Thursday, February 21, 2013

आन वर्सेस स्वाभिमान- सुनवाई जारी है

सवाल सिर्फ मंदिर का नहीं। स्वाभिमान का भी है। तुम साले बाबर की औलाद... पुरखों का पाप तो भोगोगे ही। बहुत हो गया। उसकी आवाज़ नफ़रत के कीचड़ में पूरी तरह से लिथड़ी हुई थी। सामने खड़ा करीब 13 साल का लड़का राय साहब के बेटे के इस बर्ताव से अचंभे में पड़ा, कुछ देर वहीं खड़ा रहा। वह अचानक उफनी इस नफ़रत का कारण जानना चाहता था। वह उससे पूछना चाहता था। लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका। उनकी आंखों में नफ़रत की भड़कती चिंगारी देख, उसकी अपनी आँखों में ख़ौफ़ उतर आया। वह चुपचाप वहां से लौट आया।

अभी 9वीं का ही तो छात्र था। अचानक गांव की बदली फ़िजा ने उसको बेचैन कर रखा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर वही लोग नफ़रत और गालियों की भाषा में क्यों बात कर रहे हैं जो हर रोज़ मेरे बाप से काम लेते हैं? जब बेचैनी बढ़ती ही गई तो अपने बाप से पूछ ही बैठा- अब्बा यह बाबर कौन था? मंदिर तोड़कर मस्जिद उसी ने बनवाई थी क्या? क्या बाबर हमारा पुरखा था? हमलोग मुग़ल ख़ानदान से आते हैं क्या? फिर आप मजदूरी क्यों करते हैं? दादा भी बहुत ग़रीब थे, ढंग से इलाज नहीं हो पाया था? अम्मा को तो अपनी चांदी की हंसुली तक बेचनी पड़ी थी, फिर भी ज़रूरी रकम का आप बंदोबस्त नहीं कर पाए थे! दादी तो कहती थी कि बादशाहों के पास खज़ाना हुआ करता था... ऐसा खज़ाना, जो कभी ख़त्म ही नहीं होता। तो उस खज़ाने में अपना भी तो हिस्सा रहा होगा! क्या परदादा लोगों ने लुटा दिया था?’

लड़के के ताबड़तोड़ सवालों ने दिन-भर के थके-मांदे बाप को खिझा दिया। को बोला? तुम पगलों के साथ रहते ही काहे हो?’ बाप की झिड़की ने लड़के को दोहरी निराशा के अंधेरे में ज़बर्दस्ती धकेल दिया। अब बच्चा उदास हो उठा। उसकी निराशा वाजिब ही थी। उसके सवालों का कोई भी सीधे मुँह जवाब ही नहीं देता। कोई धमकी देता है। कोई ग़ाली देता है तो कोई फटकार लगा देता है। लड़का इसी गुनधुन और बेचैनी में पैर के अंगूठे से झोंपड़ी की सीली ज़मीन को पैर के अंगूठे से कुरेदने लगा। अब जो बाप ने यह हालत देखी तो तरस खा गया। बेटे का हाथ पकड़ चटाई पर खींचा। पास बैठाया और समझाने वाले लहज़े में बोला- नहीं बेटा, हमारा मुग़लों से कोई रिश्ता नहीं था। ऊ तs शहंशाह रहें। हमारे पुरखे तो रिआया थे। जैसे आज हम-तुम। बादशाह मुग़ल रहें, पता नहीं कौन देस से आए रहें। बाकी ज़मींदार तो अपने राय साहेब के पुरखे ही थे। हाँ, बाद में मुख़्तार साहेब को भी अँग्रेज़ों के जमाने में ज़मींदारी मिल गई थी। तs सच्ची बात तs ई है बेटा कि हमलोग पहले भी मजूरे थे, आज भी हैं और अल्लाह मियाँ ज़िन्दा रखें तो आगे भी मजूरी ही क़िस्मत है। बाप के चेहरे पर विषाद् की एक और परत चढ़ आई थी। वह छप्पर के तिनकों को घूर रहा था। बच्चे ने कुछ पूछा तो नहीं, लेकिन उसकी आँखों में जिज्ञासा अब भी चमक रही थी। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसके बाप ने फिर कहना शुरू किया। अब उसकी आवाज़ कहीं दूर, किसी अंधी गुफा से आती महसूस हो रही थी। ...मीर बक़ी नाम रहा, उसका। ऊ भी ज़मींदार रहा। बादशाह से मनसब पावे की भूख रही। का बताएं, चाहो तो कह सकते हो कि चाटूकार रहा, उसी ने बनवाइस था मस्जिद... और नाम बादशाह का धर दिहिस। अब ऊ मंदिर तोड़कर बनाया गया रहा कि न, ई बात नहीं मालूम। ...मज़ाक और किसको कहा जाता है? घर अल्लाह का, नाम बादशाह का!’

अगर आप उस वक्त बाप-बेटे के साथ झोंपड़ी में होते तो आप भी विपन्नता की मार खाए चेहरे पर उस जादूई मुस्कान को देख, सोच में पड़ जाते कि वह किलस रहा है या कि हँस रहा है! ख़ैर चुप्पी ज़्यादा लंबी नहीं रह पाई। लड़के ने टोक ही दिया- 'तो जब हिन्दू इतने उतावले हैं तो दे काहे नहीं देते? दंगा-फ़साद से क्या फ़ायदा, कहीं और बना लें मस्ज़िद। नमाज़ ही तो पढ़नी है।' बेटे के इस मासूम हल पर अब्बा बेतरहा मुस्करा उठे। बेटे को बड़े प्यार से देखा और बोले- 'बेटा मसला मस्ज़िद या मंदिर का नहीं है। मसला तो आन का है। राय साहेब कारसेवा के लिए मजदूर जुटा रहे हैं। हमको भी बोले थे- जाना चाहो तो तुम भी जाओ। अजोध्या से लौटने तक, हर दिन की मजूरी देंगे और अलग से दू सौ रुपिया भी। लेकिन बेटा मजूरों का जात-धरम से का रिस्ता? हम हाथ जोड़ लिए।... अपने मुख़्तार साहेब भी तो बहुते गुस्सा में हैं, परसों बथान साफ करने गए तो कह रहे थे- हिन्दुओं का बहुते मन बढ़ गया है। अभी मस्जिद मांग रहे हैं। कल बहू-बेटी मांगेंगे। परसों घर-ज़मीन और फिर कहेंगे कि तुम्हरा तो देसे नहीं है। चलो भागो, यहां से।...

अपने बाप की इस नई बात ने बेटे को बीच में बोलने पर मजबूर कर दिया। वैसे यह सवाल कम, अचरज का इजहार ज़्यादा था। लेकिन अब्बा! हमको गाली देने से पहले तो राय साहब और मुख़्तार साहब के बेटे, दोनों साथ ही घूम रहे थे। पान खाने के बाद दोनों ने एक दूसरे को कटुआ और एंटिना कह-कह के मज़ाक भी किया था!’ अब बाप को लगा कि बेटा सचमुच भोला ही रह गया। अभी तक दुनिया को ढंग से समझ नहीं पाया है। बोले- बेटा जात-धरम कुछ नहीं होता। असली चीज़ तो आदमी की हैसियत ही होती है। मुख़्तार साहेब और राय साहेब की दोस्ती आज की बात नहीं है। ऊ तs पुरखों से चली आ रही है। बड़े लोगों की बड़ी बात। बल्कि तुम्हरे दादा कहते रहें कि आज़ादी के पहिले मुख़्तार साहेब लीगी रहें और राय साहेब सभा वाले। अंग्रेजी हकूमत के दौर में दोनों की हवेली से अंग्रेज बहादुर के यहां डाली जाती रही। जब देस आज़ाद हुआ तs दोनों घराना स्वतंत्रता सेनानी कहलाया।

लड़के के लिए यह सब बिल्कुल नई बातें थीं। वह अपने बाप के चेहरे पर टकटकी लगाए चुपचाप बैठा रहा। ...कुछ देर की चुप्पी के बाद बाप ने फिर बोलना शुरु किया- यह दोनों हमारे मालिक हैं। मसीहा हैं और लुटेरे भी। इसलिए बेटा, इन लोगों से दूर रहना ही अपने लिए अच्छा है। अपने जाहिल बाप की एक बात हमेशा याद रखना- मरते ग़रीब लोग ही हैं। ...और वैसे भी जब किसी के पास धन-दौलत की कमी न हो तो वह स्वाभिमान और आन की चिंता में पड़ जाता है। जैसे अपने राय साहेब और मुख़्तार साहेब। वोईसे इसका एक और फायदा भी है- क़ौम का मसीहा बनने में इससे सहूलत हो जाती है और हमारे जैसे मजूरे कभी उनके ख़िलाफ बग़ावत भी नहीं कर पाते।

बाप की बातों ने उसको बड़ी सोच में डाल दिया था। लड़का बिस्तर पर लेटा अभी इस आन और स्वाभिमान का वाजिब मतलब समझने की कोशिश में जुटा ही था कि घर में अचानक आग लग गई। झोंपड़ी के साथ वह भी वहीं ख़ाक हो गया।

सुना है ढांचा टूटने के बाद भी मलवा वहीं पड़ा है। आन और स्वाभिमान दोनों अपने बंगलों में आराम फ़रमा रहे हैं। अयोध्या में भीड़ पहले से ज्यादा हो गई है। जबकि कई शहर और बस्तियों में विरानी है। सरकार ने इन ख़ाली जगहों पर अत्याधुनिक शमशान विकसित करने का नीतिगत् फैसला ले लिया है। ठेके के लिए किसी विदेशी कम्पनी से बातचीत जारी है।

5 comments:

  1. अकबर भाई आपकी कलम से बेहतरीन कहानी पढने को मिली ! इस छोटी सी कहानी में बहुत सारे सवालों के जवाब छुपे हुए हैं .... बशर्ते लोग समझना चाहें !

    बहुत सार्थक सृजन !
    हार्दिक बधाई / आभार

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  2. akbar sahab bahut dino se ek baat sochti thi ki aj kal ke halaat par nirdosh muslimon ke man me kya kuchh nahi uthta hoga.....
    aaj jawab mil gaya..
    behtarin peshkash..

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  3. akbar sahab bahut dino se ek baat sochti thi ki aj kal ke halaat par nirdosh muslimon ke man me kya kuchh nahi uthta hoga.....
    aaj jawab mil gaya..
    behtarin peshkash..

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  4. अरसों बाद एक अच्छी कहानी पड़ने को मिली | छोटी मगर प्रभावशाली | आधी रात का वक़्त था| मन कर रहा था इन्टरनेट में परोसी नग्नता निहारु पर तुम्हारी कहानी पड़ना शुरू किया तो बिना पूरी पड़े रह न पाया | कहानी कैसी थी उस पर टिप्पणी नहीं करूँगा पर इतना जरुर कहूँगा तुम जो भी लिखते हो उसमे एक स्मूथ्नेस है |

    मोनू

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  5. सुंदर अभिव्यक्ति .......
    आप भी पधारो स्वागत है ..
    http://pankajkrsah.blogspot.com

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