Wednesday, March 21, 2012

दो ग़ज़लें


दोनों ही ग़ज़ले गुजरात दंगों के दौरान लिखी गई थीं और 2005 में समकालीन सोच के जनवरी-अगस्त अंक में छपी थीं। आज अचानक पत्रिका पर नज़र पड़ी तो सोचा दोस्तों की नज़र करूं। अब एक बार फिर लिटमस टेस्ट का मौका है, एक गुमनाम शायर और उसकी शायरी के लिए... और हां, तब क़लमी नाम की ख़ब्त भी थी। तब यानी उस वक़्त जनाब अकबर साहब साहिल हुआ करते थे।

(1)
गर्द-ए-दहशत और लुटा चमन है निगाहों में
देखिए क्या-क्या और हैं ज़ेहन के पिटारों में

बस्तियां वीरान हैं, घर सन्नाटे में डूबा है
जो देखनी है रौनक, तो चलिए क़त्लगाहों में
ख़ौफ़जदा आँखें, ज़र्द चेहरा और थर्राया ज़ेहन
सहमी-सहमी सी सरगोशियां उभरती हैं रातों में

मां की ममता से जब दरिंदे हार गए
सुला दिया बच्चे को मां
की बाहों में

मसीहा ने किया ऐलान सूबे में अमन है
बस थोड़ा सा ग़ुस्सा बाकी है रज़ाकारों में

सच की जीत तो अब ख़्वाबों की बात है
कि शामिल मुन्सिफ भी हैं गुनहगारों में

मजमा छोड़ कहां जाते हो साहिल मियां
नज़ारे और भी हैं, बाकी बचे पिटारों में

(2)
ज़ुबां ख़ामोश रख, जो है यहां रहना
यहां जुर्म है, सच को सच कहना

वो हाकिम हैं, हक़ ही की बात करेंगे
तुम्हारा फ़र्ज़ है, हाथ बांधे खड़े रहना
बाग़-ए-मुसर्रत के फूल पर, है उन्हीं का हक़
आबाई उसूल है तेरा.., दर्द सहना
उनके दिए ज़ख़्म को, ज़ख़्म कहना है गुनाह
तुम्हें लाजिम है, ज़ख़्म को मरहम कहना

उनके लिए आंखों से टपकते लहू को
बड़ा आसान है बरसता सावन कहना

गुजरता है नागवार बहुत समंदर को
साहिल तेरी हस्ती का बने रहना

(समकालीन सोच, जनवरी-अगस्त 2005)

15 comments:

  1. मैने शायरों को न तो पढ़ने की कोशिश की और न ही समझने की..क्योंकि जब कभी पढ़ा तो शायरी में मोहब्बत की बू आई..तो कभी शायरों ने दोस्तों को दुश्मन बना दिया...कलम की कमीनगी कहें...या शायर की दीवानगी...जो हम दम दिमाग का बंटाधार कर देती है....

    ReplyDelete
    Replies
    1. लेकिन अब तो आपने पढ़ लिया न, ना-ना करते। उम्मीद है समझने की कोशिश भी की होगी। तो इस तरह आपका वो कॉल तो टूट ही गया। रही दोस्ती और दुश्मनी की बात। ग़ज़ल हमेशा दोस्तों को दोस्त बनाए रखती है मेरे दोस्त।

      Delete
    2. बहुत खूब अकबर साहब ग़ज़ल हमेशा दोस्तों को दोस्त बनाए रखती है मेरे दोस्त।

      Delete
  2. बेहद उम्दा ग़ज़लें अकबर जी....

    ReplyDelete
    Replies
    1. pummy जी शुक्रिया... प्रशंसा ज़रूर कारगर सिद्ध होगी और हम कुछ खास लेकर फिर हाजिर होंगे।

      Delete
  3. Awesome,mai to qayal ho gai.so touching...cant express...

    ReplyDelete
    Replies
    1. ओह... क्या वाकई इतनी बेहतरीन ग़ज़ल है... लगता है अब मुझे भी फिर से पढ़ना होगा। :-)

      Delete
  4. खूब लिखा..दोनों गजले बेहतरीन है...

    ReplyDelete
    Replies
    1. hum tum शुक्रिया स्वयंबरा जी... कोशिश करूंगा और बेहतर लिख सकूं...

      Delete
  5. बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल ....दर्द और आंसू से लिपटा हुआ
    . एक एक पंक्ति हकीकत बयां करती है
    ये पंक्तियाँ झकझोर कर आँख खोलने को बाध्य करती हैं
    बस्तियां वीरान हैं, घर सन्नाटे में डूबा है
    जो देखनी है रौनक, तो चलिए क़त्लगाहों में...

    ReplyDelete
    Replies
    1. madhulika जी धन्यवाद... कभी कभी आप लिखते नहीं... भावनाएं शब्द निचोड़ लाती हैं। कुछ ऐसी ही परिस्थितियों की गिरफ्त में था उस वक्त।

      Delete
  6. क्या धारदार कलम है।

    ReplyDelete
  7. Akbar Bhai Atyant Dil ko choone wali ghazal hai, Pen is mightier than sword.

    ReplyDelete
  8. बेहतरीन गज़ल....गहरी सोच लिए हुए..
    दाद कबूल करें.

    ReplyDelete

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...