Monday, September 10, 2012

मूव ऑन



भारत कभी सोने की चिड़िया तो कभी गुलामों का देश रहा। भारत कभी पंचशील सिद्धांत के कारण विख्यात रहा। भारत कभी विकासशील, दलित-दमित देशों का उद्धारक तो कभी अगुआ रहा। भारत कभी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध के दौरान तीसरी शक्ति यानी गुट-निरपेक्ष आंदोलन का जनक रहा। भारत कभी सोवियत संघ के प्रभाव में समाजवाद की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाने वाला देश रहा। भारत अमेरिका के पूंजीवादी और विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने वाला देश भी रहा। जब कभी अफ्रीकी, एशियाई या फिर लातीन अमेरिकी ग़रीब मुल्क संकट में पड़ा, उसको संबल और मदद पहुंचाने वाला पहला देश भी भारत ही रहा।

जब कभी वैश्विक मंच पर नव-पूंजीवाद ने वर्चस्ववादी नीतियों को जबरन ग़रीब मुल्कों पर थोपने की कोशिश की तो विरोध का पहला स्वर इसी मुल्क का रहा। गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, मिश्रित संस्कृति का गौरवपूर्ण उदाहरण। पूंजीवाद और समाजवाद का युगल-बिंब। परंपरा और आधुनिकता का संगम। भाषाई विविधता। सामाजिक समरसता। अनेकता में एकता। और भी न जाने क्या-कुछ..। तात्पर्य बस इतना कि भारत एक विश्वसनीय राष्ट्र रहा।

सोवियत संघ टूटा। साम्यवाद किताबी होता गया। इंदिरा गई, राजीव आए। राजीव के बाद नरसिंह आए। राष्ट्र-दृष्टि बदली। विकासशील देश, विकसित बनने को मचल उठा। विकसित होने की जो पहली शर्त रखी गई, वो यह कि बाज़ार खोलो। खोलने-खुलने का मॉडर्न स्टाईल पसंद नहीं तो कोई बात नहीं। पुरानी हिन्दी फिल्मों की हिरोईन की तरह ही सही, मगर घूंघट के पट खोलो ज़रूर। भारत का बाज़ार आंशिक रूप से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खुला। बाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो चिलमन थोड़ा और उठा। वक्त के साथ-साथ विरोध का स्वर मंद पड़ा। जनता आदी होने लगी। यानी देश ने नई क्रांति का कमल-मुख देख लिया।

मीडिया क्रांति। संचार क्रांति। सांस्कृतिक क्रांति। औद्योगिक क्रांति। सामाजिक क्रांति। कृषि क्रांति। सियासी क्रांति। वाममुखी क्रांति। दक्षिणाभिमुख क्रांति। श्वेत-स्याम के बाद सतरंगी क्रांति। सचेत क्रांति। अचेत क्रांति। ये क्रांति-वो क्रांति। नौबत यहां तक पहुंची कि फक्कड़ बुड्ढा खीझ कर चिल्ला उठा- भ्रांति-भ्रांति। क्रांतियों का सिलसिला अब भी थमा नहीं है। अन्ना और बाबा ने भी अपने-अपने अंदाज़ में क्रांति ही की है। क्रांतियों के दौर में विकास की होड़ भी लगी ही रही। करीब ढाई दशकों से विकसित राष्ट्र की होड़ जारी है। परमाणु बम के मामले में हम थोड़े कमज़ोर पड़ रहे थे तो ये काम भी हमने दशकों पहले ही पूरा कर लिया।

निरक्षरता का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है। बेटे ही नहीं बेटियां भी पढ़ रही हैं। बेटे-बेटी के बीच का भेद तेज़ी से मिट रहा है। पेशे को लेकर हीन-भावना दम तोड़ने की कगार पर है। साधु भाव और वासुधैव कुटुम्बकम का सिद्धांत तिरोहित होता जा रहा है। साईं इतना दीजिए... कि जगह विकास गली अति सांकरि, या में दो न समाए ने ले ली है। विकास दर के मामले में भारत विकसित देशों को टक्कर दे रहा है। देश में अरबपतियों की तादाद लगातार बढ़ रही है। संसद में नव-धनाढ्य अब बहुसंख्यक हैं। जनसेवा-समाजसेवा में अब मेवा मिलने लगा है। जनता अब सचमुच वोट करने लगी है। लोकतंत्र सचमुच मज़बूत हो कर उभरा है। पुलिस से अब जनता नहीं डरती। पुलिस डंडे फटकारने की बजाय पुचकारने की ट्रेनिंग ले रही है।
 
उपलब्धियों और ऐतिहासिक गौरव के मामले में भारत पूरी तरह से बिहार बन गया है। हमें इतराना तो चाहिए ही, हम इतरा भी रहे हैं। गौरवपूर्ण इतिहास का होना क्या कम बड़ी बात है? कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है। सोवियत के हश्र के बाद भी समाजवाद की बात आपको बेमानी नहीं लगती? पूंजी के बिना विकास की बात मूर्खता ही तो है। अमेरिका की ताक़त किस मुल्क को आकर्षित नहीं करती? पंचशील की अहमियत भारत-चीन युद्ध से साबित हो गई थी। गुट-निरपेक्ष आंदोलन वास्तव में कितना निरपेक्ष था, कौन नहीं जानता? भारत की प्रारंभिक विदेश नीति का खामियाजा क्या हमने भुगता नहीं? सिर्फ श्रम-शक्ति को लेकर कोई चाटेगा क्या? पूंजी का दुर्भेद-दुर्ग जीतना भी जरूरी है।

आपको क्या लगता है? आज का भारत एक दिन में बन गया है? बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं। हाशिये के राष्ट्रों का मुखिया कहलाने का मोह छोड़ना पड़ा है। कूटनीतिक स्तर पर पप्पू बनना पड़ा है। विकास की खातिर कुबेर की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी है। घर को शॉप में तब्दील करना पड़ा है। चहारदिवारी तोड़नी पड़ी है। कमरे का पर्दा नोंचना पड़ा है। मेले का तंबू उखाड़ कर मॉल के लिए जगह बनानी पड़ी है। विकास तो त्याग मांगता है। अब एक अमीर बनेगा तो दस को ग़रीब होना ही होगा। सब में बंटेगा तो आप ही सोचिए क्या बचेगा?

ज़माना दकियानूसी सोच का नहीं रहा। शील-सदाचार की मार्केट वैल्यू बिल्कुल भी नहीं है। कौड़ी के मोल भी कोई लेने को तैयार नहीं। फिर पुरानी बातों का स्यापा करने में समय को क्यों नष्ट करें? ठीक है, हम कल विश्वसनीय थे। अब नहीं हैं। हम कल तक नेति-नेति किया करते थे। अब नीति-नीति करते हैं। ज़रूरत के हिसाब से बदलते रहते हैं। कल तक हमारे मुल्क का प्रधानमंत्री अच्छा है, भला है या बुरा है-जनता तय करती थी। अब टाईम मैग्ज़ीन तय करती है। विश्वमंच पर भारत का प्रधानमंत्री कभी सम्माननीय होता था। अब अमेरिकी राष्ट्रपति ही नहीं, अमेरिका और यूरोप के अख़बार भी बुरा-भला सुना जाते हैं और गाऊदी बोल कर निकल लेता है। लेकिन इन बातों का कोई मतलब नहीं है। पूंजी के लिए निवेश जरूरी है। और निवेश के लिए बाज़ार।

आम आदमी की छद्म परिभाषा पर ध्यान देना राष्ट्रद्रोह है। आम आदमी वह है, जिसको रोटी, कपड़ा और मकान की बजाय पूंजी की चिंता हो। देश में आम आदमी की तादाद भी तो पारसी समुदाय जैसी है। विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी थी। किसी तरह पूंजीवादी नीतियों की मदद से इनकी वंश-वृद्धि शुरू हुई है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की रफ्तार बढ़ी है। उम्मीद है जल्दी ही देश विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ जाएगा। लेकिन जनता तमाम किए-धरे पर पानी फेरने की उतावली में है। इतना खाती है कि महंगाई बढ़ा देती है। लोहा-कोयला निकालने में भी पैंतरेबाज़ी।

विरोध के लिए भी ऐसे तरीके ईजाद करती है कि दुश्मनों को दुर-छीः का मौका मिल जाता है। बांध बनेगा तभी तो बिजली बनेगी। बिजली बनी तो रोशनी मिलेगी। उद्योग लगेंगे। लेकिन इन्हें समझाए कौन? अब देखिए पानी में खड़े हो गए हैं। यह कौन सा तरीका है? आगे बढ़ना है तो मेहनत करो। सरकार तो सभी के लिए समान अवसर की व्यवस्था में लगी ही रही है।

बुद्धिजीवी तबके ने तो और भी अंधेर मचा रखी है। सारी सुविधाएं सरकार से लेते हैं। यात्रा-दर-यात्रा। सुविधा-दर-सुविधा। अवसर-दर-अवसर। फिर भी चीख़ेंगे- यह गलत तो  वह ग़लत। इतिहास जानने तक तो ठीक है, लेकिन उसका अनुसरण! कितनी बेतुकी बात है? मूव ऑन के ज़माने में हम यह थे, हम वह थे..!!! जब जो थे, तब थे ना। अब तो जो हैं, सो हैं।

परंपरा-संस्कृति, नीति-रीति। बदलना तो चाहिए ही। बदल गए तो कौन सा आसमान फट पड़ा। वैसे भी जब रिश्तों में स्थिरता नहीं रही तो देश और उसकी नीतियों में स्थिरता कहां से आ जाएगी? निठल्लों की तरह बैठे रहेंगे और बस बोलते रहेंगे। अरे मूव कीजिए... मूव...। आप मूव नहीं करेंगे तो आधुनिक युग का संत और विश्व-शांति का अगुआ आपकी इतनी और ऐसी ठुकाई करेगा कि मूव लगाने से भी राहत नहीं मिलेगी। देख नहीं रहे- अपने मनमोहन का क्या हाल बना रखा है?  

16 comments:

  1. सच कहूँ तो ज्ञान की अति नुमाईश हो गयी पर तुम्हारे लेख की एक बात निराली है की एक बार पढना शुरू करे तो अंत तक पढने का मन करता. कविता की लय लिए यह तुम्हारा मूव ऑन काफी दिलचस्प है मेरे मेरी आत्मा को पोरी तरह नहीं छू पाया

    मोनू

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  2. सारी बातें सटीक है,,,इतिहास में भी आपने गोते लगवा दिए, लेकिन अगर सभी मापदंडो पर टोला जाये तो आप भारी तो पड़ोगे ही...नहीं तो हम भी तराजू में बैठ जायेंगे आपके साथ.....पर हर खास ओ आम आदमी की बात ये है की इसे पढ़ कर अपनी लाइन पकड कर बैठ जाएगा,,,,अच्छी तस्वीर है आज के भारत की....पर तुम्हारी कलम से निकला ये कंडेंस्ड मिल्क, ऐसा है की पानी मिलाये जाओ और ये बढता ही जाए....लेकिन जो तीसरे पहरे की अंतिम तीन लाइनों में तो पटाखा छोड़ने वाले का जिक्र आया ....उसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ा...उसकी भरपाई नहीं हो पाएगी...कभी भी.....तीन बार पढ़ चूका हूँ हर बार नयी बात सामने आती है....

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  3. बढ़िया है महराज ... अब जब अपने देश को देखा जाए तो लगता है के क्या हो रहा है ये और कोई रास्ता भी नही दीख पड़ता है ...

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  4. होश हो और फिर जोश आ जाय तो कलम की धार के क्या कहने. अच्छी सोच और पकड़. आगे की बानगी का इंतज़ार.

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  5. ये लेख है-
    १. कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा.
    २. सारसंग्रहवादी.

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  6. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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  7. kuch sahi kuch galat , kuch kalpna kuch tathya .. mila jula sa lekh , aaj ki sanskriti jaisa hi hai .. jaha kuch bhi sthir nahi fir bhi sab chal raha hai .. "Raja dashrath yudhh bhumi me hai aur rath ki keel nikal chuki hai , kaikayi ne kuch poorv dekh liya aur apni ungli se pahiya sadh liya " yudhh bhumi to hamesha naye naye yudhh / yodhhayon ke sath tayaar hi rahti hai ..
    katah aur vastvikta me bahut fark hai , aaj bhi maulik moolbhoot avshayktao se dedh ubar nahi paaya (vajah koi bhi ho sakti hai , rajnaitik arthik ashiksha bla bla )
    aaj bhi hum moolbhoot jimmedariya uthane me saksham nahi aisa nahi ki hum utha nahi sakte , balki iske thik vipreet , charitr nirman me swarthparta jyada aur jyada ghul mil gayi hai , bachha bachha , pahle swayam ka bhala chahta hai baad me desh ka ..
    bade budhho ki jivan shaili ke liye na gharo me suvidhaye hai aur na hi desh me aisa koi suvidha uplabdh karane ka vichar hai .......... apni dhapli apna raag , jai ho !!

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    Replies
    1. with spellin correction : kuch sahi kuch galat , kuch kalpna kuch tathya .. mila jula sa lekh hai , aaj ki sanskriti jaisa hi hai .. jaha kuch bhi sthir nahi fir bhi sab chal raha hai ..
      "Raja dashrath yudhh bhumi me hai aur rath ki keel nikal chuki hai , kaikayi ne kuch poorv dekh liya aur apni ungli se pahiya sadh liya "
      yudhh bhumi to hamesha naye naye yudhh / yodhhayon ke sath tayaar hi rahti hai ..
      * katha aur vastvikta me bahut fark hai , aaj bhi maulik moolbhoot avshayktao se *desh ubar nahi paaya (vajah koi bhi ho sakti hai , rajnaitik arthik ashiksha bla bla )
      aaj bhi hum moolbhoot jimmedariya uthane me saksham nahi aisa nahi ki hum utha nahi sakte , balki iske thik vipreet , charitr nirman me swarthparta jyada aur jyada ghul mil gayi hai , bachha bachha , pahle swayam ka bhala chahta hai baad me desh ka ..
      bade budhho ki jivan shaili ke liye na gharo me suvidhaye hai aur na hi desh me aisa koi suvidha uplabdh karane ka vichar hai .......... apni dhapli apna raag , jai ho !!Satyamev jayte !!

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  8. अच्‍छा लेख है।

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  9. अच्छा व्यंग्य है...

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  10. बहुत सारी सूचनाओं के साथ....वर्तमान में पूंजीवादी विद्रूपता पर अपने छोटे- छोटे वाक्यों में व्यंग्य का तल्खी भरा प्रहार - 'अबे अंधेरे और फैला अपने अन्धेरेपन का उन्माद को |'..'.हारेंगे नहीं ...आ गया हूँ अपने सफ़ेद उजले शब्दों के साथ ...'

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