Sunday, July 1, 2012

आज भी परेशान है फक्कड़ बुड्ढा



(हमारे सबसे प्रिय जनकवि बाबा नागार्जुन को सादर समर्पित।)
आज भी परेशान है फक्कड़ बुड्ढा
तरौनी गांव के पीछे
मसान में
चिता की राख में
चिंगारी ढूंढता
मिला था फक्कड़ बुड्ढा
भावों की विह्वलता तो क्या
पराजय की छटपटाहट कहें
या दमा का दौरा !

हाँफ रहा था
काँप रहा था
ज़ोर-ज़ोर से खांस रहा था
....
चौंका...
मेरा नमस्कार सुनकर
सत्यानाश !
निकल गया उसके मुंह से
अनायास !
....
बाबा ढूंढ रहे हो क्या कुछ ?
संयमित था मैं, पूछ रहा था
मुझ पर डाली उचटती नज़र
और कहा सिर्फ एक शब्द...
साक्ष्य
....
कुछ देर रही चुप्पी
राख छानते बोल उठे फिर
शैली पकड़ी वही पुरानी
शब्दों में ही लगे गुर्राने
....
सुलग रहा जन के अंदर
ज्वाला उसे बनाना है...
एक नई क्रांति की ख़ातिर
अब नया हथियार बनाना है
....
देख असमंजस चेहरे पर
कुछ शांत पड़े और मुस्काए
राख छाननी छोड़ मुड़े
और वत्सल भाव से बोले...
छीन लिया है दुश्मनों ने
वो सारा हथियार
जिसके बल पर लड़ते आए
अब तक मेरे वीर निहत्थे
खो रहे सब धीरे-धीरे
साहस, धैर्य, बल और
लड़ने का उत्साह !
....
टोका मैंने-
उनको दिखलाया अख़बार
बाबा,
फासीवादी अब हमीं पर...
फासीवाद का आरोप मंढ़ते हैं
ख़ुद को देशभक्त...
सर्वधर्म समभाव और सद्भाव का प्रतीक
घोषित कर, हमको देशद्रोही कहते हैं
....
बाबा चुप रहे, सिर हिलाते रहे
बहुत देर तक बुदबुदाते रहे
फिर कुछ खिन्न भाव से बोले-
मैंने भी पढ़ा है रे...
तभी तो इतिहास की बुझी चिता
खंगाल रहा हूँ...
कौन खरा है, कौन है खोटा
वही साक्ष्य तो निकाल रहा हूँ
(कविता सन 2002 के मार्च महीने में यहीं दिल्ली में लिखी गई थी।)
  
बंजर भाव
लड़ नहीं सकते पर कहना
प्रतिकार तो धर्म है
आज के युगचेता कवि का
शब्द-विलास के बल पर
क्रांति का उद्घोष ही कविकर्म है

कलम कुदाल है
कागज़ है खेत
सर्वहारा का हित-चिंतक
उन्हीं की बिरादरी का बंधु
मजदूरी करता है
वातानुकूलित कमरे में बैठ
मज़े से कागज़ पर स्याही
लेप-लेप
(रचना-काल सन 2002, दिल्ली)

10 comments:

  1. bhawnaaon se bhari hui rachnaayen hain.. akbar bhai.......... bahut bahut badhai..........

    ReplyDelete
  2. टोका मैंने-
    उनको दिखलाया अख़बार
    बाबा,
    फासीवादी अब हमीं पर...
    फासीवाद का आरोप मंढ़ते हैं
    ख़ुद को देशभक्त...
    सर्वधर्म समभाव और सद्भाव का प्रतीक
    घोषित कर, हमको देशद्रोही कहते हैं............bahu khub janab! hakikat ko vyan karti paktiyan...........!

    ReplyDelete
  3. आपने तो सुंदर लिखा है भाई.
    बाबा की याद दिला दी.
    लगा कि जैसे बाबा आंख तरेरे यहीं कहीं खड़े हैं.
    ओह... बाबा....!!!
    सुंदर कविता.

    ReplyDelete
  4. Baba ko aaj yaad karne ka shayad yahi behtar tareeka hai.Banjar Bhav bhi achchhi kavita hai.Badhai..

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर अकबर भाई , जारी रहे लेखन

    ReplyDelete
  6. दोनों कविताएं प्रखर हैं....बाबा का सुमिरन बहुत अच्‍छा है...दूसरी में भी कुछ ख़ास बात है...मेरी शुभकामनाएं आपको।

    ReplyDelete
  7. सुंददर और बाबा नागार्जुनको समर्पित करना भी बहुत उचित.

    ReplyDelete
  8. बहुत ही सुन्दर कवितायेँ हैं ,,दिल को छूती हैं ...

    ReplyDelete
  9. बहुत बहुत बधाई / इसी तरह लिखते चलिए/

    ReplyDelete

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...