Sunday, November 25, 2012

कुछ न समझे, ख़ुदा करे कोई

पर्वत ऊँचा होता है। अडिग होता है। पत्थरों का होता है। तभी सदियों तक तना होता है। माटी के ढूह की उम्र कभी नापी है, किसी ने? गली-मुहल्ले में हो या बियाबान में..., या तो शरारती बच्चे कूद-कूद कर उसका मलीदा बना देंगे या फिर हवा-पानी अपना काम कर जाएगी। ज्यादा अड़ियल और हिम्मती निकली तो मूसकराज उसे इतना खोखला बना देंगे कि वह दलदल जैसी तासीर ग्रहण कर लेगी।

मिट्टी का टीला ज्यादा दिनों तक अस्तित्व में नहीं रह सकता। उसके नहीं रहने के कारण, कुछ भी हो सकते हैं। जाड़े में आप मिट्टी के टीले पर बैठें या कि पहाड़ की चट्टान पर, दोनों ही ठंड का ही एहसास कराएंगे। गर्मी में दोनों की तासीर गर्म हो जाती है। वैसे एक बात मिट्टी के ढूह में ऐसी है जो इसे पहाड़ या चट्टान से अलग करती है। वह ये कि मिट्टी, पत्थरों की तरह न तो ज्यादा गर्म होती है और न ही ज्यादा ठंडी। यहां एक ख़ास किस्म का समन्वय होता है जो सकून बख्शता है।

हमें कई बार ऐसा लगा है कि मिट्टी के टीले की उम्र का इससे सीधा रिश्ता है। नरमी के कारण ही यह ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाता। जबकि पत्थर कड़ियल-अड़ियल होने की वजह से ही अपना अस्तित्व ज्यादा दिनों तक बनाए रखने में सफल होता है। तो क्या सौम्यता, मृदुता और आत्मीयता अल्पजीवी होती है? क्या घृणा, स्वार्थ और परजीवीपन दीर्घायु होने की गारंटी है?

संशय आधारहीन नहीं हैं। संशय के कारण भी हैं। हमने देखी है, पहाड़ों पर हरियाली। पत्थर की दरारों से फूटते अँखुए जो पता नहीं किन अदृश्य जड़ों के माध्यम से जीवन स्रोत तक अपनी पैठ बना लेते हैं। नमी और खाद खींच लाते हैं। पत्थर पर तो घास नहीं उगते। यह हम भी जानते हैं। पत्थर पर हरियाली नहीं जमती। हम भी वाकिफ़ हैं। पत्थर जीवन का पोषक नहीं हो सकता। सभी जानते हैं। फिर हरियाली कहाँ से आती है और घास उगती कैसे है?

पहाड़ सिर्फ पत्थरों से नहीं बनता। मिट्टी की बड़ी और बराबर मात्रा वहां मौजूद रहती है। भले ही पहाड़ पत्थरों के नाम हो, लेकिन उस पर जीवन, मिट्टी का अनुदान ही तो है! पहाड़ी पर चट्टानों के बीच दरारों में मिट्टी ही जमी होती है। चट्टानों पर भी मिट्टी की परत होती है। पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़ों को भी मिट्टी ही जोड़ती है। तात्पर्य यह कि पहाड़ पर हरियाली और जीवन पत्थरों से लिपटी मिट्टी की ही देन है। फिर भी वज़न पत्थर में ही होता है। पहाड़ को लोग पत्थरों का ही पर्यायवाची मानते हैं!

मिट्टी की पूजा होती है। लेकिन यह उतना विस्तारित नहीं है, जितना की पत्थर। जबकि सृष्टि बिना मिट्टी के संभव नहीं है। पत्थर नहीं होते तो भी जीवन संभव था। फिर भी पत्थर की अहमियत ज़्यादा है। ईश प्रतिमा हो या स्टैच्यू, घर का फर्श हो या मंदिर का चौतरा या कि गर्भगृह में रखी मूर्ति, मस्ज़िद का सेहन हो या इमाम का मिम्बर, या कि क़ाबा... पत्थर है वहां। अधिकांश पावन कर्म पत्थरों का संसर्ग डिमांड करते हैं। पूजा हो या हज या कुछ और। तो क्या पत्थर की असहिष्णुता और कठोरता, महानता और पवित्रता की निशानियां हैं? क्या सचमुच पत्थर अमरता और शक्ति का बोध कराता है?

नष्ट तो पत्थर ही होता है। घिसने की गति धीमी होती है। लेकिन घिस-घिस कर अंततः लुप्त हो जाना भी तो इसी की नियती है। मिट्टी तो कभी इतनी कठोर नहीं हुई कि उसको तोड़ने-खोदने के लिए श्रम के चरम पर जाना पड़े। वह तो सहज ही कणों में बदल जाती है। फिर नमी जुटा कर धरा बन जाती है। मिट्टी का विलय तो मिट्टी में ही होता है। लेकिन पत्थर का विलय पत्थर में नहीं होता। वह भी मिट्टी में ही मिल जाते हैं। तो क्या संसार में मिट्टी से इतर जो कुछ भी है, सबको अंततः मिट्टी में ही मिल जाना है? अगर हां, तब माटी ज्यादा अमूल्य और शक्तिशाली हुई! फिर इसकी अनदेखी क्यों?

पत्थर को हम कहीं इसलिए तवज्जो और सम्मान तो नहीं देते कि वह हमें नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है! पत्थर को हम इसलिए तो नहीं बेवजह खुद से चिपकाए रखते हैं कि यह चोट देने की ताक़त रखता है! हमने तो यही महसूस किया है। शायद इसीलिए पाषाणी प्रवृत्तियों को हमने अपने दिलों में स्थापित कर रखा है! जो कुछ पशुवत या पाषाणवत् है, संसार उसके सामने नत्-मस्तक। जो कुछ भी मृदु और कोमल है, उपेक्षा या कि दलन भाव प्रबल।

हमारे देश में ही नहीं। दुनिया के तमाम मुल्कों में, यही कुछ नज़र आ रहा है। चारों तरफ संघर्ष। कहीं मुल्क, कहीं माटी की जंग। कहीं पाषाणी मानव तो कहीं संहारक का तांडव। नफ़रत और स्वार्थ का बाज़ार बढ़ता ही जा रहा है। प्रेम और त्याग जैसी भावनाएं विलुप्ति के कगार पर हैं। लोकतंत्र की आड़ में अल्पसंख्यक प्रभुवर्ग का सत्ता-लाभ। धर्म के नाम पर नफरत और फासिज्म का उद्वेगी विस्तार। विकास के नाम पर उद्योग और उद्योग के नाम पर शोषण। शोषण उनका, जो प्रकृति के संरक्षक हैं।

क्या वाकई महाप्रलय या महाविस्फोट सृष्टि के लिए ज़रूरी है? सृष्टि के लिए संहार? बड़ी अटपटी बात है ना! जो नहीं है, उसके लिए... जो है, उसको खत्म कर देना। क्या हम पाषाण युग से वाकई बाहर निकल चुके हैं? हालात  से तो ऐसा नहीं लगता! माटी पर चलते, माटी से बनते, माटी से जीते, माटी में मिलते, हम मनुष्य- पाषाण की पूजा में तब से अब तक लगे ही हैं। पाषाणों का मनोबल बढ़ता ही जाता है। पहाड़ अड़े और खड़े तो रहेंगे ही, जब तक मिट्टी है।

(वैसे क़सम ग़ालिब की- बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ। कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई।।) 

*व्यंग्य यात्रा के जनवरी-मार्च(2013) अंक में प्रकाशित

5 comments:

  1. Replies
    1. Bahut khoob Akbar bahi...कोई न समझे ख़ुदा करे .........

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  2. अच्छा व्यंग्य करते हो भाई..........

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  3. एक सामान्य सी बात को अपनी कहन और समझ से विशिष्ट बना दिया आपने अकबर. खूब शुभकामनाएं

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