Tuesday, August 7, 2012

कुछ तो ख़ता, कुछ ख़ब्त भी है


लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सियासी वितंडावाद है। भोगवाद है। विकासवाद है। समाजवाद है। पूंजीवाद है। संचार युग है। मीडिया है। बाज़ार है। सराय है। यानी जो कुछ है- प्रचुर है। कोई खुशी तो कोई गम में चूर है। जिसके पास नहीं है, वह मजबूर है। जिसके पास है, वह मग़रूर है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो नहीं है। यंत्र-तंत्र, व्यवस्था, पैरोकार, बिचौलिए, सरदार, सरकार, नेता, सत्ता, कुर्सी, मंत्री, संतरी, चोर, पहरेदार...
यानी सबकुछ तो उपलब्ध है। अपनी सुविधा से चुनिए, गुनिए या फिर सिर धुनिए। कहीं कोई छवि धूमिल है, कहीं कोई चमकदार है। अव्यवस्था है। आतंकवाद है। राष्ट्रभक्त हैं, गद्दार हैं। पुलिस है, सेना है। नक्सली हैं, मुठभेड़ है। कहीं कोई शहीद तो कहीं कोई ढेर है। न्याय है, अन्याय है। हत्या है, बलात्कार है। कहीं रौब है तो कहीं अत्याचार है। शहर है, सभ्य है। गांव है, गंवार है। अच्छी है, बुरी है, लूली है, लंगड़ी है, कमज़ोर है, मज़बूत है, जैसी भी है लोकतांत्रिक सरकार है। कहीं वाहवाही है, कहीं किरकिरी है। यानी हींग है, हर्रे है, फिटकिरी है।

कहने को तो सबकुछ है। लेकिन पता नहीं क्यों, अक्सर कमी ही महसूस होती रही है। दोस्तों का आरोप कि बात-बात में मीन-मेख निकालने वाले पेशे का आदमी, भला अच्छाई देखे तो देखे कैसे! सोहबत भी रही तो शब्दों से, संवेदनाओं से और रही-सही कसर विचारधारा ने पूरी कर दी। बाज़ार फैलने लगा तो सांस्कृतिक विचलन का ख़ौफ़। औद्योगीकरण की बात उठी तो ज़मीन छिन जाने का भय। आबादी बढ़ी तो रोजगार का संकट। स्कूलों की खस्ता हालत। बच्चों में कुपोषण। महिलाओं में एनीमिया। पुरुषों में हाईपर टेंशन और ब्लड प्रेशर की शिकायत। कल-कारखाने खुलने लगे। गाड़ियां बढ़ने लगीं। सड़कें चौड़ी होने लगीं तो प्रदूषण का डर, बिचौलियों की धमक, सरकारी खजाने की लूट-खसोट, कमीशन, रिश्वत, रोटी, रोना और न जाने क्या-क्या...। मानो ज़िन्दगी, ज़िन्दगी न रही, ख़बर हो गई।

साभार- इस्माईल दोगान
देश बढ़ने लगा, बाज़ार खुलने लगे तो परंपरागत पेशों पर संकट मंडराया, झंडा बुलंद। सड़क नहीं थी, मरीज़ अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ गया, झंडा बुलंद। सड़क बनने लगी, लोगों की ज़मीन का अधिग्रहण और झंडा बुलंद। यानी कहीं, कोई भी ऐसा काम या कदम नहीं, जहां झंडा बुलंद करने की ज़रूरत नहीं हो। देश ने मीडिया क्रांति देखी। इसकी अच्छाइयां देखीं। इसकी ताक़त देखी। ओछी हरकतें भी देखीं और दोरंगी नीति भी देख ली। सोझो दिख्यो, ओछो दिख्यो। कोई बात नहीं। कल का इज्ज़तदार पत्रकार, आज का ज़लील-कमीन पत्रकार। बदलता ही रहा है, जीवन से लेकर जगत तक, बारी-बारी एक-एक मुहावरा लगातार।

बातें अटपटी लग रही होंगी। लेकिन आज जिस दौर में हम जी रहे हैं, वहां कुछ भी संभव है और अगर आपको अटपटी लगती है तो ये आपके पिछड़ेपन की निशानी है। हम शब्दों के मूल अर्थ का क़त्ल करने में माहिर हैं। आपको याद होगा, कभी एकाध आतंकवादी पकड़ाते थे। लोग सुनकर भौंचक रह जाते थे। हमने इस शब्द को इतना घिस दिया है कि अब आतंकवाद मामूली लगने लगा है। वैसे ख़ौफ़ को पैदा तो हमने इसलिए किया था कि आप डरें और हमारी बकवास सुनें। लेकिन हमने इतना डराया कि अब आप चौंकते नहीं, बदन में झुरझुरी नहीं आती। हमने शुरू में ही आपको इतना डरा दिया था कि अब आपके जहन-ओ-दिल से डर ही निकल गया। पुलिस ने भी कुछ कम कमाल नहीं किए, हमारे इस नेक काम में उसने भी पूरा साथ निभाया है और हर दूसरा टुटपुंजिया आज के दौर में आतंकवादी करार दे दिया जाता है।

हम देशभक्त हैं। भ्रष्टाचार में लिथड़े नेता की चापलूसी कर सकते हैं। नफ़रत के बीज बो सकते हैं। लूट सकते हैं, कत्ल कर सकते हैं। लेकिन गद्दारी नहीं कर सकते। ये नया मुहावरा है। मीडिया ने गढ़ा है। जैसे राष्ट्रवाद का एक मुहावरा आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गढ़ रखा है। शब्द महत्वपूर्ण नहीं रहे। शब्दों का जो स्टॉक हमारे पास है, वो बहुत कम है। ख़बरों का दायरा तो बहुत बड़ा है, लेकिन अपनी सुविधा के लिए हमने उसे भी संकुचित कर दिया है। ख़बर वही है, जिसके बहाने आप स्टूडियो में खड़े एंकर नाम के प्राणी को चीखने पर मजबूर कर सकें। एंकर वही बेहतर है, जिसमें छोटी-छोटी घटनाओं पर भी बेवजह चीखने की क्षमता हो। वो क्या बोलता है, क्या पूछता है, उसकी बौद्धिक क्षमता कितनी है? ये सब बेकार के सवाल हैं। चीख़ना ज़रूरी है क्योंकि ये आपको ठिठकने पर मजबूर करती है। ऐसी धारणा अब आम हो चली है कि तेज़ और शानदार चीख़ को टीआरपी की भीख मिलती है।

मीडिया समाजसेवा का सशक्त माध्यम है। पता नहीं ये अवधारणा किसकी है, लेकिन जिसकी भी है, उसका वास्तविक जीवन-जगत से कोई संबंध नहीं है। ऐतिहासिक तथ्य तो यही कि मीडिया का गहरा नाता बाज़ार से रहा है। 1929 में जब विश्व महान आर्थिक मंदी का शिकार था। उस वक्त बाज़ार को हिम्मत-ढाढ़स बंधाने का पुनीत कार्य रेडियो ने किया था। जबकि बाज़ार की चमक और रौनक द्वितीय विश्व युद्ध से लौटी थी। इतिहासकारों ने इन चीज़ों को बड़ी गहराई से देखा, जांचा, परखा और लिखा है। लिहाजा इस पर कुछ ज्यादा लिखने-कहने की ज़रूरत नहीं है।

हमारा बुद्धिजीवी तबका अक्सर ये शिकायत करता है कि मीडिया में साहित्य को जगह नहीं मिलती। पहले जहां अख़बारों का संपादन साहित्यिक हस्तियों के हाथ हुआ करता था। अब वहां मार्केट फ्रेंडली लोगों को बिठाया जाता है। साहित्य, समाज और सियासी समझ से संपादन कौशल का अब कुछ ज्यादा लेना-देना नहीं रहा। इलेक्ट्रॉनिक की तो ख़ैर बात ही छोड़ दें, अब प्रिंट में भी साहित्य के लिए बमुश्किल ही जगह निकल पाती है। लेकिन ये शिकायत कितनी जायज़ है? सभी जानते हैं, बाजारीकरण और दिखने-बिकने की नयी संस्कृति ने बहुत सी अहम चीज़ों को जबरन नेपथ्य में धकेल दिया है। साहित्य भी उन्हीं में से एक है। वैसे भी लिखने वाले में छपने की भूख होनी चाहिए, दिखने की नहीं।

अख़बारों ने बेरुख़ी अख्तियार कर ली है। सच है, लेकिन लघु पत्रिकाओं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉग्स ने इस कमी को भलिभांति दूर करने की कोशिश की है और ये बात बिल्कुल सच है कि साहित्य को प्रचार-प्रसार के लिए पहले से ज्यादा सशक्त माध्यम आज उपलब्ध हैं। साहित्य का पाठक और टीवी का दर्शक, चारित्रिक स्तर पर बिल्कुल अलग-अलग है। फिर भी टीवी से शिकायत! जिन्हें ये शिकायत है, वह ये भूल जाते हैं कि टीवी देखने-दिखाने की चीज़ है। टीवी तस्वीरों का जंगल है। साहित्य शब्दों का बाग़ीचा। कहीं कोई मेल ही नहीं है। फिर भी शिकायत!!

शिकायतें कितनी जायज़ हैं, ये भी एक बड़ा सवाल है। लेकिन जवाब ढूंढने की फुर्सत किसे है? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का काम दिखाना है। दिखाया वही जाएगा जो दिखने लायक़ होगा, जो बिकने लायक़ होगा। लेकिन पता नहीं क्यों जो लोग लिखने वाले हैं, वह भी दिखना चाहते हैं। ये बड़े ही अजीब किस्म की भूख है। लिखने वाले को छपने की भूख होती थी। लेकिन अब वक्त के साथ सोच बदली है और वो दिखना चाहते हैं। दिखाओ तो अच्छे हो, नहीं दिखाओ तो पता नहीं क्या-क्या दिखाते रहते हैं! टीवी एक से डेढ़ मिनट का पैकेज डिमांड करती है। मुद्दों की बात करती है। कहानी पढ़ने के लिए है, सुनाने के लिए है। दिखाने के लिए नहीं। गंभीर कहानी या कविता का पाठक तो हो सकता है, दर्शक नहीं होता। साहित्य को टेलीविज़न की ज़रूरत भी नहीं है।

कटरीना का ठुमका। करीना की नज़ाकत। जेनेलिया की शरारत। लता की आवाज़। ए आर रहमान का म्यूज़िक। दिखाने-सुनाने के लिए ये सब क्या कम हैं जो टीवी वाले बुड्ढे साहित्यकारों, आलोचकों से स्क्रीन को भरने की मूर्खतापूर्ण कोशिश करें? मीडिया ने थोड़ी न समाजसेवा या कि साहित्य सेवा का ठेका ले रखा है! मीडिया ने तो अरसा पहले चीखना शुरू कर दिया था और चीख़-चीख़ कर ये कह दिया था कि हमारे यहां वही चलेगा जो लोग देखेंगे। मसलन नेताओं के बीच लाईव थुक्कम-फजीहत, तू-तू, मैं-मैं, राखी का स्वयंवर, गोविंदा का थप्पड़ और नेताओं पर लोगों की चप्पल। इससे फुर्सत मिली तो बलात्कार, अवैध सम्बंधों की वजह से हत्या या फिर प्रेमी-प्रेमिका का घर परित्याग या फिर मजनूं की सरे-राह पिटाई। कुछ भी तो अघोषित नहीं है। फिर हाय-तौबा क्यों?

टीवी की भाषा को लेकर चकल्लस क्यों..? शब्दों पर आप जाते ही क्यों हैं..? क्या मालिकों ने चैनल की बागडोर भाषाविदों को सौंप रखी है? जी, नहीं आप मुग़ालते में न रहें। टीवी दृश्य माध्यम है। यहां दृश्य ही शब्द हैं। दृश्य ही भाव हैं। एंकर तो बस गूंगापन दूर करने के लिए है, चीखने के लिए है। अगर आप उससे विषय की गहराई या ख़बर की बारीकी की उम्मीद रखते हैं तो इसमें बेचारे एंकर का क्या कसूर?

मीडिया अपनी राह से भटका नहीं है। वह वही कर रहा है, जो करने की जिम्मेदारी उस पर है, जो वह करना चाहता है। लक्स कोज़ी, नैपकीन, टॉयलेट सोप, कंघी, नेकलेस से लेकर चड्डी-बनियान और अब तो नेल पॉलिश तक दिख-बिक रहा है। सरकार को झुकाने के लिए, मास को जगाने के लिए, मूवमेंट को बढ़ाने के लिए, अपने क्लाइंट के हित साधन के लिए.., मीडिया जो कर सकता है, कर तो रहा है। टीवी को देखने-समझने के लिए नज़र से ज्यादा नज़रिया बदलने की ज़रूरत है। माध्यम कोई भी ग़लत नहीं होता, चुनाव सही-ग़लत हो सकता है। लिहाजा चुनने में सावधानी बरतें। रिमोट तो आप ही के हाथ में है। कंटेट पर नाक-भौं मत सिकोड़िए, चैनल बदलिए।


29 comments:

  1. बहुत बड़ा लिखा है, चूंकि अब आंखों में थकान है फिर भी बोझिल नहीं कहीं से भी, शानदार कटाक्ष है अंत तक...

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  2. rizvi sahab "kuchh to khta kuchh khabt bhi hai"jeewan ke har pahloo par parkash dalta sunder shabdon se ktaksh liye ek bahoot hi uttam aalekh hai,bahoot hi sunder likhte ho, khoobsurat likhne ke liye badhai.

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  3. हम देशभक्त हैं। भ्रष्टाचार में लिथड़े नेता की चापलूसी कर सकते हैं। नफ़रत के बीज बो सकते हैं। लूट सकते हैं, कत्ल कर सकते हैं। लेकिन गद्दारी नहीं कर सकते। ये नया मुहावरा है। मीडिया ने गढ़ा है। जैसे राष्ट्रवाद का एक मुहावरा आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गढ़ रखा है। शब्द महत्वपूर्ण नहीं रहे। शब्दों का जो स्टॉक हमारे पास है, वो बहुत कम है। ख़बरों का दायरा तो बहुत बड़ा है, लेकिन अपनी सुविधा के लिए हमने उसे भी संकुचित कर दिया है। ख़बर वही है, जिसके बहाने आप स्टूडियो में खड़े एंकर नाम के प्राणी को चीखने पर मजबूर कर सकें। एंकर वही बेहतर है, जिसमें छोटी-छोटी घटनाओं पर भी बेवजह चीखने की क्षमता हो। वो क्या बोलता है, क्या पूछता है, उसकी बौद्धिक क्षमता कितनी है? ये सब बेकार के सवाल हैं। चीख़ना ज़रूरी है क्योंकि ये आपको ठिठकने पर मजबूर करती है। ऐसी धारणा अब आम हो चली है कि तेज़ और शानदार चीख़ को टीआरपी की भीख मिलती है।................बहुत खूब लिखा है आपने ............... सच को उजागर करती पक्तियां............!

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  4. media ka charitra...usme bhi kuchh aise hi kataksh hai media ko lakar...yahan mamuli admi kafi baichain hai...system se ladne ki jaddo jahad dikhai de rahi hai...apka lekh aaina to dikhata hai..lakin usme koi positive batain nai hoti...sirf frustration badha deta hai...kya kuchh aisa bhi..jo mere remote se mujhe kuchh achcha ya positive dikha sake....remote to hai...channel badal bhi sakte hai...lakin

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  5. विषय प्रस्तुति उत्तम ही है, पर शब्दभंडार भी बडा समृद्ध है अकबर, बधाई हो।

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  6. Bilkul sach likha hai...aap ko dhanywaad !!!

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  7. माध्यम कोई भी ग़लत नहीं होता, चुनाव सही-ग़लत हो सकता है....यह जितना सही है उतना ही यह भी कि माध्‍यमों ने सही और गलत का भेद ही मिटा डाला है...जो गलत है वह सही दिखता है जो सही है वह कहीं दिखता ही नहीं...इतना भ्रम, इतना कन्‍फ्यूजन शायद ही कभी रहा हो...इस अनंत घटाटोप में वैकल्पिक मीडिया बड़ा काम कर सकता था पर अब तो लगता है खुद इसका विकल्‍प ढूंढने की नौबत आ गई....आपके तेज प्रवाहयुक्‍त विचार उद्वेलित करते हैं मित्र...बधाई एक अच्‍छे आलेख के लिए....

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  8. दूसरा कोई इस पूरी सामग्री से भिन्न-भिन्न चार-पांच लेख बना देता, फिर भी अकबर जी ने यह लालच छोड़ दिया तो बधाई ही देनी होगी. जब हम अपने इर्द-गिर्द की सभी चीज़ों के बदलने पर समय की मांग की दुहाई देते हैं तो यह सुविधा मीडिया को देने से गुरेज़ क्यों? आज बाज़ार हमारे आँगन से लेकर किचन, बेडरूम तक घुस चुका है तो मीडिया बिचारा अपनी सर्वाईवल को लेकर वैसे ही त्रस्त है. सच तो सच है, मुंह घुमाईये या सामना कीजिये.

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  9. कंटेट पर नाक-भौं मत सिकोड़िए, चैनल बदलिए। अच्‍छा पंचलाइन है।
    आलेख अच्‍छा लगा। शैली भी अच्‍छी थी। मध्‍यम वर्ग का द्वंद्व दिखा।

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  10. कंटेट पर नाक-भौं मत सिकोड़िए, चैनल बदलिए। अच्‍छा पंचलाइन है।
    आलेख अच्‍छा लगा। शैली भी अच्‍छी थी। मध्‍यम वर्ग का द्वंद्व दिखा।

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  11. आगे और भी अच्छी लेखनी की उम्मीद के साथ।। बेहतर लेखन।।

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  12. लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है
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    ख़ौफ़ को पैदा तो हमने इसलिए किया था कि आप डरें और हमारी बकवास सुनें। लेकिन हमने इतना डराया कि अब आप चौंकते नहीं, बदन में झुरझुरी नहीं आती।
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    हम देशभक्त हैं। भ्रष्टाचार में लिथड़े नेता की चापलूसी कर सकते हैं। नफ़रत के बीज बो सकते हैं। लूट सकते हैं, कत्ल कर सकते हैं। लेकिन गद्दारी नहीं कर सकते।
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    एंकर वही बेहतर है, जिसमें छोटी-छोटी घटनाओं पर भी बेवजह चीखने की क्षमता हो। वो क्या बोलता है, क्या पूछता है, उसकी बौद्धिक क्षमता कितनी है? ये सब बेकार के सवाल हैं।
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    पता नहीं क्यों जो लोग लिखने वाले हैं, वह भी दिखना चाहते हैं। ये बड़े ही अजीब किस्म की भूख है। लिखने वाले को छपने की भूख होती थी। लेकिन अब वक्त के साथ सोच बदली है और वो दिखना चाहते हैं।
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    अकबर साहब आपने भी क्या खूब सजीव प्रसारण किया है :)
    आपने इस पोस्ट के माध्यम से मौजू-ए-हालात की सच्ची तस्वीर पेश कर दी ... यह व्यंग नहीं बल्कि बदलते समय का आईना है !
    बेहतरीन पोस्ट है ..... आपको हार्दिक बधाई !
    शुभ कामनाएं !!

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  13. अच्छा लिखा है आपने भाई... बधाई...

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  14. वाकई ..हम शब्दों के मूल अर्थ का क़त्ल करने में माहिर हैं।...शानदार आप बधाई के पात्र है इस लेख के लिए ..............शालिनी गौड़

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  15. akbar bhai ,apne badhiya likha hai ..bhasha apki shakti hai..atirek ke karan kai bar kamzori bhi banane lagti hai.usase bachna hoga..apko pahli bar padha hai..prabhavit hua hoon...sarokaro ke prati isi samaparna ko baanye rakhen ...namaskar
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  16. bahut umda likha hai bhai. bhasha aur vyagya kya khoob

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  17. मैं कहूँ तुने कुछ नया नहीं लिखा? बुरा लगा ना? पर जिस ढंग से लिखा वो रोंगटे खड़े कर देता है. तुने कोई सन्देश देने की कोशिश नहीं पर जो सच है उसे बयान किया. ऐसा कम लोग ही कर पते है. तारीफों के पूल नहीं बांधूंगा सिर्फ इतना चाहूँगा कि इसी तरह बेब्की के साथ लिखता रह किस को अच्छा लगे या बुरा........मोनू डेका

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  18. एक-एक शब्‍द चुनकर लिखा है, छोटे-छोटे वाक्‍य बात को समझने की सहूलियत देते हैं। पूरा लेख सीधे हलक से नीचे उतर जाता है जैसे शराब। बेहतरीन लिखते हैं जनाब अकबर रिजवी साहब,बधाई एण्‍ड जय हो।

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  19. sach rizvi bhai bahut umda likha aapne aaj ke chalan par samaj par badhiya comment ek ek shabd chun chun kar shabdo me piroya hai aapki lekhni ko salam badhiya likhte hai bas aapki tareef ke liye mere paas shabd nahi bas bahut achcha likha jis tarah se Siyasat se lekar Media tak ki sachchayi aur Samaj ki sonch ko aap samne laye hai ye Achchi koshish hai bas aapa lekhni tabhi safal hogi jab kuch log isay padh aur samajh kar sabaq hasil kare aur kuch achch karne ki koshish bhi ek baar fir aapko badhayi

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  20. समाज की प्रत्येक धारा से लेकर तबके तक के बारे में विचार करने के बाद लिखा गया लेख. विशेषतः मीडिया का सूक्ष्म विश्लेषण. सामाजिक सरोकारों और बदलते परिदृश्यों का गहन विश्लेषण. रिज़वी साहब को धन्यवाद.

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  21. अकबर आपने तो अपना मुरीद बना लिया। मुबारक हो।

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  22. अकबर जी
    पहली बात लेख के लिए बधाईयाँ
    जो आपने पोस्ट दी ,
    समाज , पत्रकारिता , और साहित्य हाँ राजनीती को कैसे भूल सकता हूँ का बेहद संतुलित और प्रमाणिक चित्रण इस लेख के माध्यम से पढने को मिला , हाँ कमी जरूर अखरी की धर्म को कैसे छोड़ा जा सकता है जो सारी समस्याओं का बाप है ,इसमें धर्म को जोड़ा जाता तो बेहद अच्छा लेख बन सकता था लेकिन जो पूर्वाग्रह होते हैं बे साथ कहाँ छोड़ पाते हैं , आपके मन में कतिपय ऐसा ही भ्रम राम राज्य का अभी बाकी दिखता है , जी जब राम की पार्टी राम राज्य नहीं ला पायी तो क्या आशा कर सकते हैं किसी से ? फिर भी आपने इस बिसय को क्यूँ नहीं छुआ , कृपया उत्तर दें , मै तो शाशन और प्रशासन मै धर्म की भूमिका नकारता हूँ जी , आपके मन मे अभी कई अनावश्यक भ्रम धार्मिक श्रेस्थताओ को लेकर हैं तो न्याय कर पाना उतना सरल नहीं हो पाता, बीमारी की बात हटा कर सवास्थ की चर्चा कितनी अधूरी है जी , और साहित्यकार से फिर उम्मीद कर पाना की लूट तंत्र को बह बदल पायेगा जरा कम संभव लगता है और मीडिया तो कमीनेपन की हद पर बैठा है उसका भी धर्मगुरुओं तथा नेताओं से दांत काटी दोस्ती का नाता चल रहा है , अब फिल्मों का क्या कहू जी यहाँ प्रेम हार जाता है , और धार्मिकता जीत जाती है , तमाम फिल्मो मै मेने नायिकाओं को अपने प्रेमियों को छोड़ते देखा है धार्मिक और सामाजिक ताने बाने को लेकर ही यह घटित होता है . मीडिया की भूमिका केवल धन कमाने की है , सत्य को भी बेचा जाता है और असत्य को भी , इनका बश चले तो देश को भी ये बेच डालें . आपने मीडिया की बातें बेहद सुन्दर ढंग से कुरूपता को दर्शाती बतायी , जो सही और निश्चित ही झज्कोरने बाली है . आपकी निगाह समाज की बुराइयों को देखती है और पाठकों को भी सोचने के लिए मजबूर करती है . आप के लेख के लिए साधुबाद और धन्यवाद भी .
    ------------------------------------------------------------------------आपका भी
    अनुराग चंदेरी

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  23. आपकी कोशिश सराहनीय है ..बधाई

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  24. बाजारीकरण और दिखने-बिकने की नयी संस्कृति ने बहुत सी अहम चीज़ों को जबरन नेपथ्य में धकेल दिया है।
    मूल बात यही है .. इसी का परिणाम है कि हम हर प्रकार की अव्‍यवस्‍था झेलने को मजबूर हैं .. बहुत बढिया लिखा !!

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  25. Undoubtedly you are excellent, god bless you ....!

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  26. एक शेर याद आ गया : 'कोई दावा नहीं,फरियाद नहीं ,तंज़ नहीं / रहम जब अपने पर आता है तो हँस लेता हूँ.'

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  27. very nice.. great going,,keep it up..

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