Monday, October 1, 2012

बदले-बदले सरकार नज़र आते हैं !


बहुत शोर था तेरे सनमख़ाने में, तू शेर है, शीरीं है, शहंशाह है। जनता का हमदर्द, बड़ा हाकिम है। सुनता है उन्हें तू, देता है तसल्ली। हकीकत है या भ्रम है? सब पर्दे का करम है। एक दौर था। जब तुमसे बड़ा, तुमसे अच्छा कोई न था। अब एक दौर है। जब तुमसे बुरा कोई नहीं।


ऐसा हुआ क्या? ऐसा किया क्या? जिस जनता ने आपको सर-आँखों पर बिठाया, वही जनता अब चप्पल दिखा रही है! जो जनता कभी आपको सुनने के लिए दूर-दूर से सभा-स्थल तक आती थी। जिन्हें आपकी बातों पर भरोसा हुआ करता था। वही अब आपको झूठा बता रही है।मुख्यमंत्री जी आप मानें या न मानें, कुछ-न-कुछ, कहीं-न-कहीं गड़बड़ ज़रूर है।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते। आपको अच्छी तरह याद होगा। जनता ने आपको ऐसा बहुमत दिया, जिसकी कल्पना आपने भी नहीं की थी। विश्वास था तभी तो ऐसा हुआ। तो अब विश्वास क्यों नहीं? पहले आप कहते थे क़ानून से बड़ा कोई नहीं। अब क्या हुआ कि आपको अपनी हिफाजत के लिए एक दबंग की ज़रूरत पड़ गई

आप तो जनता से सीधा संवाद चाहते थे। आप तो जनता की ज़रूरत को समझना चाहते थे। आपने जनता दरबार लगाना शुरू किया था। बहुत कुछ आपने ही बिहार में पहली बार किया था। गिनाने की ज़रूरत नहीं। लेकिन जनता को लगता है कि आपने ज़ुबान से ज्यादा किया, धरातल पर बहुत कम किया। ऐसे में सब्र आखिर कब तक?

कहां तो तय था कि सुशासन में जनता को उसका हक़ मिलेगा! फिर जनता को सड़क पर उतरना क्यों पड़ा? आपने कहा, अपराधी डर गए हैं तो रोज़ाना हत्या-लूट, बलात्कार और भ्रष्टाचार की घटनाएँ क्यों हो रही हैं? जनता नाराज़ होगी तो शिकायत किससे करेगी? आप तो अब पास बंटवाते हैं और चुनिंदा लोगों को ही अपनी सभा में बुलवाते हैं।

सुशासन में सबकुछ नियमों के तहत होना था ना? फिर आप ही बताइए, ये धौंस-धमकी का दौर किसने शुरू कर दिया है। आपकी पार्टी का दबंग नेता पुलिस की कार्बाईन हाथ में लहराता है। विरोध कर रहे लोगों को धमकाता है। पीटता है। आप कहते हैं, ग़लत क्या है?

सुशासन स्थापित करने वाली सरकार का ही एक मंत्री अधिकारियों को सीआर खराब करने की धमकी देता है। आपकी कैबिनेट का ही सदस्य दर्जनों नरसंहारों के आरोपी को गांधीवादी बतलाता है। खुलेआम कहता है कि अगर आज वो मंत्रिमंडल में है तो सिर्फ उसी की वजह से है। आपने तो विकास के नाम पर वोट मांगा था, फिर अचानक जाति बीच में कहां से आ गई?

आप तो जनता के प्रतिनिधि बनकर उभरे थे। पैरोकार बनकर उभरे थे। फिर अचानक जनता से आप कार्यकर्ता पर क्यों आ गए? कहीं ऐसा तो नहीं कि जनता आपके मानदंडों पर खरी नहीं उतर पा रही? मीडिया फ्रेंडली मुख्यमंत्री अब अचानक मीडिया से दूरी क्यों बरतने लगा?

हम जानते हैं आप नहीं मानेंगे। लेकिन सच तो सच ही है। बदले-बदले नज़र आ रहे हैं सरकार! वैसे एक आइडिया है। आप शासक हैं। चाहें तो कर सकते हैं। जनता ही बदल दीजिए। बहुत नासमझ है ये!!

10 comments:

  1. सुशासन बाबू को आपने सच से रु ब रू करा दिया है।

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  2. एक शेर याद आ गया,
    हम जब भी मिले उनसे खंदा पेशानी के साथ,
    वो पेश आये हमसे फितरो सामानी के साथ.....!

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  3. प्रभुता पाय मद न होय.........!

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  4. बहुत साहस के साथ लिखा गया है.......बधाई.

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  5. aaina saaf karke poori chhavi dikha di. badhai!

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  6. मुद्दे की पकड अलावा कलम की धार और बयां करने का अंदाज़ भी निखरा हुआ है. ऐसी कलम और अंदाज़ को कुछ और बेहतर मौके मिलने चाहिए.

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  7. बहुत खुब अकबर जी , अपने राज्य के गार्जियन को बड़े ही शराफत से खुबसुरत आयना दिखाया है ।आयना कितना भी खुबसुरत क्यूँ न हो चेहरा तो वही रहता है । ऐसे ही लिखते रहिये , हमारे समाज को ऐसे खुबसुरत आयना दिखाने वालोँ की बहुत जरुरत है ।आभार । *अंशु माला*

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