Tuesday, January 14, 2014

सबकुछ है धुआँ-धुआँ

कुछ दिनों पहले ख़ालिद जावेद का उपन्यास मौत की किताब पढ़ रहा था। उपन्यास में एक जगह कथा-नायक अपनी ज़िन्दगी के अनुभव को कुछ यूँ बयान करता है- मैं हमेशा एक ऐसी फिल्म देखता रहा, जिसके हर-एक मंज़र से उसका डायलॉग थोड़ा आगे या पीछे होता है। आवाज़ उसके साथ फिट नहीं होती। आवाज़ हर मंज़र को मुँह चिढ़ाती, फिल्म के फ़्रेम में बहती रहती है।1 भारतीय सिनेमा के संदर्भ में यह उक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है।

सौ साल का वक्फ़ा कम नहीं होता। ठीक है, भारत में सिनेमा की शुरुआत ठीक वैसे नहीं हुई, जैसे कि यूरोप या अमेरिका में। भारत में सिनेमा का अध्याय यूरोप की देखा-देखी ही खुला। दादा साहेब फाल्के ने इंग्लैंड में लाईफ ऑव क्राईस्ट देखी और उसके बाद उन्होंने जुनून की हद तक फ़िल्म निर्माण में ख़ुद को झोंक दिया। 1913 में भारत की पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चन्द्र रिलीज़ हुई। विधा नई थी। अनुभव नया था। इंसानों जैसी हँसती-चलती तस्वीरें, कौतूहल और उत्तेजना पैदा करने के लिए काफ़ी थीं। रही-सही क़सर 1931 ई. में आर्देशिर ईरानी की आलम आरा से पूरी हो गई। इसके साथ ही भारतीय सिनेमा में एक नये युग का आरंभ भी हुआ। अब रजतपट पर तस्वीरें हँसने-चलने के साथ-साथ  बोलने भी लगीं। यह कथा अब पुरानी पड़ चुकी है। कला-संस्कृति का इतिहास तो हमेशा ही आकर्षक रहा है।

थॉमस अल्वा एडिसन के कारनामे हम नहीं भूल सकते। मूवी कैमरा और किनैटोस्कोप का अविष्कार तो उन्होंने ही किया था। इन्हीं उपकरणों के मदद से ल्यूमिए ब्रदर्स ने हमारे ही यथार्थ को, हमारे सामने प्रदर्शित करने में सफलता हासिल की थी। इससे पहले यह काम नाटकों के माध्यम से ही संभव था। लेकिन वहां सिनेमा जैसी निर्बाध जीवंतता संभव नहीं थी क्योंकि नाटक में तो सिंगल लॉन्ग शॉट ही संभव है। वहां दृश्य के बावजूद भावों की गहराई के लिए ध्वनि पर ही निर्भरता होती है, क्योंकि क्लोज शॉट्स जैसी सुविधा मंच पर संभव नहीं है। कथा-कविता भी मानवीय संवेदनाओं के चित्रण के ही साधन हैं, लेकिन यह शब्दों की मदद से भाव-चित्र का निर्माण करते हैं। शब्दों की सीढ़ियाँ चढ़कर ही पाठक उस भाव तक पहुंचता है और अपना संसार रचता है। जबकि सिनेमा ने इस भावात्मक श्रम से हमें मुक्ति दे दी। यहाँ शब्द-चित्र नहीं होते, यहाँ तो चित्रों से शब्द और संवाद बनते-संवरते हैं। या यूँ कहें कि सिनेमा वस्तुतः वर्तमान एवं काल्पनिक भविष्य का सचित्र-वर्णन अथवा विवरण है। यह एक ऐसा यथार्थ-चित्र बनने की दिशा में अग्रसर हुआ, जो हमारा होते हुए भी, हमें ही कौतुहल में डाल रहा था। इस लेख का मक़सद भी यथार्थ और सिनेमा के बीच इन्हीं अंतर्संबंधों की पड़ताल है।

यूरोप या अमेरिका में कैमरे ने प्रारंभिक दौर में, जिन दृश्यों को क़ैद किया था, वे जीवन के यथार्थ-चित्र थे। बागीचे में पौधों की सिंचाई करते माली के थे। कॉन्फ्रेंस की तरफ बढ़ते कदमों के थे। जबकि हमारे यहाँ ठीक उल्टा हुआ। कैमरे ने सबसे पहले जिन चित्रों और चरित्रों को कैप्चर किया, वह गुलाम भारत के शोषित-पद्दलित लोगों के जीवन-संघर्ष को अभिव्यक्त करने वाली तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि वह एक पौराणिक कथा का स्वप्नलोक था। यह स्थिति कुछ वैसी ही थी, जैसी कि किसी लोककथा में वर्णित चुड़ैल की शारीरिक संरचना अर्थात पीठ की तरफ मुड़े हुए पैर के पंजे। (यह सरासर निर्दयता है। मुझे इस बात का शिद्दत से अहसास है। आखिर शुरुआत तो कहीं से होनी ही थी! प्रारंभ किसी न किसी को तो करना ही था! दादा साहेब फाल्के अगर दिलचस्पी नहीं लेते तो शायद भारत में सिनेमा-निर्माण में थोड़ा और समय भी लग सकता था।)

भारत में सिनेमा को यथार्थ से जुड़ने में दशकों लगे हैं। पहल बाबूराव पेंटर की तरफ से हुई थी। बाद में और भी कई लोगों ने भक्ति और भाग्य को ठेंगा दिखाया। पेंटर ने देश-दशा को केन्द्र में रखा। ज़रूरी भी था। जब देश गुलाम हो। जब जनता को शोषण की चक्की में अनाज की तरह पीसा जा रहा हो, वैसे हालात में भगवान की भक्ति से मुक्ति नहीं मिलती। वैसे सिर्फ भक्ति ही क्यों? बल्कि मुजरे की नींव भी तो आलम आरा के साथ ही पड़ी थी, जो बाद में परंपरा बन गई और फिर वक़्त के हिसाब से उसे नया नाम मिला- आइटम सांग। सिलसिला थमा नहीं है। सच तो यह है कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री अब तक अपना विशिष्ट ढब विकसित नहीं कर पाई है। यह पश्चिमी सिनेमा, पारसी रंगमंच और मेलोड्रामा का पंचमेल ही है। हालांकि प्रारंभ से ही बीच-बीच में कुछ अच्छी, अर्थपूर्ण और अपने ट्रीटमेंट में बिल्कुल अलहदा क़िस्म की फिल्में भी बनी हैं।

तकनीकी स्तर पर आज का सिनेमा, 20वीं सदी के प्रारंभिक दौर से सैंकड़ों मील आगे आ खड़ा हुआ है। कैमरे की क्वालिटी, साउंड क्वालिटी, ग्राफिक्स एफेक्ट, मेकअप के संसाधन और लाईट्स से लेकर फिल्म की एडिटिंग के लिए अत्याधुनिक टूल्स और सॉफ्टवेयर तक, सबकुछ बदल चुके हैं। तकनीकी स्तर पर छोटी से छोटी चूक भी अब लगभग नदारद है। लेकिन कंटेंट अर्थात कथ्य के स्तर पर पुरानी लकीर ही पीटी जा रही है, कुछेक अपवादों को छोड़कर। फिल्म शब्द जहन में आते ही आपके सामने ख़ुद-बख़ुद सिनेमाई रील की ही मानिंद नायक-नायिका, प्रेम-प्रणय, मिलन-विरह, तवायफ़, शोषक-खलनायक, जोगी-फ़कीर, मार-धाड़ और पुलिस; अपने-आप आपकी नज़रों के सामने नृत्य करने लगते हैं। अब यह सवाल तो वाजिब हो जाता है कि क्या सेल्यूलाइड का अर्थ सिर्फ ढिशुम-धड़ाम और ठुमका ही है? अगर हां, तो फिर इसे साहित्य क्यों स्वीकार करें?

अगर हम सिनेमा को साहित्य की विधा मानते हैं तो फिर उसका पर्सपेक्टिव भी वही होना चाहिए, जो किसी दूसरी साहित्यिक विधा का है या होता है। यानी वह सिर्फ प्रचार या सतही मनोरंजन का निमित्त नहीं हो सकता। वह महज चटख-चमकीली तस्वीरों का अर्थहीन कोलाज मात्र नहीं हो सकता, जिसको देखकर आप ठहाका मारें, हुल्लड़ मचाएँ। पुरुष हैं तो अभिनेत्री का अंग-विन्यास करें और स्त्री हैं तो नायक को सपनों का राजकुमार गर्दानें और मुस्कराते हुए घर को लौट आएँ। बल्कि अगर सिनेमा साहित्य की ही विधा है तो वह संदेश देगा। समाज, सियासत और संस्कृति के साथ-साथ आर्थिक मुद्दों पर जनहित के दृष्टिकोण को स्थापित करेगा। यदि सिनेमा ऐसा करने में अक्षम है तो उसे साहित्य की विधा के रूप में स्वीकार करने का कोई तुक नहीं बनता।

फिल्म के कंटेंट का मसला सिर्फ कसी हुई स्क्रिप्ट या कि बुराई पर अच्छाई की जीत, प्यार के लिए नायक अथवा नायिका का संघर्ष, भ्रष्ट आचरण वाले जन-प्रतिनिधियों या अधिकारियों को सबक़, राष्ट्रभक्ति का अतिरेक या सैनिकों का बलिदान जैसे रूढ़ हो चुके विषयों पर ही बार-बार थोड़े उलटफेर के साथ फिल्मांकन का नहीं है। बल्कि असली मसला दृष्टिकोण का है। राही मासूम रज़ा की भी यही चिंता थी कि आज भारत में बहुत से लोग यह समझते हैं कि हमारे समाज का जीवन राम मंदिर के बनने या न बनने पर आधारित है। मंदिर बना तो समाज है, न बना तो समाज नहीं है। बहुत से लोग यह समझते हैं कि बाबरी मस्जिद हमारे समाज के स्वास्थ्य और जीवन का प्रतीक है तथा कुछ लोग यह समझते हैं कि हमारा समाज राम मंदिर या बाबरी मस्जिद के बिना भी जिन्दा रह सकता है। मतलब यह कि राम मंदिर भी वहीं है और बाबरी मस्जिद भी वहीं है। अंतर सिर्फ दृष्टिकोण का है और वास्तव में सही दृष्टिकोण कला का आधार है। दृष्टिकोण के बिना कला की रचना संभव नहीं है। इसलिए सिनेमा बनाने वालों के पास भी एक दृष्टिकोण होना चाहिए।2

साठोत्तरी सिनेमा में दृष्टिकोण का अभाव बुरी तरह खटकता है। बहुत कम फिल्में कसौटी पर खरी उतर पाती हैं। छठे दशक तक सिनेमा व्यवसायिकता के दबाव के बावजूद दृष्टि-सम्पन्न रहा। देश-समाज से जुड़े मुद्दे केन्द्र में रहे। तभी तो 1946 में धरती के लाल और नीचा नगर जैसी फिल्में बनीं। इससे पहले 1937 में जातिवाद जैसी समस्या पर केन्द्रित अछूत कन्या प्रदर्शित हो चुकी थी। 1940 में मदर इंडिया, सन 1953 में परिणीता, 1955 में श्री 420, 1960 में मुग़ले आजम और 1963 में मुझे जीने दो जैसी फिल्में पर्दे पर आईं। अलग बात है कि जिस दौर को भारतीय सिनेमा का स्वर्ण-युग कहा जाता है, अर्थात सदी का छठा दशक, उस दौर में भी फिल्में अपनी पुरानी रुढ़ियों को नहीं छोड़ पाईं। किसानों-मजदूरों की समस्याओं और स्त्री-पुरुष संबंधों के सामंती ताने-बाने को उघाड़ने की मुकम्मल कोशिश तो उस दौर में नज़र आती है, लेकिन बात फिर वहीं यानी प्रभाव पर आकर अटक जाती है।

आज भी सिनेमा की पहुंच आम आदमी तक मुश्किल ही है। अब तो फिल्में भी मेट्रो में बसे शहरी मध्यवर्ग को केन्द्र में रखकर बनाई जा रही हैं। 20वीं सदी के छठे दशक तक तो छोटे शहरों में भी सिनेमा हॉल का होना बड़ी बात थी। मतलब यह कि जिस दौर में आम आदमी को केन्द्र में रखकर फिल्में बन रही थीं, वैचारिक स्तर पर दृष्टि-सम्पन्न लोग फिल्में बना रहे थे या जो अर्थपूर्ण फिल्में बन रही थीं, उसकी पहुंच उस वर्ग के दर्शकों तक थी ही नहीं। सिनेमा जिस वर्ग की पहुंच में था, वह मजदूरों-किसानों के संघर्ष को ठीक उन्हीं अर्थों में नहीं सहेज सकता था। लेकिन फिल्में चल रही थीं, सराहना भी हो रही थी।

अचरज की बात यह कि समाज का बुद्धिजीवी तबका भी इस हकीक़त से दूर ही रहा कि फ़िल्मों का दर्शक-वर्ग ग़रीब-मजदूर नहीं था। मजदूरों की एक छोटी आबादी जो माइग्रेट कर शहर आई थी, उसके पास भी न तो इतना समय था और न ही इतनी आमदनी कि वह फिल्म देखने के लिए मोहलत और रूपये जुटा सके। लेकिन हाँ, इस बात में सच्चाई है कि उस दौर में सार्थक फिल्में(गरम मसाला, 1972) बन रही थीं। फिल्मों के केन्द्र में गांव का ग़रीब किसान, शहरी मज़दूर और टूटते सामंती परिवेश के साथ ही समतामूलक समाज का स्वप्न भी था।

शोषण-मुक्त समतामूलक समाज का स्वप्न देखने वाले बुद्धिजीवियों को सिनेमा से ढेर सारी उम्मीदें थीं। तभी हरिशंकर परसाई यह लिख पाए कि एक मंत्री ने अभी कहा है कि यदि ग़रीबी और भूखमरी है तो इतने लोग सिनेमा क्यों देखते हैं? उन्हें नहीं मालूम कि भोजन से सिनेमा सस्ता पड़ता है। एक बार के साधारण भोजन में जितना लगता है, उससे आधे दाम में सिनेमा देखा जा सकता है। मन खुश होता है और तीन घंटे भूख भाग जाती है। एक आदमी खाना छोड़ कर सिनेमा क्यों न देखे?”3 दरअसल हरिशंकर परसाई महंगाई पर व्यंग्य कर रहे थे। उसके लिए उन्होंने रोटी के बरक्स सिनेमा को चुना। लेकिन वास्तविक यथार्थ यह नहीं था, क्योंकि पेट के बाद ही मनोरंजन की सूझती है। खाली पेट तो लोग भजन भी नहीं करते, फिल्में तो फिर भी दूर की कौड़ी थीं।

वैसे राही मासूम रज़ा भी स्वप्न की इसी ज़मीन पर खड़े होकर लोकप्रिय सिनेमा के पक्ष में दलील पेश करते हुए कहते हैं कि- सिनेमा वह मोर है जो जंगल में नहीं नाच सकता क्योंकि दर्शकों के बिना उसका कोई वजूद ही नहीं है। इसलिए आम आदमी से उसका सीधा संबंध है।4 लेकिन यह ज़मीन यथार्थ में बेहद भुरभुरी है। आम आदमी से सिनेमा का वास्तविक संबंध तो 8वें-9वें दशक बाद ही ढंग से बन पाया। और तब तक बड़ी होशियारी से भारतीय सिनेमा का कायांतरण किया जा चुका था। फिल्मों में अब या तो हीरो-हिरोइन के ठुमके थे, धूम-धड़ाका वाले संगीत थे, शादियाँ थीं, जीजा-साली की चुहलबाज़ियाँ और सेठ-साहूकारों, धन्नाओं की उदारताएं थीं।

मतलब साफ है कि जब आम आदमी की सिनेमा तक पहुंच बनी तब तक सिनेमा आम आदमी की बजाय यूरोप और अमेरिका में जा बसे एनआरआई की सांस्कृतिक कुंठा मिटाने का माध्यम बन चुका था। लिहाजा अब आम आदमी की फिल्म ठीक उस मुहावरे जैसी हो गई थी, जैसी कि आप अक्सर सरकारी विज्ञापनों के अंत में सुनते या लिखा देखते हैं- जनहित में जारी। जबकि जनहित का उस विज्ञापन से कोई लेना-देना नहीं होता।

बताने की ज़रूरत नहीं कि अब निर्देशकों और निर्माताओं का मक़सद स्वस्थ्य समाज का निर्माण नहीं रह गया। उनका काम सतही स्क्रिप्ट पर मसाला-मार्का(अनारकली डिस्को या शीला की जवानी टाईप) फिल्मों का निर्माण तक ही सीमित होकर रह गया। ऐसा नहीं है कि अब अच्छा लिखने वाले या कि अच्छा देखने वालों की कमी हो गई है। बल्कि सच तो यह है कि आज निर्देशक का क़द फिल्म के स्तर से बहुत छोटा हो गया है। इसीलिए सार्थक और अच्छी फिल्में बहुत कम बन पा रही हैं।5

ग्लोबलाईजेशन ने निर्माताओं की भूख बढ़ा दी है। उनकी नज़र अब भारतीय सिनेमा के ग्लोबल मार्केट पर है। जबकि हकीक़त यह है कि भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा की पहुंच से दूर ही है। अच्छी और सार्थक फिल्मों को आज भी दर्शकों का टोटा नहीं पड़ता। अगर सिर्फ दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, हम साथ-साथ हैं, साजन, विवाह और ऐसी ही दूसरी फिल्मों को दर्शक मिलते हैं तो फिर पिपली लाईव,चक्रव्यूह, तारे ज़मीन पर, पा या ऐसी ही दूसरी फिल्मों को कौन देखता है? इसलिए सिनेमा की वर्तमान दशा के लिए दर्शकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सिनेमा की सफलता सिर्फ पैसे में विसर्जित नहीं हो सकती। पैसा तभी तक हौवा बना रह सकता है जब तक हम रचना की निर्मिति के लिए मुहताज़ हों। जैसे ही हम गहरी जड़ों पर छोटी सी कुटिया खड़ी करते हैं तो राजमहलों को भी सिर झुकाकर देखना पड़ता है। अच्छी फिल्में तभी बन सकती हैं जब उनके प्रदर्शन की सुविधा उपलब्ध हो। आज यदि इक़बाल या डोर जैसी फिल्में सफल होती हैं तो मल्टिप्लेक्स संस्कृति की मेहरबानी से। आज इसी संस्कृति ने मात्र महानगरीय युवाओं को केन्द्रित कर कम बजट की फिल्में बनाने का ट्रेंड चलाया है। सिनेमा को कला और व्यवसायिक जैसे खानों में बाँटा ही नहीं जा सकता। फिल्म कोई भी बनाए, व्यवसाय उसकी मजबूरी है।6 लेकिन अगर मजबूरी आड़ बन जाए तो समस्या पैदा होती है। आधुनिक दौर में सिनेमा का यही संकट है।

क्या मदर इंडिया, मुग़ले आज़म, उमराव जान जैसी फिल्में कालातीत नहीं हैं? अगर हाँ, तो क्यों? जब आप फिल्म के कंटेंट और मैसेज पर ग़ौर करेंगे तो बात स्वतः स्पष्ट हो जाएगी। देश में शोषण, सामंती दौर में जिस स्तर का था, आज औद्योगिक युग में उसकी त्वरा घटने की बजाय बढ़ी ही है। स्त्री अगर कल पुरुष की सम्पत्ति थी तो आज भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं। फ़र्क़ यह पड़ा है कि अब विरोध के स्वर तेज़ हुए हैं। महंगाई-भ्रष्टाचार दोनों ने मिलकर आम आदमी की हालत पस्त कर रखी है। नैतिकता के मानदंड चकनाचूर हो रहे हैं। सत्ता अब अपने नग्न रूप में हमारे सामने है।

देश को भोग का रोग लग गया है। इसका शमन करने की बजाय सिनेमा उसे और फैला-भड़का रहा है। गुरू जैसी फिल्में जो कि बेहद ख़तरनाक हैं, को भारी सफलता मिल रही है। रावण जैसी फिल्में जो शक्तिपूजा की मृत परंपरा को ढो रहे समाज पर पुनर्विचार का दबाव बनाती हैं, नकार दी जाती हैं। आप इसे समस्या का साधारणीकरण करार दे सकते हैं। लेकिन यह महज साधारणीकरण नहीं है। दर्शक को तो आप जो परोसेंगे, वह उसी के आलोक में अपनी धारणा बनाएगा। सिनेमा का दर्शक, सिनेमा से बिल्कुल अनभिज्ञ है। यह और बात है कि वह स्वीकार और अस्वीकार के अपने व्यक्तिगत मानदंडों की कसौटी पर सिनेमा को स्वीकार एवं अस्वीकार करता रहता है।7 वैसे भी जब फिल्म समीक्षक ईमानदारी नहीं बरत रहे। रूपया या बाज़ार के दबाव में विज्ञापन-मार्का समीक्षाएँ लिखी जा रही हैं, तो दर्शकों का भ्रमित हो जाना अचरज की बात नहीं।

सिनेमा के मामले में 20वीं सदी का 9वाँ-10वाँ दशक बेहद कमज़ोर रहा है। इस बावत ऊपर चर्चा की जा चुकी है। 21वीं सदी की शुरुआत कुछ उम्मीदें लेकर आई है। नक्सल, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शोषण, स्त्री-स्वाधीनता जैसे मुद्दों की तरफ, एक बार फिर निर्देशकों-निर्माताओं का ध्यान गया है। एक तरफ चक्रव्यूह’, ‘आरक्षण, गंगाजल, हल्ला बोल जैसी फिल्में बनी हैं तो दूसरी तरफ रावण, थ्री-इडियट,मुन्ना भाई एमबीबीएसया फिर धोबीघाट जैसी फिल्में भी बनी हैं। अच्छी बात यह भी है कि अब आइटम सॉन्ग में बार-बालाओं के ठुमके की जगह जनहित से जुड़े मुद्दों को फिल्माया जाने लगा है।

भारतीय सिनेमा अपने प्रारंभ से लेकर अब तक, न तो कभी बिल्कुल ही स्याह रहा है और न ही बिल्कुल सफ़ेद। लेकिन हाँ, भारतीय सिनेमा बहुत कम ही मौकों पर अपने वक़्त की आवाज़ बन पाया है। पहला कारण तो सिनेमा तक आम आदमी की पहुंच का न होना ही है। जबकि दूसरा कारण निर्माता-निर्देशकों का दृष्टिकोण है। जब जनता फिल्मों को समझने के क़ाबिल हुई तो कहानी ही बदल दी गई। जब आम आदमी यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर दो बूंद पानी के तड़प रहा था, तब रजतपट पर चुनरवाली भींग रही थी। जब मजदूरों की रोटी हड़पी जा रही थी, ठीक उसी वक्त उन्हीं मजदूरों का मालिक सिल्वर स्क्रीन पर दानी-दाता के रूप में खड़ा मुस्करा रहा था। जब देश नरसंहारों की गिरफ्त में था, तब सिनेमा शादी-समारोहों पर केन्द्रित था। जब सड़कों पर, स्कूल-कॉलेज से लेकर कार्यस्थल तक पर औरतें और लड़कियाँ छेड़खानी और बलात्कार की शिकार हो रही थीं, तब फिल्मों का नायक, हिरोईन के नितंब पर गुलेल से निशाना साध रहा था।

सबसे बुरी हालत तो भट्ट कैंप ने की है। गीत के बोल इतने प्यारे और दिल को छूने वाले कि आप डूबे बिना, गुनगुनाए बिना रह न सकें। आँखें बंद कर अगर आप उन गीतों को सुनें तो रूहानी सुकून मिलेगी। लेकिन जैसे ही आपकी नज़र खुलेगी तो सामने नायक-नायिका एक-दूसरे को भंभोर खाने को उतावले नज़र आएंगे। यह भावों की जघन्य हत्या है। फिल्मों ने प्रेम को जिस्म और कुंठित भंगिमा-वाली यौन-पिपासा की तृप्ति तक ही सीमित करने की कुचेष्टा की है। इस पर सोचने की ज़रूरत है कि आख़िर फिल्में अपने वक़्त यानी यथार्थ से मुँह क्यों चुराने लगी हैं? क्या पूँजी का दबाव है? क्या भोगवादी दृष्टिकोण से ही फिल्में निर्देशित हो रही हैं? क्या फिल्मों में जिन शक्तियों का पैसा लग रहा है, या लगा है, वह नहीं चाहते कि फिल्मों में जन-जीवन से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को उठाया जाए? क्या उन्हें सचमुच ये लगता है कि सिनेमा का दर्शक जागरुक हो चुका है और अब उन्हें उकसाना उनके हित में ठीक नहीं है? सिनेमा की पहुँच के विस्तार के साथ ही कंटेंट का संकुचन और यथार्थ से परे महज मनोरंजन और अर्थहीन रोमांच पर फोकस का कारण जनता को वास्तविकता से दूर करना तो नहीं? अगर हाँ, तो फिर राही मासूम रज़ा के दावे के ठीक विपरीत हमारा यह दावा है कि भारतीय सिनेमा वह मोर है जो अपने प्रारंभ से ही कुछेक अपवादों को छोड़ जंगल में ही नाचता रहा है और उसके दृश्य-संवाद संबंध भी संदिग्ध ही रहे हैं।

संदर्भ-
1.      ख़ालिद जावेद, मौत की किताब, अर्शिया पब्लिकेशन, पृ. सं. 58.
2.      राही मासूम रज़ा, सिनेमा और संस्कृति, पृ. सं. 23-24.
3.      परसाई रचनावली, भाग-3, अन्न की मौत, राजकमल प्र., पृ. सं. 92.
4.     राही मासूम रज़ा, सिनेमा और संस्कृति, पृ. स. 26.
5.     राही मासूम रज़ा, सिनेमा और संस्कृति, पृ. सं. 25.
6.    प्रह्लाद अग्रवाल, बाज़ार के बाजीगर, राजकमल प्र. प्र.सं.    2007, पृ.सं. 165.
        7.    राही मासूम रज़ा, सिनेमा और संस्कृति, पृ. सं. 23

1 comment:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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