Sunday, December 28, 2014

यही है हमारा लोकतंत्र (राष्ट्रपिता को समर्पित, क्योंकि उम्मीदें कभी मरती नहीं।)

कुछ लोग हिन्दुओं को जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश हिन्दुओं का था
कुछ लोग मुसलमानों को जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश मुसलमानों का था
कुछ लोग राजे-रजवाड़ों का जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश राजाओं का था
कुछ लोग दलितों-वंचितों को जगा रहे थे
उनका सोचना था कि देश दलितों-वंचितों का था

सभी टुकड़ों में जनता को जगा रहे थे
और जनता थी कि सोई पड़ी थी
कोई कुनमुनाता तो कोई बड़बड़ाता

Tuesday, November 25, 2014

दिन की गवाही दर्ज़ नहीं होती

दिन तो दिन ही होते हैं
वही सात जो लौट-लौट आते हैं
कभी कोई दिन मनहूस नहीं होता
कैलेंडर पर दर्ज़ तारीख़ें बदलती हैं
उन्हें तीन सौ पैंसठ दिन पूरे करने होते हैं
दिन तो वही सात जो लौट-लौट आते हैं
तारीखों से इसीलिए होड़ नहीं लेते दिन
इसलिए तारीख़ों से अक्सर मेल नहीं खाते दिन

तवारीख़ में तारीखें दर्ज़ होती हैं
इसलिए लोगों को रहती हैं याद
सभी को याद है अम्बेडकर का निर्वाण
सभी को याद है बाबरी मस्जिद का ध्वंस
सभी को याद रहेगा मंडेला का देहावसान
लेकिन क्या सभी को याद हैं या रहेंगे वो दिन
किस वार को हुआ था अंबेडकर का परिनिर्वाण?

Friday, November 21, 2014

दुखी मत होना मेरे भाई

दुखी मत हो! मेरे वर्दी वाले भाई!
क्या हुआ जो तेरी बंदूक से निकली गोली
मेरी निर्जीव सी पसलियों में उतर गई तो?

दुखी मत हो! मेरे बंदूक वाले भाई!
क्या हुआ जो तेरे नेज़े की धार ने फाड़ दिए
हफ्तों से अन्नहीन-रसहीन मेरे खाली पेट!

दुखी मत हो! मेरे टोपी वाले भाई!
तुमने व्यवस्था बनाए रखने की शपथ ली
और मेरा नंगा सिर खंडित हो गया तो क्या!

दुखी मत हो! मेरे प्यारे भाई!
तुमने सचमुच कुछ नहीं किया है मेरे साथ
बंदूक तुम्हारी नहीं थी, वर्दी तुम्हारी नहीं थी
नेज़े की धार या लाल फुदने वाली टोपी भी तो
तुम्हारी नहीं थी... जब हाथ ही तुम्हारे नहीं थे

Monday, September 29, 2014

नयी कहानीः लघुता में विराट का प्रक्षेपण और अमरकांत

हिन्दी कहानी उपदेश की हवेली से आदर्शवाद की डोली पर सवार होकर यथार्थ के धरातल पर उतरी। रूसी क्रांति के प्रभावस्वरूप प्रगतिशील चेतना ने उपदेश और आदर्श की महत्ता को थोड़ा कम किया। लेकिन यथार्थ का दबाव कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया। उपदेश-भाव की साँसें तो बहुत पहले ही उखड़ गई थीं, लेकिन आदर्श और यथार्थ के बीच रस्साकशी आज तक चली आती है। सच तो ये है कि दोनों ही अपने एकल-वास्तविक रूप में जन-मानस का प्रतिबिम्ब नहीं बन सके। प्रगतिवाद निरे-यथार्थवाद का पोषक था। आदर्शवाद के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। न तो यथार्थ की उपेक्षा की जा सकती थी और न ही आदर्शों की वायवीयता से समाज और साहित्य का भला हो सकता था। 20वीं सदी का चौथा-पाँचवां दशक न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक और वैचारिकता के स्तर पर भी उथल-पुथल से भरा था। स्वतंत्रता के लिए जब तक संघर्ष चलता रहा, तब तक आज़ादी का स्वप्न और सबकुछ के सुंदरतम हो जाने की उम्मीद बची रही। लेकिन आज़ादी के बाद अचानक मोहभंग ने सुंदर-स्वप्नों के हवा-महल को धराशायी कर दिया। फणिश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय, जैनेन्द्र, यशपाल, धूमिल, मुक्तिबोध आदि, सभी मोहभंग के शिकार हुए। वैसे मोहभंग की कथा तो बाद में शुरू होती है, उससे पहले ही मार्क्सवाद और गाँधीवाद के ज़ेरे-असर, प्रेमचंद एक नयी लीक बना चुके थे, जिसका नाम था- आदर्शोन्मुख यथार्थवाद। लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से भी अपना दामन छुड़ा लिया था। उनकी कहानी सांकेतिकता का अवलम्ब ग्रहण कर रही थी। कफ़न इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप की साहित्यिक-धारा में उत्पन्न विक्षोभ की परानुभूति ने भी हिन्दी की साहित्य-धारा को कम परेशान नहीं किया। भाषा हिन्दी ही थी। पात्रों के नाम भी हिन्दुस्तानी थे। लेकिन अनुभूतियाँ, कथा-विन्यास और घटनाक्रम पाठकों के स्वानुभूत सामाजिक-सत्य से कोसों दूर। साहित्य की यह अजनबीयत बेचैन करने वाली थी। इसी बेचैनी से नयी कहानीऔर नयी कविता की धारा फूटी। नयी कहानी ने जहाँ अपनी सहजता के कारण लोकप्रियता का नया मापदंड गढ़ा, वहीं नयी कविता’ ‘ब्रह्मराक्षस बन गई।

Saturday, June 28, 2014

धम्म-विजय

चाय की केतली से उठती भाप से उसे ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के बाद उसने सेवा प्रारंभ की। सेवा से शक्ति मिली और वह मसीहा बना। पौराणिक परंपरा का अनुपालन करते हुए उसने भी स्त्री को विष की बेल स्वीकार किया। पत्नी का त्याग करने के बाद उसने आधुनिकता का परिचय देते हुए ब्रेकअप पार्टी की। उपस्थित अनुयायियों के अनुरोध पर सोमरस का पान किया। सोमरस के प्रभाव में ही उसने विधर्मियों के समूल नाश का आह्वान किया। अनुयायियों ने भक्तिभाव से उसका अनुपालन किया। जब मसीहा की चेतना लौटी तो उसे ज्ञात हुआ कि देवों में उसके इस कृत्य से आक्रोश है और सभी निंदा में व्यस्त हैं। मसीहा रुष्ट हुआ और अनुयायियों की सभा बुलाई-
मसीहा- आप सभी मेरे कृतित्व और व्यक्तित्व से परिचित हैं। आप ही बताएँ कि मैंने कुछ अनुचित किया?
अनुयायी- नहीं... कदापि नहीं। आपने तो वही किया जो अब से पहले देवतागण किया करते थे।
मसीहा- तो फिर देवताओं के आक्रोश और विरोध का कारण क्या है?
अनुयायी- केवल कुंठा..। वस्तुतः यह देवों का कार्य-क्षेत्र था, आपका कृत्य उसका अतिक्रमण है।
मसीहा- लेकिन मैंने तो धर्म-रक्षा का ही आह्वान किया था, इसमें ऐसा अप्रिय क्या था?
अनुयायी- अगर मसीहा भी देवों का कार्य करने लगे तो देवों का मूल्य कहां रह पाएगा?
मसीहा-(कुछ क्षण चिंतामग्न रहने के पश्चात)... तो अब समस्या का समाधान क्या है?
अनुयायी- नरमेध के बाद अश्वमेध की परंपरा रही है... आप अविलंब अश्वमेध यज्ञ की युक्ति करें।
मसीहा- उचित है... सर्वथा उचित। लेकिन यदि देवताओं ने पुनः आपत्ति की तो...
अनुयायी- यह भी परंपरागत ही होगा... आप चिंता न करें। देवों का दोहरा चरित्र अब गोपन नहीं रहा।
मसीहा- तो आज इस धर्म-सभा में मैं आपका मसीहा स्वयं को अहिंसक घोषित करता हूँ।
अनुयायी-(समवेत्) साधो-साधो... जय हो, जय हो... धम्म-विजय, धम्म-विजय..


मगध की जनता कालाशोक वाले युग से बहुत पहले ही मुक्त हो चुकी थी। चंडाशोक का दृश्य भी अधिक समय तक नहीं टिक सका। प्रियदर्शी को अब सभी जानते हैं। अभी से प्रस्तर मूर्तियों के निर्माण की योजनाएँ बनने लगी हैं। मसीहा ने अंगवस्त्रों का रंग परिवर्तित कर लिया है। पिपली वृक्ष के नीचे शांति है। पत्ते पीले पड़ गए हैं। देवताओं के विरोध का स्वर भी मंद पड़ने लगा है। नये अवतार को मान्यता मिलनी प्रारंभ हो गई है। मगध को अब शीघ्र ही पवित्र होना होगा। नगरवधू को आइटम सौंग के लिए आमंत्रित किया गया है। मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था में अनुयायी जुटे हैं। मसीहा मृगचर्म पर ध्यान-योग में निमग्न हो गया है।

Thursday, June 12, 2014

ब्रेन-वॉश

(हरिगंधा के अप्रेैल-मई 2014 में प्रकाशित लघुकथा)


महारथी.., तुमने तो कमाल कर दिया! वातावरण से कटु सवालों के तमाम कीटाणु तुमने पलक झपकते ही साफ कर दिए। हमारे चिंताओं का पूर्णतः लोप हो गया है। अब कहीं से भी विरोधी स्वर सुनाई नहीं देते।

प्रजा वत्सल, यह सब तो आपकी बौद्धिक सोच और मार्गदर्शन का ही परिणाम है। हमने तो केवल उसका पालन किया है।

नहीं-नहीं महारथी.., तुम तो हमारे सबसे योग्य दरबारी हो। तुम से पहले, मैंने कई दरबारियों को प्रजा के मस्तिष्क को साफ करने का निर्देश दिया था। लेकिन वे असफल रहे। प्रजा उन सवालों का ज़ोर-ज़ोर से जाप करने लगी थी। लेकिन अब देखो, बिल्कुल शांति है।

Saturday, June 7, 2014

नक़ाब

(हरिगंधा के अप्रेैल-मई 2014 में प्रकाशित लघुकथा)

अदब- ज़रा ये तो बताना... तुम नक़ाब क्यों लगाती हो?
अदीबा- बस यूँ ही... अच्छा लगता है। ख़ुद को सेक्योर फील करती हूँ।
अदब- तो क्या वो तमाम लड़कियाँ इनसेक्योर होती हैं, जो नक़ाब नहीं लगातीं?
अदीबा- नहीं... ऐसा मैंने कब कहा?
अदब- तुम्हारी बातों से तो ऐसा ही लगा...

Thursday, May 22, 2014

जन-आंदोलनः अर्थ, निहितार्थ और मीडिया

2004 में एक तेलुगु फिल्म आई थी। फिल्म का नाम था मास। फिल्म के नायक थे- अक्कीनेनी नागार्जुन। पटकथा और निर्देशन राघव लॉरेंस का था। कहानी का नायक अनाथ था। अनाथ तो बेनाम बादशाह में अनिल कपूर भी था। वैसे अनिल कपूर की ही एक और फिल्म है- नायक। 2001 में आई, ये फिल्म मास-मूवमेंट की वास्तविक झांकी प्रस्तुत करती है। बल्कि अन्ना आंदोलन से उभरे अरविंद केजरीवाल में, भारत के युवा मानस ने उसी नायक शिवाजी की छवि देखी थी। नायक फिल्म का नायक भी तो भ्रष्टाचार और अपराध से ही निराश और नाराज़ था। उसने मुख्यमंत्री को इसी मुद्दे पर घेरा था। परिस्थितियों ने उसे एक दिन का मुख्यमंत्री बनाया। फिर मीडिया ने, इस कैमरामैन से रिपोर्टर और रिपोर्टर से एक दिन का मुख्यमंत्री बने शिवाजी को इतना लोकप्रिय बना दिया कि भ्रष्टाचार, अत्याचार, जातिवाद और तमाम तरह से त्रस्त जनता ने उसको अपना उद्धारक मान लिया। शिवाजी जबरन पॉलिटिक्स में घसीट लिया गया। इन सबके बावजूद मैं बॉलीवुड की बजाय टॉलीवुड की फिल्म को तरजीह दे रहा हूँ तो इसका कारण सिर्फ फिल्म का नाम ही है। ख़ैर, फिल्म का नाम दरअसल नायक के नाम पर आधारित है। यानी नागार्जुन ने इस फिल्म में जिस किरदार को जिया है, वो मास है। गुंडों की धुनाई के समय ही सही, लेकिन नायक ने मासकी परिभाषा देने की कोशिश की है। मास की प्रेमिका ने भी हाथ नचा-नचाकर, भौंहें चढ़ा-चढ़ाकर और शब्दों को चबा-चबाकर मास की ख़ूबियों का बखान किया है। लेकिन मैं उस परिभाषा से संतुष्ट नहीं हूँ। साहित्य में वीरगाथा काल को बहुत पहले ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने न सिर्फ चिन्हित कर दिया था, बल्कि उसके अवसान को भी रेखांकित कर दिया था। और अब तो बहुत हद तक फिल्मी वीरगाथा काल का भी बॉलीवुड से लोप होने को है। इसलिए मास की टॉलीवुडीय परिभाषा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। लिहाजा मास मूवमेंट और मास मीडिया के अंतर्संबंधों की पड़ताल के लिए अभी मैं जिस सतही प्रस्थान बिन्दु पर हूँ, वहाँ से इस गंभीर विषय की गरिमा को बरकरार रखना संभव नहीं है। लिहाजा मास मूवमेंट शब्द का वास्तविक अर्थ और जन-आंदोलन के संदर्भ में इसके इस्तेमाल के कारणों की पड़ताल का रास्ता ज्यादा सटीक जान पड़ता है।

Tuesday, May 6, 2014

विभ्रम के धुंधलके में सच की तलाश

हां, जीतता कौन है? शुद्ध लाभ किसे होता है? शुद्ध लाभ मतलब अर्थ लाभ, पद्लाभ, प्रतिष्ठा लाभ, सम्मान लाभ या कोई और लाभ? परिभाषाएँ भोथरी हैं। किस रास्ते पर चलोगे तो मंजिल मिलेगी? सोच लो कहीं वही मंजिल न हो, जहां से यात्रा शुरू की हो? और कहीं चलनेवाला ही मंजिल हुआ तो? ...सोचने के कई तरीके, पहलू, अन्दाज़, ढंग और आज़ादी न होती तो कुछ न होता।

कैसी आगी लगाई उपन्यास का कथा नायक साज़िद अपने सपनों और क्रांतिवादिता की रोमांचक दुनिया से बेदखली एवं यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर धराशायी होने के बाद पराजय-बोध से मुक्ति के लिए जो तर्क ढूंढता है, वह यही है। यहां कोई ठोस हल, पहल या उत्तर नहीं है। सिर्फ अनुत्तरित प्रश्न हैं और आश्चर्यजनक रूप से द्वंद्वपूर्ण साधु-भाव है। सपनों की राजधानी दिल्ली से विरक्ति और इससे नफ़रत की पराकाष्ठा है- मैं तुमसे पक्का और सच्चा वादा करता हूँ। क़सम खाता हूँ... कि दिल्ली कभी नहीं लौटूँगा... मतलब रहने या काम करने...
...
इस शहर पर थूक दो।

Tuesday, April 15, 2014

अविश्वसनीय दौर में विश्वसनीयता का सवाल

अब तो ज़माना बदल रहा है। ख़ास तौर से शहरों में माँ-बाप अपने बच्चों की पसंद को तरजीह देने लगे हैं। लव कम अरेंज मैरेज का चलन है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी शादी का परंपरागत तौर-तरीक़ा ही स्थापित है। ऐसी शादियाँ बिना अगुआ के मुमकिन नहीं हुआ करतीं। अगुआ की भूमिका को समझने का सबसे आसान तरीक़ा तो यही है कि आप किसी मवेशी मेले में जाएँ और वहाँ गाय-भैंस या बैल की बिक्री में जुटे दलाल की बातें सुनें। जैसी बातें वहाँ पर होती हैं, कमोबेश वैसे ही संवाद अगुआ के मुँह से निर्झर की तरह उस वक़्त झड़ते हैं, जब वह किसी विवाह योग्य वर अथवा वधू के बारे में संबंधित पक्ष को बता रहा होता है। अगुआ की छवि कैसी होती है? इसको जानने के लिए लोकगीतों पर भी ग़ौर किया जा सकता है। अगुआ से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा लोकगीत आपको मिले, जिसमें उसकी प्रशंसा की गई हो या धन्यवाद दिया गया हो!

Wednesday, March 12, 2014

चर्नलिज़्म के चारण

एक क्विज हो जाए? ज्यादा भारी-भरकम नहीं है। बस एक ही शब्द है, जिसका आपको अर्थ बताना है। चर्नलिज्मशब्द सुना है आपने? जर्नलिज्म का सहोदर जैसा लगता है- है भी। हाँ, फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि जैसे ही हम चर्नलिज्म का इस्तेमाल करते हैं, जर्नलिज्म की आभा थोड़ी मलिन हो जाया करती है। वैसे ये टर्म भले नया हो, प्रवृत्ति नई नहीं है। और तो और इसका रूप भी नहीं बदला है। जबकि संचार क्रांति ने बहुत कुछ बदल दिया है। आपको भी मालूम है। दोहराने की आवश्यकता नहीं। हम उस दौर से बहुत आगे आ चुके हैं, जब न्यूज़ रूम का देवता टेली-प्रिंटर हुआ करता था। जब उसकी कचर-कचर-कच जैसी आवाज़ न्यूज़रूम की पहचान हुआ करती थी। ये आवाज़ न्यूज़रूम में टेबुल के चारों तरफ़ कुर्सियों पर बैठे कॉपी एडिटर्स के लिए अलार्मिंग साउंड की हैसियत रखती थी।

Wednesday, February 19, 2014

उम्मीद(अप्रैल-जून, 2014) में प्रकाशित तीन कविताएँ

आवरण- शिरीष कुमार मौर्य

दुःस्वप्नों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती

रुदालियों अपने-अपने घर जाओ
यहाँ अब रूदन का कोई अर्थ नहीं
दधीचियों हो सके तो वापस ले लो
अपनी अस्थियाँ कि अब ज़रूरत नहीं
मेरे शूरवीर क्रांतिकारियों तंबू उखाड़ो
कुमुक बंद होने वाला है और युद्ध स्थगित
न्याय-न्याय रटना बंद करो भाई युधिष्ठिर
कोई और काम नहीं है क्या?

आँसुओं ने धुँधला दी है संजय की आँख
अब तो बख़्श दो इसको युग के धृतराष्ट्र
न वो कर सकता है कुछ और न ही तुम
फिर क्यों कर रहे हो समय बर्बाद?

Thursday, February 13, 2014

पूँजी की पीठ पर मीडिया नाच

कुछ शब्द ऐसे हैं जो आजकल हर आम-ओ-ख़ास की ज़ुबान पर तकियाक़लाम की तरह चढ़े बैठे हैं और किसी भी सूरत में उतरने को तैयार नहीं हैं। हमें इन शब्दों से कोई आपत्ति भी नहीं है और न ही हमारी ऐसी कोई चाहत है कि लोग इसे अपनी ज़ुबान से उतार दें। उत्तर आधुनिक परिदृश्य में इन शब्दों से छुटकारा संभव है भी नहीं। आप भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे कि प्रत्येक युग की अपनी अलग भाषा और विमर्श-प्रणाली होती है। समय के अनुकूल शब्दों के अर्थ तो बदलते ही हैं, नये शब्दों का जन्म भी होता है और कुछ पुराने शब्दों की डेंटिंग-पेंटिंग भी की जाती है, ताकि वे नये अर्थ-संदर्भों का भार वहन कर सकें। ऐसे ही कुछ पारिभाषिक शब्द हैं- ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण), लिबरलाइजेशन (उदारीकरण), डेमोक्रेटाइजेशन (लोकतांत्रीकरण), इंडस्ट्रियलाइजेशन (उद्योगीकरण), कैपिटलिज्म (पूँजीवाद), कन्ज्यूमरिज़्म (उपभोक्तावाद) आदि। वैसे कुछ शब्दों में नियोअथवा नव उपसर्ग लगाकर भी उनका नवीकरण किया गया है, ताकि प्रवृत्तिगत बदलाव को रेखांकित किया जा सके। आप ग़ौर करेंगे तो पाएँगे कि कोई भी विमर्श इन शब्दों के बिना अधूरा है। यहाँ पर इन शब्दों का ज़िक्र रस्मी तौर पर नहीं किया गया है, बल्कि जिस विषय पर हम बात करना चाहते हैं, उसका इन शब्दों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध ज़रूर है। वैसे भी जीवन-जगत का प्रत्येक क्रिया-व्यापार एक-दूसरे से जुड़ा होता है और किसी एक में बदलाव का प्रभाव शेष पर पड़ना स्वभाविक है।

Thursday, January 23, 2014

सोशल मीडिया के साइड इफेक्ट्स

हम भारत के लोग थोड़ा अलग क़िस्म के जीव हैं। चुप हों तो ऐसे कि गूँगा भी ख़ुशफ़हमी पालने लगे। बोलने पर आ जाएँ तो इतना बोलें कि सिर चकराने लगे। सहने की हद तो इतनी कि सदियों तक ग़ुलामी की जंज़ीर को ज़ेवर ही समझते रहे। अत्याचारियों को देवता बनाकर पूजते रहे। ...और अगर विरोध का ख़ब्त सवार हो तो मुद्दे की परवाह किए बग़ैर नारा बुलंद करने लगें। वैसे अभी एक साल पहले तक मुझे भी इस ख़ूबी का इल्म नहीं था। ‘जनलोकपाल’ को लेकर अन्ना आंदोलन के बाद से नौबत ये है कि जनता मौक़ा ढूँढती रहती है। हालांकि 16 दिसंबर 2012 की लोमहर्षक घटना और उसके बाद दिल्ली के जंतर मंतर को तहरीर स्क्वॉयर में तब्दील कर देने वाला उतावलापन, फिर कभी नज़र नहीं आया। लेकिन “मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना” और निर्भया कांड के बाद वाला तख़्ता-पलट जोश, सड़क से सिमटते-सिमटते घर के अंदर पड़े कम्प्यूटर सिस्टम में जज़्ब हो गया। अनुभव की कमी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सनसनी मास्टर्स अर्थात नौटंकीबाज़ एंकर्स और उनकी आक्रामक शैली ने दूर कर दी और तब से सोशल मीडिया, जो पहले अभिव्यक्ति और संवाद-सेतु का काम कर रहा था, क्रांति-केन्द्र के रूप में स्थापित हो गया। शालीनता और संवाद के लिए यहाँ भी स्पेस लगातार सिकुड़ता ही जा रहा है। अब तो हालत ये है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने भस्मासुर का रूप धारण कर लिया है और दुर्भाग्य ये है कि फिलहाल परिदृश्य से शिव ग़ायब हैं। हाल की कई घटनाओं ने न सिर्फ चौंकाया है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इसकी आड़ में गुट बनाकर व्यक्ति-विशेष अथवा दल-विशेष के ख़िलाफ़ अथवा पक्ष में जनमत को प्रभावित करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते नये क़िस्म की सामाजिक चिंता को भी जन्म दे दिया है। यानी कई घटनाओं ने सोशल साइट्स की उपादेयता को तो साबित किया है, लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स भी अब सतह पर आने लगे हैं।

Tuesday, January 14, 2014

सबकुछ है धुआँ-धुआँ

कुछ दिनों पहले ख़ालिद जावेद का उपन्यास मौत की किताब पढ़ रहा था। उपन्यास में एक जगह कथा-नायक अपनी ज़िन्दगी के अनुभव को कुछ यूँ बयान करता है- मैं हमेशा एक ऐसी फिल्म देखता रहा, जिसके हर-एक मंज़र से उसका डायलॉग थोड़ा आगे या पीछे होता है। आवाज़ उसके साथ फिट नहीं होती। आवाज़ हर मंज़र को मुँह चिढ़ाती, फिल्म के फ़्रेम में बहती रहती है।1 भारतीय सिनेमा के संदर्भ में यह उक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है।

Wednesday, January 1, 2014

अनफ़ेयर होता सोशल स्फीयर

हम जिस युग में जी रहे हैं, वह अत्याधुनिक सूचना-तकनीकों से लैस है। चिट्ठी-पत्री, लिफाफा-पोस्टकार्ड का ज़माना काफी पीछे छूट गया है। सार्वजनिक टेलीफोन-बूथों की परंपरा भी दम तोड़ने की कगार पर आ पहुँची है। अब गाँवों के लोग भी मोबाइल फोन से ही संवाद-सम्प्रेषण को तरजीह देने लगे हैं। सूचना और मनोरंजन का एकमात्र सहारा दूरदर्शन और उसके लोकप्रिय प्रोग्राम संध्या समाचार और चित्रहार की जवानी को ढले भी अरसा बीत गया। गाँवों में अब अधिकांश घरों की छत पर डीटीएच की छतरी आकाश को मुँह चिढ़ाती है। बिजली की समस्या है, लेकिन कोई बात नहीं। सम्पन्न घरों के पिछवाड़े में जेनसेट पड़ा है। जिन घरों और घरानों के प्रति लक्ष्मी अभी अधिक उदार नहीं हो सकी हैं, वैसे घरों में इनवर्टर, बैट्रा और चार्जिंग उपकरणों ने इस कमी को पूरा कर दिया है। शहरों में तो फिर भी एफएम ने रेडियो की लाज बचा रखी है, लेकिन गाँवों के लोगों ने इसका फिलहाल बायकॉट कर रखा है। केवल दूरदर्शन और डीडी न्यूज़ देखने की बाध्यता ख़त्म हो चुकी है और लोग आराम से मन-मुताबिक ढाई-तीन सौ चैनलों के जंगल में भटकते रहते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि उदारीकरण की सहेली सूचना-क्रांति ने हमारी परंपरागत जीवन-संस्कृति को बदल दिया है और बदलाव की प्रक्रिया अभी जारी है। गाँव के वैसे युवा जो बमुश्किल दस्तख़त करने की दक्षता रखते हैं, उनके पास भी मोबाइल है। मोबाइल में इंटरनेट है और फेसबुक है।

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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...