Thursday, December 6, 2012

आदमी भी कछुआ होता है

वह अंधेरे में बैठा
देखता रहा दीपक टिमटिमाता
छप्पर पर उल्लू बैठा रहा
खरों को उखाड़-उखाड़ ढूँढता रहा कीड़ा
देर तक सीली ज़मीन पर हाथ टिका कर
बैठने से उभरे चकत्ते में कुनमुनाती पीड़ा
बेख़बर ठण्ड से ठिठुरा गठरी बना
एकटक देखता रहा दीपक टिमटिमाता

Sunday, December 2, 2012

आज़ादी का अर्थ

इतने मदारी, इतने बंदर!
मस्त से बैठे कैम्प के अंदर
ठहाके लगाते, खैनी फांकते
अपनी-अपनी कमाई का हिसाब लगाते
अपने-अपने मजमे की भीड़ के बारे में
बातें करते...
मदोन्मत्त से इतराते-छितराते
भविष्य यानी कल की योजना बनाते
इलाकों का चयन, समय का चयन
ज़रूरी है, भीड़ इकट्ठी करने के लिए

Sunday, November 25, 2012

कुछ न समझे, ख़ुदा करे कोई

पर्वत ऊँचा होता है। अडिग होता है। पत्थरों का होता है। तभी सदियों तक तना होता है। माटी के ढूह की उम्र कभी नापी है, किसी ने? गली-मुहल्ले में हो या बियाबान में..., या तो शरारती बच्चे कूद-कूद कर उसका मलीदा बना देंगे या फिर हवा-पानी अपना काम कर जाएगी। ज्यादा अड़ियल और हिम्मती निकली तो मूसकराज उसे इतना खोखला बना देंगे कि वह दलदल जैसी तासीर ग्रहण कर लेगी।

मिट्टी का टीला ज्यादा दिनों तक अस्तित्व में नहीं रह सकता। उसके नहीं रहने के कारण, कुछ भी हो सकते हैं। जाड़े में आप मिट्टी के टीले पर बैठें या कि पहाड़ की चट्टान पर, दोनों ही ठंड का ही एहसास कराएंगे। गर्मी में दोनों की तासीर गर्म हो जाती है। वैसे एक बात मिट्टी के ढूह में ऐसी है जो इसे पहाड़ या चट्टान से अलग करती है। वह ये कि मिट्टी, पत्थरों की तरह न तो ज्यादा गर्म होती है और न ही ज्यादा ठंडी। यहां एक ख़ास किस्म का समन्वय होता है जो सकून बख्शता है।

Saturday, November 17, 2012

थोड़ा वक्त लगेगा अभी



मीडिया पर लोग उंगली क्यों उठाते हैं? मीडिया कुछ मामलों में इतना दकियानूस क्यों है? कंटेंट को लेकर बेबहरापन क्यों है? मीडियाकर्मियों के साथ इन-हाउस शोषण पर वरिष्ठ चुप क्यों रहते हैं? जन-सरोकार से जुड़ी ख़बरें अक्सर छूट क्यों जाती हैं? मीडियाकर्म अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है? जब पेड न्यूज़ की सभी आलोचना करते हैं तो फिर इस प्रवृति पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया उथली भाव-भंगिमा की गिरफ्त में क्यों है? क्या सचमुच मीडिया सत्ता का चापलूस या कि वर्ग विशेष का प्रतिनिधि बनकर रह गया है? मीडिया में आमजन कहां ठहरते हैं? सवाल इतने हैं कि दिमाग कभी-कभी विद्रोह को आतुर हो जाता है। लेकिन जवाब...?

Friday, November 9, 2012

बूँदों का तिलिस्म


उमस और ऊब का माहौल 
मन को कोंचते... 
ख़्वाहिस को बढ़ाते... 
बिल्कुल प्यास की तरह
जबकि नल की टोटी 
चिढ़ाती रहती !
बूंद-बूंद पानी टपका कर...
हाथों की अंजुरी बना कर 
ऊँकड़ूं बैठा, आगे को झुका...

Friday, October 12, 2012

गुमशुदा आवाज़



साहब मैं पटना से बोल रहा हूँ। आपसे कुछ भी नहीं छुपाउंगा। बिल्कुल सच बताउंगा। मैं लव मैरिज करने के बाद अब पछता रहा हूँ। बीवी ब्लैकमेल कर रही है। उसका किसी और के साथ संबंध है। मेरे पास वीडियो फुटेज है। फोन की रिकॉर्डिंग भी है। चाहकर भी विरोध नहीं कर सकता। खुदकुशी की धमकी देती है। दहेज-प्रताड़णा का मामला बनाने और जेल भिजवाने की धमकी देती है। पुलिस को बता नहीं सकता। घरवाले पहले से ही खार खाए बैठे हैं। अंतिम उम्मीद आप ही हैं। मैं सुनता हूँ। ठीक वैसे जैसे यह रूदाद काठ के उल्लू को सुनाई जा रही हो। उसके चुप होने पर हल्ला बोल का नियत समय बतलाता हूँ। थोड़ी सी ढांढ़स देता हूँ और फोन कट।

Monday, October 1, 2012

बदले-बदले सरकार नज़र आते हैं !


बहुत शोर था तेरे सनमख़ाने में, तू शेर है, शीरीं है, शहंशाह है। जनता का हमदर्द, बड़ा हाकिम है। सुनता है उन्हें तू, देता है तसल्ली। हकीकत है या भ्रम है? सब पर्दे का करम है। एक दौर था। जब तुमसे बड़ा, तुमसे अच्छा कोई न था। अब एक दौर है। जब तुमसे बुरा कोई नहीं।

Monday, September 10, 2012

मूव ऑन



भारत कभी सोने की चिड़िया तो कभी गुलामों का देश रहा। भारत कभी पंचशील सिद्धांत के कारण विख्यात रहा। भारत कभी विकासशील, दलित-दमित देशों का उद्धारक तो कभी अगुआ रहा। भारत कभी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध के दौरान तीसरी शक्ति यानी गुट-निरपेक्ष आंदोलन का जनक रहा। भारत कभी सोवियत संघ के प्रभाव में समाजवाद की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाने वाला देश रहा। भारत अमेरिका के पूंजीवादी और विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने वाला देश भी रहा। जब कभी अफ्रीकी, एशियाई या फिर लातीन अमेरिकी ग़रीब मुल्क संकट में पड़ा, उसको संबल और मदद पहुंचाने वाला पहला देश भी भारत ही रहा।

Thursday, August 16, 2012

कठपुतली नाच वाया अन्ना बाबा


एक अन्ना थे। एक बाबा थे। धारणा के विपरीत बाबा जवान थे। धारणा के विपरीत अन्ना बूढ़े थे। दोनों अपनी-अपनी कुटिया में रहते थे। बाबा की जनता भक्त थी, नेता भक्त थे।हर छोटा-बड़ा, बाबा के इशारे पर कदमताल करता। हैंड्स अप और डाउन करता। सब के सब नतमस्तक होते। बाबा कसरती तो थे, लेकिन थे दुबले-पतले। भक्त समझते योग का बल है। जबकि बाबा राष्ट्र चिंता में तिल-तिल घुलते मंच पर उछल-उछल कर लोगों को मज़बूत बनाते। खाए-अघाए का देश था। काया थुल-थुल, चर्बीवाली। एक-एक शरीर में छोटी-मोटी दर्जनों बीमारी। प्राकृतिक उपचार पद्धति थी रामबाण। बाबा की कोशिश ने कई काया को बनाया कांचन। आने लगी बन आंधी माया। शिविरों में जब उमड़ी भीड़। देश चिंता में वह हुए अधीर। भानुमति का कुनबा जोड़ वह अश्वमेध को हुए विकल। नेताओं ने भौंह तरेरी। प्रतिष्ठा जो दी थी, वो झटके से ले ली। भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का जो आरोप लगा तो वह बेहद घबराए। लौट गए फिर से कुटिया को। बहुत दिनों तक न बाहर आए।

Tuesday, August 7, 2012

कुछ तो ख़ता, कुछ ख़ब्त भी है


लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सियासी वितंडावाद है। भोगवाद है। विकासवाद है। समाजवाद है। पूंजीवाद है। संचार युग है। मीडिया है। बाज़ार है। सराय है। यानी जो कुछ है- प्रचुर है। कोई खुशी तो कोई गम में चूर है। जिसके पास नहीं है, वह मजबूर है। जिसके पास है, वह मग़रूर है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो नहीं है। यंत्र-तंत्र, व्यवस्था, पैरोकार, बिचौलिए, सरदार, सरकार, नेता, सत्ता, कुर्सी, मंत्री, संतरी, चोर, पहरेदार...

Sunday, July 1, 2012

आज भी परेशान है फक्कड़ बुड्ढा



(हमारे सबसे प्रिय जनकवि बाबा नागार्जुन को सादर समर्पित।)
आज भी परेशान है फक्कड़ बुड्ढा
तरौनी गांव के पीछे
मसान में
चिता की राख में
चिंगारी ढूंढता
मिला था फक्कड़ बुड्ढा
भावों की विह्वलता तो क्या
पराजय की छटपटाहट कहें
या दमा का दौरा !

Thursday, May 31, 2012

कुछ कणिकाएँ... कुछ क्षणिकाएँ... यूं ही आएँ-बाएँ!!!


(1)
ले आए ये कैसा प्याला
पिये बिना ही जग मतवाला
देख-देख आँखें चुँधियाईं
जग का ऐसा रूप निराला
कब से आँखें धधक रही हैं
जिगर में भड़की है ज्वाला

Thursday, May 17, 2012

आत्मालाप (आवाज़ गुमशुदा और वक्त कुत्ता है अब)


आत्मालाप-1
सीने में जलन सी हो रही है
होंठ फड़फड़ा रहे हैं...
अजीब सी बेचैनी सवार है
ज़ोर-ज़ोर से चीखना चाहता हूँ
लेकिन कहीं किसी कोने में दुबका बुज़दिल
डरा रहा है, ख़ौफ़ का छौना 

Thursday, April 12, 2012

देवी ये न्याय है या प्रहसन?


साल की पहली तारीख़ थी। सुबह का वक़्त था। नये साल के स्वागत में आधुनिक लोकतंत्र का एक मसीहा यानी जन-प्रतिनिधि व्यस्त था। पूर्णिया में अपने आवास पर विधायक राज किशोर केसरी ने दरबार सजा रखा था। दरबारी और भक्त आ-जा रहे थे, अपना-अपना दुखड़ा सुना रहे थे। फरियाद कर रहे थे, मुराद पा रहे थे। ठंड ने संवेदनाओं को भी सर्द कर रखा था। कहीं किसी के भीतर घुट रही वेदना ने धीरे-धीरे प्रतिरोध और फिर प्रतिशोध की ज्वाला का रूप ले लिया था।

Friday, April 6, 2012

मेरा फ़रिश्ता


मेरे नन्हे, ज्यादा दिनों का नाता नहीं तुझसे
अभी तो आया है, लेकिन है बड़ा जादूगर!

मेरे नन्हे, मेरे मन को तूने बांध लिया है
तेरे जाने ने मुझे जिन्दगी में पहली बार
अकेलेपन, सूनेपन और बेरंग जीवन का अर्थ
सीधे-सीधे और बेखटके ही समझा दिया है
तेरी सूरत आँखों में कुछ बेतरह जज़्ब है

जब भी सोचता हूँ..,
तू सोते में मुस्कराता
पोर-पोर के दर्द को अंगड़ाइयों में तोलता
कभी मानूस निगाहों से देखता
कभी कुछ अजीब सा मुँह बनाता
ठीक मेरी बगल में..,

Saturday, March 31, 2012

कील है कि गड़ी है अभी तक


फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियां देखी नहीं है। लेकिन हां, बात बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।

Wednesday, March 28, 2012

हम चुप क्यों रहते हैं?


वे लोग जब भी आते हैं
बात-बात पर मुस्कराते हैं
आप जो कुछ भी कहते हैं
समझने के अंदाज़ में...
अरना भैंसे की तरह सिर हिलाते हैं
...
जब हम पानी मांगते हैं
वे प्रदूषण की बात करते हैं
जब हम अनाज मांगते हैं

Wednesday, March 21, 2012

दो ग़ज़लें


दोनों ही ग़ज़ले गुजरात दंगों के दौरान लिखी गई थीं और 2005 में समकालीन सोच के जनवरी-अगस्त अंक में छपी थीं। आज अचानक पत्रिका पर नज़र पड़ी तो सोचा दोस्तों की नज़र करूं। अब एक बार फिर लिटमस टेस्ट का मौका है, एक गुमनाम शायर और उसकी शायरी के लिए... और हां, तब क़लमी नाम की ख़ब्त भी थी। तब यानी उस वक़्त जनाब अकबर साहब साहिल हुआ करते थे।

(1)
गर्द-ए-दहशत और लुटा चमन है निगाहों में
देखिए क्या-क्या और हैं ज़ेहन के पिटारों में

बस्तियां वीरान हैं, घर सन्नाटे में डूबा है
जो देखनी है रौनक, तो चलिए क़त्लगाहों में
ख़ौफ़जदा आँखें, ज़र्द चेहरा और थर्राया ज़ेहन
सहमी-सहमी सी सरगोशियां उभरती हैं रातों में

मां की ममता से जब दरिंदे हार गए
सुला दिया बच्चे को मां

Monday, March 12, 2012

ये क्या जगह है दोस्तों...?


होली अपनी सतरंगी छटा बिखेरती हुई यूं निकल गई कि पता भी न चला। कई दोस्त तो तमाम विघ्न-बाधाओं को पार कर, घर भी गए थे। लौटे तो सब-के-सब रंगों में सराबोर। ऐसी बात नहीं कि कपड़े नहीं बदले गए थे। जिस्मों पर कपड़े बिल्कुल साफ और धुले-धुले ही थे, लेकिन मन पर चढ़ा फागुन का रंग बहुत गाढ़ा था। अपनी-अपनी कहानियां थीं, अपने-अपने रंग-ढंग और

Sunday, March 4, 2012

मीडिया का चरित्र, उम्मीद बाकी है!


 
परिस्थितियों का चरित्र हमेशा परिवर्तित होता रहा है। समय और सापेक्षता का सिद्धांत भी स्थायी नहीं है। विचार-व्यवहार बदलते रहे हैं। ऐसे में, सिर्फ इसलिए कि अब तक लोग मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पुकारते या मानते रहे हैं, परंपरा का निर्वाह करते हुए हम भी इसे ऐसा ही मानें, यह कतई ज़रूरी नहीं है। स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता। नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के दौर वाली पत्रकारिता और फिर इसके बाद की पत्रकारिता। ये कोई परंपरागत विमर्श-पद्धति वाला वर्गीकरण नहीं है। बल्कि ये बस काल-परिवर्तन और परिदृश्यगत् बदलाव के अनुरूप मीडिया के कायांतरण की महज सीढ़ियां हैं।

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