Thursday, December 6, 2012

आदमी भी कछुआ होता है

वह अंधेरे में बैठा
देखता रहा दीपक टिमटिमाता
छप्पर पर उल्लू बैठा रहा
खरों को उखाड़-उखाड़ ढूँढता रहा कीड़ा
देर तक सीली ज़मीन पर हाथ टिका कर
बैठने से उभरे चकत्ते में कुनमुनाती पीड़ा
बेख़बर ठण्ड से ठिठुरा गठरी बना
एकटक देखता रहा दीपक टिमटिमाता

Sunday, December 2, 2012

आज़ादी का अर्थ

इतने मदारी, इतने बंदर!
मस्त से बैठे कैम्प के अंदर
ठहाके लगाते, खैनी फांकते
अपनी-अपनी कमाई का हिसाब लगाते
अपने-अपने मजमे की भीड़ के बारे में
बातें करते...
मदोन्मत्त से इतराते-छितराते
भविष्य यानी कल की योजना बनाते
इलाकों का चयन, समय का चयन
ज़रूरी है, भीड़ इकट्ठी करने के लिए

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