Tuesday, November 12, 2013

नज़रिए की बात है

संचार क्रांति के बाद मीडिया और बाज़ार का संबंध और प्रगाढ हुआ है। दोनों की गलबहियाँ के साइड इफेक्ट्स ही नहीं, बल्कि फायदों से भी आप बख़ूबी वाक़िफ़ हैं। पहला फ़ायदा तो यही कि हिन्दी रोज़गार की भाषा के रूप में स्थापित हुई। ग्रामीण क्षेत्रों के सुविधा-विहीन छात्रों की मजबूरी और कॉलेज-यूनिवर्सिटी के उपेक्षित विभाग के रूप में चिन्हित एक ऐसी भाषा, जो मेधा के मामले में पिछड़े छात्रों की अंतिम शरण-स्थली हुआ करती थी, अब अँग्रेज़ी स्कूल से पास-आउट छात्रों की भी मजबूरी बन गई। लोग अँग्रेज़ी का तड़का लगाकर ही सही, हिन्दी लिखने और बोलने को बाध्य हुए। ऐसा, लोगों के हिन्दी-भाषा से रागात्मक संबंधों के कारण कम, बाज़ार के दबाव के कारण ज़्यादा हुआ है।

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