Sunday, November 25, 2012

कुछ न समझे, ख़ुदा करे कोई

पर्वत ऊँचा होता है। अडिग होता है। पत्थरों का होता है। तभी सदियों तक तना होता है। माटी के ढूह की उम्र कभी नापी है, किसी ने? गली-मुहल्ले में हो या बियाबान में..., या तो शरारती बच्चे कूद-कूद कर उसका मलीदा बना देंगे या फिर हवा-पानी अपना काम कर जाएगी। ज्यादा अड़ियल और हिम्मती निकली तो मूसकराज उसे इतना खोखला बना देंगे कि वह दलदल जैसी तासीर ग्रहण कर लेगी।

मिट्टी का टीला ज्यादा दिनों तक अस्तित्व में नहीं रह सकता। उसके नहीं रहने के कारण, कुछ भी हो सकते हैं। जाड़े में आप मिट्टी के टीले पर बैठें या कि पहाड़ की चट्टान पर, दोनों ही ठंड का ही एहसास कराएंगे। गर्मी में दोनों की तासीर गर्म हो जाती है। वैसे एक बात मिट्टी के ढूह में ऐसी है जो इसे पहाड़ या चट्टान से अलग करती है। वह ये कि मिट्टी, पत्थरों की तरह न तो ज्यादा गर्म होती है और न ही ज्यादा ठंडी। यहां एक ख़ास किस्म का समन्वय होता है जो सकून बख्शता है।

Saturday, November 17, 2012

थोड़ा वक्त लगेगा अभी



मीडिया पर लोग उंगली क्यों उठाते हैं? मीडिया कुछ मामलों में इतना दकियानूस क्यों है? कंटेंट को लेकर बेबहरापन क्यों है? मीडियाकर्मियों के साथ इन-हाउस शोषण पर वरिष्ठ चुप क्यों रहते हैं? जन-सरोकार से जुड़ी ख़बरें अक्सर छूट क्यों जाती हैं? मीडियाकर्म अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है? जब पेड न्यूज़ की सभी आलोचना करते हैं तो फिर इस प्रवृति पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया उथली भाव-भंगिमा की गिरफ्त में क्यों है? क्या सचमुच मीडिया सत्ता का चापलूस या कि वर्ग विशेष का प्रतिनिधि बनकर रह गया है? मीडिया में आमजन कहां ठहरते हैं? सवाल इतने हैं कि दिमाग कभी-कभी विद्रोह को आतुर हो जाता है। लेकिन जवाब...?

Friday, November 9, 2012

बूँदों का तिलिस्म


उमस और ऊब का माहौल 
मन को कोंचते... 
ख़्वाहिस को बढ़ाते... 
बिल्कुल प्यास की तरह
जबकि नल की टोटी 
चिढ़ाती रहती !
बूंद-बूंद पानी टपका कर...
हाथों की अंजुरी बना कर 
ऊँकड़ूं बैठा, आगे को झुका...

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