Thursday, April 12, 2012

देवी ये न्याय है या प्रहसन?


साल की पहली तारीख़ थी। सुबह का वक़्त था। नये साल के स्वागत में आधुनिक लोकतंत्र का एक मसीहा यानी जन-प्रतिनिधि व्यस्त था। पूर्णिया में अपने आवास पर विधायक राज किशोर केसरी ने दरबार सजा रखा था। दरबारी और भक्त आ-जा रहे थे, अपना-अपना दुखड़ा सुना रहे थे। फरियाद कर रहे थे, मुराद पा रहे थे। ठंड ने संवेदनाओं को भी सर्द कर रखा था। कहीं किसी के भीतर घुट रही वेदना ने धीरे-धीरे प्रतिरोध और फिर प्रतिशोध की ज्वाला का रूप ले लिया था।

Friday, April 6, 2012

मेरा फ़रिश्ता


मेरे नन्हे, ज्यादा दिनों का नाता नहीं तुझसे
अभी तो आया है, लेकिन है बड़ा जादूगर!

मेरे नन्हे, मेरे मन को तूने बांध लिया है
तेरे जाने ने मुझे जिन्दगी में पहली बार
अकेलेपन, सूनेपन और बेरंग जीवन का अर्थ
सीधे-सीधे और बेखटके ही समझा दिया है
तेरी सूरत आँखों में कुछ बेतरह जज़्ब है

जब भी सोचता हूँ..,
तू सोते में मुस्कराता
पोर-पोर के दर्द को अंगड़ाइयों में तोलता
कभी मानूस निगाहों से देखता
कभी कुछ अजीब सा मुँह बनाता
ठीक मेरी बगल में..,

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...