Wednesday, April 10, 2013

मौत की किताब (उपन्यास का अंश)


ख़ालिद जावेद

मैं जल्लाद के पीछे-पीछे चल रहा हूँ। क्या मुझे झूलते हुए रस्सी के फन्दे की तरफ़ ले जाया जा रहा है? इन सब के वज़नी बूट मेरे आगे मार्च कर रहे हैं। मैं रात भर जागा हूँ। अभी तो नींद आई थी कि रुख़्सत का वक़्त आ पहुँचा। मैं एक बार फिर सुबह की नींद के खि़लाफ़ चल रहा हूँ। अपने काहिल और ढीले हाथ-पैरों से मैं नींद के ख़िलाफ़ एक बयानिया फिर लिख रहा हूँ। आज सारे इक़बाले जुर्म और चश्मदीद गवाह पूरे हो गए।

मगर नहीं... वह मेन गेट की तरफ़ जा रहे हैं। वह, मुझे यह ख़ुशख़बरी दे रहे हैं कि मैं अब बिल्कुल आज़ाद हूँ। वह मुझे मेन गेट तक अलविदा कहने के लिए आए हैं। मैंने पीछे मुड़ कर उन अँधेरे गलियारों और कोठरियों को देखा। बारिश की धुँध में वह मुझे साफ़ नज़र नहीं आतीं। गूँजने वाले वह वहषी क़हक़हे रूक गए हैं। चुड़ैलें और भूत मुझे अपनी सूनी और उदास आँखों से एक-टक देखे जा रहे हैं। मैं शर्मिंदा हूँ। मैं उनकी आँखों का सामना नहीं कर सकता। मैं उनकी तरफ पीठ कर लेता हूँ। मैं अपने लोगों को छोड़ कर जा रहा हूँ। अपने दोस्तों, अपने भाइयों को उन्हीं अँधेरे गलियारों में हंटर की सांय-सांय और भरभरा कर जलते हुए स्टोव की आवाजों में, अपने-अपने जलमग्न जज़ीरों की तलाश में भटकता हुआ छोड़कर, मैं उस इमारत के एक लम्बे-चैड़े से दरवाज़े से बाहर निकल रहा हूँ। काली दीवार की मुँडेर से एक भींगता हुआ बन्दर, कूद कर अचानक मेरे सामने आ जाता है और अपनी लाल-लाल आँखों से मुझे घूरने लगता है। मैं दरवाज़े से बाहर, सड़क पर हूँ। मुझे लेने कोई नहीं आया है। न ही उन्होंने मुझे किसी के हवाले किया है। मैं ख़ुद अपने-आपके हवाले हूँ। मगर वह भागती हुई आ रही है। वह आठ-नौ साल की एक बच्ची इमारत के अन्दर से आई है। उसकी फ्रॉक कीचड़ से सनी हुई है। चैकीदार उसे धक्का देकर अन्दर करते हैं। मगर वह मुझे अलविदा कहने आई है। उसने चैकीदारों और जल्लादों का घेरा तोड़ कर मुझे चूम लिया। उसके होंठ जले हुए फूलों जैसे हैं। शायद उसने मुझे बाबा कहकर पुकारा है। मुझे मालूम है कि वह कोई नहीं है। वह मेरे ही उस चोट खाए हुए सिर से पैदा हुई है। मेरे सिर में, वह न जाने कब से भ्रूण की तरह रहती है। मेरे दिमाग़ का लहू पीकर और मेरे दिमाग़ की हड्डियों को चूसकर, उसकी परवरिश हुई और अब वह एक ख़्वाब की तरह बाहर आई है। यह ख़्वाब उस इमारत के अन्दर क़ैद है, जिससे निकल कर मैं बाहर आया हूँ।

बारिश हो रही है। लम्बी और सुनसान सड़क, भींगी पड़ी है। एकदम से शाम कैसे हो गई? अभी तो दिन था, मगर अब दोनों वक़्त मिलने का उदास मंजर बारिश में भी साफ़ नज़र आ रहा है। सामने बिजली के झूलते हुए तारों पर एक कौवा ख़ामोशी से बैठा भींग रहा है। बाँस और लकड़ी के शहतीरों से लदा हुआ एक ट्रक बारिश से लदबद, काली सड़क पर तेज़ी से छींटे उड़ाता हुआ गुज़र गया। मेरे पीछे, एक उदास और भारी आवाज़ के साथ मेन गेट बन्द हो जाता है। मैं सड़क पार कर, सामने आ गया हूँ। सड़क के दूसरे किनारे पर खड़े होकर, उस काली चहारदीवारी को देखता हूँ जो बारिश में भींगती हुई, नज़र की हद तक फैली है। उस पर उग आई जंगली घास, हवा में आहिस्ता-आहिस्ता हिल रही है।

मैंने उस उदास इमारत के दरवाज़े पर लगे बोर्ड को ग़ौर से पढ़ा है। यह एक स्कूल है। महानतम पाठशाला। मैं अब इन काली सूनी दीवारों को एहसान भरी निगाहों से देखता हूँ। इस ख़ाली दुनिया में मौजूद, आख़िर यह वह अकेली जगह है, जिसने मेरे खोए हुए जलमग्न जज़ीरे तक मुझे पहुँचा दिया है। मेरी याददाश्त को बहुत गहराई में ले जाकर डुबो दिया है। इस स्कूल के अन्दर सारे स्टूडेंट्स, दुनिया के सबसे होशमंद और ब्रह्मज्ञान से मालामाल इंसान हैं। इसलिए वह उन छोटे और अँधेरे कमरों और सुनसान गलियारों में हँसते और रोते फिरते हैं। इस पाठशाला ने मुझ पर यह रहस्य भी प्रकट किया है कि ख़ुदा और शैतान मौत की किताबपर झुके हुए, आखि़र किस बात पर झगड़ रहे थे? अब पता चला है कि वह किताब के कॉपीराईटका मसला नहीं था। बल्कि एक रात जब ख़़ुदा सो रहा था और अपने ख़्वाबों में उन बच्चों को देख कर मुस्कुरा रहा था, जो अपनी-अपनी माँ के पेट में ख़ुशी से किलकारियाँ मार रहे थे, तो शैतान ने चुपके से मौतका मतलब बदल दिया था। ख़ुदा की किताब में मौतकी ऐसी कल्पना और अर्थ नहीं थे। शैतान ने किसी और लफ़्ज़ की जगह मौतलिख दिया। यह लफ़्ज़ ज़िन्दगीथा। मगर अब ख़ुदा क़ाबिले-रहम हद तक मजबूर था। शैतान के क़लम की स्याही, उड़ने वाली स्याही न थी। तभी से उन दोनों का झगड़ा चला आ रहा है। मगर वह आपस में हँसते-बोलते भी हैं और अपनी बात पर क़ायम रहने का दिखावा भी करते हैं। फिर भी इंसान ग़लतफ़हमियों और ख़ुशफ़हमियों के एक बेहद लंबे सिलसिले से जुड़ा है, जिसका नाम यह दुनिया है।

मगर यह स्कूल एक समांतर दुनिया है। ख़ुदा और शैतान की बनाई हुई दुनिया से बिल्कुल अलग और असली होशमंद इंसानों की दुनिया। यह, वह दुनिया नहीं, जहाँ कोई चुपके से इंसान के हाथ में एक ख़ंजर थमा कर चला गया है, ताकि उसका मुक़द्दर कभी ख़त्म न होने वाली नाकाम कोशिशों में बदल कर रह जाए और वह तमाम उम्र तस्वीरों पर ख़ंजरबाज़ी करता रहे। दुनिया की सारी चीज़ें और सारे इंसान भी महज़ तस्वीरें हैं क्योंकि न तो वह मुकम्मल तौर पर हक़ीक़ी हैं और न ही ग़ैर-हक़ीक़ी। वह सब एक-दूसरे पर आधारित हैं। उनका कोई अलग और आज़ाद वजूद नहीं।

इसलिए, अब इस काली और मेहरबान चहारदीवारी से बाहर आ जाने के बाद मैं जिस दुनिया में हूँ, वह बेहोश इंसानों की एक बेमतलब जगह का नाम है। उन्हें होश में लाने के लिए किसी पैग़ाम, किसी प्रोपेगंडा या किसी नारे की ज़रूरत नहीं... बस माँ के गर्भाशय पर एक वज़नी ठोकर ही काफ़ी है।

बारिश हल्की हुई है, मगर अँधेरा फैलने लगा है। मैं अब कहाँ जाउँगा? मैं दोबारा उन डरावने रास्तों से नहीं गुज़रना चाहता। उन सड़कों पर नहीं चलना चाहता जो यहाँ से सिर्फ़ लौटने के लिए बनी हैं। मैं अपने अतीत के बारे में भी क्या सोचूँ? अतीत तो मुर्दा लोगों की हिमाक़त भरी उम्मीद है, जिसे मौत ने छीन लिया और अपनी काली ज़िल्द वाली किताब में दर्ज कर लिया। तो मुझे अब इसका कोई अफ़सोस नहीं कि मैंने नापाकी और गुनाहों को एक गीत की तरह गाया था। यह क्या कम था कि कम से कम मैंने एक गीत तो गाया। हर चीज़, हर जज़्बा और हर इंसान... मेरे सामने एक जिस्म बन कर आया। नफ़रत, मुहब्बत, गाली, ज़िल्लत, आँसू, मुक्का और दुख... सब ने मिलकर, बरगद के एक घने पेड़ के साए में आकर, दीवानों की तरह नृत्य किया। जिस्मानी भूख, अश्लीलता और ख़्वाहिशों के सुर-ताल पर मैं मरने को आया। मगर मैंने शैतान के फ़रेब और साज़िश और खुदा की सुस्ती की भेंट चढ़ी मौत की किताबको खोल कर भी नहीं देखा। बरगद की डालियों से फूटते हुए मेरे ख़ून को क्या बुद्ध अपनी भिक्षा में स्वीकार करेंगे?

अच्छा है कि महाद्वीपों या ज़मीनों में नई-नई दरारें बन रही हैं। ज़मीन के अन्दर से निकलने वाले लावे का यह फर्ज़ है कि अब वह जल्दी ही एक नया समन्दर बनकर ज़मीन के एक और बड़े, बेहिस और बहरे हिस्से को बहाकर ले जाए। ऐसी घाटियों और दरारों का यह फ़र्ज़ है कि वह लाल सागर से जा मिलें। कम से कम वह इंसान की जिस्मानी भूख में सने ख़ून के समन्दर से कम वहशी, कम बदबूदार और कम झाग उड़ेलने वाला होगा।

बारिश तेज़ होने लगी। मैं इस बारिश में भींगते हुए, अपने चिथड़े-चिथड़े होकर झूलते हुए लिबास के साथ, कच्ची ज़मीन पर आ गया हूँ। मेरे फटे हुए जूतों में पानी भरने लगा। यहाँ एक छोटा सा गड्ढ़ा है, जिसमें इस वक़्त पानी भरा हुआ है। मैं अपने लिए इस बेहतरीन जगह का चुनाव करता हूँ। यहाँ से यह पाठशाला मुझे हमेशा नज़र आती रहेगी। वह काली चहारदीवारी और वह लकड़ी का बड़ा सा अकेला और ऊँचा मेन गेट। एक स्कूल के सामने बैठ जाना, कम से कम किसी ख़ानक़ाह या दरगाह के सामने बैठ जाने से बेहतर है।

ख़ालिद जावेद उर्दू के मशहूर कथाकार हैं। उनके अफ़साने एक नई दुनिया रचते हैं, जो है तो हमारी लेकिन अब तक हमारी ही नज़रों से या तो ओझल रही है या कि हमने जान-बूझकर उसको अनदेखा किया है। ख़ालिद जावेद न सिर्फ कथ्य बल्कि स्ट्रक्चर के स्तर पर भी उर्दू कहानी और उपन्यास को एक नया कलेवर देने वालों में शुमार किए जाते हैं। उनका पहला उपन्यास 'मौत की किताब' भी बेहद चर्चित रहा है और अब जल्दी ही इसका हिन्दी अनुवाद आप पढ़ सकेंगे।

2 comments:

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...