Friday, April 26, 2013

विरासत की बेदखली, --विश्वनाथ त्रिपाठी



यह चाहे जितना भी खेदजनक हो, लेकिन यह कहने का समय आ गया है कि कम से कम कथा साहित्य में, हिन्दी में लिखने वाले मुसलमान लेखकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे या हैं। मैं जान-बूझकर पुरस्कार या सम्मान की बात नहीं करना चाहता, क्योंकि यह कोई मानदंड नहीं है। लेकिन उपेक्षा हुई है। इसके क्या कारण रहे हैं, उसकी पड़ताल या छानबीन का यह अवसर नहीं है। लेकिन उपन्यास पर बात करते समय मैं इस तथ्य की तरफ इशारा जरूरी समझता हूँ। बहुत दिनों से यह सवाल मेरे मन में बना हुआ है और इसका कोई स्पष्ट कारण मुझे समझ में नहीं आता। सामान्यतः हिन्दी साहित्य का जो माहौल है, वह बिल्कुल साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि यह सम्प्रदाय विरोधी है। फिर भी ऐसा क्यों होता है या हो रहा है? यह मैं नहीं जानता।
मैं जब अपने समय में लिखे गए हिन्दी उपन्यासों की फेहरिस्त पर नजर डालता हूँ, तो मुझे उनमें शानी का काला जल, अब्दुल्ला बिस्मिल्लाह का झीनी-झीनी बीनी चदरिया, असग़र वजाहत का सात आसमान, मंजूर एहतशाम का सूखा बरगद और बदीउज्जमा का एक चूहे की मौत उच्च कोटि की रचनाएं नज़र आती हैं। इन मुस्लिम उपन्यासकारों के बारे में एक और बात मैं कहना चाहता हूँ या यूँ कहिए कि मेरा दिमाग बार-बार उधर जाता है। वह है इनकी भाषा। और भाषा के विषय में जो बात मैं कहना चाहता हूँ, वह कथा से अधिक स्पष्ट रूप से कविता में नज़र आती है। हिन्दी कविता और उर्दू कविता में एक बड़ा फर्क यह है कि उर्दू कवि... कविता लिखते समय, वाक्य गठन का बहुत ध्यान रखते हैं। उनके जुमले दुरूस्त होते हैं। गहरी से गहरी और ऊंची से ऊंची बात, वह खड़ी बोली के वाक्य विन्यास में कह देते हैं। हालांकि यह बात नई नहीं है। यह पहले भी कही जा चुकी है। अपनी भाषा और वाक्य विन्यास के कारण ही उर्दू कविता समझ में ज्यादा आती है और इसीलिए वह लोकग्राही भी ज्यादा है।

अगर मैं आपसे कहूँ कि बिना उच्च कोटि के गद्य के, उच्च कोटि की कविता नहीं लिखी जा सकती तो आप शायद ताज्जुब में पड़ जाएंगे। लेकिन अगर आप असहमत होंगे, तो मैं यह कहूँगा कि खड़ी बोली में इसके प्रतिमान गालिब हैं। ग़ालिब, खड़ी बोली गद्य और खड़ी बोली पद्य, दोनों के प्रतिमान हैं। खड़ी बोली में गालिब का जो गद्य है, वह 19 वीं शताब्दी का गद्य है। जिसके बारे में डॉक्टर रामविलास शर्मा ने अपनी 1857 वाली किताब में लिखा है कि वह यूरोप में फ्रेंच भाषा के गद्य से भी बेहतर गद्य है। 19वीं शताब्दी के गद्य और पद्य को साथ-साथ रखकर सोचने के बाद, मैं कहना चाहता हूँ कि शानी, असग़र वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, बदीउज्जमा और मंजूर एहतशाम जैसे मुस्लिम गद्य लेखकों या उपन्यासकारों की रचनाओं को पढ़ते हुए, पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि 19वीं शताब्दी के खड़ी बोली गद्य का विकास और उसका संबंध इनके गद्य से है। यह कैसे है और क्यों है? इसके बारे में मैं ज्यादा नहीं कह सकता। लेकिन सही या गलत, मेरे मन में यह बात बसी हुई है। मुझे खड़ी बोली गद्य के मामले में, हिन्दू और मुस्लिम गद्यकारों में फ़र्क दिखाई पड़ता है। यह बात मैं किसी साम्प्रदायिक भावना से नहीं कह रहा हूँ। मुझे यह बात पारंपरिक तौर पर दिखाई पड़ती है।

अब जहां तक सात आसमान उपन्यास के गद्य एवं भाषा का सवाल है तो यह उपन्यास दास्तानगोई की एक अनूठी मिसाल है। बहुत आंतरिक तौर पर यह हिन्दी क्षेत्र की जातीय परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह एक मुस्लिम परिवार की कथा है। शिया मुसलमान के परिवार की कथा है। लेकिन इसका कथा-विन्यास, इसकी लय, इसका गद्य और घटनाएं.., राही मासूम रज़ा के उपन्यास आधा गांव से एकदम अलग हैं। यहां तटस्थता अधिक है। उपन्यास का कथावाचक या कथा-नायक अपने पिता के पक्षपात को भी छुपाने की कोशिश नहीं करता। वह स्वीकार करता है कि उसके पिता अपनी जिम्मेदारी का काम करते वक्त इस बात का ख्याल रखते थे कि फायदा मुसलमानों को ही मिले। मुसलमानों में भी शिया मुसलमानों को वह ज्यादा तरजीह देते थे। सच तो यह है कि जिस तरह से उपन्यास के लेखक की विचारधारा बिल्कुल खुली हुई है, ठीक वैसे ही उपन्यास के पात्र, कथाएं और घटनाएं भी खुली हुई हैं।

एक बात और, वह यह कि इधर नारी चेतना, दलित चेतना और आंचलिक चेतना को केन्द्र में रखकर बहुत से उपन्यास लिखे गए हैं। (मैं जान-बूझ कर इनसे मैला आंचल को अलग रख रहा हूँ।) अभी हाल ही में खनन क्षेत्रों में होने वाले अत्याचार और वहां की जीवन दशा पर केन्द्रित महुआ माजी का उपन्यास मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ चर्चित रहा है। (इलियास अहमद गद्दी का फायर एरिया भी खनन क्षेत्र पर केन्द्रित चर्चित उपन्यास है।) ये उपन्यास अच्छे हैं। मशहूर भी हुए हैं। लेकिन मुझे इन उपन्यासों के सम्बंध में विचार करते हुए दिक्कत होती है, क्योंकि इन उपन्यासों में कथात्मक बिखराव नहीं है। जबकि एक उपन्यास की औपन्यासिकता के लिए यह जरूरी है कि उसके कथानक और शिल्प में बिखराव हो। उपन्यास की कथा में या उसके कहन में और उसके रचना-संयोजन में फैलाव होना चाहिए.., बिखराव होना चाहिए। जबकि नारी या दलित चेतना पर लिखे गए उपन्यास या फिर खनन क्षेत्र को केन्द्र में रख कर लिखे गए उपन्यासों में यह बिखराव नज़र नहीं आता। जैसे ही आप किसी चीज को फोकस करते हैं और उसको केन्द्र बनाते हैं तो आप शुरू में ही उपन्यास से, उसके औपन्यासिक बिखराव को अलग कर देते हैं। जब आप एक ही चीज़ को ध्यान में रखकर उपन्यास लिखेंगे तो कथानक में, कथा में, घटना-परियोजना में बिखराव नहीं आ पाएगा। (वैसे यह बात सिर्फ उपन्यास पर ही नहीं, बल्कि कहानी पर भी उतनी ही लागू होती है।) उपन्यास में जो फ्यूजन होना चाहिए, जो बिखराव होना चाहिए, वह इनमें कहीं दिखाई नहीं पड़ता। जबकि सात आसमान और झीनी-झीनी बीनी चदरिया जैसे उपन्यासों में यह फ्यूजन, यह बिखराव है। सात आसमान पढ़ते वक्त, यह नहीं लगता कि यह किसी शिया मुसलमान के पूर्वजों की कथा है। या कि एक मुसलमान परिवार की कथा है। बल्कि यह एक संस्कृति युग के अंत की पीड़ा-कथा है।

प्रेमचंद के उपन्यास ज्यादातर पूरबिया प्रदेश अर्थात पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं। उनके पात्र और कथानक भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही हैं, लेकिन उनमें बिखराव है। उन्हें आंचलिक नहीं कहा जा सकता। प्रेमचंद के उपन्यासों में फ्यूज़न यानी बिखराव विद्यमान है। सेवा सदन की कथा-भूमि कहने को तो जेवर है, लेकिन उपन्यास पढ़ते वक्त आपको ऐसा कहीं भी नहीं लगता कि उपन्यास जेवर पर लिखा गया है या कि यह महज नारी चेतना का उपन्यास है। यही बात सात आसमान पर भी लागू होती है। यह मुस्लिम परिवार की कथा होते हुए भी... एक शिया परिवार की कथा होते हुए भी, उस अर्थ में क्षेत्रीय या उस अर्थ में किसी चीज को फोकस्ड उपन्यास नहीं है।

सात आसमान कथा और शिल्प की दृष्टि से निहायत सुगठित उपन्यास है। यहां शिल्प में एक खास किस्म का जादू नज़र आता है और यह इस उपन्यास की विशेषता है। पूरी कथा में एक अजीब आंतरिक गठन है। उपन्यास का प्रारंभ एक कुँएं के पानी से होता है। कुएँ का पानी बहुत मीठा है और ऐसा कहा जाता है कि जो भी उस कुएँ का पानी एक बार पी लेता है, वह फिर कहीं नहीं जाता, वहीं का होकर रह जाता है। सीधी-साधी सुस्त रफ्तार सैंकड़ों सालों के थपेड़ों को सहती हजारों तब्दीलियों को हज़म करती, अपनी ही तरंग में बहती वह जिन्दगी किसी भी साँचे में ढलने से इंकार कर देती है। वह उस कुएँ की तरह है, जिसका पानी जिसने भी पी लिया, वहीं का हो गया। कितने ही लोग आए थे कुछ दिनों के लिए, लेकिन उस कुएँ का पानी पी लिया और पसर गए। ज़िन्दगी बिता दी और कहने लगे- भइया इस कुएँ का पानी ही ऐसा है। यह किसी मध्यकालीन रोमांचक कथा का जादुई कुआँ नहीं है। यह जादू नहीं है, यह ज़िन्दगी का प्रतीक है। बाहरी दुनिया से इस सामंती दुनिया का सरोकार बहुत कम है। यह अपने आप में ठहरी, पसरी और पूर्ण है। कुआँ यहां आत्मतुष्ट सामंती वातावरण का बिल्कुल सटीक प्रतीक है। उपन्यास के अंत में भी इस कुएँ का ज़िक्र आता है। जब सामंती दुनिया टूटती है, वंश बिखर जाता है, तब कुएँ के पानी का जादूई असर भी खत्म हो जाता है। अब कुएँ का पानी सूखने लगता है। जादू टूटने लगता है। कुएँ का पानी पीनेवाले भी, कुएँ से दूर चले जाते हैं। इस लिहाज से यह एक जीवन-व्यवस्था के समाप्त हो जाने की कहानी है। यह खात्मा द्वंद्वात्मक है। यहां कुएँ का पानी एक संस्कृति के खिले होने और उसके क्रमशः मुरझाते जाने का प्रतीक बन जाता है। एक अजीब तरीके का आंतरिक गठन इस पूरे उपन्यास में है।

उपन्यास में जितने चरित्र हैं, सभी अपने-अपने ढंग और ढब के बिल्कुल अलग हैं। यह जितने रोचक हैं, उतने ही वास्तविक भी हैं। कथानक-विकास के दौरान प्रसंगवश मिर्जा ग़ालिब भी आते हैं। यहां मिर्ज़ा ग़ालिब का काइयांपन भी उजागर होता है। यह बताने की जरूरत नहीं कि ग़ालिब महान गद्यकार और कवि थे। आले अहमद सरूर साहब ने कहा है कि गालिब में जीवन के प्रति लालसा और जो चीज़ अच्छी लगे, उसको पाने के लिए कुछ भी करने की ललक थी। इस उपन्यास में भी ग़ालिब पूरे खुलेपन के साथ आते हैं।

उपन्यास के कथानक में जो भटकाव या बिखराव है, वह इसकी जान है। कथावाचक अपने पूर्वजों की कथा कह रहा है। बड़ी बात यह कि उपन्यास में पात्र अथवा परिवार के किसी भी ऐब को छुपाने की कोशिश नहीं की गई है। कहने में भी तथ्याग्रह और निर्ममता है। आर्थिक-सामाजिक गिरावट को पूरी निष्पक्षता से दर्ज करने की कोशिश साफ़ नजर आती है। पूरी सामंती व्यवस्था धीरे-धीरे गिरती है और क्या से क्या हो जाता है। वही सामंती अकड़ और स्वाभिमान, जो एक जमाने में सिर पर सोने के मुकुट की तरह चमचमाता था, वह धीरे-धीरे चिरकुट में तब्दील हो जाता है और उस चिरकुटई में भी जो अकड़ है, वो कितनी यातनाप्रद है, उसका अंदाज़ा इस उपन्यास को पढ़ कर लगाया जा सकता है। यह सिर्फ यातनाप्रद ही नहीं, हास्यास्पद भी है। बल्कि यूँ कहें कि यह यातनाप्रद भी है और नई पीढ़ी के लिए सबक़ भी। जिस तरह हमारे मन में महान मुगल साम्राज्य के पतन के प्रति यातना पैदा होती है। उसी तरह एक परिवार के पतन से भी करुण गाथा पैदा होती है। यह असग़र वजाहत के क़लम का जादू ही है कि पूरे उपन्यास में कहीं भी स्यापा, रोना-पीटना, भावुकता या अतिरंजना नहीं है। उनमें लेखकीय तटस्थता है। यही उनकी पहचान भी है।

सात आसमान असग़र वजाहत के अपने पूर्वजों और परिवार की ही करुण गाथा है। फिर भी वह तटस्थ है। वह खुद कथा में रस ले-लेकर, कथा कहता है। यह कोई मामूली बात नहीं है। कभी किस्सागो, कभी व्यंग्य-विनोदकार तो कभी इतिहासकार बन कर वह पूरी तन्मयता के साथ कथानक को विस्तार देता है। मैं इस उपन्यास का प्रशंसक इसीलिए हूँ कि मुझे यह उपन्यास, अपने दौर के सभी उपन्यासों से अलग और स्वाभाविक लगता है। उपन्यास पढ़ते वक्त न सिर्फ मनोरंजन होता है, बल्कि रोना भी आता है।

सात आसमान में वर्णित करुण-गाथा से ही जुड़ी एक और बात। मेरी पीढ़ी, असग़र वजाहत से पहले की पीढ़ी है। लेकिन यह बात जितनी मेरी पीढ़ी पर लागू होती है, उतनी ही असग़र की पीढ़ी पर भी लागू होती है। विकास के लिए पुरानी पीढ़ी और परंपरा से पार्थक्य जरूरी था। वर्तमानता... विकास की अनिवार्यता थी। और इसी विकास की यातना-भूमि से असगर वजाहत ने अपने पूर्वजों की कथा कही है। सात आसमान की कहन इस यातना से स्पन्दित है। वह अतीत की गौरवगाथा नहीं, गौरवगाथा का वर्णन तो छल है। हम सभी ने विकसित होने का अपराध किया है। हम अपने मां-बाप को छोड़कर, अपनी भाषा को छोड़कर, अपनी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन, जिन्दगी की क़द्रें और अपनी आदतें छोड़कर, हम बड़ी-बड़ी नौकरी के चक्कर में अपने गांव रूपी कारागार से निकल कर शहर आ गए।

हिन्दुस्तान में अजनबीयत और एलियनेशन का सबसे बड़ा कारण भी संयुक्त परिवार का टूटना ही है। हमारे मां-बाप, भाई-मित्र, पूर्वज जो शहर नहीं आ पाए, गांव में रह गए। वह आर्थिक एवं समाजिक स्तर पर हमसे बदतर हालत मे रह गए। सिर्फ मन से ही हमलोग गांव से, अपनी माटी से जुड़े रह सके। आंचलिक कथाएं लिखी गईं... महुआ, केले के पात, चैती और फागुन तो कथाओं में और स्मृति में आ गए, लेकिन वो अहम नहीं आ पाया। हम अपनी जड़ों से उखड़े लोग ही बने रहे। हमारी पीढ़ी दरअसल अपराध-बोध से ग्रस्त पीढ़ी है। यह ऐसा अपराध है, जिसमें यातना भी है। ...इससे बड़ा अपराध और पाप किसी सचेतन प्राणी के लिए दूसरा नहीं हो सकता कि अपने पूर्वजों की, बुजुर्गों की सेवा न कर सके। इस यातना का ज़िक्र, इस उपन्यास में कई जगहों पर है-मैं उनके साथ गया। उन्होंने बरामदे के एक कोने में एक फैन्सी-सा लगनेवाला दरवाज़ा खोल कर और मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराने लगे। मैंने देखा बाथरुम बिल्कुल शहर के तर्ज़ पर बनवाया गया था। सीट, बाथटब और वॉशबेसिन था। चारों तरफ सफेद टाइल लगे थे। अब्बा के चेहरे पर बहुत आत्मीयता भरी मुस्कान थी। शहर की तर्ज़ पर बाथरूम के निर्माण का मक़सद यही है कि किसी तरह कथावाचक यानी अब्बा साहब की नई पीढ़ी, महानगर का मोह छोड़ दे और यहां पुरखों की वीरान हवेली फिर से गुलज़ार हो उठे। कथावाचक जानता है कि अब्बा साहब आखिर यह सब क्यों कर रहे हैं? लेकिन वापसी संभव नहीं है। बेटों को, अपने वारिसों को महानगरों से वापस लाने के लिए यह अब्बा साहब की अंतिम कोशिश थी। अब्बा ने बँगलिया और उसके पास बनी कच्ची कोठरी गिरवा दी और एक अच्छा नक्शा बनवाकर, वहां बरामदा, हॉल और गेस्टरूम बनवाना शुरू कर दिया। अब्बा की पूरी कोशिश है कि बच्चे लौट आएं। लेकिन बच्चों का लक्ष्य यह नहीं है। वर्तमान पीढ़ी का वारिस, अनेक पीढ़ियों की विरासत को निर्मम होकर अस्वीकार कर देता है। यह अस्वीकार, विरासत से बेदखल होना है। विरासत सिर्फ जायदाद ही नहीं, परिवार की पारंपरिक और सांस्कारिक अस्मिता भी होती है।

उपन्यास की प्रतीकात्मकता देखिए। हमलोग अपने पूर्वजों को छोड़कर यहां आए और अब हमारे बच्चे हमको छोड़कर अमेरिका जा रहे हैं। हमारे पूर्वजों के लिए जो दिल्ली और दूसरे महानगर थे, वही अब हमारे लिए न्यूयॉर्क और अमेरिका बन रहा है। मां-बाप यहां रहते हैं और बच्चे अमेरिका में नौकरी करते हैं। हमने तो यहां तक देखा है कि पिता की मृत्यु पर बेटे ने मुखाग्नि देने के तुरंत बाद ही फ्लाइट पकड़ी और चला गया। शहरी बुजुर्गों के पास पैसे तो हैं लेकिन फिर भी वह अकेले हैं और आए दिन उनके खिलाफ अपराध में बढ़ोतरी हो रही है। लूट या चोरी के इरादे से उनकी हत्या भी हो रही है।

लोग विस्थापन की यातना की बात करते हैं। विस्थापन की यातना तो पूरा देश भोग रहा है। जो लोग विस्थापित हुए हैं, वो मौज मारने के लिए विस्थापित हुए हैं। उनको किसी ने मारकर नहीं कहा कि तुम विस्थापित हो जाओ। यह पाकिस्तान चले जाना या हिन्दुस्तान चले आना या ये मुहाजिरीन और शर्णार्थियों या फिर यहूदियों का विस्थापन नहीं है। यह तो सुविधाभोग के लिए विस्थापन है। इसलिए यह विस्थापन की यातना भी है और यह विस्थापन का दंश भी है

प्रस्तुतिः अकबर महफ़ूज़ आलाम रिज़वी
(साहित्यिक पत्रिका 'संवेद'(जनवरी 2013),उपन्यास विशेषांक में प्रकाशित) 


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