ग्रामीण और शहरी परिवेश, समाज, सत्ता-समीकरण, सांस्कृतिक ताना-बाना और निम्न-मध्य वर्ग से लेकर मध्यवर्ग एवं सामंती दौर के धूल-धुसरित कुलीन-तंत्र की व्यथा-कथा और जद्दो-जहद तक अपनी पूरी त्वरा के साथ विद्यमान है।

उपन्यास की कथा-भूमि यूं तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और कैम्पस की सियासत है। लेकिन कहानी का प्रारंभ हिन्दू-मुस्लिम दंगे से होता है। दंगों के शांत पड़ते-पड़ते खटमल और मच्छर का मामला सामने आ जाता है। यानी पहले हिन्दू-मुस्लिम, फिर शिया-सुन्नी। वैसे इससे आगे भी बढ़ा जा सकता है। लेकिन भारतीय समाज में जाति-धर्म और इसको लेकर संघर्षों-अंतरद्वंद्वों और खींचतान की कहानी इतनी ढंकी-छुपी नहीं है कि उन्हें विस्तार देना जरूरी ही हो। शायद यही वजह है कि उपन्यास में ये चीज़ें संकेत रूप में ही आई हैं।

उपन्यास को पढ़ते वक्त बार-बार ज़हन में यह शंका सिर उभारती है कि इसमें कितनी हकीक़त है? कितना फ़साना है? क्योंकि कथ्य और शिल्प यानी दोनों ही स्तर पर यह उपन्यास परंपरागत किस्सागोई और गल्प शैली से थोड़ा जुदा है। कई ऐसे पात्र हैं, जिनसे उपन्यासकार का सीधा सम्पर्क रहा है। ख़ुद साज़िद का कैरिकेचर लेखक के अपने जीवन-चरित् की तरफ इशारा करता सा प्रतीत होता है। 27 मार्च 2005 को पाकिस्तानी अख़बार द डॉन के लिए रबाब नकवी को दिए इंटरव्यू से भी यह बात पुष्ट ही होती है।

उपन्यास सिर्फ सियासत, संत्रास और घुटन की कथा ही नहीं कहता। वह जीवन के जटिल गुंजलक से कुछ सदिच्छाओं और सौहार्द्र के पुष्प भी मुक्त करा लाता है। प्रोफेसर अनवारुल हसन, के पी की मदद के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं तो के पी, साज़िद की मदद के लिए हर वक्त तैयार खड़े रहते हैं। कामरेड लाल सिंह की नज़र में साज़िद सबसे ज्यादा विश्वसनीय और करीबी है। सभी एक-दूसरे के सहारे भी हैं और सहारा भी। नज़रिया अलग-अलग ज़रूर है। जहां के पी यह मानते हैं कि यह संसार चल ही नहीं सकता अगर लोग एक-दूसरे की मदद न करें। वहीं जावेद भाई के नज़रिये से देखें तो हम सब दूसरों की मदद करने के बहाने ख़ुद अपनी ही मदद करते हैं। ...मदद तो इंसान की फितरत है, उसकी मजबूरी है, उसके बगैर वह ज़िन्दा नहीं रह सकता। दिल्ली में सरयू और नेगी के सहारे ही साज़िद का एक-वर्षीय संघर्ष चलता है।  

वैसे कैसी आगि लगाई में उपन्यास विधा नई निखार के साथ सामने आई है। यहां अपने वक्त के दस्तावेज़ीकरण के साथ ही तात्कालिक वृतांतों को उसके उत्कृष्ट रूपों के साथ पेश करने के साथ ही रिपोर्ताज विधा से होड़ भी नज़र आता है। यहां गल्प के साथ तथ्यों का मिश्रण है जो हिन्दी उपन्यास-विधा को एक नयी ज़मीन मुहैया कराता सा प्रतीत होता है।

उपन्यासकार ने अपने लेखकीय एक अनपढ़ का विलाप में अपनी मनःस्थिति को स्पष्ट करते हुए, यथार्थ-जनित विभ्रम को कुछ यूँ व्यक्त किया है- आजकल मैं कुछ ज़्यादा ही परेशान रहता हूँ। परेशानी से बचने के लिए काम शुरू कर देता हूँ। लोग समझते हैं, मैं काम कर रहा हूँ। जबकि मैं तो सिर्फ परेशानी से बच रहा होता हूँ। परेशानी ये है कि बहुत बड़े पैमाने पर, बहुत सारा झूठ बोला जा रहा है। आप कहेंगे मेरी सेहत पर क्या फ़र्क़ पड़ता है? मैं कहूँगा बहुत बड़े पैमाने पर बहुत सारा झूठ बोले जाने का फ़र्क़ हमारे ऊपर पड़ता है, क्योंकि सच्चाई धुंधलाने लगती है। चीज़ें समझ में नहीं आतीं और कन्फ्यूज़न वाली स्थिति पैदा हो जाती है।

बकौल उदय प्रकाश- इतिहास और उपन्यास दोनों में कोई बुनियादी या वास्तविक भेद नहीं होता। दोनों में यथार्थ और कल्पना या सच और झूठ बराबर ही उपस्थित रहते हैं। बल्कि कई-कई बार तो ऐसा समय भी आता है जब इतिहासकार किसी कहानीकार की भूमिका निभाने लगते हैं और कथाकारों को उस समय और समाज का इतिहास लिखना पड़ता है। और यकीन मानिए ऐसा ही समय ज्यादातर रहा आता है और इसीलिए कथा, कहानी, उपन्यास की जरूरत और प्रासंगिकता समाज में बराबर बनी रहती है। उदय प्रकाश के इस कथन से असहमत होने का साहस कम से कम मुझमें नहीं है। यह एक वस्तुगत सच्चाई है। न तो इतिहास कभी सत्ता निरपेक्ष हो सकता है और न ही साहित्य कभी सत्ता-सापेक्ष। सवाल प्रतिबद्धता का है। ख़ुद असग़र वजाहत के शब्दों में- हम कहते हैं कि देश के खज़ाने लबालब भरे हैं। प्रगति के आँकड़े आसमान छू रही हैं। सबको अच्छा लग रहा है, या लगना चाहिए। लेकिन दुःख की बात है कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, क्योंकि मेरी प्रतिबद्धता संसार के सबसे कमज़ोर आदमी से है।

परेशानी सिर्फ सच का धुंधलाना या सच-झूठ का गड्ड-मड्ड होना ही नहीं है। बल्कि जन-संचार की भाषा पर राजनीति की काली छाया भी बड़ी समस्या है। भाषा के करप्ट होने की स्थिति में बाकी तमाम चीज़ों के बचने की संभावना खत्म हो जाती है। शब्दों पर जब राजनीति या कहिए अवसरवादी, छद्म राजनीति की काली छाया पड़ने लगे तो लेखक को बड़ी बेचैनी होती है और वह शब्दों को बचाने के लिए बेचैन हो जाता है। वह जानता है कि शब्द ही न रहेंगे- यानी अर्थवान शब्द ही न रहेंगे तो मनुष्य ही न रहेगा, समाज ही न रहेगा। इसलिए लेखक लिखता है। शब्दों को अर्थ देने या अर्थवान बनाए रखने के लिए। शब्दों की अर्थवत्ता की चिंता वाजिब है। खासतौर से विभ्रम के धुंधलके में बेचैन दृष्टि कुछ ठोस की तलाश में लगी ही रही है।

उपन्यासकार की तरह ही उपन्यास के पात्र भी कुछ ऐसी ही गुन-धुन में उलझे पड़े हैं। या यूँ कह लीजिए कि दो-दो हाथ कर रहे हैं। वहां भी बेचैनी है। विरोध है। बेबसी के साथ ही बहुत से अनसुलझे प्रश्न भी हैं। जिनके उत्तर की तलाश में कामरेड लगे हैं, साजिद लगा है। लेकिन रहना है तो व्यवस्था का दायरा नहीं लांघ सकते। के पी हों, शहरयार हों या जावेद भाई। सभी ने एक तरह से यथार्थ-जनित विभ्रम के सामने हथियार डाल दिए हैं। जावेद भाई की हालत कफ़न के घिसू-माधव वाली है। प्रारंभिक विद्रोह के बाद उन्होंने एक तरह से हथियार डाल दिए हैं। यहां जीवन में न रस है, न गति है और न ही लय है। स्थिरता है। एक तरह की अकर्मण्यता है जो व्यवस्था-जन्य परिस्थितियों के खिलाफ पराजय के बाद भी हेकड़ी दिखा रही है।

उपन्यास में धर्म और कट्टरपंथ भी ज़ेरे-बहस है। इसको लेकर साजिद और जावेद भाई के बीच की बातचीत बेहद दिलचस्प है। अच्छा ये कमाल की बात है जावेद भाई कि पूरी यूनिवर्सिटी में जितने भी जमाअते इस्लामी टाइप लोग हैं, सब साइंस के हैं। जितने भी कट्टरपंथी हैं सब साइंस फैकल्टी के हैं। इस अचंभे का जबाव जावेद भाई के पास है- यार देखो ये लोग साइंस को साइंस की तरह नहीं कुरान या रामायण की तरह पढ़ते हैं। यानी रेशनलिटी का अभाव है। जबकि होना इसके ठीक विपरीत चाहिए था क्योंकि विज्ञान और धर्म के बीच परंपरागत तौर पर छत्तीस का आंकड़ा ही रहा है।

जावेद भाई तो कट्टरपंथ और वामपंथ दोनों को एक ही तराजू पर तौल देते हैं- मियाँ बुरा न मानना, तुम्हारे अस्सी फीसदी कम्युनिस्ट जो हैं न, ये कम्युनिज्म का मतलब ही नहीं समझते। क़सम से, इनमें से कुछ का हाल वही है, जो तब्लीगी जमात वालों का है। वह एक तरफ मुहम्मद साहब को रिवॉल्यूशनरी करार देते हैं, साथ ही जमात वालों को लकीर का फ़क़ीर भी। जावेद कमाल के नज़रिए से देखें तो रिवॉल्यूशन अपने मूल-चरित्र में रिएक्शनरी होती है और सिस्टम का हिस्सा बनने के साथ ही जड़ता के कारण अपनी अधोगति को पहुंच जाता है। इस बात को साबित करने के लिए वह लेनिन की मौत के बाद के यूएसएसआर का उदाहरण भी प्रस्तुत कर देते हैं।

हर रिवॉल्यूशन के अंदर एक अगले रिवॉल्यूशन के बीज होते हैं। उन्हें पूरी तरह पनपने का मौका मिलना चाहिए। नहीं मिलेगा तो वो बेढंगे तरीके से बढ़ेंगे और फूटेंगे। पर तब उसका नतीज़ा ख़राब होगा। जावेद कमाल की यह बात बिल्कुल सही है। व्यवस्था अगर शांतिपूर्ण आंदोलनों को कुचलने की कोशिश नहीं करे तो हिंसक आंदोलन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। नक्सलवाद या ऐसी ही दूसरी समस्याएं पैदा ही नहीं होंगी। लेकिन व्यवस्था जड़ नीतियों से मुक्त नहीं हो सकती। ऐसे में असंतोष किसी न किसी राह फूटेगा ही। वैसे दुर्भाग्य की बात तो यह भी है कि रिवॉल्यूशन की बागडोर जिन लोगों ने संभाल रखी है, वह अहमद के पिता यानी अरगला के राजा साहब जैसी मनःस्थिति में हैं। राजा साहब यूँ तो ज्यादातर वक्त घर की चहारदिवारी में ही बिताते हैं, लेकिन उनका दावा है कि उन्होंने बीस साल की मशक्कत के बाद एक ऐसी थीसिस तैयार की है, जिसके छपने के बाद वर्ल्ड हिस्ट्री बदलनी पड़ेगी। बताने की ज़रूरत नहीं कि हिन्दुस्तान में कम्युनिज्म और कम्युनिष्ट दोनों का यही हाल है।

कामरेड लाल सिंह की बेचैनी का कारण भी यही है। किसान संगठन से आए हैं। गांव और ग्रामीणों से उनका साबका पड़ा है। शहरी शिक्षित मध्यवर्ग और उसकी जटिल जीवन प्रक्रिया से अनभिज्ञ हैं। उनकी नज़र में वैचारिक आदर्श बेहद ज़रूरी है। प्रतिबद्धता और कथनी-करनी की एका जरूरी है। कामरेड का आरोप है- आप लोगों के सामने पार्टी से बड़ी चीज़ अपना-अपना कैरियर, अपना-अपना भविष्य है। आप सब एक दूसरे पर इतना निर्भर हैं कि अलग होकर गाड़ी चला ही नहीं सकते। मतलब कांग्रेसी हो या सीपीएम का प्रोफेसर हो... वह अपने हितों के लिए एक हो जाएगा... बाहर तमाम भाषणबाज़ी करेगा... कामरेड की यह शिकायत क्या आधुनिक भारतीय लोकतंत्र की हकीकत नहीं है?

वह ख़ुद जिस तरह संगठन की कोशिश करते हैं, वह भी तो भविष्य की कोई उम्मीद नहीं जगाता। बेनीपुर की बानगी बड़ी दिलचस्प है। लाला जाओ... और सब सालों से कहो कि मीटिंग में तो आना ही पड़ेगा... वैसे न आएंगे तो जूते मार के लाए जाएंगे... क्या समझ रखा है, जहां दस-दस जूते पड़े तहां जुआ-उवा सब निकल जाएगा। यहां पर कथा-नायक की यह चिंता वाजिब ही है कि जूते मारकर जो किसान-मजदूर सभा बनाई जाएगी, वह कैसी होगी?” वामपंथ तो बराबरी की बात करता है। सर्वहारा की बात करता है। फिर धौंस-धमकी और दबंगों की मदद से कैसे संगठन खड़ा होगा? और अगर ऐसे ही होना-चलना है तो फिर कांग्रेस क्यों बुरी हो गई? आज़ादी के ठीक बाद जैसे कांग्रेस पर सामंतों, दबंगों और जातिवादियों ने कब्जा जमा लिया और पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता साईड-लाईन कर दिए गए। कहीं वही हालत कम्यूनिस्ट पार्टियों की तो नहीं हो गई! वर्ना ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता कि इतने सारे समर्पित कार्यकर्ताओं के बावजूद वामदलों का जनाधार और प्रभाव सिकुड़ता ही चला गया। जिनके हक़ की लड़ाई लड़ने का दावा किया गया, वही जंग से नदारद रहे। ऐसे में कथा-नायक का यह निष्कर्ष वाजिब ही है- तुम इसे जो चाहो कह लो... पर बात दरअसल यह है कि तुम ग़रीबों, मजदूरों के लिए क्रांति करना चाहते हो और उन्हीं को यह पता नहीं है, यदि पता है तो विश्वास नहीं है। लब्बो-लुआब यह कि कथा-नायक के संशय का तसल्ली-बख्श जवाब लाल सिंह के पास भी नहीं है।

दलित-शोषित और वंचित तबकों में अविश्वास का कारण भी है। शुरूआत जहां से होनी चाहिए, वहां से नहीं होती या नहीं हुई। मजदूरों के हित-अहित को जानना समझना था। जबकि लोग मार्क्स और लेनिन की पोथियों का भास्य करने में लगे रहे। शोषितों को मुक्त कराने की कोशिश होनी थी। लेकिन सभी धर्म-विरोध का झंडा लिए खड़े रहे। यानी प्रारंभ जड़ की बजाय डालियों से हुई। ऐसे में जनता जुड़ने की बजाय और दूर होती चली गई। जो ज्यादा उत्साही थे, उन्हें पागल करार दे दिया गया। कामरेड शुक्ला और कामरेड शंकर की स्थिति तो यही कहानी बयान करती है।

उत्तर आधुनिक भारत बाजारू परिवेश में सिर्फ बुद्धिजीवी तबका ही नहीं, बल्कि आम आदमी भी देख रहा है कि राष्ट्र-हित की आड़ में किस तरह राष्ट्र के बड़ी आबादी बदतर जिन्दगी जीने को अभिशप्त है। भूख से होने वाली मौतों को लेकर, किसानों की आत्महत्या के मसले पर, बेरोजगारी और बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार के मसले पर अ-गंभीर रुख़ रखने वाली सरकार बाज़ार खोलने या खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष पूंजी-निवेश से लेकर परमाणु-संधि तक आक्रामकता के स्तर तक गंभीर हो उठती है। समस्या तो यह भी है कि तमाम समस्या की जड़ भ्रष्ट और बेपटरी व्यवस्था है। हम भी यह बात जानते हैं लेकिन एक बड़े अनुशासन में बंधे हैं कि व्यवस्था को इतना बुरा मत कहो कि वह गिर जाए- क्योंकि तुम भी इसी व्यवस्था की पैदावार हो, यह गिर जाएगी तो तुम भी गिर जाओगे।

यहां पर ज्याँ पाल सार्त्र की आत्मकथा द वर्ड्स का ये अंश बार-बार मन को कुरेद रहा है -मैं पहले कलम को तलवार समझता था। अब जान गया हूँ कि हम लेखक शक्तिहीन हैं। लेकिन कोई हर्ज नहीं। मैं अब भी किताबें लिखता रहूँगा। यह ठीक है कि संस्कृति किसी वस्तु या व्यक्ति की रक्षा नहीं कर सकती और न ही इससे किसी औचित्य को प्रमाणित किया जा सकता है। लेकिन इसे मनुष्य ने ही खड़ा किया है। आदमी इसी में अपने व्यक्तित्व को स्थापित करता और अपने को देखता है। यही एक आईना है, जिसमें वह अपना अक्स देख सकता है।” 

सच तो यही है कि उपन्यास का पूरा ताना-बाना सामज, सियासत और जीवन के उलझाव को सुलझाने की कोशिशों का नतीजा है। यहां कार्य-कारण संबंधों की पड़ताल की बजाय उसका प्रत्यक्षीकरण है।

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