Thursday, August 16, 2012

कठपुतली नाच वाया अन्ना बाबा


एक अन्ना थे। एक बाबा थे। धारणा के विपरीत बाबा जवान थे। धारणा के विपरीत अन्ना बूढ़े थे। दोनों अपनी-अपनी कुटिया में रहते थे। बाबा की जनता भक्त थी, नेता भक्त थे।हर छोटा-बड़ा, बाबा के इशारे पर कदमताल करता। हैंड्स अप और डाउन करता। सब के सब नतमस्तक होते। बाबा कसरती तो थे, लेकिन थे दुबले-पतले। भक्त समझते योग का बल है। जबकि बाबा राष्ट्र चिंता में तिल-तिल घुलते मंच पर उछल-उछल कर लोगों को मज़बूत बनाते। खाए-अघाए का देश था। काया थुल-थुल, चर्बीवाली। एक-एक शरीर में छोटी-मोटी दर्जनों बीमारी। प्राकृतिक उपचार पद्धति थी रामबाण। बाबा की कोशिश ने कई काया को बनाया कांचन। आने लगी बन आंधी माया। शिविरों में जब उमड़ी भीड़। देश चिंता में वह हुए अधीर। भानुमति का कुनबा जोड़ वह अश्वमेध को हुए विकल। नेताओं ने भौंह तरेरी। प्रतिष्ठा जो दी थी, वो झटके से ले ली। भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का जो आरोप लगा तो वह बेहद घबराए। लौट गए फिर से कुटिया को। बहुत दिनों तक न बाहर आए।

Tuesday, August 7, 2012

कुछ तो ख़ता, कुछ ख़ब्त भी है


लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सियासी वितंडावाद है। भोगवाद है। विकासवाद है। समाजवाद है। पूंजीवाद है। संचार युग है। मीडिया है। बाज़ार है। सराय है। यानी जो कुछ है- प्रचुर है। कोई खुशी तो कोई गम में चूर है। जिसके पास नहीं है, वह मजबूर है। जिसके पास है, वह मग़रूर है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो नहीं है। यंत्र-तंत्र, व्यवस्था, पैरोकार, बिचौलिए, सरदार, सरकार, नेता, सत्ता, कुर्सी, मंत्री, संतरी, चोर, पहरेदार...

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...