Tuesday, February 19, 2013

इतिहास का उल्था वाया अयोध्या

'उल्टी करते-करते जाह्नवी की आँखें उलट गई थीं। वह निश्छल और पवित्र कहां रह पाई! शिव की जटा से निकल, जब महावीर कर्ण के घर चम्पावती पहुंची थी, तब सपने में भी नहीं सोचा था कि सुजानगढ़ के लोग ही उसके साथ कभी ऐसा सलूक भी करेंगे। जाह्नवी तो सोचती थी कि यहां ज्ञान, मानवता और न्याय का पाठ पढ़ाया जाता है। असुरों को परास्त करने के लिए मथानी और रस्से की व्यवस्था जहां के लोगों ने की हो, उनके बारे में अशुभ विचार कैसे पनप सकते थे! लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति कब और कैसे बदल जाए, कौन जानता है?' कथा कहते-कहते बुज़ुर्ग का गला अचानक भर्रा उठा, उसकी लंबी सफेद दाढ़ी आटा-चक्की वाले ईंजन की तरह कांप रही थी। आँखें लाल स्याही से रंग चुकी थीं।

थोड़ी देर की कोशिश के बाद उसने ख़ुद को संयत किया। 'हां, यह सही है कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय को बख़्तियार खिल्जी नाम के एक लुटेरे ने तहस-नहस कर दिया था। लेकिन बेटा इसका धर्म से नहीं ज्ञान से संबंध था और ख़िल्जी कोई धर्मगुरू या विद्वान नहीं था।' युवक से बुज़ुर्ग की हालत देखी नहीं जा रही थी। वह अब और कुरेदना नहीं चाहता था। वह चुप ही रहा। बुज़ुर्ग ने खुद ही फिर कहना शुरू किया-'अरे राम तो ख़ुद आहत थे। वह तो जाह्नवी के सामने हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहे थे, सफाई पेश कर रहे थे - देवी मेरी ग़लती नहीं है, देवी मेरा दोष नहीं है। ...लेकिन उस समय जाह्नवी को अपना होश ही कहां था। वह तो मतिशून्य सी अपनी रक्तरंजित काया को घूर रही थी।

पूरे तीन महीने तक पिशाच-नृत्य हुआ था। लाशों पर गोभी की फसल उगाई गई थी। ताज़ी सब्ज़ी अधिकारियों और नेताओं के बंगले पर पहुंचाई गई थी और सभी ने उस किसान को ख़ूब आशीषा था क्योंकि उसका स्वाद बिल्कुल अलग था।' बाबा थोड़ी देर को बिल्कुल चुप हो गए, मानो स्मृतियां जीवित हो उठी हों। चेहरे पर विशाद की छाया और गहरी होने लगी थी। लंबी सांस खींचते हुए बोले- बेटा, मैं साधु होकर भी मस्तक पर चंदन नहीं लगाता। मंदिर में पूजा के लिए नहीं जाता। मनुष्यों से मिलने में भी अब रूचि नहीं रही। जानते हो क्यों? युवक कुछ बोला नहीं, लेकिन आँखों में सवाल का कांटा ज़रूर चुभ गया था। 

'वह लड़की बिल्कुल निर्वस्त्र थी। सड़क पर बेतहाशा भाग रही थी। पिशाचों की एक भीड़ जीभ लपलपाती और नारा लगाती, उसके पीछे दौड़ रही थी। तभी सामने से पुलिस की जीप आती नज़र आई और लड़की उसी दिशा में दौड़ने लगी। लेकिन पास पहुंचते ही उसने पाया कि वर्दी का रंग तो खाकी ही था, लेकिन उसे पिशाचों ने पहन रखा था। और इस तरह वर्दी की देखरेख में उस लड़की से ख़िल्जी के अत्याचार और लूट का बदला लिया गया। अब तुम्हीं कहो बेटा जिस मंदिर का शिलापूजन इस तरह से हो, उसके प्रति आस्था कैसे बनी रह सकती है?' मैं क्या जवाब देता? हां, एक बात ज़रूर समझ में आ गई थी कि पागल कौन है? यह बुजुर्ग या वो लोग जिन्होंने इन्हें पागल करार दे रखा है। सुना है अभी महाकुंभ में उन लोगों ने भी डुबकी लगाई है, जिनका दावा है कि गंगा का जल सन 1989-90 में मलेच्छों के खून से लाल हो गया था। 

ख़ैर, सवाल मेरा बचकाना था यह मैं जनता हूँ। लेकिन मैंने पूछा था ज़रूर- बाबा, कौन लोग थे वे? किसी खास दल के थे क्या? बाबा बोले- नहीं रे! सभी थे। दो दलों में हिन्दू वोटों को लेकर वर्चस्व की जंग छिड़ी थी। दोनों खुद को बड़ा हिन्दू साबित करना चाहते थे। एक दंगा भड़काने के मुद्दे तलाश रहा था। दूसरा दंगा भड़का रहा था। तीसरे ने पीड़ितों को न्याय दिलाने में दिलचस्पी इसलिए नहीं ली क्योंकि पिशाच उसी की जाति का था। सच कहूँ तो बेटा राम को सबने मिलकर मारा। जाह्नवी का सामूहिक बलात्कार हुआ था।' अब उनकी आवाज़ सरगोशी में बदल रही थी- जाह्नवी तो आज भी रात के सन्नाटे में चीत्कार कर उठती है। उसका हाथ-पैर पटकना और गिड़गिड़ाना मुझसे नहीं देखा जाता तो मैं ज़ोर-ज़ोर से गाने लगता हूँ। हद तो यह कि अब भी लोग यही कहते हैं कि गंगा किनारों को लील रही है, कटाव कर रही है। लेकिन गंगा का दर्द कौन समझे! 

वैसे ताज़ा ख़बर यह है कि यहां सिल्टेशन का काम शुरू किया गया है। कटाव रोकने के लिए ज़रूरी कदम उठाने का ठेका वर्तमान सरकार के एक सिपहसालार के नज़दीकी रिश्तेदार को मिला है।

No comments:

Post a Comment

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...