Thursday, September 19, 2013

हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती

ये जो टीवी पर अपने चैनल का बूम थामे, बाँहें चढ़ाए, बड़ी-बड़ी बातें करता हुआ शख़्स आपको नज़र आता है। जो तमाम घटनाओं की बारीकियों से आपको रू-ब-रू करवाता है। जो सरकार की नीतियों की धज्जियाँ पूरे आत्म-विश्वास के साथ उड़ाता है। वही, जिसके किसी थाने या दफ़्तर में पहुँचते ही पुलिस और कर्मचारी मुस्तैद नज़र आने लगते हैं, थोड़ी घबराहट के शिकार भी हो जाया करते हैं। जो कभी स्टूडियो में बैठा, किसी राज्य के मंत्री की जिम्मेदारी तय करता दिखता है। जो तमाम छोटी-बड़ी घटनाओं पर एक्सपर्ट कमेंट देने में बिल्कुल भी झिझक महसूस नहीं करता। वही, जो मजदूरों की हड़ताल या बंद के दौरान उनकी समस्याओं की बजाय देश और कम्पनी की अर्थ-व्यवस्था को होने वाले नुकसान को लेकर ज्यादा चिंतित नज़र आता है। जो बंद के दौरान स्टूडियो में बैठे रहने के बावजूद यात्रियों से ज़्यादा परेशानी महसूस करता है और बंद का आह्वान करने वालों को कठघरे में खड़ा करता है। जो सड़कों पर बरसात के मौसम में होने वाले वक़्ती जल-जमाव को भी सरकार के निकम्मेपन की निशानी क़रार देता है। जो राजनीति से लेकर विदेश नीति और क्रिकेट से लेकर केट विंसलेट तक के बारे में तमाम छोटी-बड़ी जानकारी रखता है।
आप भी इनके कारनामों से इतने प्रभावित होते हैं कि कई बार अपनी समस्या लेकर सरकारी दफ्तर या अधिकारी के पास जाने की बजाय, सीधे इन्हीं के पास चले आते हैं। लेकिन जब ख़ुद पर संकट आता है तो ये बिल्कुल गूँगा हो जाता है। इसकी आवाज़ इसी के गले में घुटकर दम तोड़ जाती है। तब ये बिल्कुल असहाय और सबसे अधिक शोषित और उपेक्षित नज़र आता है। आप भले ही इसे मीडियाकर्मी मानें, हम तो मजदूर ही मानते हैं। ये ज्ञान-गुण के अथाह सागर, दरअसल रोटी के मरीज़ होते हैं और उसी के लिए इतना सबकुछ करते हैं।

आप चाहे जो समझें, लेकिन यह सच है कि मजदूर समाजसेवी नहीं हो सकता। मजदूर अगर कुछ हो सकता है तो वह मजदूर ही हो सकता है। मजदूर कुछ कर सकता है तो वह मजदूरी ही कर सकता है। मजदूरों के न तो अधिकार होते हैं और न ही विशेषाधिकार। मजदूर की इतनी हैसियत कभी नहीं हो सकती कि वह विरोध कर सके। वह न सिर्फ ग़ैर-ज़रूरी सरकारी नीतियाँ, बल्कि अपने नियोक्ताओं की मनमानी शर्तें भी ढोता है। मसला पेट का है। मसला रोटी का है, जिसके बदले उसे सिर्फ कर्तव्यों की फ़ेहरिश्त थमाई जाती है। अधिकार मालिकान के पास संरक्षित रहते हैं। सामान्य स्थितियों में उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह ख़ुद ही उस फ़ेहरिश्त पर नज़र रखे और उसी के अनुकूल आचरण करे।

मजदूर चूँकि नौकर ही होता है, लिहाजा वह मालिक के किसी भी फ़ैसले के ख़िलाफ़ उँगली नहीं उठा सकता। नारा बुलंद करना तो दूर की बात है। जिस तरह लोकतांत्रिक देश में रहना और लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंग होना; दोनों बिल्कुल अलग-अलग स्थितियाँ हैं। ठीक उसी तरह, मजदूर होना और मजदूर नेता होना भी एक ही बात नहीं है। इसलिए मजदूर संगठनों के नाम गिनाने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। वैसे भी उत्तरोत्तर विकसित होते भारत में, मजदूर संगठनों का उत्तरोत्तर पतन भी हमें इस बात की इजाज़त नहीं देता। मारूति के मानेसर प्लांट में कर्मचारियों की छंटनी और उनके अथक संघर्षों का परिणाम,  सबकुछ हमारे सामने है।

उदारीकरण के इस दौर में सरकारें उदार तो हुई हैं, लेकिन यह उदारता जनता या मजदूरों के लिए नहीं है। बल्कि यह उदारता कम्पनियों और उसके मालिकों के लिए है। सरकारी उदारता के साये में उपलब्धियों की ऊँची छलांग लगाने वाली कम्पनियाँ, उनके मैनेजमेंट और मालिकान पहले से ज़्यादा अनुदार हुए हैं। जब कभी कथित मंदी का शोर बरपा होता है, कॉस्ट कटिंग के नाम पर मजदूरों की बलि का सहज मार्ग ढूंढ लिया जाता है। कोई ज़रूरी नहीं कि कर्मचारियों की छंटनी करने वाली कम्पनियाँ घाटे में ही हों, बल्कि अब तो लाभांश में गिरावट को भी अकाट्य तर्क के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। टीवी 18 मैनेजमेंट ने तीन सौ से ज़्यादा मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। भारतीय मीडिया के इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी छंटनी है। हाँ, उदारता ये रही कि तीन-तीन महीने का वेतन क्षतिपूर्ति के रूप में दे दिया गया। यह उदारता भी अकारण नहीं है। मक़सद यह है कि नौकरी गंवाने वाले कर्मचारी, कम्पनी के इस अनुग्रह के एवज़ में चुप्पी साध लेंगे। और यही हो भी रहा है। छंटनी के शिकार लोग, छंटनी के ख़िलाफ़ संघर्ष में शामिल नहीं हैं। इसका वाजिब और सबसे बड़ा कारण तो यही है कि यह मीडिया ग्रुप, आधुनिक भारत के सबसे बड़े व्यापारी मुकेश अंबानी का है। जिस अंबानी के ख़िलाफ़ सरकार नहीं बोलती। जिस अंबानी के ख़िलाफ अख़बार या मीडिया नहीं बोलता। जिस अंबानी के ख़िलाफ़ बोलने पर किसी पार्टी की छवि रातों-रात बिगड़ जाती है। जिस अंबानी का दावा है कि सरकारें उसकी जेब में रहती हैं। और सबसे बड़ी बात कि जिस अंबानी का ज़्यादातर मीडिया-घरानों से गहरा याराना है या फिर उनके व्यापार में साझेदारी है, उस अंबानी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने का सीधा परिणाम होगा- भविष्य की बची-खुची संभावनाओं का भी गला घोंट देना। इसलिए अन्याय के शिकार मीडियाकर्मी घर के कोने में दुबक कर रो तो सकते हैं, रोड पर नारे नहीं लगा सकते।

वॉयस ऑफ इंडिया का शटर डाउन एपिसोड काफी चर्चित रहा था। उसके शिकार बहुत से पत्रकार आज भी सड़क पर भटक रहे हैं। इसके बाद सीएनईबी और फिर महुआ का यूपी चैनल बंद हुआ। काफी हो-हंगामे और धरना-प्रदर्शन के बाद भी नौकरी तो नहीं बची, हाँ, कुछ महीने के लिए रसद का बंदोबस्त ज़रूर हो गया। छंटनी जैसे क़दम तो आए दिन उठाए जा रहे हैं। सौ-पचास कर्मचारियों की छंटनी, बड़ी घटना नहीं होती। और अक्सर ऐसी घटनाओं को कर्मियों की अयोग्यता से जोड़ दिया जाता है, लिहाजा शोर भी नहीं हो पाता। वैसे बड़े पैमाने पर छंटनी भी ख़बर तो नहीं ही बन सकती, क्योंकि खबरिया चैनल के पत्रकार की ख़बर कौन दिखाएगा? यहाँ तो चोर-चोर मौसेरे भाई वाली स्थिति है। वो तो भला हो न्यू मीडिया का, जिसकी मदद से आजकल मेन-स्ट्रीम मीडिया में सेंसर्ड कर दी गई ख़बरें भी आम-लोगों तक पहुँच जाती हैं।

ख़ैर, उदार अर्थ-व्यवस्था को इतनी छूट तो मिलनी ही चाहिए। देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में पहुँचाने का महती दायित्व भी तो इन्हीं औद्योगिक घरानों पर है। वैसे भी भारत जैसे सघन-जनसंख्या वाले लोकतांत्रिक मुल्क में मजदूरों की कोई कमी नहीं है, लिहाजा उनकी चिंता में समय नष्ट करने की ज़रूरत ही क्या है? रही मीडिया मजदूरों की दयनीय दशा और अस्थिर करियर का मसला तो इसको लेकर सरकार ने वॉयस ऑफ इंडिया के बंद होने के बाद ही फुलप्रूफ प्लान तैयार किया था और प्रधानमंत्री ने उसको हरी झंडी भी दे दी थी। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने न्यूज़ चैनल्स के बंद होने और नये चैनलों के लिए लाइसेंस माँगने वालों की बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए अक्टूबर 2011 में नयी नीति लागू कर दी थी। नई नीति के तहत न्यूज़ चैनल के लिए तीन की बजाय बीस करोड़ रूपये के एसेट्स अर्थात नेट वर्थ क्राइटेरिया को अनिवार्य कर दिया गया था। दर्जनों राष्ट्रीय और क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल्स के बंद होने के बावजूद अभी देश में करीब चार सौ न्यूज़ चैनल्स ऑन एयर हैं। लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र नये चैनल्स की होड़ भी नज़र आ रही है। अभी मंत्रालय के पास न्यूज़ चैनल्स के लिए 80 आवेदन हैं। मतलब साफ़ है कि नेट वर्थ क्राइटेरिया में गगनचुंबी उछाल का भी कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा है।

दो-तीन मीडिया हाउस छोड़ दिए जाएँ तो ज़्यादातर चैनल्स के मालिक या तो धन-कुबेर हैं, या फिर बिल्डर और चिटफंड कम्पनियों के मालिक। मीडिया-व्यवसाय मुनाफे की दृष्टि से भले ही कमज़ोर हो, लेकिन सियासी रसूख़ और सिस्टम पर धौंस जमाकर काम निकलवाने के लिहाज से खरा सोना है। काले धन पर सफ़ेदी की लेप चढ़ाने में भी इससे बहुत सुविधा होती है। सरकारी नीतियों को अपने हित में ढलवाने या बदलवाने के लिए भी मीडिया का प्रेशर-सिस्टम के रूप में उद्योगपतियों द्वारा इस्तेमाल अब नई बात नहीं रही। यानी संकट में मीडिया हाउस या इनके मालिकान नहीं, संकट में मीडियाकर्मी रहे हैं। जबकि दुर्भाग्य से सरकार का ध्यान इनकी तरफ़ कभी नहीं रहा। अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के 17वें अधिवेशन में बतौर चीफ़ गेस्ट, भारत के उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने माना था कि गैर-मीडिया घरानों के प्रवेश से मीडिया की कार्यशैली पर बुरा असर पड़ा है। वे पत्रकारों की नौकरी को लेकर भी चिंतित थे और उन्होंने माना था कि इनकी नौकरियों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है। अंसारी ने एक ऐसे मीडिया काउंसिल के निर्माण की सलाह भी दी थी, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी शामिल किया जाए। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के वर्तमान चेयरमैन मार्कंडेय काटजू और पूर्व अध्यक्ष पी वी सावंत भी यही बात दोहराते रहे हैं। लेकिन नतीज़ा वही ढाक के तीन पात।

आइडियाज़ अथवा विचारों की कमी नहीं है। समस्या इन पर अमल की है। बिगड़ैल सांडों की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को रौंदने वाले उद्योगपतियों ने बड़ी चालाकी से मीडिया को भी अपना चारागाह बना लिया है। अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लिया है। 2011 की नयी मीडिया नीति भी इन्हीं के हित-पोषण के लिए बनी थी। यानी न्यूज़ चैनल्स पर भी बड़ी मछलियों के एकाधिकार का मार्ग तो प्रशस्त कर दिया गया, लेकिन मीडियाकर्मियों का हित हमेशा की तरह अनदेखी का शिकार हो गया। उप-राष्ट्रपति के विचार से अगर केन्द्र सरकार सहमत होती तो 20 करोड़ के एसेट्स की अनिवार्यता वाला बिल कभी नहीं लाती। रही मीडिया काउंसिल के निर्माण की बात तो दशकों से अस्तित्व-लाभ कर रहे प्रेस काउंसिल से पत्रकारों को ऐसा कौन सा लाभ मिला है, जिसके आलोक में मीडिया काउंसिल की स्थापना से बदलाव की उम्मीद रखी जाए? मीडियाकर्मियों को नौकरी की गारंटी कौन देगा? प्रेशर-ग्रुप की हैसियत से मीडिया-घरानों ने ही सरकारों की नकेल कस रखी है, अब इनकी नकेल कौन कसे? बिल्ली के गले में घंटी बांधी जानी चाहिए, इस मुद्दे पर सभी चूहे सहमत हैं। लेकिन जैसे ही सवाल यह उठता है कि आखिर बाँधे कौन, तो लोग अचानक महामौन धारण कर लेते हैं।

मीडिया इंडस्ट्री(प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक) कंटेंट के नाम पर पोर्नोग्राफी परोस सकती है। नैतिकता के मानदंडों को ठेंगा दिखा सकती है। पेड न्यूज़ का काला कारोबार कर सकती है। अपनी लक्ष्मण रेखा फलांग सकती है। मीडियाकर्मियों को न्यूनतम से भी कम वेतन पर काम को मजबूर कर सकती है। उन्हें मनमर्ज़ी से जब चाहे तब बाहर का रास्ता दिखा सकती है। उनके श्रम का ही नहीं, बल्कि मानसिक शोषण भी कर सकती है। लेकिन इन मनमानियों और अनैतिक लालसाओं पर जैसे ही अंकुश की बात होगी, वैसे ही मीडिया और प्रेस की स्वायत्ता और स्वतंत्रता ख़तरे में पड़ जाती है। कमाल की स्वतंत्रता है! अचरज की बात तो ये भी है कि ऐसे मामलों में मानवीय स्तर पर बेहद संवेदनशील माने जाने वाले हमारे संपादकों का झुंड बीईए या ऐसा ही कोई संगठन खड़ा कर, सेल्फ रेगुलेशन की आड़ में पुराना कारोबार जारी रख सकता है। लेकिन मीडिया मजदूरों के हित की बात आते ही इनकी ज़ुबान तालू से चिपक जाती है और ये बिल्कुल निरीह बन जाते हैं।

केन्द्र सरकार ने कई साल पहले प्रेस-कर्मियों का न्यूनतम वेतन तय करने के लिए मजीठिया वेज बोर्ड का गठन किया था। वेज बोर्ड की जब रिपोर्ट आई और इनके वेतन में अस्सी से सौ फीसदी तक बढोतरी की सिफारिश की गई तो प्रेस की स्वतंत्रा पर अचानक हमला हो गया। सिफारिशों को लागू करने से पहले ही मालिकान सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए और स्टे ले लिया। तब से तारीख़ पर तारीख़ का पुराना नाटक दुहराया जा रहा है। फैसला अगस्त में आना था, लेकिन अब सितंबर तक के लिए टाल दिया गया है। मालिकों का दावा है कि इससे पत्रकारों की क़लम स्वाधीन नहीं रह पाएगी। चूँकि पत्रकारों की सैलरी का निर्धारण सरकार करेगी, इसलिए वे सरकार के ख़िलाफ़ निर्भीक होकर नहीं लिख पाएँगे। बात हास्यास्पद है या नहीं? सरकार तो सिर्फ वेतन निर्धारित करती, वेतन तो कम्पनी को ही देना था। ऐसे में पत्रकारों की क़लम सरकार के हाथों गिरवी कैसे हो जाती? अगर प्रेस मालिकों की यह दलील सही है तो क्या यह मान लिया जाए कि पत्रकारों की क़लम उनके मालिकान के हाथों गिरवी ही है? फिर पत्रकारों की निर्भीकता और स्वतंत्रता कहाँ बची? कहने की ज़रूरत नहीं कि जैसे ही मीडिया मुग़लों के हितों पर आँच आती है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्षता ख़तरे में पड़ जाती है। मैं नहीं मानता कि बीईए जैसी संस्थाओं के शीर्ष पद पर बैठे संपादक, केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण विभाग और उसके मंत्री या फिर प्रेस काउंसिल के कर्ताधर्ता चाह-कर भी कुछ नहीं कर सकते। बल्कि सच ये है कि वे ऐसा करना ही नहीं चाहते। या अगर करना चाहते भी हैं तो मीडिया मुग़लों के आगे इनकी हैसियत कौड़ी के तीन से ज़्यादा की नहीं है। अगर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू होतीं तो मीडियाकर्मियों के लिए भी उम्मीदों के द्वार खुलते।

अभी टीवी 18 ग्रुप के मजदूर-विरोधी रवैये के ख़िलाफ़ सख़्ती के बजाय सूचना एवं प्रसारण मंत्री मीडियाकर्मियों का स्तर तय करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वो चाहते हैं कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की तर्ज़ पर संयुक्त प्रवेश परीक्षा का आयोजन हो, इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वालों को लाइसेंस दिया जाए। वर्तमान परिस्थिति में तो इस बयान को हँसुआ के ब्याह में खुरपी का गीत ही माना जाएगा। फिर भी प्रसारण मंत्रालय संयुक्त प्रवेश परीक्षा और लाइसेंस प्रणाली लागू करने के साथ अगर नौकरी और वाजिब वेतन की गारंटी देने को भी तैयार हो, तो किसी भी मीडियाकर्मी को ऐतराज़ नहीं होगा। लेकिन नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। सरकार और संपादक सभी जानते हैं कि मीडियाकर्मियों के स्तर में गड़बड़ी नहीं है। चैनल चलाने वालों की नीयत में गड़बड़ी है। सरकार के इरादों में खोट है। यह दावा अपने-आप में धोखाधड़ी है कि जिस व्यक्ति का चयन लिखित और मौखिक परीक्षा के आधार पर किया गया, जो कई सालों से संस्थान में काम करता रहा, अचानक से अयोग्य हो गया और उसे निकाल दिया गया। प्रसारण मंत्रालय और मीडिया इंडस्ट्री पहले योग्य-अयोग्य का पैमाना ही क्यों नहीं तय कर लेती?

मीडियाकर्मियों की दयनीय दशा के लिए न्यूज़ चैनल्स की बाढ़ और जन-पक्षधरता की बजाय व्यवसायिक हितों पर अतिशय ज़ोर देने की प्रवृत्ति भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। न्यू मीडिया का भी कुछ हद तक असर पड़ा है। साल 2000 तक टीवी चैनल्स के लिए विज्ञापन दर जहाँ अस्सी हज़ार रूपये प्रति दस सेकेंड हुआ करती थी, वहीं अब यह अपने न्यूनतम स्तर यानी दो हज़ार रूपये प्रति दस सेकेंड तक आ पहुँची है। बड़ी बात यह भी है कि इस दौरान न्यूज़ चैनलों के लागत में इजाफ़ा हुआ है, जबकि आमदनी क्रमशः घटती गई है। जबकि प्रोपेगेंडा सेटिंग और अपने आकाओं के हित में न्यूज़ क्रिएट करने की प्रवृत्ति के साथ ही लागत कम करने के चक्कर में बेमतलब की बहसों से एफपीसी रंगने के कारण, बड़ा दर्शक वर्ग अब न्यू मीडिया की तरफ़ आकर्षित हो रहा है। रही-सही कसर दूरसंचार नियमन प्राधिकरण अर्थात ट्राई के ताज़ा आदेश ने पूरी कर दी है। नये आदेश के तहत अब न्यूज़ चैनल्स एक घंटे के प्रोग्राम में अधिकतम 12 मिनट का विज्ञापन ही दिखा सकते हैं। दो विज्ञापन-सत्रों के बीच भी कम से कम 15 मिनट का अंतराल अनिवार्य होगा। अभी न्यूज़ चैनल्स पर प्रसारित कंटेंट में विज्ञापनों का औसत तकरीबन पैंतीस फीसदी है। मीडिया-घरानों के हाय-तौबा के बीच करीब-करीब यह तय है कि ट्राई के नये आदेश पर अमल नहीं होगा। लेकिन अगर ऐसा हुआ तो सैंकड़ों और मीडियाकर्मी रोड पर आ जाएंगे।

मसला योग्यता का नहीं, जॉब सिक्योरिटी का है। श्रम के अनुकूल वेतन का है। लेकिन मीडिया मजदूर इसके लिए वाजिब दबाव बना पाने की स्थिति में कभी नहीं रहे। बाक़ी तमाम क्षेत्रों में नाम को ही सही, यूनियन तो हैं। जबकि मीडिया इंडस्ट्री में संगठन की जो संभावना थी, उसकी प्रारंभ में ही भ्रूण हत्या कर दी गई थी। यानी इस मामले में मीडिया मजदूर और दिहाड़ी मजदूर की स्थिति एक जैसी है। दोनों ही असंगठित हैं। मीडियाकर्मी पहले तो श्रम-शोषण की चक्की में पिसते हैं। मालिकान और संपादकों के इशारों पर न चाहते हुए भी, कई धत्कर्मों में शरीक होते हैं और अंततः चाय में गिरी मक्खी की तरह निकाल फेंके जाते हैं। कवि अनुज लुगुन के शब्दों में कहें तो-
हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती।
हमारी मौत पर
शोकगीत की धुनें सुनाई नहीं देंगी
हमारी मौत से कहीं कोई अवकाश नहीं होगा
अख़बारी परिचर्चाओं से बाहर
हमारी अर्थी पर केवल सफ़ेद चादर होगी।

1 comment:

  1. बहुत संजीदगी से और ज्वलंत मुद्दा उठाया है |

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