Saturday, March 31, 2012

कील है कि गड़ी है अभी तक


फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियां देखी नहीं है। लेकिन हां, बात बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।

एक दौर अर्थपूर्ण फिल्मों का भी आया था। फिर कौव्वा भी आया, बंदर भी आया। मार्केट की मार और आधुनिक परिवेश में लोगों के स्वाद एवं सोच में आए बदलाव ने फिल्मों की मुख्य धारा से निम्न वर्गीय समाज को एक तरह से बेदखल ही कर दिया था। नायक अमीर ही होगा। पृष्ठभूमि चाहे जैसी भी हो, नायिका के मेकअप और पहनावे में राजसी ठाट-बाट ज़रूरी हो गया था। हालात ऐसे हो चले थे कि नौकरानी भी नायिका की सहेली या बहन जैसी और कभी-कभी तो नायिका के समकक्ष खड़ी नज़र आती थी। वो तो शुक्र मनाइए कि घर-घर पहुंची टीवी ने लोगों का जेनरल नॉलेज इतना मज़बूत कर दिया है कि फिल्म की हिरोइनों को देखते ही पहचान लेते हैं।

बिना किसी कहानी के भी फिल्में बनने और हिट होने लगीं। अच्छी स्क्रिप्ट होने के बाद भी फिल्में फ्लॉप होने लगीं। आलोचकों ने जब निर्माता-निर्देशकों को घेरने की कोशिश की तो यहां भी बाज़ार की आड़ में सबकुछ जायज़ ठहराने का चलन बढ़ा। फिर अचानक से फिल्मों का नया वर्गीकरण हो गया। हम आर्ट फिल्में नहीं, कॉमर्शियल फिल्में बनाते हैं। हम दर्शकों का मनोरंजन और इस माध्यम से आमदनी चाहते हैं। हमारा काम समाज सेवा या संदेश देना नहीं है। ऐसी ही अन्य अनेक ऊल-जुलूल बातें और तर्कों ने माहौल ठंडा कर दिया। लोग फिल्में नहीं, ऋषि कपूर, जितेन्द्र, धर्मेन्द्र, अमिताभ, शाहरुख़, सलमान और आमिर ख़ान को देखने जाने लगे। लेकिन पता नहीं क्यों अचानक हवा का रुख़ बदला-बदला नज़र आने लगा है। ऐसी-ऐसी फिल्में बनने और हिट होने लगी हैं कि कभी-कभी दांतों तले उंगली दबाने को जी चाहता है।

गुरुकांत देसाई आपको याद ही होंगे। मणिरत्नम ने अपनी छवि के विपरीत गुरू जैसी फिल्म बनाई। मल्लिका नाची ज़रूर थी। लोगों ने आनंदित भी महसूस किया था लेकिन फिल्म के हिट होने की वजह ये नहीं थी। गुरू की स्क्रिप्ट बेहद मज़बूत थी। हां, ये अलग बात है कि इस फ़िल्म से जो मैसेज दिया गया, वह बेहद ख़तरनाक था। महात्मा गांधी इस फिल्म में बिसूरते से नज़र आए, क्योंकि अपनी चालाकियों के कारण खाकपति से अरबपति बना झूठ और फ़रेब का गुरू, बड़ी बेशर्मी से साधन की शुद्धता (जो कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सबसे सशक्त हथियार साबित हो सकता था) का मज़ाक उड़ाता है और कठ-दलीली की हद यह कि मैंने चोरी, झूठ और दग़ाबाज़ी के सहारे जो कुछ भी हासिल किया, उसमें अपने शेयरधारकों को भी पूरा हिस्सा दिया। यानी चोरी का सामूहिक उत्तरदायित्व और इसमें भी ईमानदारी(!)। बताने की ज़रूरत नहीं कि फ़िल्म एक ऐसे विध्वंसक आइडिया पर आधारित थी, जहां सिस्टम तोड़ने वाला अपराधी, फ़रेबों में माहिर शख्स, बड़ी शान से कहता है कि बनिया हूँ, बात भी सोच-समझ कर ही ख़र्च करता हूँ (सिर्फ नियमों को तोड़ने, प्रतिपक्षी को कमज़ोर करने और देशहित को ठेंगा दिखाने से गुरेज नहीं करता)।
कामयाबी की काईयां मुस्कान

फिल्म लोगों को बेहद पसंद आई। समीक्षकों और कला मर्मज्ञों की तरफ से ख़ूब वाह-वाही भी मिली। फ़िल्म ने नया इतिहास रचा। सही मायने में ये उत्तर आधुनिक, बाज़ार केन्द्रित और उपभोक्तावादी संस्कृति को परिभाषित करने वाली फिल्म थी। नैतिकता-अनैतिकता के मकड़जाल से परे, जियो जी भर के टाईप की लाईफ स्टाईल वाली फिल्म। जहां साधन नहीं, साध्य महत्वपूर्ण है। जहां बस किसी भी तरह हासिल कर लेने को ही जीत समझा जाता है। क़ायदे से कहें तो निरे स्वार्थ को जनहित का सर्वस्वीकृत मुहावरा घोषित करने का बलात् प्रयास था- गुरू। आज हमारे देश में जो कुछ भी ग़लत हो रहा है और उसे जिस ढंग और जिन तर्कों के सहारे जायज़ ठहराने की कोशिश की जा रही है। गुरु भाई की ही शैली और अंदाज़ हैं।

मणिरत्नम की ही एक और फिल्म है- रावण। फ़िल्म रिलीज़ से पहले ही समीक्षकों की नाक सिकुड़ गई थी, भौंहें अजीब सी मुद्रा अख्तियार कर चुकी थीं। भाव था- हुंह.., इसी को फिल्म कहते हैं। उबाऊ, थकाऊ, पकाऊ... और न जाने क्या-क्या। जबकि फिल्म को गंभीरता से देखने वाला व्यक्ति, कथित समीक्षकों की बात से कतई इत्तेफाक नहीं रखता। गंभीर दर्शक के लिए अगर ये सेल्यूलाइड पर पहला दलित डिस्कोर्स था तो मनोरंजन और हास्य प्रेमियों के लिए भी मसाले की कमी नहीं थी। पटकथा में कहीं ठहराव नहीं, रवानी ऐसी कि नज़र पर्दे से हटने को तैयार नहीं। फिर भी फ़िल्म पिट गई। कारण जानने के लिए बाज़ार की बिकाऊ संस्कृति और उत्तर आधुनिक गुड लुकिंग सेंस वाला मनोविज्ञान समझना होगा। 
आत्महंता आक्रोश

आज का दर्शक और बाज़ार (दोनों) मदर इंडिया के दौर से काफी आगे निकल चुका है। अब फिल्मों में सबकुछ सुंदर और सुडौल दिखाने का ही रिवाज़ है। हालांकि पिपली लाईव, धोबीघाट जैसी फिल्में भी बनी हैं और लोगों ने सराहा भी है।(लेकिन फिलहाल हम नायक और मिथ की बात कर रहे हैं और वह भी गुरू और रावण के संदर्भ में तो इस मुद्दे पर फिर कभी।)

सवाल वाजिब है कि क्या फिल्मों का भी कोई क्लास होता है? दर्शकों का भी कोई वर्ग विशेष होता है क्या? क्या बाज़ार की पसंद और व्यक्ति की पसंद में कोई फर्क नहीं रहा?

रावण के फ्लॉप होने में न तो फिल्मांकन का दोष था, न निर्देशक ही नौसिखुआ था और न ही नायक-नायिका के अभिनय में ही कोई कमी थी। बल्कि फिल्म की कमी थी- राम के मिथ को दलित डिस्कोर्स में तब्दील करना। ग़रीब और दलित की विश्वसनीयता हमेशा से संदिग्ध रही है। ये प्रभु वर्ग द्वारा प्रचारित-प्रसारित समाज सम्मत धारणा है। दोषी राम नहीं, रावण ही होगा। अचरज की बात है कि गुरूकांत भी अभिषेक थे और वीरा भी वही बने थे। दोनों ही जगह नायिका रूप में विश्व सुंदरी ही थीं। दोनों फिल्मों के निर्देशक भी बॉलीवुड के जाने-माने हस्ताक्षर मणिरत्नम ही थे।

गुरू का नायक चोरी करता है, झूठ बोलता है, लेकिन प्रशंसनीय बना रहता है। लोगों की ज़ुबान पर उसके डायलॉग चढ़ जाते हैं। वह रोल मॉडल की सी हैसियत लेकर हमारे दिल और दिमाग में जज़्ब हो जाता है। वीरा ईमानदार है, छल नहीं कर सकता। पराई स्त्री के साथ दुर्व्यवहार नहीं कर सकता। शोषण के खिलाफ है। व्यवस्था की दमनकारी नीतियों के खिलाफ खड़ा है। पुलिसवाले उसकी बहन के साथ शादी के दिन बलात्कार करते हैं, लेकिन वह ख़ुद पुलिसवाले की पत्नी को पूरे सम्मान के साथ मुक्त करता है। फिर भी असभ्य है। जबकि रागिनी का पति यानी एसपी अपने देव नाम के विपरीत दस्यु वाली हरकतें करता है।

निष्पक्ष दृष्टि से अगर रावण की कथा का विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि पूरी फिल्म सुर-असुर, सत्य-असत्य और सुसाधन-कुसाधन के मसले पर डिस्कोर्स करती है। मणिरत्नम ने जो भूल-ग़लती गुरू में की थी। रावण में उसका सुधार था। यहां नायक को छल बल से परहेज है जो उसकी मौत का कारण भी बनता है। यहां प्रेम निस्वार्थ था। नायक ने पूंजी जुटाने के लिए विवाह नहीं किया था। लेकिन अचरज की बात, दर्शकों ने वीरा को नायक स्वीकार नहीं किया। फिल्म पिट गई।

बताने की ज़रूरत नहीं कि हमारा समाज अभी भी सामंती ढांचे में ही रचा-बसा है। कपड़े बदल जाने से, रहन-सहन और लाईफ स्टाईल बदल जाने से, अंग्रेज़ी सीख लेने से और संसाधन जुटा लेने से ही समाज नहीं बदल जाता। समाज सोच से बदलता है। दुर्भाग्य से इस मामले में भारतीय समाज की स्थिति बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। आज भी व्यक्ति और व्यक्तित्व से ज्यादा जाति की अहमियत है। गुरू इसलिए हिट हुई क्योंकि वह भारत के आधुनिक प्रभुवर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी। (साधन की शुद्धता जाए भाड़ में, जितना जमा कर सकते हो करो, जैसे जमा कर सकते हो करो।) रावण इसलिए फ्लॉप हो गई क्योंकि वो इसी प्रभु वर्ग के ख़िलाफ़ बनी थी। मिथ को चुना गया, या राम-रावण के समांतर फिल्म बनी, इसलिए फ्लॉप हो गई, ये बात सही नहीं है। बल्कि फिल्म के फ्लॉप या अस्वीकार की असली वजह है कि साधन सम्पन्न का यशगान ही संभव है, आलोचना नहीं। गुरूकांत देसाई के सामने वीरा की औक़ात ही क्या है! दलित और संसाधन विहीन वीरा, सत्ता प्रतिष्ठान के स्वामी देव को नैतिकता का पाठ भला कैसे पढ़ा सकता है? वीरा का हृदय कैसे विशाल हो सकता है? बस यही वह कील है!

9 comments:

  1. बेहद उम्दा विश्लेषण किया है अकबर सर आपने
    बात की गंभीरता को समझने के लिए रावण भी देखनी होगी जो की अब तक हमने नहीं देखी है ..
    लेकिन शब्दों का बेहद मारक इस्तेमाल किया है आपने की बात सीधे जेहन पर जाकर लगी.कोई सटीक प्रतिक्रिया रावण देख लेने पर ही सम्भव है ..

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  2. ravan ke bare me aapki samaalochanaa bilkul satik he .

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  3. बढ़िया लिखा है...पसंद आया :-)

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  4. aapne sabhi pahluon ka behad shandar aur steek vishlation kiya hai.jis parkar se aapne pratkriya me sunder shabdo ki mar di hai wo vakai kabile tareef hai.behad khubsurat vishlation ke liye badhai

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  5. u wrote so exact and correct about Indian films and its aspects of socio-analysis . ur attitudes are really appealing . i wish u the best wishes and hope u to continue ---------anurag chanderi

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  6. aap ka kathan sahi hai hum samantwadi vichar dhar se grashit hai ameer ke sau gunaah maaf hai

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  7. ek imandaar koshish,aise hi likhte rahiye...shubhkaamnayen..

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  8. अच्छा लिखा है अकबर. फ़िल्में भी अपने समय-समाज से अलग नहीं होती हैं और इस रूप में एक वर्गीय उत्पाद होती हैं. ज़ाहिर है कि ये जिस वर्ग द्वारा बनाई जाती हैं उसके वर्गीय हितों की रक्षा भी करती हैं.

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  9. भारतीय सिनेमा जरूर बदल गया है पर समाज की सोंच नही बदल पाया हाँ फूहड़ता और नग्नता को समाज ने जरूर स्थान दिया है है
    आपकी समालोचनीयता प्रशंसनीय है !

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