Thursday, February 21, 2013

आन वर्सेस स्वाभिमान- सुनवाई जारी है

सवाल सिर्फ मंदिर का नहीं। स्वाभिमान का भी है। तुम साले बाबर की औलाद... पुरखों का पाप तो भोगोगे ही। बहुत हो गया। उसकी आवाज़ नफ़रत के कीचड़ में पूरी तरह से लिथड़ी हुई थी। सामने खड़ा करीब 13 साल का लड़का राय साहब के बेटे के इस बर्ताव से अचंभे में पड़ा, कुछ देर वहीं खड़ा रहा। वह अचानक उफनी इस नफ़रत का कारण जानना चाहता था। वह उससे पूछना चाहता था। लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका। उनकी आंखों में नफ़रत की भड़कती चिंगारी देख, उसकी अपनी आँखों में ख़ौफ़ उतर आया। वह चुपचाप वहां से लौट आया।

Tuesday, February 19, 2013

इतिहास का उल्था वाया अयोध्या

'उल्टी करते-करते जाह्नवी की आँखें उलट गई थीं। वह निश्छल और पवित्र कहां रह पाई! शिव की जटा से निकल, जब महावीर कर्ण के घर चम्पावती पहुंची थी, तब सपने में भी नहीं सोचा था कि सुजानगढ़ के लोग ही उसके साथ कभी ऐसा सलूक भी करेंगे। जाह्नवी तो सोचती थी कि यहां ज्ञान, मानवता और न्याय का पाठ पढ़ाया जाता है। असुरों को परास्त करने के लिए मथानी और रस्से की व्यवस्था जहां के लोगों ने की हो, उनके बारे में अशुभ विचार कैसे पनप सकते थे! लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति कब और कैसे बदल जाए, कौन जानता है?' कथा कहते-कहते बुज़ुर्ग का गला अचानक भर्रा उठा, उसकी लंबी सफेद दाढ़ी आटा-चक्की वाले ईंजन की तरह कांप रही थी। आँखें लाल स्याही से रंग चुकी थीं।

Thursday, February 14, 2013

प्रेम (उनके लिए जिन्होंने सबकुछ दांव पर लगा दिया)


प्रेम-1
आता है तो आ ही जाता है
दिल एक नादान परिंदा है
उम्र का पाबंद कहां
जग की रीतों को क्या जाने
मतवाला भौंरा है यह तो
सपनों की अपनी दुनिया का
थाम ले मन की डोर अगर तो
छोर थाम बस उड़ता जाता
सबकुछ सहता, हंसता रहता

Monday, February 4, 2013

आसान नहीं होता 'शोकगीत गाना'


तस्वीर में- ख़ालिद जावेद, डॉ. संजीव कुमार, प्रो. दुर्गा प्रसाद गुप्त, प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो. शम्सुलहक़ उस्मानी एवं अन्य

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का टैगोर हॉल श्रोताओं से खचाखच भरा था। जितने कुर्सियों पर बैठे थे, उससे कहीं ज्यादा लोग फ़र्श पर बैठे या फिर खड़े थे। मौका था हिन्दी विभाग की तरफ से सृजन एवं संवादकार्यक्रम के तहत कहानी पाठ का। उर्दू भाषा के सिद्धहस्त कथाकार डॉ. ख़ालिद जावेद, अपनी कहानी शोकगीत गानेवाला का जब पाठ कर रहे थे, वहां मौजूद श्रोता, एक अलग क़िस्म की दुनिया में गोते लगा रहे थे। पाठ के दौरान श्रोताओं के चेहरे पर आते-जाते हर्ष-विषाद के भिन्न भाव, कथा के साथ न सिर्फ उनके तादात्म्य का बोध करा रहे थे, बल्कि इस बात का अहसास भी दिला रहे थे कि यह कहानी उनके अंदर अरसे से काई की तरह जमे उन भावों पर भी खराशें डाल रही थी, जो शिल्प के अभाव में अभिव्यक्ति नहीं पा सके थे।

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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...