Thursday, May 31, 2012

कुछ कणिकाएँ... कुछ क्षणिकाएँ... यूं ही आएँ-बाएँ!!!


(1)
ले आए ये कैसा प्याला
पिये बिना ही जग मतवाला
देख-देख आँखें चुँधियाईं
जग का ऐसा रूप निराला
कब से आँखें धधक रही हैं
जिगर में भड़की है ज्वाला

Thursday, May 17, 2012

आत्मालाप (आवाज़ गुमशुदा और वक्त कुत्ता है अब)


आत्मालाप-1
सीने में जलन सी हो रही है
होंठ फड़फड़ा रहे हैं...
अजीब सी बेचैनी सवार है
ज़ोर-ज़ोर से चीखना चाहता हूँ
लेकिन कहीं किसी कोने में दुबका बुज़दिल
डरा रहा है, ख़ौफ़ का छौना 

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