Sunday, April 14, 2013

राख की भाषा

ख़ालिद ए. खान
यूँ ही आई तुम
हमेशा की तर

वा में उड़ते पीले ज़र्द
खु़श्क पत्ते की तरह
अनायास!
होठों पर वही
बेतरतीब सी ठहरी हँसी
कुछ दरकी हुई 
नामालूम सी उलझी आँखें!


तुम्हारे आने ने
चौंकाया मुझे
पहले की तरह!
आते ही उलझ जाना
तुम्हारा कमरे से
और बासी फूल
में खुशबू ढूंढने की
नाकाम सी कोशिश
कितनी खीझ
पैदा करती है! 

क सिरे से छूती हुई
मुक्तिबोध, नेरूदा, अलोक धन्‍वा, शमशेर
पाश, ग़ालिब, मीर पर रूकी
तुम्हारी उंगलियाँ !
ना जाने कितना वक़्त
बह गया अब तक
मैं पकड़ न सका !
और फिर हौले से बैठ
जाना पायताने तुम्हारा ! 
तुम्हारी गहरी उजली बेबाक
आँखों के किनारे बैठा मैं !
देख रहा हूँ लहरों की
सूरज को डुबोने की
जि़द को खा़मोशी से ! 
मैं गुमनाम सफीने सा 
भटक जाता हूँ
तुम में ही कहीं !
तुमने रेत पर लिखा
कुछ अपनी उंगलियों से
लहरों ने आगोश में ले लिया
मैं पढ़ न सका !
कुछ कहा भ 
पर हवा ने
चुरा लिया कि
एक हर्फ़ भी ना
आया हा 

हमारे बीच कि ज़मीं सिमट गई खुद में
और रात ने लपेट लिया एक ही चादर में हमें !
उफ़ ये तुम्हरी सांसों की तपिश में
मेरा जिस्बर्फ़ के मानिंपिघल रहा है 

तुम्हारी लहरें
किनारों कि तरह
काट रही हैं मुझे
मैं रेत की तरह

घुल रहा हूँ तुममें !


तुम्हारी ठहरी साफ़ आँखें
जहां छोड़ आया था अपना गाँव
अपने खेत
अपने जंगल
और
वो काली पंतग
जो लटकी है अभी भी
उस बरगद की टहनी पर 
जहाँ अब भी 
नहीं पहुचते मेरे हाथ ! 

क्या खेत वहीं हैं अब भी
जहाँ धान की रुपाई करती
आधी भीगी हुई
औरतें गीत गाती थीं
जो समझ में ना आने पर भी
कितना मीठा लगता था !


क्या जैसे दिखते हैं जंगल
पहली बारिश में नहाये हुए
तुम्हारी आँखों में
वैसे अब भी हैं !


ये दम तोड़ती ख़ामोशी तुम्‍हारी
ये तुम्‍हारा अजनबीपन
और बेवजह छोड़कर जाना
कितने सवाल छोड़ जाता है पीछे
और छोड़ जाता घना निर्वात !

उनके खाली बजते पेटों को
भर दिया गया
दुनिया के सबसे महंगे लोहे से 
उनका रक्त बहा दिया गया
उस जमीन पर 
जिसे उन्होंने प्यार किया थ

उन्होंने प्यार किया था 
जंगल को जंगल की तरह 
पेड़ों को पेड़ों की तरह
नदियों को नदियों की तरह
पहाड़ो को पहाड़ो की तरह 
उन्होंने प्यार किया था
जिसे खुद से भी ज्यादा
जब सरकारी बूट 
जंगल को नंगा करके
कर रहे थे उसका बलत्कार
तो तुमने भी
अपने कपड़े उतार दिए
तुम ऐसे चीखी
जैसे उस रात चीखी थी
जब एक थुथला बुढ़ा शरीर
खुरच रहा था
किसी गाँव से खरीदी
गई बच्ची का शरीर !
थकी हुई रात
सड़क के किनारे
अंधेरे में लिपटी देह 
उनकी सांस के सहारे उतर जाना तुम्हारा
पके, दुर्गन्ध, जलते
हुए रक्त की सड़न
कारखानों के धुएँ 
से भरी घुप्प अंधेरी सड़कों पर !
मशीनों, हथौड़ों
का बहरा करता शोर
यहां ख़्वाब नहीं मिलते
लाख ढूंढने पर भी
बस यंत्र की तरह
लगते हैं
 
यह जिस्म जाने कब बदल गए 
हथौडे, बेलचे, मशीन में !
अंधी, बहरी, अभिशापित गलियों में
आषाढ के पानी की तरह घुसी तुम
और जर्जर दीवारों पर सीलन की तरह
उभर आई 

जहाँ एक थकी देह
दरवाजा खुलने और बंद
होने के बीच में
कर रही थी अपनी साँसों को व्यवस्थित
उसे देह पर पड़ने
वाले घाव, धक्कों को
तुम खुद पर झेलती रही 
अनवरत...
 
देर से लौटी तुम
उजड़ी, बौराई आँखें लिए
कुछ बड़बडा़ते हुए 
आई और कुर्सी
पर उकड़ूँ बैठ गई
तुम्हारी बड़बड़ाहट
कमरे को हिलाती
इन ऊँची इमारतो को नाधती
गाँव, जगलों को बेसुरा करते
खदानों में
बांसुरी की तरह बजते हुए
लौट रही थी
अनुत्तरित

नहीं-नहीं ये कविता नहीं है
ये कविता की भाषा नहीं है
ये भाषा राख की भाषा है
जले हुए घरौंदों की
ये भाषा रक्त की भाषा है
खेत में फैले हुए रक्त की
ये भाषा हल की भाषा है
जिनकी फसलें पकने से पहले
गोदामों में पहुँचा दी जाती है
ये भाषा थके हुए हाथों की भाषा है
जो अब न जाने कब से खाली है
ये भाषा पेटों की है
जिनकी रोटियाँ
हवा में उछाल देते हो
और देखते हो तमाशा 
ये भाषा उन अनाम मासूम बच्चों की है
जिन्हें तुम गाँव से खरीद लाते हो और
अजीब-अजीब नामों से पुकारते हो तुम 
ये भाषा उनकी भाषा है
िन्हें तुम्हारे सभ्य समाज ने बनाया 
फिर कर दिया बहिष्कृत
ये भाषा उनकी भाषा है
जिनके कपड़े उतार कर
सजा देते हो अपने
महलों की दीवारों पर 
ये भाषा उनकी भाषा है
जिनकी फ़रियाद दब जाती है
मंदिर कि घंटियों
अजानों के, प्रवचनों के शोर में 
ये भाषा उनकी भाषा है
जिनकी चीखों को
फाइलों में दबा कर
फेंक देतो हो
अंधेरे गोदाम में
ये भाषा
किसी देश
किसी जाति
किसी कौम की नहीं है
जनता हूँ
तुम इस भाषा से
डरे और कांपे हुए हो
तुम इस को गूँगा बना देना
चाहते हो या 
ख़त्म कर देना चाहते हो
पर
ये भाषा
दूब की भाषा है 
जो तुम्हारी
हर तबाही के बाद
बचा लेती है
अपने अन्दर
थोड़ी सी हरितिमा
तुम इस भाषा को
मिटा नहीं सकते हो
देख सकते हो
तो देखो
तुम्हारे
महलों, कंगूरों, बुर्जो
की दरारों में
ये अब अकार ले रही है

देख सकते हो तो देखो
छितिज की फैली दूब के नीचे
न जाने कितने तख़्त, कितने ताज़ दफन हैं
देख सकते हो तो देखो
तुम... 
ख़ालिद ए. ख़ान

6 comments:

  1. बहुत ही उम्दा कविता.... ग़ज़ब....

    यह जिस्म जाने कब बदल गए
    हथौडे, बेलचे, मशीन में !
    अंधी, बहरी, अभिशापित गलियों में
    आषाढ के पानी की तरह घुसी तुम
    और जर्जर दीवारों पर सीलन की तरह
    उभर आई


    क्या कहने...!!! वाह...!!!!

    ReplyDelete
  2. तुमने रेत पर लिखा
    कुछ अपनी उंगलियों से
    लहरों ने आगोश में ले लिया
    मैं पढ़ न सका !
    कुछ कहा भी
    पर हवा ने
    चुरा लिया कि
    एक हर्फ़ भी ना
    आया हाथ

    ReplyDelete

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