Monday, March 11, 2013

घड़ा बदलने से पानी नहीं बदलता

15 अगस्त 1947। भारत के लिए पर्व का दिन। इतिहास का टर्निंग प्वॉइंट। मान्यता के मुताबिक आधी रात को आज़ादी दबे-पाँव देश में दाखिल हुई थी। लोग-बाग जश्न में डूबे थे। पटाखे फूट रहे थे। नारे गूँज रहे थे। आम जनता मदमस्त थी। उसको इस बात की चिंता ही नहीं थी कि सदियों बाद लौटी आज़ादी के रहने-सहने का बंदोबस्त कौन करेगा? वह ठहरेगी कहाँ?
तब देश के उसी साभ्रांत तबके ने एक बार फिर मानवता का परिचय दिया और आज़ादी को उसी महल में शरण मिली, जहां वायसराय रहा करते थे। साभ्रांत तबका हमेशा से उदार रहा है। अँग्रेजों को, डचों को, मुगलों को, शकों को हूणों को, यानी जो भी मेहमान, जहां से भी आया। इन्हीं लोगों से शरण मिली। बदले में मेहमानों ने भी इनका पूरा ख़्याल रखा। देश की बाकी जनता को तो ग़ुलाम बनाना पड़ा था। यह तबका चाहता तो ग़ुलामी से इनकार भी कर सकता था। मेहमान अपने मेज़बानों के साथ ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं करते। यह विश्वास तो किया ही जा सकता है। लेकिन उदारता तो मेज़बान का पहला और प्रमुख गुण होता है। लिहाजा साभ्रांत तबके ने ख़ुद ही आगे बढ़कर सहर्ष गुलामी स्वीकार कर ली थी।
चित्र- लियोन रेयान
कहते हैं कि यह साभ्रांत तबका सनातन काल से ही उदार रहा है। इसलिए मेहमानों ने भी इनके प्रति अपना हृदय विशाल ही रखा। कभी भी अपने मेज़बानों को कोई कष्ट नहीं होने दिया। भले ही उन्हें इसके लिए देश की आम जनता पर कोड़े बरसाने पड़े हों। उनके खेत उजाड़ने पड़े हों या रोटी छीननी पड़ी हो। अंग्रेज़ों ने आज़ादी को बंदी बनाकर भले ही काल कोठरी में डाल दिया हो। लेकिन इस तबके को हमेशा दरबार में ही जगह मिली। आपको यकीन नहीं होता? हो भी कैसे! आपने तो इतिहास और भूगोल के चक्कर में अपनी दृष्टि ही दूषित कर ली है। ग़ैर-ज़रूरी बातों के लिए साक्ष्य ढूंढने इतिहास में चले जाते हैं। वक़्त बर्बाद करते हैं। जबकि वर्तमान में ही इतिहास धरती पर लोटपोट है। हकीक़त जानना हो तो इतिहास में झांकने की बजाय अपने आस-पास नज़र दौड़ा लीजिए। वह साभ्रांत तबका आपको भी मेरी तरह नज़र आ जाएगा।

साभ्रांत की पहचान ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। वह घराना(परिवार कहना उनका अपमान होगा) जो अँग्रेजराज में ही नहीं, मुगलकाल और उससे पहले के कालों में भी साभ्रांत रहता आया है। देश जब लुट रहा था। तब भी इनके पास दौलत की इज्ज़त थी। देश जब ग़ुलाम था, तब भी इनकी हालत ग़ुलामों जैसी नहीं थी। मेहमान तो राजा ठहरे, वह कैसे राजकाज में समय बर्बाद करते! लिहाजा साभ्रांत तबके ने स्वयं ही उन्हें इस झंझट से मुक्ति दी और आगे बढ़कर राजपाट के सुचारू संचालन का जिम्मा सहर्ष अपने सिर ले लिया। और तो और यही अनुभव उस गाढ़े वक्त भी काम आया, जब अंग्रेजों का भारत से जी ऊब गया और वह अपने इंग्लिश्तान लौटने की तैयारी में जुट गए। अंग्रेज़ मेहमानों को यह चिंता खाए जा रही थी कि इतने दिनों तक ग़ुलामों का ख़्याल उन्होंने तो पूरी मुस्तैदी से रखा। लेकिन अब जबकि वो जाने वाले हैं तो बेचारे ग़ुलाम बिल्कुल अनाथ हो जाएंगे। उनका ख़्याल कौन रखेगा? ऐसे आड़े वक़्त में भी वही साभ्रांत तबका काम आया।

राजकाज संभालने का सनातन अनुभव था इनके पास, वर्ना सोचिए कि देश छोड़कर जब अंग्रेज चले गए तो देश की क्या हालत हुई होती ! मैं तो सोच भी नहीं सकता! पिद्दी सी ग़ुलाम जनता, कोई पिद्दी सा प्रतिनिधि चुनती और उसे उस ऐतिहासिक चौड़ी-ऊँची कुर्सी पर बिठाती, जिस पर राजे-रजवाड़ों का आनुवांशिक हक़ हुआ करता था। अगर ऐसा होता तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि विश्व में लोकतांत्रिक भारत की कितनी ख़राब छवि बनी होती! लेकिन इस आड़े वक़्त में भी इस साभ्रांत तबके ने नवजात लोकतंत्र की देखभाल का जिम्मा आगे बढ़कर लिया। अँग्रेजों ने राहत की साँस ली और निश्चिंत होकर स्वदेश लौटे।

साभ्रांत तबके ने पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपने पूर्वजों की लाज रखी है और राजकाज चला रहे हैं। अगर आप इनकी निष्ठा पर शक करते हैं तो यह राष्ट्रद्रोह होगा क्योंकि इन्होंने उस लोकतांत्रिक व्यवस्था को अक्षुण्ण रखा है, जिसकी नींव अँग्रेज डाल गए थे। देश आज भी बिल्कुल वैसा ही है, जैसा अंग्रेज छोड़ गए थे। अमानत की ऐसी हिफ़ाज़त और सिस्टम का ऐसा स्थायित्व बनाए रखना आम आदमी के बस की बात नहीं है। बल्कि यह अनुभवी साभ्रांत तबके की एकनिष्ठ सेवा का ही प्रतिफल है।

अब इतनी उदारता और त्याग के बाद, अगर ये उसके एवज़ में हमसे हमारे कुछ मौलिक अधिकार छीन ही लेते हैं तो क्या गुनाह करते हैं? वैसे भी उस जनता को बोलने का हक़ ही क्या है, जो या तो गंगा में डूबी रहती है या फिर दंगा में लुटी-पिटी और क्लांत। कभी काम के समय जश्न में जुटी रहती है तो कभी कर्त्तव्य के समय आँसु का झरना बहाने में व्यस्त। उसे तो ढंग से यह भी नही पता कि आज़ादी अकेली आई थी या कि कोई और भी उसके साथ था? वह पैदल आई थी या कि प्लेन से उतरी थी? वैसे ताई सही कहती थी- घड़ा बदलने से पानी नहीं बदलता।

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