Thursday, April 12, 2012

देवी ये न्याय है या प्रहसन?


साल की पहली तारीख़ थी। सुबह का वक़्त था। नये साल के स्वागत में आधुनिक लोकतंत्र का एक मसीहा यानी जन-प्रतिनिधि व्यस्त था। पूर्णिया में अपने आवास पर विधायक राज किशोर केसरी ने दरबार सजा रखा था। दरबारी और भक्त आ-जा रहे थे, अपना-अपना दुखड़ा सुना रहे थे। फरियाद कर रहे थे, मुराद पा रहे थे। ठंड ने संवेदनाओं को भी सर्द कर रखा था। कहीं किसी के भीतर घुट रही वेदना ने धीरे-धीरे प्रतिरोध और फिर प्रतिशोध की ज्वाला का रूप ले लिया था।

कहते हैं एक अधेड़ उम्र औरत ठंड से बचने के लिए जिस्म पर शॉल लपेटे विधायक के दरबार में हाजिर हुई थी। महिला के हाव-भाव और विधायक के बर्ताव से साफ था कि दोनों एक-दूसरे से पहले से ही परिचित हैं। उसने विधायक से अनुरोध किया था कि वह उनसे अकेले में कुछ बात करना चाहती है। विधायक ने हामी भरी और भीड़ से थोड़ा किनारे हुआ। महिला ने उसी वक्त विधायक की कमर के निचले हिस्से में सब्ज़ी काटने वाली चाकू से वार किया। विधायक की चीख़ ने मौजूद भीड़ का ध्यान खींचा, ख़ून देख कर लोग बौखला उठे। कुछ तो ज़ख़्मी विधायक को लेकर अस्पताल की तरफ भागे, बाकी ने उस महिला को दबोच लिया। उसकी बेदर्दी से पिटाई शुरू हो चुकी थी।

हमारे पास जो शुरुआती ख़बर पहुंची, वह यही थी कि पूर्णिया विधायक राज किशोर केसरी पर एक महिला ने हमला किया। ज़ख़्मी विधायक को अस्पताल ले जाया गया है। अपने प्रिय जन-प्रतिनिधि पर वार से बौखलाई भीड़ ने आरोपी महिला को पीट-पीट कर मार दिया है। हालांकि आरोपी की मौत की ख़बर और विधायक के घायल होने की ख़बर दोनों ही ग़लत निकली। विधायक की मौत हो चुकी थी। आरोपी महिला को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। घटना इतनी अप्रत्याशित थी कि जिसने भी सुना, सन्न रह गया। 

अब जबकि एक साल, तीन महीने और दस दिन के अंतराल के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने फैसला सुना दिया है। आरोपी को हत्या का दोषी करार देने के बाद उसे उम्रकैद की सज़ा सुना दी है। फ़ैसले के खिलाफ़ एक बार फिर महिला संगठनों ने संघर्ष का एलान कर दिया है। प्रदर्शन और फैसले का विरोध शुरू कर दिया है। वो तमाम घटनाएं एक-एक कर हमारी ज़ेहन से निकल-निकल कर हमारे दिमाग़ पर वार कर रही हैं। परेशान कर रही हैं। मैं हताश हूँ। व्यवस्था ने अपनी औक़ात दिखा दी है। सच फिर से हार गया है। न्याय की देवी एक बार फिर न सिर्फ अंधी साबित हुई है, बल्कि ये भी साबित हो गया है कि वह बहरी भी है और गूंगी भी।

ऐसा नहीं है कि यह सब भावुकता या कि भावावेश में कह रहा हूँ। जब एक निजी स्कूल की प्रिंसिपल रूपम पाठक ने पूर्णिया के सबसे बड़े शराब व्यवसायी और बीजेपी विधायक राज किशोर केसरी की हत्या की थी, उस वक़्त भी ये तमाम सवाल खड़े हुए थे और आज भी वह तमाम सवाल अनुत्तरित ही हैं। मुँह चिढ़ा रहे हैं। रूपम या उनके परिवार का कोई भी सदस्य कभी किसी आपराधिक घटना या मामले में वांछित नहीं रहा।

सबसे बड़ी बात कि एक सामान्य महिला होने के बावजूद रूपम ने आख़िर विधायक की हत्या क्यों की? सीबीआई ने जब जांच की शुरूआत में दावा किया था कि ये दफा 302 नहीं बल्कि 304 का मामला है। फिर चार्जशीट दायर करते वक्त मुकर क्यों गई? रूपम न तो आपराधिक चरित्र की थीं और न ही उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड था। हत्या की वजह भी लूट नहीं थी। आपसी रंजिश का मामला भी नहीं बनता, क्योंकि रूपम और राजकिशोर की माली और समाजी हालत में ज़मीन आसमान का फ़र्क था। लिहाजा हत्या की वजह क्या थी?

सामान्य आदमी तब तक अपराध या इस तरह की घटना से बचने का प्रयास करता है, जब तक कि वह बच सकता है। यानी स्पष्ट है कि रूपम के साथ कुछ ऐसा हुआ था, जिसने उसके धैर्य और सहन शक्ति की सीमा को समाप्त कर दिया था। ऐसे में क्या ये जानने की कोशिश नहीं होनी चाहिए थी कि रूपम ने ये एक्सट्रीम स्टेप किन परिस्थितियों में उठाया?

विधायक की हत्या के बाद ही से रूपम पाठक, उनकी माँ, उनके पति यानी तमाम लोग बार-बार विधायक के नज़दीकी विपिन राय का नाम लेते रहे। पुलिस से उसकी गिरफ्तारी की मांग करते रहे। रूपम पाठक ने बजाब्ता यह आरोप लगाया था कि विधायक ने तो सिर्फ एक बार रेप किया था, लेकिन विपिन राय उसके स्कूल आकर ये काम बार-बार करता रहा। ऐसे में पूर्णिया पुलिस और सीबीआई दोनों को ही विपिन राय को गिरफ्तार करना चाहिए था। सच जानने की कोशिश की जानी चाहिए थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से न तो पुलिस ने विपिन राय की तरफ ध्यान दिया और न ही सीबीआई ने.., आखिर क्यों?

हाई प्रोफाईल मर्डर केस में जिस व्यक्ति की तरफ बार-बार इशारा किया गया, जांच एजेंसियों की नज़र में वह बिल्कुल बेदाग रहा और फैसले से महज कुछ दिनों पहले ही उसने सरेंडर किया। कहीं ऐसा तो नहीं कि एक पक्षीय फैसले का स्क्रिप्ट पहले ही लिख लिया गया था और इसमें कोई क़ानूनी पेंच नहीं फंसे, बस इसके लिए अंतिम समय में विपिन राय को समर्पण का न्योता दिया गया। विपिन राय के सरेंडर करने के बाद सीबीआई ने उसे न तो रिमांड पर लिया और न ही विशेष अदालत में उसकी क्रॉस क्वेश्चनिंग हुई। आख़िर क्यों? 
रूपम ने हत्या जैसा कठोर फैसला लेने से पहले दो बार पुलिस से न्याय की गुहार लगाई थी। एक बार खुद डिप्टी सीएम सुशील मोदी के हस्तक्षेप के बाद मामला वापस लिया गया था। इससे साफ है कि राजकिशोर केसरी और रूपम पाठक के बीच जिन चीज़ों को लेकर संघर्ष की स्थिति बनी थी, उससे सुशील मोदी अच्छी तरह वाकिफ थे। ऐसे में सुशील मोदी से भी पूछताछ होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। क्या सीबीआई की जांच टीम इसका वाजिब कारण बताएगी?

रूपम ने जो फर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट पुलिस को दी थी, उसमें साफ लिखा गया था कि विधायक ने उसे घर पर बुलाकर जबर्दस्ती जिस्मानी रिश्ता बनाया था। जिस वक्त ये सबकुछ हुआ, उसी के बाद विपिन राय ने ब्लैकमेलिंग शुरू की और रूपम के स्कूल जा-जा कर उसके साथ रेप किया। और तो और रूपम के साथ ही जब विपिन ने उनकी बेटी पर भी गंदी निगाहें डालनी शुरू कीं तब जाकर रूपम विरोध को विवश हो गईं। इसी की अंतिम परिणति विधायक की हत्या थी।

क़ानून सभी के लिए बराबर होता है। जिसने जो किया है, उसे उसकी सज़ा मिलनी ही चाहिए। रूपम ने हत्या की, उसे उसकी सज़ा मिले। लेकिन रूपम का जो अपराधी है, वह छुट्टा क्यों घूमे? इस मामले में जांच एजेंसी से लेकर अदालत तक ने तमाम चीजों और परिस्थितियों की अनदेखी की है। अदालती फैसले को देखने के बाद ये बात स्पष्ट हो जाती है कि एक शराब माफिया और शोषक की प्रजा हितैषी छवि को बनाए रखने के लिए सबकुछ प्री-प्लांड वे में किया गया। यानी न्याय नहीं हुआ है। इंसाफ की देवी कहीं तुम भी विवश तो नहीं हो? व्यवस्था की भूल-भुलैया ने तुम्हें थका तो नहीं दिया है? कहीं तुम भी प्रभावशाली लोगों की चेरी बनकर तो नहीं रह गई हो? देखो ज़रा संभल कर रहना, कहीं ऐसा न हो कि लोकतंत्र में एक दिन न्याय भी प्रहसन बन जाए या कि तुम्हारा भी चीर-हरण हो जाए और निरीह जनता नम आंखों से सबकुछ होता देखती रह जाए!

3 comments:

  1. सशक्त लेखन..
    ऐसी घटना को सामने लाने के लिए आपका आभार..

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  2. शुक्रिया अदा जी... बात आप तक पहुंची... मेहनत सफल हुई।

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  3. शर्म-शर्म और गुस्सा. इसके सिवा और कोई शब्द नहीं, प्रतिक्रिया के लिए.

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