Monday, February 4, 2013

आसान नहीं होता 'शोकगीत गाना'


तस्वीर में- ख़ालिद जावेद, डॉ. संजीव कुमार, प्रो. दुर्गा प्रसाद गुप्त, प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो. शम्सुलहक़ उस्मानी एवं अन्य

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का टैगोर हॉल श्रोताओं से खचाखच भरा था। जितने कुर्सियों पर बैठे थे, उससे कहीं ज्यादा लोग फ़र्श पर बैठे या फिर खड़े थे। मौका था हिन्दी विभाग की तरफ से सृजन एवं संवादकार्यक्रम के तहत कहानी पाठ का। उर्दू भाषा के सिद्धहस्त कथाकार डॉ. ख़ालिद जावेद, अपनी कहानी शोकगीत गानेवाला का जब पाठ कर रहे थे, वहां मौजूद श्रोता, एक अलग क़िस्म की दुनिया में गोते लगा रहे थे। पाठ के दौरान श्रोताओं के चेहरे पर आते-जाते हर्ष-विषाद के भिन्न भाव, कथा के साथ न सिर्फ उनके तादात्म्य का बोध करा रहे थे, बल्कि इस बात का अहसास भी दिला रहे थे कि यह कहानी उनके अंदर अरसे से काई की तरह जमे उन भावों पर भी खराशें डाल रही थी, जो शिल्प के अभाव में अभिव्यक्ति नहीं पा सके थे।

ख़ालिद जावेद के कहानी पाठ के बाद परिचर्चा की शुरुआत दिल्ली यूनिवर्सिटी के डॉ. संजीव कुमार ने की। उन्होंने कहा कि ख़ालिद उर्दू कहानी में वही कर रहे हैं, जो हिन्दी में उदय प्रकाश। शोकगीत गानेवाला में जूते को कथा-वाचक बनाया गया है। जूता एक ऐसी एंटिटी (वजूद) है, जो ज़मीन के साथ सीधे तौर से जुड़ा है। जूते को कथा-वाचक बनाना, दरअसल लेखक की उस ख्वाहिस का सबूत है, जिसके तईं वह दुनिया को, वहां से देखना और दिखाना चाहता है, जहां पर खड़े होना भी, बुलंदी पर बैठे खाए-अघाए लोगों को सख्त नापसंद है। कहानी यथार्थ की बेहद स्याह तस्वीर पेश करती है। सात छोटी-छोटी कहानियों का समुच्चय होने के बावजूद कथा-वाचक जूता की वजह से, यह सभी एक ही कहानी का हिस्सा बन जाती हैं। यह एक-दूसरे में अंतर्गुम्फित हैं। ख़ालिद जावेद के यहां भी उदय प्रकाश की ही तरह कहानी का परंपरागत ढांचा टूटता है। अपनी बात सटीक ढंग से रखने के लिए रचनाकार कई दूसरी विधाओं की भी मदद लेता है। दोनों रचनाकार क्रमशः हिन्दी-उर्दू कथा का नया ढांचा गढ़ते हैं। कहानी के इस नये ढांचे में ललित निबंध, कविता, सिनेमैटिक इमेज और इसके साथ ही कई दूसरी विधाओं का अंश समाहित हो जाता है और इस तरह रचनाकार सीमित अर्थ दे सकने वाले प्रसंगों को भी एक बड़े फलक या यूँ कहें कि व्यापक संदर्भों से जोड़ देता है। ख़ालिद जावेद कहानी का नया ढांचा गढ़ने के लिए कई दीवारें तोड़ते हैं। वैसे इस कहानी में जूतेको अपने निस्फ वजूद की तलाश है। यह निस्फ वजूद है क्या? कहानी के अंत तक जूता तमाम नैरेशन के बीच अपने निस्फ वजूद की चिंता नहीं भूलता। मेरे हिसाब से यह कथाकार का अपना ढब है और यही इस कहानी का सर्फेस टेंशन भी है। अब यह पाठकों पर निर्भर है कि वह इस निस्फ़ वजूद का क्या प्रतीकार्थ निकालते हैं।

हालांकि उर्दू साहित्य के बड़े नक्काद(आलोचक) शम्सुलहक़ उस्मानी ने ख़ालिद जावेद की कहानियों के ढांचे को नया नहीं माना। उनका कहना था कि कहानी का ढांचा वही है। हां, शैली के स्तर पर खालिद की कहानियाँ बिल्कुल नई हैं। इसके लिए उन्होंने किस्सागोई और आलिफ लैला का उदाहरण भी पेश किया। जामिया के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. दुर्गा प्रसाद गुप्त ने अपने स्वागत भाषण के दौरान खालिद जावेद की कहानियों के मूल को रेखांकित करते हुए कहा कि शोकगीत गानेवालामें जो खून और हिंसा है वह दरअसल हमारे समाज और मनुष्य के विकास का रूपक है। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्य प्रेमी युवाओं ने कथाकार से सीधा संवाद भी किया और इंटर-एक्शन का एक लंबा दौर भी चला।


कहानियां कह दिए जाने के बाद ख़त्म नहीं हो जातीं। पाठ समाप्त होते ही द्वंद्व की त्वरा तीव्रतर हो उठती है। इसकी कोई सुबह नहीं होती लेकिन कहने को तो पौ फट रही है। रात बीत गई। रात बीत जाने के बाद सारी कहानियाँ ख़त्म हो जाती हैं। ख़ून में शराबोर मेरी यह कहानी भी ख़त्म हो गई। आसमान में बहुत सारे सितारे डूब गए हैं। सितारों में भी मिटने और बनने का अजब सिलसिला जारी है। पुराने बहुत से सितारे भटक कर न जाने कौन से अजनबी सितारों के क़ाफ़िले में जा मिले हैं। लेकिन कुछ तो है जो अब भी अंदर से मथ रहा है मन को...। पैर का जूता अब निर्जीव नहीं रहा। उसकी धड़कनें महसूस की जा सकती हैं। वह इंसानी सभ्यता का संजय है। सभ्यता का शोकगीत गाना इतना आसान नहीं होता। ख़ुद को ख़ून में लिथाड़ना पड़ता है। हालांकि तमाम निराशाओं के बीच उसके ज़हन में कौंधता यह सवाल, सिर्फ सवाल नहीं, आरज़ू भी है। क्या वह अपनी ज़ख्मी उंगलियों के साथ एक बार फिर यहां आएंगे?”

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